तालाब को स्वीमिंग पुल न बनायें

Opinionतालाब को स्वीमिंग पुल न बनायें

Pushya Mitra 

मुझे हमेशा लगता है कि पटना और बिहार के दूसरे शहरों के पास नारायण जी चौधरी जैसा सजग पर्यावरण कार्यकर्ता क्यों नहीं है। अब इस पोस्ट के साथ जो तालाब के जीर्णोद्धार की तसवीर लगी है, उसे देखकर आमलोगों को कुछ भी गलत नहीं लगेगा। पटना शहर में अदालतगंज तालाब को तो पूरी तरह सुखाकर उसकी पेंदी तक को सीमेंटेड कर दिया गया, मगर कोई विरोध नहीं हुआ। मगर तालाब के पारिस्थितिकीतंत्र और उसे जुड़े कानूनों की जानकारी रखने के कारण नारायण जी ने जीर्णोद्धार की इस प्रक्रिया पर जो आपत्तियां की हैं, उसका लाभ निश्चित तौर पर दरभंगा को मिलेगा। उन्होंने आपत्ति करते हुए जो पत्र दरभंगा विवि को लिखा है, उसका अंश पढ़ें-

………………………….

आपका ध्यान आकर्षित करते हुए तालाब की संरचना के एक महत्वपूर्ण अंग, जिसे मिथिला में ‘कछैर या कछार’ कहते हैं, की ओर दिलाना चाहता हूँ, जो जलीय पारिस्थितिकी तंत्र (Aquatic Ecosystems) को सुरक्षित एवं संरक्षित रखने में अहम् भूमिका निभाता है।

तालाब के किनारे से इसके बेड/पेट तक उतरने वाला जो ढलान चारो तरफ होता है, उसे तालाब का कछार कहते हैं। तालाब का कछार वह जगह होता है, जिसमें इसके पानी का स्तर वर्षा ऋतु में उच्चतम और जून में निम्नतम रहता है। अर्थात कछार तालाब का वह स्थान होता है, जिसमें इसके पानी के स्तर का उतार-चढाव विभिन्न ऋतुओं में अलग-अलग होता रहता है। यह कछार सैकड़ों तरह के जलीय जीवों का निवास स्थान और प्रजनन स्थल होता है। मिथिला के कोई भी आम आदमी आपको बता सकता है कि कछार में घोंघा, सितुआ, डोका, केकड़ा, कछुआ, चाली/अर्थवर्म, घुरघुरा सहित अनेक कीड़े-मकोड़े का निवास और प्रजनन स्थल होता है। इसके साथ-साथ, पोठी, मारा, देढ्बा, चेंगा, गरई, सिंगी, मांगुर, गैंची, ढलई, भुल्ला, कबई, कोतरी, झींगा, चेल्हा, चना, लट्टा, सौरा, भोंरा आदि दर्जनों मछलियों का भी निवास व प्रजनन स्थल कछार ही होता है। सैकड़ों तरह के सूक्ष्म जीव भी अभी निवास और प्रजनन यहीं करते हैं। इसीलिए यह कछार तालाब/जलाशय के जलीय पारिस्थितिकी तंत्र (Aquatic Ecosystem) को बनाए रखने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कई तरह के पक्षी भी अपने भोजन के लिए तालाब और इसके कछार के जीव-जंतुओं पर निर्भर होते हैं। मिथिला में तालाब के कछार पर घास लगाने (बायोलॉजिकल फेन्सिंग) और इसके भिंडा/किनारे में पेड़-पौधा लगाने की परम्परा रही है। इसके अलावा, तालाब के किनारे पक्का घाट और छोटा सा मंदिर भी बनाने की परम्परा रही है।

