Dr Raju Ranjan Prasad
तिनेरी हाई स्कूल में राजेश्वरी शर्मा सामाजिक विज्ञान (इतिहास-राजनीतिशास्त्र) के शिक्षक थे। वे हमें अंग्रेजी साहित्य भी पढ़ाते। वे बगल के गांव हरिबसपुर के वासी थे लेकिन मसौढ़ी उनका निवास-स्थान होता।
वे मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित थे। उनका मार्क्सवाद रहन-सहन की उनकी शैली में भी प्रकट होता। वे खादी का कुरता और धोती पहनते। पैर में चमड़े का चप्पल होता। कभी-कभी खादी की एक गमछी भी कंधे से झूलती होती। के सी पाल का छाता भी उनका सहचर होता। उन्हें खैनी खाने की बुरी लत थी लेकिन पास कभी न रखते। इस मामले में वे बिल्कुल ‘सर्वहारा’ थे। किसी खैनी खानेवाले को विद्यालय के आसपास भटकता हुआ देख लेते तो हममें से किसी एक बच्चे को उसके पीछे दौड़ा देते। खैनी देनेवाले को कभी ना- नुकुर करते नहीं देखा। खैनी सर्वहारा-संस्कृति की चीज लगती है। खैनी खानेवालों में एक अदृश्य परिचय होता है। कोई किसी से हाथ बढ़ाकर खैनी प्राप्त कर सकता है। राजेश्वरी बाबू इस संस्कृति का यथेष्ट लाभ लेते।
सन 80 की बात होगी जब एस एफ आई के छात्र-नेता श्री रविन्द्र राय को राजेश्वरी बाबू मेरे स्कूल ले गये थे। वहां उन्होंने हम बच्चों को संबोधित किया था। भाषण का क्या विषय था आज कुछ भी स्मरण नहीं है। इसके कुछ दिनों बाद ही राजेश्वरी बाबू ने एस एफ आई की कुछ रसीद थमा दी थी। 25 पैसे सदस्यता शुल्क लेकर छात्र को सदस्य बनाया जाता था। तब महीने में दो दिन-15 और 30 तारीख को छात्रों से शुल्क वसूला जाता। उधर वर्ग शिक्षक अपनी रसीद काटते और मैं अपनी। कुछ दिनों की मिहनत के बाद मेरे पास लगभग सात-आठ रुपये की राशि जमा हो चुकी थी। इसकी भनक मेरे छोटे चाचा को लग गई। उन्होंने बड़े चाचा का भय दिखाकर रुपये जब्त कर लिए। बड़े चाचा यद्यपि कम्युनिस्ट विचारों से प्रभावित कांग्रेसी थे। बाद में उनका कम्युनिस्टों से मोहभंग हुआ तो एक तरह की घृणा पाल बैठे थे। छोटे चाचा ने उनकी इस घृणा का लाभ लिया और पैसे हस्तगत कर लिए। पैसा उनकी कमजोरी भी था। अपने कई प्रयासों के बावजूद राजेश्वरी बाबू को मैं रसीद के पैसे न दे सका। एक-दो बार के तगादे के बाद वस्तुस्थिति का उन्हें भी ज्ञान हो चला था। अतः मांगना छोड़ दिए और अंततः मैं इस जिम्मेवारी से मुक्त हो गया।
सन 84 में जब मुझे मैट्रिक की परीक्षा देनी थी तो उन्होंने केंद्राधीक्षक के नाम का एक पत्र भिजवाया था। तब मेरा सेंटर हाई स्कूल साईं था और परीक्षा के दौरान बगल के गांव मोरियामा में एक पुराने रिश्तेदार के यहां ठहरा था। सहपाठी सतीश भी वहीं ठहरा था। उसने फार्म कुछ इस तरीके से भरा था कि बोर्ड से रॉल नं. आगे-पीछे आ सके ताकि परीक्षा में साथ बैठने की व्यवस्था हो। इस समझौते के लिए मैंने रोज शाम में एक सिगरेट की शर्त रखी थी। सिगरेट की लत यहीं से लगी। परीक्षा में चोरी का मैं शुरू से विरोधी था। अपने विद्यालय में भी मैं चोरी न करने के कारण बदनाम था। गांधीजी के बाद एक मैं ही होऊंगा जिसे चोरी के लिए शिक्षक भी उकसा जाते। चोरी करते बच्चों की धर-पकड़ के लिए कुख्यात दीनबंधु बाबू भी इधर-उधर झांक लेने की सलाह दे जाते किन्तु मेरा मन सदैव ही गांधी बना रहा। इसलिए राजेश्वरी बाबू की चिट्ठी मेरे लिए एक मुसीबत ही थी। मैं उस चिट्ठी को रोज प्रवेश-पत्र की तरह अचूक रूप से ले जाता लेकिन केंद्राधीक्षक महोदय से केवल अंतिम दिन ही मिल पाने का सुयोग हुआ। उन्हें चिट्ठी दी तो बोले पहले क्यों नहीं दिया। मैंने कहा कि मुझे किसी तरह की अनुचित छूट नहीं लेनी थी, इसलिए आज सौंप रहा हूँ। थोड़ी डांट लगाकर शिक्षक काफी खुश थे। मैं भी खुश था कि मैंने गुरु के ‘धर्म’ की रक्षा की।


