प्रेमकुमार मणि
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विपक्षी एकता के प्रयास में दिल्ली प्रवास पर हैं और इस दिशा में आगे बढ़ते हुए वह विभिन्न विपक्षी दलों के वरिष्ठ नेताओं से मिल -जुल रहे हैं. यह स्वागत योग्य कदम कहा जाएगा. विपक्षी दलों की एकता और सक्षम प्रतिपक्ष के गठन का मैं व्यक्ति स्तर पर भी हार्दिक स्वागत करना चाहूंगा. अतएव इस दिशा में किए गए प्रयासों का भी सशर्त समर्थन करता हूँ .
एक प्रश्न मेरे मन में है . वह यह कि किसी एकता के पूर्व हमें बिखराव के कारणों की खोज करनी चाहिए या नहीं ? व्याधि के इलाज के पूर्व डाक्टर एक जांच प्रक्रिया से गुजरने की सलाह देता है. बीमारी के कारण तत्व क्या हैं इसका पता चल जाने पर चिकित्सा आसान हो जाती है. राजनीतिक मामलों में भी कारण और समाधान के बीच सम्बन्ध स्थापित करना जरूरी होता है. इसके बिना हुए प्रयास का बहुत अर्थ नहीं होता. इस तरह की मुलाकातों से ही प्रतिपक्ष गठित हो जाता तब कब के ऐसे प्रयास हो चुके होते. इसलिए श्री नीतीश कुमार के इस प्रयास में गंभीरता की कमी दिखती है. उद्देश्य तो निःसंदेह सही है ,लेकिन किए जा रहे प्रयास उसके अनुकूल नहीं हैं.
प्रतिपक्ष अथवा विपक्ष के बिखराव के कारण क्या हैं ? मैं समझता हूँ कि सर्वप्रथम इसी मुद्दे पर विचार होना चाहिए था. मुझे जो कारण दीखते हैं उसके मुख्य बिंदु निम्नोक्त हैं-
1 – व्यक्तित्वों का टकराव जिनके मूल में अहम अथवा ईगो केंद्रीय तत्व है.
2 – कालातीत हुई वैचारिकता. प्रायः सभी दल ऐसी वैचारिक- सरणी के तहत काम कर रहे हैं जो पुरानी पड़ गई है. नई सदी के चुनौतियों का उसके पास वाजिब जवाब नहीं है.
3 – नैतिकता का अभाव.
क्या उपरोक्त बिंदुओं के समाधान ढूंढने के पूर्व किसी विपक्षी एकता की संभावना हो सकती है? मुझे इसमें संदेह है. यात्रा के आरम्भ में नीतीश कुमार का उत्साह जोश से भरा था. लेकिन क्या इसमें होश भी था? यात्रा पूर्व उन्होंने लालू प्रसाद से मुलाकात की अथवा उनका ‘ आशीर्वाद ‘ लिया. लालू प्रसाद उनके पुराने मित्र हैं और उनके ही शब्दों में ‘ भाई समान मित्र ‘. लेकिन उनसे मिलने का राजनीतिक निहितार्थ क्या है ? स्वयं नीतीश कुमार 1994 में जब जनता दल से अलग हुए थे, तब उनका आरोप था कि लालू प्रसाद की कार्यशैली ठीक नहीं है और पार्टी के भीतर उनका व्यवहार तानाशाहीपूर्ण है. इसी बिंदु पर संघर्ष करते हुए वह पार्टी से अलग हुए और कुछ महीने बाद भारतीय जनता पार्टी के साथ राजनीतिक समझौता किया. इस समय ही लालू प्रसाद पर चारा घोटाले का मामला समता -भाजपा के लोगों की तरफ से कोर्ट में दर्ज हुआ जिसके आधार पर कालांतर में उन्हें सजा हुई . लालू प्रसाद की पार्टी को सत्ता से अपदस्थ करने में वह अंततः कामयाब हुए और 2015 के पूर्व एकबार फिर उसी लालू प्रसाद से चुनावी समझौता करने केलिए मजबूर भी हुए. इसबार भाजपा को हराया. दो साल बाद फिर भाजपा से हाथ मिला लिया और पांच साल साथ चले. पिछले महीने भाजपा से अलग होकर फिर लालू प्रसाद के साथ हुए. अब वह भाजपा को परास्त करने केलिए राष्ट्रीय अभियान पर निकले हैं.