महोदय, विश्वविद्यालय प्रशासन की इस तालाब के सौन्दर्यीकरण के नाम पर इसके कछार के समस्त क्षेत्र पर लगभग 15 फीट चौड़ा और लगभग 5 फीट तालाब के बेड/पेट में ईट और सीमेंट-कंक्रीट की ढलाई करने की योजना है, जैसा स्थानीय लोगों ने बताया। अगर यही सौन्दर्यीकरण करने की योजना है, तो इससे इस तालाब के जलीय पारिस्थितिकी तंत्र की ह्त्या होगी। ऐसा प्रतीत होता है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने “जल, जलाशय और नदी” के एक्सपर्ट, जो जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के जानकार होते हैं, से बिना सुझाव लिए ही सौन्दर्यीकरण की योजना/डिजाइन बनायी है।

महोदय, विश्वविद्यालय का परिसर ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर वाला इलाका है। इस परिसर के अंतर्गत लगभग 800 वर्ष पुराना एक विशालकाय झीलनुमा तालाब है, जिसे मिथिला के कर्णाटवंशीय राजाओं द्वारा बनाया गया है। दोनों विश्वविद्यालयों के परिसर और इसके भवन का निर्माण खंडवला कुल के राजाओं द्वारा किया गया है। खंडवला कुल के राजाओं द्वारा आठ या नौ तालाबों का निर्माण भी इस परिसर में कराया गया है, जो सभी आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए थे और इसीलिए इस परिसर में कभी भी जल-जमाव की समस्या नहीं होती थी।

हम उम्मीद करते हैं कि विश्वविद्यालय (LNMU) के पदाधिकारीगण पर्यावरण, जैव-विविधता और पारिस्थितिकी से संबंधित सरकार के गाइडलाइन्स, दिशा निर्देश और माननीय न्यायलय के आदेश की अद्यतन जानकारी (latest information) जरूर रखते होंगे। अतः विनम्र अनुरोध है कि:

1) माननीय न्यायालय, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के आदेश से CPCB द्वारा बनाए गए गाइडलाइन्स एवं जलीय पारिस्थितिकी तंत्र (Aquatic Ecosystems) के रक्षार्थ भारत सरकार द्वारा बनाये गये गाइडलाइन्स एवं दिशा निर्देशों की सम्मान करते हुए तालाब पर अभी किये जा रहे विनाशकारी सौन्दर्यीकरण पर अविलम्ब रोक लगायेंगे। साथ ही अपने इस तालाब के जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के रक्षार्थ एवं सुधारात्मक कार्य के लिए आवश्यक कदम उठायेंगें।

2) सांस्कृतिक तालाब के सौन्दर्यीकरण का डिजाइन कभी भी ‘स्वीमिंग पूल’ के कांसेप्ट/डिजाइन और तकनीक से न किया जाय। जिस तरह से अभी सौन्दर्यीकरण किया जा रहा है, उससे यह तालाब, तालाब न रहकर एक बड़ा स्वीमिंग पूल बन जाएगा। तालाब और स्वीमिंग पूल – दोनों दो चीजें हैं, दोनों की संरचाएं, आवश्यकताएं, भूमिका और उद्देश्य भी अलग-अलग होते हैं।

3) तालाब हमारी सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर है। मिथिला में तालाब का निर्माण समस्त जीवों, जिसमें मनुष्य के अलावा, पशु, पक्षी, कीड़े-मकोड़े एवं जलीय जीव भी शामिल हैं, के कल्याण, बल प्राप्ति एवं स्नानादि के उदेश्य से किया जाता है। किसी भी तड़ागोत्सर्ग पद्धति में इस विषय पर विस्तार से जानकारी मिल सकती है। अतः हमारे इस (तालाब) सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर की सुरक्षा, संरक्षण और पुनरुद्धार (RRR) की योजना बनाने में पर्यावरण, जैव-विविधता एवं पारिस्थितिकी के प्रति संवेदनशील हो।
……………….
मेरी तरफ से यह पत्र उन तमाम परियोजना प्रबंधकों के नाम है, जो तालाब को स्वीमिंग पुल बनाने में जुटे हैं।

Check out our other content

Check out other tags:

Most Popular Articles