Alok Bajpai
मैं जिस दौर में होश वाला हुआ उसमे दिलीप साहब का नाम व शोहरत तो थी ही लेकिन उस तरह से बहुत सी फिल्में नही थीं। मुझे उनकी पहली फ़िल्म जो बचपन की याद है वो 1981 में आई क्रांति थी। दिलवाले दिलवाले तेरा नाम क्या है तेरा काम क्या है — क्रांति क्रांति क्रांति।
फिर आयी शक्ति शायद 1982 में। हम तब अमिताभ बच्चन की ढिशुम ढिशुम के दीवाने थे। लंबा कद ,झुके कंधे ,चलने का अंदाज शायद अच्छा लगता था । मुझे याद है डैडी जब दिखाने ले गए तो बोले अब अमिताभ बच्चन को पता चलेगा कि एक्टिंग क्या होती है। पहली बार थोड़ी समझ के साथ दिलीप कुमार को एक्टिंग करते देखा। फ़ोन पर उनका बोलना कि मार डालो मेरे बच्चे को, कर दो उसका खून। जब फ़िल्म देख कर लौटा तो फ़िल्म समझने में थोड़ा mature होकर लौटा था और यह भी अहसास कि अमिताभ बच्चन दिलीप कुमार के आगे फीके रहे जबकि स्क्रिप्ट के हिसाब से तो उन्हें ज्यादा सहानुभूति मिलनी चाहिए थी। अमिताभ को दुबारा शाहरुख खान के आगे एक्टिंग में कमजोर होते देखा मोहब्बतें में जिसमे आखिर में वो सीन है कि लेकिन सर जहां से मैं देख रहा हूँ आप हार गए।
दिलीप कुमार की फ़िल्म आई विधाता। हमको था कि डैडी ये फ़िल्म तो जरूर दिखाने ले जाएंगे । लेकिन डैडी हम लोग को नही ले गए और एक नाईट शो चुपके से देख आये बिना हमे पहले से बताए। अब घर जब आये तो बहुत खुश खुश। हम लोग पीछे पड़ गए कि बताइये क्या बात है। उन्होंने नही बताया कि फ़िल्म देख आये अकेले। पर पिक्चर के सीन बताने लगे खूब मजे ले ले के। हम लोग पीछे पड़ गए कि क्या आप देख आये? टाब उन्होंने हंसते हुए कहा हाँ।
इधर बाद में जब इतिहास पढ़ना शुरू हुआ तो धीरे धीरे हर चीज में दिलचस्पी रखनी हुई क्योंकि एक इतिहासकार को अपनी सोच का दायरा फैलाना होता है। तो फिल्मी दुनिया पर भी एक नजरिया बनना शुरू हुआ।
अब दिलीप कुमार के बारे में।
दिलीप कुमार नेहरू युग की देन हैं। वह दौर था जब लोग ऊंची तबियत के होते थे ,उनमे एक गहराई और एक सच्चाई होती थी।लोग खुश थे ,उत्साह से भरे थे, भारत पे नाज था ,एक आत्मविश्वास था ,पश्चिम से खौफ न खाते थे, सुंदर और गरिमामय थे, और जी हां सेक्युलर थे। कला ,संस्कृति एक सेक्युलर माहौल में ही अपने उरूज पे पहुच सकती है , साम्प्रदायिक चिरकुटई में नही। दिलीप कुमार की आत्मकथा एक पठनीय किताब है जिसमे यह सब मिलेगा।
दिलीप कुमार ने एक्टिंग में एक नया आयाम जोड़ा। उन्होंने नाटकीयता और सहजता व ठेठ भारतीय अंदाज को आपस मे पिरोया और अपना एक मेथड एक्टिंग का स्कूल कायम किया जिसमें लगभग सभी सराहनीय मानवीय संवेदनाओं को अभिव्यक्ति दी जा सकती थी। उनका improvisation कमाल का था । उनके बाद राजेश खन्ना की एक्टिंग में यह चीज शानदार ढंग से दिखती है और इधर के एक्टर्स में शाहरुख खान में।
अशोक कुमार के दौर में एक्टिंग में सहजता की नई शुरुआत हुई थी। दिलीप कुमार ने उसमे थियेटर अभिनय भी जोड़ा।
दिलीप कुमार में अभिनय में एक खास बात थी जो बाद में नही दिखती। वह है बिना बोझिल हुए समय गति को ठहरा देना । एक सुकून था उनकी अभिनय शैली में और शनैः शनैः संगीतमय गत्यात्मकता थी।पूर्णतः अहिंसक आत्मा वाले के लिए ही यह सम्भव होता है।
सिनेमा के इतिहास में और फ़िल्म प्रेमियों के सीलोन में भी दिलीप कुमार हमेशा राज करेंगे।


