एक तरफ़ सरकार आज़ादी का अमृत महोत्सव मनाएगी, दूसरी जानिब आज़ादी के अज़ीम रहनुमा बरकतुल्लाह भोपाली के नाम को मिटाने की कोशिश करेगी।
एक तरफ़ सरकार राजा महेंद्र प्रताप के नाम पर राजनीति कर यूनिवर्सिटी बनाएगी, वहीं दूसरी जानिब उनके सबसे क़रीबी बरकतुल्लाह भोपाली के नाम पर बनी यूनिवर्सिटी का नाम मिटाएगी।
एक तरफ़ सरकार नेताजी सुभाष चंद्र बोस को सेलिब्रेट करेगी, वहीं दूसरी तरफ़ उनके लिए विदेशों में जापान से लेकर जर्मनी तक माहौल बनाने वाले महान क्रांतिकारी बरकतुल्लाह भोपाली के नाम को नीचा दिखाने की कोशिश करेगी।
एक तरफ़ सरकार विनायक दामोदर सावरकर को क्रांतिकारी के रूप में स्थापित करना चाहती है, और दूसरी जानिब जिस बरकतुल्लाह भोपाली से प्रेरित होकर इंग्लैंड के इंडिया हाउस में क्रांतिकारी आंदोलन को उन्होंने आगे बढ़ाने की कोशिश की, उन्ही के नाम को ख़त्म करने की कोशिश कर रही है।
कुल मिलाकर भारत के पहले प्रधानमंत्री बरकतुल्लाह भोपाली (1915) के नाम पर जहाँ भारत के हर राज्य की राजधानी में एक स्मारक बनना चाहिए था, वहीं उसके नाम को उन्ही के शहर भोपाल से मिटाने की कोशिश की जा रही है।
एक ज़माना था जब लोग बहादुर शाह ज़फ़र के क़ब्र की मिट्टी रंगून (बर्मा) से और बेगम हज़रत महल के क़ब्र की मिट्टी काठमांडु(नेपाल) से हिन्दुस्तान लाने की बात करते थे पर आज कैलीफ़ौरनिया (अमेरिका) मे लेटे बरकतुल्लाह भोपाली के नाम तक को मिटाने की कोशिश की जा रही, जबके ये उनकी चाहत थी के हिन्दुस्तान के आज़ाद होने के बाद उन्हे वापस हिन्दुस्तान मे दफ़नाया जाए…
न दबाया ज़ेरे-ज़मीं उन्हें, न दिया किसी ने कफ़न उन्हें
न हुआ नसीब वतन उन्हें, न कहीं निशाने-मज़ार है.

ये ध्यान रहे कि 45 साल भारत से दूर रह कर आज़ादी की जद्दोजहद करने वाले बरकतुल्लाह भोपाली दुनिया के अलग अलग हिस्सों रहते हुए अमेरिका पहुंचे और वहीं 27 सितम्बर 1927 बरोज़ मंगल की रात उनकी आख़री रात थी, उस समय वोह अपने पुरे होश ओ हवास मे थे, और उस वक़्त अपने कुछ साथियों के सामने, जो उस समय उनके बिस्तर के पास मौजुद थे, से कुछ बात कही जो कुछ इस तरह थे :-
तमाम ज़िन्दगी मै पुरी ईमानदारी के साथ अपने वतन की आज़ादी के लिए जद्दोजेहद करता रहा, ये मेरी ख़ुशक़िसमती थी के ये मेरी नाचीज़ ज़िन्दगी मेरे प्यारे वतन के काम आई. आज इस ज़िन्दगी से रुख़सत होते हुए जहां मुझे ये अफ़सोस है के मेरी ज़िन्दगी में मेरी कोशिश कामयाब नही हो सकी, वहीं मुझे इस बात का भी इतमिनान है के मेरे बाद मेरे मुल्क को आज़ाद करने के लिए लाखो आदमी आज आगे बढ़ आए हैं, जो सच्चे हैं, बहादुर हैं और जाबाज़ हैं.. मै इतमिनान के साथ अपने प्यारे वतन की क़िसमत उनके हांथो मे सौंप कर जा रहा हुं…
इसके बाद बरकतुल्लाह भोपाली का इंतक़ाल हो चुका था और उनके चाहने वाले का बुरा हाल था जिस बारे मे आरज़ी हुकुमत ए हिन्द (1915) मे राष्ट्रपति की हैसियत रखने वाले राजा महेन्द्र प्रताप लिखते हैं :- “इस जिगर सोज़ नाज़ुक मौक़े पर मैने मौलाना साहेब के बहैसियत क़रीब क़रीब दोस्त और वारिस होने की हैसियत से तजहीज़ो तकफ़ीन के फ़राएज़ अंजाम दिये.. उन आख़री रसमों मे हिन्दु, मुस्लिम और सिख बराबर के शरीक थे.. हर एक ने अपने मज़हबी अक़ीदे के मुताबिक़ रसोमात अदा कीं.. ये बड़ा यौादगार दिन था.. डॉ सैयद हुसैन, डॉ रहमत अली, यौरी सिंह, राम सिंह सहीत सैकड़ो हिन्दुस्तानी अपने इस अज़ीम इंक़लाबी रहनुमा को ख़िराज ए अक़ीदत पेश करने जमा हुए थे..”
चेहरा ऩुमाई ख़त्म होने पर सैकड़ों सिसकियों और अश्कबार आंखो के साथ उनके ठंडे पड़े बदन को एक क़ीमती संदूक़ मे बंद कर के Sacramento से Maryville पहुंचया गया.. और वहां के मुस्लिम क़ब्रिस्तान मे ये कह कर दफ़न कर दिया के हिन्दुस्तान के आज़ाद हो जाने पर तुम्हारी ख़ाक को हिन्दुस्तान पहुंचा दिया जाएगा.. आख़री रसम मौलवी रहमत अली, डॉ सैयद हुसैन, डॉ औरंग शाह और राजा महेन्द्र प्रताप ने मिल कर अदा कीं और इस अज़ीम इंक़लाबी अमेरिका की सरज़मीन मे सुपुर्द ए ख़ाक कर दिया गया..
अब बेशर्मी देख लीजिए, किनके हाथ में मुल्क की डोर दी गई है?? ध्यान रहे कि पंडित जवाहर लाल नेहरू आज़ादी से पहले अपने यूरोप दौर पर बरकतुल्लाह भोपाली से मिले थे।


