Mohd Zahid
मैंने कुछ दिन पहले एक पोस्ट की थी कि मुसलमान मस्जिद मदरसों में इतना चन्दा देता है उस चंदे कि सही प्रयोग कैसे हो तो आईये रमजान के महीने में ज़कात की गणना कैसे की जाए और किस हकदार को दी जाए वह समझते हैं
ज़कात ( दान) का जिक्र हर मजहब में है। मिसाल के तौर पर जैन धर्म में जिस अपरिग्रह (जरूरत से ज्यादा धन/वस्तुएँ अपने पास नहीं रखना) की बात की गई है उसकी बुनियाद में जकात ही तो है यानी जमा मत करो और जरूरतमंदों को बाँट दो , दान कर दो।
इसी तरह सनातन धर्म में भी त्याग करते हुए उपभोग (तेन व्यक्तेन भुंजीथः) की बात कही गई है। यह त्याग दरअसल जकात की ही तो पैरवी है। बाइबल में भी कहा गया है कि ‘फ्रीली यू हेव सिसीव्ड /फ्रीली यू गिव’ यानी तुम्हें खूब मिला है। तुम ख़ूब दो (दान करो)।
इस्लाम मजहब में भी जकात की बड़ी अहमियत है। क़ुरआने-पाक के पहले पारे (प्रथम अध्याय) अलिफ़-लाम-मीम की सूरह अल बकरह की आयत नंबर तिरालीस (आयत-43) में अल्लाह का इरशाद (आदेश) है ‘और नमाज कायम रखो और जकात दो।
जकात, दोस्ती का दस्तावेज तो है ही रोजे का ज़ेवर भी है। ज़कात का जेवर रोजे की गौरव और गरिमा को बढ़ाता है। ज़कात में दिखावा नहीं होना चाहिए। ज़कात का दिखावा, ‘दिखावे’ की जकात बन जाएगा।
दिखावा शैतानियत का निशान है, इंसानियत की पहचान नहीं। रोजा स्वच्छता और इंसानियत का हमदम है रोजा, रोजे की ताकत है जकात। हजरत मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़र्माया ‘रोजा रखते हुए शख़्स को बुरी बात कहने से बचना चाहिए, यह भी ज़कात है।
यह तो हुई सभी धर्मों में दान देने की स्थिति का आकलन ।जहां तक मुसलमानों की बात है तो एक समय में जितना धन इस समुदाय के एक एक व्यक्ति द्वारा दान किया जाता है ऐसा उदाहरण दुनिया में और कहीं नहीं मिलेगा और यह भी सच है कि इस दान का जितना लूट खसोट होता है उतना पूरी दुनिया में और कही नहीं होता होगा, मैने देखा है कि मस्जिद मदरसों के मौलाना इसी ज़कात के धन को बटोरने के लिए सऊदी अरब और इस्लामिक मुल्कों में रमजान के महीने में हर साल जाते हैं और वहाँ मौजूद अपने कुछ दलालों के जरिये सऊदी शेखों के निकाले गये ज़कात को बटोर लाते हैं । चुकी शेखों की समस्या होती है कि ज़कात किसे दें क्योंकि उनके समाज में कोई गरीब तो होता नहीं इसलिए वह भी इस सुविधा को अच्छा मानते हैं और अपनी कमाई या जमा किये माल का ज़कात दे देते हैं जो करोड़ों में होता है । ज़कात है क्या और कैसे इसकी गणना होती है।
इस्लाम में ज़कात की मात्रा निर्धारणऔर उन चीजों को इंगित भी कर दिया जिस पर ज़कात फर्ज है।
इस आधार पर ज़कात को चार भागों में बांटा जा सकता है।
- खेती व बाग
- चौपाय – पशु, ऊँट, गाय, बकरी इत्यादि
- सोना-चांदी इत्यादि
- व्यापार में हुआ लाभ
ज़कात साल में एक बार फर्ज है खेती व बाग का साल उस समय पूरा समझा जायेगा जब फसल पक जाये। अगर ज़कात हर हफ्ते और हर महीने देनी होती तो दौलतमंद लोगों के लिए यह बड़े घाटे की बात होती I यदि जीवन में एक बार फर्ज होती तो इसका घाटा दीन-दुखियों को उठाना पड़ता।
ज़कात की मात्रा व गणना :-
ज़कात की मात्रा व निसाब का निर्धारण मालिको की मेहनत, प्रयास, उनकी सहूलियत एवं मेहनत को सामने रखकर किया गया।
अचानक प्राप्त माल पर व ज़कात :-
