Dr Rajendra Jha
कोविड से जंग जारी है. पिछले अठारह महीनों में हम ने बहुत खोया, लेकिन बहुत सीखा भी और अनेक उल्लेखनीय विजय भी हासिल की: कोविड के लिए निश्चित औषधि बन गयीं हैं, संक्रमण रोकने के लिए हम अनेक टीके ला पाए हैं लेकिन जंग जारी है और तनिक भी आत्मसंतोष आत्मघाती सिद्ध हो सकता है. दुश्मन मायावी है, अपने को कमजोर पड़ते देख वह फ़ौरन अपना रूप बदल लेता है और हम फिर कई कदम पीछे चले जाते हैं.
इजराइल एक उदाहरण है. छोटा देश है, सरकार टीकाकरण के प्रति कटिबद्ध थी, नागरिक अनुशासित हैं और इज़राइल दुनिया का पहला देश हुआ जहाँ साठ प्रतिशत से अधिक लोग पूरी तरह टीकाकृत होगये. इज़राइली वैज्ञानिकों के विचार से देश में यूथ प्रतिरक्षा (हर्ड इम्युनिटी) की स्थिति आगयी थी. कुछ दिन इन्तजार कर कोविड के चलते जितने प्रतिबन्ध थे – नकाब, सामाजिक दूरी वगैरह सब हटा दिए गए. पर यह एक महीने भी नहीं चला. वाइरस के डेल्टा रूपांतर पर टीकों के कम प्रभावी पाए जाने पर इस्राएल में प्रतिबन्ध फिर वापस लागू कर दिए गए. टीके के बावजूद वाइरस के विरुद्ध सबसे प्रभावी हथियार हैं नकाब, दूरी और हाथों को धोते रहना. लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि टीके किसी काम के नहीं हैं. इस लड़ाई में टीके का मूल्य नहीं आँका नहीं जा सकता. यह सच है कि टीकाकरण के बाद भी कुछ रूपांतरों से संक्रमण हो रहे हैं लेकिन यह भी सच है कि टीका लिए व्यक्ति की बीमारी गंभीर रूप नहीं ले रही.
वाइरस के बदलते रूप मिथकों के प्राणियों की याद दिलाते हैं. प्रायः सभी धर्मों के मिथकों में ऐसे प्राणियों की चर्चा है जो मनुष्यों पर हावी होने के लिए अपने रूप बदल लेते हैं. हिन्दुओं में ऐसे अनेक राक्षसों के उल्लेख हैं, अब्राहमिक धर्मों में शैतान ऐसा करते रहता है. सार्स कोवी 2 भी वैसा ही करता दिख रहा है. यह वाइरस, जिसके आदि स्रोत पर अभी तक पर्दा पड़ा हुआ है, दिसंबर 2019 में चीन के वुहान नगर में प्रकट हुआ और कुछ ही महीनों में इसने पूरी दुनिया को अपनी गिरफ्त में ले लिये. और आज अठारह महीने बाद भी स्थिति सामान्य नहीं हो पायी है.
वाइरस की संरचना से अब हम सब परिचित हो गए हैं. वसा और प्रोटीन की एक झिल्ली (खोल) के अंदर उसकी जेनेटिक सामग्री (उसका आरएनए) रहती है, खोल से कांटे जैसे प्रोटीन निकले रहते हैं जिन्हे स्पाइक प्रोटीन कहा जाता है. (स्पाइक के ऊपर पॉलीसैकेरॉइड्स रहते हैं जिससे यह अपने मेजबान के प्रतिरक्षा तंत्र की चौकसी से बच सके.) इस स्पाइक प्रोटीन के दो पृथक अंश (संघटक) हैं एस-1 और एस-2. एस-1 घटक हमारे शरीर की कोशिकाओं की बाहरी सतह पर मिलने वाले एक एन्ज़ाइम एसीई-2 से जुड़ता है और एस-2 घटक वाइरस की झिल्ली और हमारी कोशिका की झिल्ली को मिलाकर एक करता है जिससे वाइरस का आरएनए हमारी कोशिकाओं के अंदर पँहुच जाता है.
सार्स कोवी 2 का आरएनए अपेक्षाकृत लंबा है, तुलना के लिए, एचआईवी के आरएनए से तीन गुने से अधिक लम्बा. आरएनए जितना लंबा होता है उत्परिवर्तन प्रायः उतना ही कम उसमे देखा जाता है. इन्फ्लुएंजा वायरस और एचआईवी के उत्परिवर्तन दर सार्स कोवी 2 के उत्परिवर्तन दर से क्रमशः दो गुने और चार गुने अधिक हैं. मानव शरीर में प्रवेश करने के बाद वायरस के प्रतिजन (ऐंटीजेन) में कुछ बदलाव आते हैं, जितनी बार प्रवेश करता है उतने अधिक बदलाव आते हैं. धीरे धीरे इन बदलावों के चलते वायरस के व्यवहार में परिवर्तन दिखने लगते हैं और हम कहते हैं वायरस का नया रूपांतर आगया. विज्ञानियों की वायरस के प्रमुख रूपांतर में दिलचस्पी (वैरिएंट ऑफ़ इंटरेस्ट) रहती है और यदि किसी रूपांतर के गुण आशंका जगाते दीखते हैं तो इसे चिन्ताजनक रूपांतर (वैरिएंट ऑफ़ कंसर्न) कहा जाने लगता है.
