Mohd Zahid
मैं एक बात बताता हूँ कि दुनिया में कैसे कैसे मुर्ख हैं उससे आपको अंदाजा हो जाएगा जो धर्म के नाम पर लड़ाई तो कर लेते हैं पर उसी धर्म को खुद नहीं मानते ।
आज से कोई 4 दिन बाद ईद उल अजहा है जिसे आम बोलचाल में बकराईद कहते हैं ।अब आप जानवरों की मंडी में बकरे खरीदते तमाम मुसलमानों को देखेंगे जो दरअसल कुरबानी के मुख्य उद्देश्य के बिल्कुल विपरीत कार्य करते दिखेंगे और इस अवसर का उपयोग अपनी शान और शौकत को दिखाने के लिए करेंगे जिसकी इस्लाम में बिल्कुल मनाही है ।
सबसे पहले यह समझिए कि बकराईद क्या है और उसका उद्देश्य क्या है ? और धार्मिक कारण क्या है ? करीब 5000 वर्ष पहले एक पैगंबर हुए थे हज़रत इब्राहिम अलैहिस्लाम जिन्हे उनकी 80 वर्ष की आयु में एक औलाद हुई हज़रत इस्माइल अलैहिस्लाम , इकलौती औलाद होने के कारण वह अपने वालदैन के बेहद प्रिय और दुलारे थे , कुछ वर्ष बाद हज़रत इब्राहिम अलैहिस्लाम ने ख्वाब देखा कि अल्लाह का हुक्म हुआ कि हज़रत इस्माईल अलैहिस्लाम की कुरबानी दे दी जाए , संक्षेप में यह कि हज़रत इब्राहिम अलैहिस्लाम ने अल्लाह का हुक्म मानकर अपनी इकलौती औलाद की गर्दन पर आंख बंद करके छुड़ी चला दी और जब आंख खोला तो उन्होंने हज़रत इस्माइल अलैहिस्लाम को पास खड़ा होकर मुस्कुराते हुए देखा और छुड़ी जो चलाई वह गर्दन दुम्बा (भेड़ ) की थी ।
अल्लाह को उनकी यह अदा इतनी पसंद आई कि कयामत तक सारी उम्मत पर यह कुरबानी वाजिब कर दी और तब से मुसलमानों द्वारा कुरबानी दी जाने लगी ।
सामाजिक रूप में इसका प्रभाव यह हुआ कि गरीब से गरीब तक कुछ पैसे पहुंचने लगे जो बकरे या जानवरों को पालते हैं और बहुतों के तो घर चलाने का यही ज़रिया होता है ।
परन्तु कुरबानी का भाव यह था कि अपनी पसंदीदा चीज कुर्बान करो और इसलिए घर पर पाले गये जानवरों की कुरबानी ही सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है क्युँकि घर के जानवर से 2 वर्ष में लगाव हो ही जाता है ।
अब उन मुर्खता की चर्चा जो इस बहाने की जाती है ।जानवर खरीदने की आपाधापी एक वाजिब को अदा करने के लिए नहीं बल्कि अपनी औकात का दिखावा करने के लिए किया जाता है और जो गरीब कम कीमत के जानवर खरीद कर लाता है उसे अनजाने में ही एहसास कराया जाता है कि वह गरीब है , उसके दिल को कचोटा जाता है ।
कुरबानी के लिए केवल स्वस्थ जानवर की ही आवश्यकता होती है जिसके कम से कम दो दाँत हो परन्तु उसकी खूबसूरती पर लाखों रुपये लुटाए जाते हैं , एक तरह से देखें तो यह उस जानवर के मालिक की मदद ही हुई और खरीदने वाले के माल की कुरबानी , पर यहाँ उद्देश्य उस गरीब कि मदद ना होकर दिखावा है जिसको इस्लाम में सख्ती से मना किया गया है।
बेहतर होता कि जो फालतू के पैसे बर्बाद किये जा रहे हैं वह किसी की बहन बेटी की पढ़ाई लिखाई शादी के लिए खर्च हों तो अधिक सार्थक होगा ।
खबर आ रही है कि जयपुर में एक बकरे की कीमत 48 लाख लग चुकी है जबकि बकरे का मालिक 60 लाख की कीमत माँग रहा है , जानते हैं क्या खास है ? क्युँकि उस बकरे पर मुहम्मद के शब्द जैसी कोई आकृति है ।
यही मुर्खता है और इसका खूब प्रदर्शन किया जाता है।


