देवकुंड/अमझर शरीफ: बिहार के औरंगाबाद जिले में अमझर शरीफ की खानकाह कादरिया मुहम्मदिया और देवकुंड मठ के बीच सदियों से चली आ रही संत-सूफी परंपरा, आपसी सम्मान और भाईचारे की रिवायत एक बार फिर जीवंत हो उठी। करीब 80 वर्षों बाद दोनों धार्मिक परंपराओं के प्रतिनिधियों के बीच हुआ यह सम्मान समारोह क्षेत्र की गंगा-जमुनी तहजीब और साझा सामाजिक विरासत का प्रतीक बन गया।

सैयदना दादा और देवकुंड के महंत की दोस्ती की रिवायत
अमझर शरीफ में कादरिया सिलसिले के विस्तार का श्रेय गौस-ए-पाक के वंशज महान सूफी हजरत सैयद अमीर मुहम्मद कादरी अमझरी उर्फ सैयदना दादा साहब को दिया जाता है। उनकी शिक्षाओं का मूल संदेश इंसानियत, सेवा और प्रेम पर आधारित रहा। सूफी परंपरा में प्रचलित संदेश “अल-खल्कु अयालुल्लाह” का अर्थ है कि तमाम मखलूक खुदा का कुनबा है।

स्थानीय मान्यता के मुताबिक, सैयदना दादा साहब और देवकुंड के तत्कालीन महंत के बीच मुलाकात अमझर शरीफ की पुरानी ईदगाह के निकट हुई थी। इसके बाद दोनों धार्मिक स्थलों के बीच सम्मान और आत्मीयता की परंपरा मजबूत हुई।
बताया जाता है कि अमझर शरीफ में नए सज्जादानशीन की नियुक्ति के अवसर पर देवकुंड मठ की ओर से टोपी, गमछा और पगड़ी आदि भेजी जाती थी। इसी तरह देवकुंड में नए महंत के पदभार संभालने पर खानकाह की ओर से धोती, अंगोछा और पगड़ी भेंट करने की परंपरा रही।
यह परंपरा महज वस्त्रों के आदान-प्रदान तक सीमित नहीं थी, बल्कि दोनों धार्मिक संस्थानों के बीच सम्मान, मित्रता और भाईचारे की अभिव्यक्ति मानी जाती थी।
नक्सली तनाव के दौर में भी कायम रहा आपसी सम्मान
स्थानीय विवरणों के अनुसार, करीब 1944 के आसपास दोनों स्थानों के बीच प्रत्यक्ष संपर्क कमजोर पड़ गया। क्षेत्र में बढ़ते नक्सली तनाव और महंतों पर हुए हमलों के कारण उनका आना-जाना कम हो गया। हालांकि, आपसी सम्मान और उपहारों के आदान-प्रदान की परंपरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।
नक्सली हिंसा और संकट के दौर में देवकुंड मठ एवं मंदिर की सुरक्षा में स्थानीय मुस्लिम समुदाय की भूमिका का भी उल्लेख मिलता है। इसे क्षेत्र की साझा सामाजिक विरासत और आपसी विश्वास की मिसाल के रूप में याद किया जाता है।
देवकुंड मंदिर से जुड़ी एक पुरानी निशानी
सैयदना दादा साहब के परिवार और देवकुंड मठ के बीच पुराने रिश्ते की एक निशानी के तौर पर उनके एक पोते की मजार शरीफ का भी स्थानीय स्तर पर उल्लेख मिलता है। बताया जाता है कि यह मजार कभी देवकुंड मंदिर के पश्चिमी द्वार की ओर स्थित थी, जो अब जमींदोज हो चुकी है।
स्थानीय और किताबी विवरणों में यह भी उल्लेख मिलता है कि देवकुंड के महंत ने अपने प्रिय मित्र सैयदना दादा साहब के पोते के सम्मान में पश्चिम दिशा में द्वार बनवाया था।
80 वर्षों बाद फिर आगे बढ़ी मोहब्बत की रिवायत
इसी ऐतिहासिक संत-सूफी प्रेम और भाईचारे की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए देवकुंड के 17वें महंत श्री कन्हैया नंद पुरी जी महाराज ने अमझर शरीफ खानकाह कादरिया मुहम्मदिया के नए 15वें सज्जादानशीन सैयद मुहम्मद हुसैन कादरी साहब का सम्मान किया।
महंत श्री कन्हैया नंद पुरी जी महाराज ने चंदन का टीका लगाकर, पगड़ी बांधकर और अंगवस्त्र पहनाकर सैयद मुहम्मद हुसैन कादरी साहब का अभिनंदन किया। इस अवसर पर खानकाह के संरक्षक सैयद जमालुद्दीन आबिद कादरी साहब ने भी महंत जी को अंगवस्त्र भेंट कर सम्मानित किया।
करीब आठ दशक बाद हुई यह पहल पुराने रिश्ते को नई पीढ़ी के सामने लाने वाली महत्वपूर्ण घटना मानी जा रही है।
अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और सम्मान पर जोर
इस अवसर पर महंत श्री कन्हैया नंद पुरी जी महाराज ने कहा कि दोनों स्थानों के अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करना और उन्हें सम्मान देना दोनों धर्मस्थलों के प्रमुखों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होनी चाहिए।

वहीं, खानकाह के नए सज्जादानशीन सैयद मुहम्मद हुसैन कादरी साहब ने महंत जी के प्रति आभार व्यक्त किया और हर संभव सहयोग एवं साथ देने की बात कही।
सनाउल्लाह अहमद रिजवी की रही महत्वपूर्ण भूमिका
इस ऐतिहासिक परंपरा को दोबारा व्यवहार में लाने में सनाउल्लाह अहमद रिजवी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने जिला परिषद प्रतिनिधि के सहयोग से महंत जी तक यह संदेश पहुंचाया, जिसे महंत श्री कन्हैया नंद पुरी जी महाराज ने सहर्ष स्वीकार किया।

इस ऐतिहासिक अवसर के साक्षी फैजान कादरी, सैयद अबशार, सैयद फरमान कादरी, सैयद अली कादरी, सैयद अतिबुल्लाह कादरी, सनाउल्लाह अहमद रिजवी, अखलाक खान, अरविंद कुमार वर्मा, शंभू शरण सत्यार्थी सहित अन्य लोग बने।
मंदिर और खानकाह से ऊपर इंसानियत का संदेश
अमझर शरीफ और देवकुंड का यह मिलन केवल दो धार्मिक स्थलों के प्रतिनिधियों के बीच हुआ सम्मान समारोह नहीं है, बल्कि क्षेत्र की उस साझा विरासत की पुनर्पुष्टि है, जिसमें धार्मिक सीमाओं से ऊपर उठकर इंसानियत, प्रेम, सम्मान और एक-दूसरे की हिफाजत को प्राथमिकता दी गई।
सदियों पुरानी इस रिवायत का दोबारा सामने आना यह संदेश देता है कि मंदिर और खानकाह की परंपराएं अलग हो सकती हैं, लेकिन मानवता, भाईचारा और आपसी सम्मान की भावना साझा हो सकती है।