इस आवाजाही में निश्चित तौर पर उनकी जन – विश्वसनीयता को गहरा धक्का लगा. आयाराम- गयाराम का चरित्र किसी भी समाज में आदर के साथ नहीं देखा जाता. ऐसे में उन्हें यदि यह लगता है कि जनता बेवकूफ है और कुछ भी नहीं समझती तब वह गलती पर हैं. पब्लिक सब कुछ जानती -समझती है. वह मौके पर जवाब देती है. हाँ, यह भी सही है कि वह गलतियां मुआफ करना भी जानती है. लेकिन उसे सचमुच यह महसूस होना चाहिए कि नेता मुआफ करने लायक है. इसीलिए मैं नीतीश कुमार से आग्रह करना चाहूंगा कि वह मुआफ करने लायक बनें.
क्या उन्हें यह महसूस होता है कि लालू प्रसाद के दर्शन करके आरम्भ होने वाली इस यात्रा के कुछ नैतिक सन्दर्भ हो सकते हैं? पिछले तीन दशक से वह लालू के खिलाफ राजनैतिक लड़ाई लड़ रहे हैं. उनकी पार्टी से जुड़े लोगों ने ही उन पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए और उसी आधार पर वह सजायाफ्ता हैं. बीमारी के आधार पर वह जेल से बाहर हैं. अब जिस यात्रा का आरम्भ एक अपराधी की भक्ति से होता हो उसकी परिणति क्या हो सकती है ? यदि नीतीश जी को यह भान हो गया है कि लालू प्रसाद निर्दोष हैं और उनके लोगों द्वारा उनपर किया गया मुकदमा गलत था तो सब कुछ के पहले उन्हें इसकी सार्वजनिक घोषणा करनी चाहिए. या फिर यह भी वह कह सकते हैं कि बदली हुई परिस्थितियों में भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं रह गया है. लेकिन इस तरह एक सजायाफ्ता से मिल कर निकले उनके अभियान से कोई बड़ा सन्देश जाएगा इस पर संदेह है. लालू प्रसाद की जगह यदि पटना में ही बीमार -हाल बुजुर्ग गांधीवादी रज़ी अहमद साहब से मिल कर वह अभियान पर निकलते तो देश भर में एक अच्छा सन्देश जाता.
नैतिकता का प्रश्न उनके सांसदों -विधायकों पर भी है. पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनाव उन्होंने भाजपा के साथ लड़ा है. शुचिता का तकाजा था कि उनके सभी सांसद -विधायक इस्तीफा देकर एक आदर्श उपस्थित करते कि पूर्व में हमने चाहे जो गलतियां की हैं अब जब एक बड़े अभियान पर निकले हैं तब हम नई नैतिकता के साथ हैं. इसका व्यापक असर होता. 1974 में बिहार आंदोलन के समय उसमें साथ होने वाले विधायकों ने अपनी सदस्यता से त्यागपत्र दिया था. छात्रों ने साल भर की पढाई छोड़ी थी. असहयोग आंदोलन के समय गांधी ने नौकरी पेशा लोगों से नौकरी और छात्रों से सरकारी शिक्षण संस्थान छोड़ने का आग्रह किया था. बहुत लोगों ने ऐसा नहीं किया था . लेकिन जितने लोगों ने किया उतने की ही नैतिक आभा से आंदोलन को बल मिला और वह परवान चढ़ गया. त्याग हमेशा हमें शक्ति देता है. किसी भी इबादत के पूर्व उपवास का यही निहितार्थ है. भोजन त्याग कर ब्रती एक ताकत हासिल करता है और उस ताकत से की गई उसकी अराधना का एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव होता है.
मैं आग्रह करूँगा कि नीतीश कुमार अपनी इस यात्रा को यूँ ही मिलने -जुलने की यात्रा भर रहने दें . अपनी वास्तविक राजनीतिक यात्रा की शुरुआत वह किसी सजायाफ्ता अपराधी से नहीं किसी संत सामाजिक कार्यकर्त्ता से मिल कर करें और यात्रा के पूर्व अपने सांसदों -विधायकों का इस्तीफा करवा कर अपने भाजपा- संग होने का प्रायश्चित भी सुनिश्चित करें. बिहार सरकार का होम तो करना ही पड़ेगा. बेहतर होगा बिहार में मध्यावधि चुनाव हो और इस चुनाव से ही राष्ट्रीय राजनीति का आरम्भ भी. लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश को दिशा देने वाला राजनेता स्वयं ही उलझनों का शिकार है. विचारों की केन्द्रीयता का अभाव उनके पूरे व्यक्तित्व पर फैला हुआ है. आज भी उनके वक्तव्यों में भाजपा के दिवंगत नेता अटलबिहारी वाजपेयी केलिए जो श्रद्धा और अनुराग दीखता है वह चिंतनीय है. वह बिखरे विपक्ष को सुगठित करने के पूर्व अपने बिखरे व्यक्तित्व को सुगठित करें. मेरी बातें कड़वी हो सकती हैं ,लेकिन इसके निहितार्थ भले हैं.