अत: जो माल आदमी को अचानक एवं एक बारगी में मिल जाये, (जैसे खनन से प्राप्त धन) तो उन पर साल बितने का इंतजार न किया जाये और जिस समय ऐसे धन की प्राप्ती होती है उसी समय उसका पांचवा हिस्सा उस पर वाजिब हो जाता है कि दान कर दे ।
खेती व बाग ( बरानी खेती ) व ज़कात :-
जिस धन की प्राप्ती में स्वयं उसकी मेहनत शामिल हो तो उस पर 10वां हिस्सा वाजिब होगा। जैसे खेती व बाग इत्यादि जिसके जोतने व बोने का कार्य जो स्वयं करता है ,
किन्तु उसकी न सिंचाई की जरूरत पड़ती है, और न उसके लिए कुआँ खोदने और रहट् आदि लगाने की आवश्यकता पड़ती हो बल्कि बरसात के पानी से सिंचाई ( बरानी खेती ) हो जाती है।
सिंचाई खेती व ज़कात :-
अगर कोई व्यक्ति डोल अथवा किसी अन्य साधन से सिंचाई करता है तो उस पर 20वाँ हिस्सा वाजिब हो जाता है।
धन की देखरेख , सुरक्षा व ज़कात :-
अगर कोई ऐसा काम हो जिसमें बढ़ोतरी मालिक की मेहनत पर निर्भर हो और उसकी देखरेख व सुरक्षा उसके जिम्मे हो तो उस पर 40वाँ हिस्सा वाजिब हो जाता है।
पशु- पशु, ऊँट, गाय, बकरी इत्यादि ज़कात :-
चौपायों पर ज़कात का निसाब अलग -अलग हैं , जैसे: 5 ऊंट पर ही ज़कात देना आवश्यक है और ऐसे ही 40 बकरियां , 30 गायें ।
अर्थात जिस आदमी के पास पशुओं की यह संख्या है उन पर धन के कुल मूल्य का 40 वां हिस्सा अर्थात 2 .5 % ज़कात निकालना वाजिब हो जाता है I
सोना -चाँदी व ज़कात :-
सोने की सीमा = 7 . 5 ,साढ़े सात तोला I
चाँदी की सीमा = 52 .5 , साढ़े बावन तोला I
अर्थात जिस आदमी के पास सोना -चाँदी की इससे अधिक मात्रा है उन पर धन के कुल मूल्य का 40 वां हिस्सा अर्थात 2 .5 % ज़कात निकालना वाजिब हो जाता है I
व्यापार के मुनाफे पर ज़कात :-
व्यापार के मुनाफे को = 52 .5 , साढ़े बावन तोला सोने पर ज़कात रखा गया है I ध्यान रहे की तिजारत के कुल धन पर ज़कात लागु होगा और कुल लाभ पर भी अलग से लागु होगा I अगर किसी व्यक्ति को हानि होती है उस स्थिति में उसके कुल व्यापार के माल में से हानि घटाकर शेष धन पर ज़कात वाजिब हो जाता है I
( अर्थात व्यापार के धन के कुल मूल्य व लाभ का 40 वां हिस्सा अर्थात 2 .5 % ज़कात निकालना वाजिब हो जाता है I )
ज़कात के हकदार
इस्लाम में ज़कात के 8 हकदार बयान किये गए हैं ।
जिनका विवरण ये है-
- फकीर – ये वे लोग है जिन के पास कुछ न कुछ माल तो हो, मगर उन की जरूरत के लिए काफी न हो। जो बेहद गरीबी में गुजर बसर करते हो एवं किसी से मांगते न हो।
- मिसकीन -ये लोग बहुत ही तबा हाल लोग है जिनके पास अपने तन की जरूरतो को पूरा करने के लिए कुछ भी न हो।
- आमिलीन अलैहा – वे मुराद लोग जिनसे इस्लामी हुकुमत ज़कात वसूल करने के लिए मुकरर करे उनको ज़कात के मद से तनख्वाह दी जायेगी।
- मोअल्लफतुल कुलूब – वे मुराद लोग जिन को इस्लाम की हिमायत के लिए या इस्लाम की मुखालिफत से रोकने के लिए रूपया देने की जरूरत पेश की जाये।
- फ़िरिकाब -इनसे मतलब यह है की जो शख्स गुलामी के बंधनों से छूटना चाहता हो उसको ज़कात दी जाये अर्थात् मालिक को रूपया देकर उनको गुलामी से छूड़ा दे ।
- अलगारिमीन – वे लोग जो कर्जदार हो अर्थात् इतना कर्ज की उसे अदा करने के बाद उसके पास कुछ ना बचता हो तो उसे ज़कात दी जा सकती है।
- फी सबीलिल्लाह – ये आम लफ्ज है जो सभी ने कामों पर इस्तेमाल होता है अर्थात् सच्चेदीन का झण्डा ऊँचा करने वालों की मदद करना, जो जरूरत मंद हो।
- मुसाफिर -सफर की हालत में अगर वह मोहताज है तो उसे ज़कात देनी चाहिए।
ज़कात किसे नहीं देनी चाहिए ?
