1857 का विद्रोह और सूबेदार सीताराम की आपबीती

Opinion1857 का विद्रोह और सूबेदार सीताराम की आपबीती

By Shubhneet Kaushik

सन सत्तावन के विद्रोह को उसकी समग्रता में समझने के लिए विष्णुभट्ट गोडसे, मिर्ज़ा ग़ालिब, सैयद अहमद खाँ और सत्तावनी क्रांति से जुड़े गीतों, लोकगाथाओं (जिन्हें अमृतलाल नागर ने ‘ग़दर के फूल’ में बड़े परिश्रम से संगृहीत किया) के साथ-साथ सूबेदार सीताराम की यह आपबीती भी पढ़नी चाहिए। अवध के तिलोई गाँव में वर्ष 1797 में जन्मे सीताराम पांडे युवावस्था में ही ईस्ट इंडिया कम्पनी की फ़ौज में दाखिल हो गए और अगले पाँच दशकों तक कम्पनी की फ़ौज से जुड़े रहे। यह किताब 1812 से लेकर 1860 तक कम्पनी के सिपाही और सूबेदार के रूप में हासिल हुए उनके अनुभवों का विस्तृत लेखा-जोखा है।

सीताराम मौत के मुँह में जाने से बाल-बाल बचते हैं, अफगानिस्तान में ग़ुलाम बनकर दो साल गुज़ारते हैं और विद्रोह के दौरान अपने विद्रोही बेटे को मृत्युदंड दिए जाते देखने को अभिशप्त होते हैं। उनकी यह आपबीती 1857 के विद्रोह से पहले ईस्ट इंडिया कम्पनी द्वारा चलाए गए सैन्य अभियानों जैसे भरतपुर, ग्वालियर, नेपाल और अफगानिस्तान, सिखों से हुई लड़ाईयों का भी सिलसिलेवार ब्यौरा देती है। सीताराम ठगों और पिंडारियों के विरुद्ध चले अभियानों में भी भागीदार रहे थे। ठगों और पिंडारियों का शिकार होने से बचने की उनकी रोमांचक कहानी रोंगटे खड़े कर देती है।

ख़ुद सूबेदार सीताराम भले ही विद्रोही न बने हों, लेकिन उनकी यह आपबीती उन स्थितियों का, हालात का विवरण ज़रूर देती है, जिसने 1857 के विद्रोह की पृष्ठभूमि तैयार की। वह चाहे अंग्रेज़ सैन्य अधिकारियों द्वारा किया जाने वाले नस्लीय दुर्व्यवहार हो, वेतन-भत्ते का सवाल हो, धर्म द्वारा निषिद्ध क्षेत्रों में सिपाहियों को जबरन ले जाना हो, या फिर सिपाहियों के सामाजिक जीवन से जुड़ी समस्याएँ हों। इन सभी का परिचय इस किताब में मिलता है।

सूबेदार सीताराम की यह आपबीती ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों और नीति निर्माताओं के मन में चल रही उथल-पुथल का भी विवरण देती है। मसलन उन्नीसवीं सदी में ब्रिटिश अधिकारियों, गवर्नर-जनरलों के मन में छाया हुआ रूस के आक्रमण का भय। रूसी हमले के इसी भय ने कम्पनी के अधिकारियों को अफगानिस्तान में राजनीतिक हस्तक्षेप करने और दोस्त मुहम्मद को गद्दी से हटाकर शाह शुजा को गद्दी पर बैठाने के लिए सैन्य अभियान चलाने को प्रेरित किया। इसी अभियान के दौरान काबुल में सीताराम को ग़ुलाम बनाकर बेच दिया गया। बड़ी मुश्किल से वे वहाँ से भागने में सफल हुए। हिंदुस्तान लौटकर वे लम्बी जद्दोजहद के बाद फिर से सेना में शामिल हुए। लेकिन यहाँ सेना में उनके साथ भेदभाव किया जाने लगा – अंग्रेजों द्वारा ही नहीं हिंदुस्तानी सिपाहियों द्वारा भी।

इसी संदर्भ में सूबेदार सीताराम ने लिखा है कि ‘मैं ज़िंदगी से थक गया था। काबुल में मैं वहाँ से निकल भागने के बारे में सोच-सोचकर ज़िंदा रहा। रोज़ वही सपना देखता। अब आज़ाद हूँ लेकिन इस आज़ादी से मुझे क्या मिला? इतना दुःख झेला लेकिन न तरक़्क़ी मिली, न इनाम।’ यह आपबीती हिंदुस्तानी सिपाहियों के अपने जातिगत पूर्वग्रहों और उनकी संकीर्णताओं की भी झलक देती है। सत्तावन के विद्रोह के तीन साल बाद लिखी गई इस आपबीती का अनुवाद जेम्स नॉरगेट ने ‘फ्राम सिपॉय टू सूबेदार : बीइंग द ऑटोबायोग्रफ़ी ऑफ़ ए सिपॉय’ शीर्षक से किया। इस महत्त्वपूर्ण पुस्तक का हिंदी अनुवाद मधुकर उपाध्याय ने किया है, जो वाणी प्रकाशन से छपा है। ज़रूर पढ़ें।

Check out our other content

Check out other tags:

Most Popular Articles