Vir Vinod Chhabra
मुझे राजकपूर की वहीदा रहमान संग दो फ़िल्में याद आती हैं, एक दिल सौ अफ़साने (1963) और तीसरी क़सम (1966). बॉक्स ऑफिस पर भले दोनों ही बहुत अच्छी नहीं चलीं लेकिन तीसरी क़सम ने क्रिटिक्स की दुनिया में धमाल मचा दिया था. बहुत सराहना हुई. बड़े शहरों में तो फिल्म थोड़ी बहुत चली भी. फ्रंट बेंचर्स को फिल्म समझ ही में नहीं आयी. अफ़सोस यह भी रहा कि ये देखने के लिए प्रोड्यूसर गीतकार-शैलेंद्र जीवित नहीं रहे. फ़िलहाल तो एक किस्सा सुनाता हूँ. वहीदा रहमान ने इसे सोनी टीवी के कपिल शर्मा शो में शेयर भी किया था. वहीदा से पूछा गया कि सेट पर सबसे लेट कौन हीरो आता था? उन्होंने थोड़ा हिचकते हुए बताया कि राजकपूर साब. सुबह नौ बजे की शिफ़्ट होती थी और राज साहब दोपहर दो बजे आते थे. बेचारी वहीदा और बाकी आर्टिस्ट सुबह नौ बजे से तैयार होकर इंतज़ार करते रहते. इंतज़ार करते करते काम करने का उत्साह भी ख़त्म हो जाता. एक दिन डायरेक्टर ने सोचा क्यों न दोपहर दो बजे की शिफ्ट कर दी जाए. सबने मंजूरी दे दी, राज साहब ने भी. लेकिन राज साहब की लेट-लतीफ़ी फिर भी जारी रही. वो शाम छह बजे शूटिंग पर आने लगे. अब राज साहब बड़े आर्टिस्ट. कौन उनसे प्रोटेस्ट करे. दिन वहीदा ने साहस बटोर राज साहब से कह ही दिया – देखिये राज साब, हम सब आपका इंतज़ार करते करते सूख जाते हैं. टाइम पर आया करें.
राज साहब ने प्रामिज़ किया – ठीक है, कल से वक़्त पर आऊंगा. ठीक सुबह नौ बजे.
अगले दिन वहीदा को सुबह सुबह फ़ोन आया. उधर से राज साहब बोल रहे थे – अरे मैं सुबह सात बजे से स्टूडियो में तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ.
वहीदा को तो काटो खून नहीं वाली हालत हो गयी. घड़ी देखी, अभी आठ बजा था. उन्होंने पलटवार किया – सॉरी सर. लेकिन आपने हम सबको इत्ता इंतज़ार करवाया, आज आप थोड़ा इंतज़ार करें प्लीज़.
बहरहाल, राज साहब ने वहीदा के कहने का बुरा नहीं माना.
अब ये नहीं मालूम कि ये किस्सा एक दिल सौ अफ़साने की शूटिंग के दौरान का है या तीसरी क़सम की शूटिंग का। लेकिन ये ज़रूर है कि वो दोस्ताना माहौल हुआ करता था।
२९-०६-२०२१