- कोई आदमी अपने बाप या बेटे को ज़कात नहीं दे सकता। शौहर अपनी बीवी को और बीवी अपने शौहर को ज़कात नहीं दे सकती। नजदिकी रिश्तेदार ज़कात के हकदार नहीं है।
- ज़कात सिर्फ मुसलमानों का हक है। लेकिन गैर मुस्लिम को आम खैरात व सदके में से हिस्सा दिया जा सकता है बल्कि आम खैरात में फर्क करना गैर वाजिब है I
- ज़कात अपनी ही आबादी के गरीबों में खर्च होनी चाहिए। अगर अपनी आबादी में ज़कात के हकदार नहीं है तो फिर अन्य आबादी में भेजी जा सकती है।
- इमाम अबू हनीफा रह. के अनुसार जिसके पास 50 रूपये से ज्यादा हो उसे ज़कात नहीं लेनी चाहिए।
यह है विस्तार से ज़कात का पूरा हिसाब किताब, सच यह है कि केवल भारत में लगभग सभी मुसलमान जो इस मापदंड के अनुसार ज़कात के फर्ज से बंधे हैं वह 19-20 गणना करके ज़कात देते ही देते हैं इस्लामिक देशों से आरहे ज़कात जो हैं वह अलग हैं ।
इस लेख को लिखने का आशय बस इतना मात्र है कि रमज़ान आते ही ज़कात के धन की लूटखसोट के कारण सही लोगों तक ना पहुंच पाना एक समस्या है और ज्यादातर फर्जी चंदे की रसीद छपवाकर लोग निकल जाते हैं चंदा वसूलने जो गलत है ऐसे लोगों को बिल्कुल ज़कात नहीं देनी चाहिए ।ज़कात का अधिकतर पैसा मदरसों में जाता है पर वह खर्च कहां और कैसे होता है इसको देखने के लिए कोई व्यवस्था नहीं है।
मैने अपनी सोसायटी की मीटिंग में ही एक प्रस्ताव रखा था कि एक वालेंटरी कमेटी बने जहाँ सभी लोग ज़कात के पैसे जमा करें और वह कमेटी निष्पक्ष रूप से इस धन को जहां जैसी ज़रूरत हो वहाँ खर्च करे , चाहे मदरसा चाहे गरीब बेटियों की शादी हो , इससे कमीशन और बंदरबांट रुक जाएगी , मेरी सोसायटी के ही मौलानाओं ने तुरंत इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया ।
मेरा मानना है कि यह सिस्टम इमानदारी से यदि हर जिले तहसील कस्बे और गांव में लागू कर दिया जाए तो बिना सरकारी मदद के मुसलमानों की बहुत सी समस्याओं का हल केवल ज़कात के पैसे से हो जाऐगा ।
नोट :- मैं इस्लाम का बहुत बड़ा जानकार तो नहीं इसलिए ज़कात की गणना में कोई गलती हो तो आप सुधार कर सकते हैं। 1400 साल पहले गणित पर आधारित इस व्यवस्था को इस्लाम ने बताया जिसे दरों में हेर फेर कर पूरी दुनिया ने लागू किया , टैक्स वसूलने के लिए।