डेल्टा प्लस रूपांतर को चिंताजनक रूपांतर करार किया जा चुका है. हर रोज किसी नए प्रान्त में इसके दिखने की बात आ रही है. यद्यपि हमारी चिंता हाल के हफ़्तों में बढ़ी है, इसके द्वारा हुए संक्रमण के जो आँकड़े आ रहे हैं वे लगभग सभी अप्रैल और मई महीने के हैं – उनके जेनोम को पढ़ने में देर होने के चलते हमें आज पता चल रहा है. और तब लगता है हमारी दूसरी लहर में, जिसे हम डेल्टा रूपांतर की लहर कह रहे थे, डेल्टा प्लस का भी शायद काफी हाथ रहा था.
डेल्टा रूपांतर में जिस उत्परिवर्तन के चलते डेल्टा प्लस आया है उसे ‘के417एन’ कहते हैं. इसका अर्थ हुआ वायरस के आरएनए की श्रृंखला में 417वीं जगह पर ‘के’ नामके एमिनो एसिड की जगह ‘एन’ नामका एमिनो एसिड आगया है. नामकरण की इस पद्धिति से हो रहे उत्परिवर्तनों को समझने में सहूलियत होती है और यदि ऐसा उत्परिवर्तन कहीं और देखा गया हो तो वह पहचान में आता है और उससे नयी जगह पर हुए उस रूपांतर के स्वभाव के बार में अनुमान लगाए जा सकते हैं.
यह उत्परिवर्तन, ‘के417एन’ पिछले साल के अंत में दिखे बीटा (दक्षिण अफ्रीकी) रूपांतर में पाए गए विहार उत्परिवर्तनों में से एक है. बीटा रूपांतर की संक्रामकता बहुत अधिक रही थी, उसी आधार पर यह अनुमान है कि डेल्टा प्लस की संक्रामकता भी बहुत अधिक है. बीटा रूपांतर टीकों से बने प्रतिरक्षियों (ऐंटीबॉडीज़) से बच निकलता था. उसी आधार पर अनुमान लगाया जा रहा है कि डेल्टा प्लस पर टीके उतने प्रभावी नहीं रहेंगे जितने वे वायरस के अब तक मिले रूपांतरों पर रहे हैं.
डेल्टा प्लस के पूर्वावतार डेल्टा रूपांतर का अभी यूके और यूरोप में खूनी दौर चल रहा है. यूके में आजकल 90% संक्रमण डेल्टा के बताए जा रहे हैं जो पहले अल्फा (पुराना नाम यूके या केंट) रूपांतर के होते थे.
स्मरण रहे, ऐस्ट्राज़ेनेका के टीके (हमारा कोविशील्ड वही है) का दक्षिण अफ्रीका में हुए तीसरे चरण के नैदानिक परीक्षण में बहुत अच्छा प्रदर्शन नहीं हुआ था. यह हमारे लिए विशेष चिंता की बात है क्योंकि भारत में अधिकांश लोगों को कोविशील्ड का टीका मिला है. वहीं हमारे दूसरे टीके कोवैक्सिन के बारे में जानकारी कम है क्योंकि अभी तक उसके परीक्षण के आँकड़े जन-साधारण के लिए उपलब्ध नहीं हुए हैं. इस लिए बहुत जरूरी है कि हम सब संभव सावधानियाँ बरतते रहें.
एक अच्छी खबर है कि टीका-उत्पादक टीकों के नए संस्करण बनाने में सक्रिय हो चुके हैं, ये नए टीके कुछ महीनों में उपलब्ध हो जाएंगे, और आशा की जाती है, वायरस के सभी रूपांतरों पर प्रभावी रहेंगे. भारतीयों के लिए एक और अच्छी खबर है कि भारत की कम्पनी जेनोवा फार्मा ने एमआरएनए पर आधारित अपने टीके का दूसरे चरण का नैदानिक पिछले अप्रैल से शुरु कर दिया है और उम्मीद है यह टीका भी कुछ महीनों में उपलब्ध हो जाएगा. पिछले सप्ताह केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि ज़ाइडस कैडिला का टीका भी जल्द उपलब्ध होगा जो 12 से 18 वर्ष वय वालों को दिया जा सकेगा.!
(औषधि विभाग, आरएमसीएच, राँची के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ Rajendra Jha के लेख का हिंदी रूपांतर। डॉ झा का, 28 जून 2021 के पायोनियर राँची में प्रकाशित हुवे लेख के अनुवाद कर्ता Sachidanand Singh हैं।)


