जमालहाता ~ जहां के बुनकरों से राजेंद्र प्रसाद ने रंग-बिरंगे कपड़े ख़रीदे थे, अब लड़ रहा वजूद की लड़ाई

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Rameez Raza

कभी सूता व हाथ के बने कपड़े के लिए मशहूर मंडी के रूप में चर्चित सिवान जिले के जमालहाता गाँव आज अपनी पहचान को बनाए रखने के लिए कड़ी मशक्कत कर रहा है। ऐसी मान्यता है कि कृषि के बाद रोजगार उपलब्ध कराने के मामले में हस्तकरघा कुटीर उद्योग दूसरे नंबर पर आता है, लेकिन आलम यह है कि सरकारी मदद के अभाव में जिले का यह फलता-फूलता उद्योग अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए जूझ रहा है। समय की बदलती जरूरतों के साथ ही यह उद्योग अपनी पुरानी प्रतिष्ठा खो चुका है। सिवान जिले के हुसैनगंज प्रखंड के जमालहाता गाँव कभी रंग-बिरंगे धागों से बनाए गए वस्त्रों के लिए जाना-पहचाना जाता था। शतरंगी चादर के साथ ही लूंगी, साड़ी, गमछा बनाए जाते थे। इसके लिए स्थानीय स्तर पर रॉ मटेरियल उपलब्ध कराए जाते थे। वही पंजाब, मेरठ, मऊ, देवरिया, भटनी आदि स्थानों से व्यापारी आकर माल लेकर जाते थे।

डॉ० राजेन्द्र प्रसाद ने बापू को भेंट किए थे वस्त्र

जमालहाता गांव का हस्तकरघा वस्त्र आजादी के पहले से अपनी विशेष पहचान रखता रहा है। यहां के बुनकरों के बनाए गए कपड़े के प्रशंसक प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डॉ० राजेन्द्र प्रसाद भी थे। आजादी की लड़ाई के दौरान जीरादेई आए महात्मा गांधी को डॉ० राजेन्द्र प्रसाद ने इन बुनकरों के बनाएं गए वस्त्र को भेंट किया था। कहा जाता है कि डॉ० राजेन्द्र प्रसाद जब जमालहाता के बुनकरों से मिले तो उनके द्वारा रंग-बिरंगे धागों से बनाए गए वस्त्रों को देखकर गदगद हो गए। बुनकरों की हौसला अफजाई करते हुए उनसे वस्त्र भी खरीदे। राष्ट्रपति बनने के बाद यहां के बुनकरों के बनाए गए वस्त्र को पहनते थे। बुनकर समिति के निदेशक प्रोफेसर तौहीद अंसारी ने बताया कि डॉ० राजेन्द्र प्रसाद ने बुनकरों के विकास व उद्योग के बढ़ावा के लिए तीन मोबाईल वैन उपल्बध कराया था, ताकि करीगरों को माथे पर रखकर वस्त्र को बेचना नही पडे़।

गाडी खाराब होने पर खुद के खर्चे से बनवाते भी थे.

1986 मे हैंडलुम कारखाना बनाने की शुरुआत हुई जिसका कार्य करने का टेंडर विटको कंपनी को दिया गया, लोगों ने अपनी निजी जमीन कारखाने को बनाने के लिये दिया। लेकिन 1989 में हैंडलूम यूनियन के अध्यक्ष पद खत्म कर दिया गया, हैंडलुम कारखाने का कार्य पूरा होने से पहले ही जब चेयरमैनशिप खत्म हुआ तो कंपनी और अफसर मिल कर पैसों का खूब अच्छे से बंदर बंट किए और जो हैंडलूम 1990 में हैंडओवर करना था वह आज भी बदहाली पर रो रहा है, आज 30 साल हो गए कई सरकारे बदली कई नेता बदले नहीं बदला तो बुनकर लोगो का जीवन मेरी बात सीवान विवर्स हैंडलूम कोऑपरेटिव यूनियन के अध्यक्ष श्री रूहुल अमीन साहब से हुई उन्होने बताया की अगर सरकार इसपे ध्यान देती है तो कम से कम 5000 परिवारों का भरण पोषण हो जाता और यह बात जोर देकर कहा की जो बुनकरों का हाल बदतर है उसमे बदलाव लाया जा सकता है। सरकार अविलम्ब इसको शुरु करने का प्रयास करे।

 

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