मुग़लों और मराठों के बीच हुवे संघर्ष की असली कहानी

Opinionमुग़लों और मराठों के बीच हुवे संघर्ष की असली कहानी

शिवाजी और मुग़लों के बीच हुई जंग को भी हमेशा धार्मिक रंग दिया जाता है जबकि हक़ीक़त ये है कि शिवाजी की पिता शाह जी और दादा मालोजी बीजापुर के सुल्तान की सेना के एक कमांडर थे। उनकी बहादुरी से खुश होकर आदिल शाह ने पुणे की जागीर सौंप दी और सर लश्कर नाम की सेना की एक टुकड़ी का प्रमुख बना दिया।

मालोजी कई साल तक बिना औलाद के रहे। हज़रत शाह शरीफ़ के आशीर्वाद से दो बेटे हुए। मालोजी ने अपने दोनो बेटो का नाम हज़रत के नाम पर रखा एक नाम शाहजी और दूसरे का नाम शरीफ जी।

मालोजी के बाद शाहजी ने पुणे की जागीर सम्भाली और बीजापुर की सुल्तान के सेनापति अम्बर मलिक के अंदर कमांडर रहे। मुग़ल बादशाह शाहजहां ने जब बीजापुर पर हमला किया तो शाहजी कुछ वक़्त के लिए मुग़ल सेना में शामिल हो गए इनाम के तौर पर उन्हें बंगलोर की जागीर मिली। लेकिन कुछ समय बाद ही मुग़ल सेना छोड़ वापस अम्बर मलिक के साथ चले गए।

यहां तक लड़ाई मुग़लो और आदिल शाह के बीच थी लेकिन जैसे ही पुणे की जागीर शिवजी के पास आई वो आस पास की जागीर पर भी अपना राज बढ़ाने की कोशिश करने लगे जिसके लिए बीजापुर के सुल्तान ने शाहजी को गिरफ्तार कर लिया और इस शर्त पर छोड़ा की दोबारा पुणे से बाहर किसी दूसरे जागीर पर क़ब्ज़ा नही करेंगे।

लेकिन शिवाजी नही माने जिसकी वजह से उनके पिता शाह जी ने शिवाजी से ख़ुद को अलग कर लिया और पुणे छोड़कर दूसरे बेटे के पास चले गए। इधर मुग़लो ने बीजापुर फ़तह कर आदिलशाह को सत्ता से बेदखल कर दिया। आदिलशाह के बचे हुए अफ़ग़ान लड़ाकों को शिवा जी ने अपनी सेना में शामिल कर लिया।

दक्कन में अब मुग़लों और मराठों की बीच संघर्ष शुरू हो गया इधर औरंगज़ेब के साथ जयसिंह, उदयभान जैसे कई बड़े राजपूत और उनकी सेना थी तो उधर शिवाजी की अफ़ग़ान लडको की सेना थी।

मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब जबतक जिंदा थे तबतक मुग़लो ने मराठों को पुणे तक ही सीमित कर रखा था। औरंगजेब की वफ़ात के बाद मुग़ल सल्तनत बिखर गई जिसका फायदा मराठों ने बखूबी उठाया और उत्तर भारत तक मराठा साम्राज्य को फैलाया। सत्ता का संघर्ष यूँही चलता रहा इसमे कही धर्मयुद्ध जैसा कभी नही था जैसा की आज हिंदी फिल्मों और नेताओ द्वारा परोसा जाता है।

Via : Mughal Saltanat

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