Anand Singh
इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में अमेरिकी साम्राज्यवाद अपने उरूज़ पर था। दुनिया पर अपना एकछत्र साम्राज्य स्थापित करने की सनक में उसने पहले 9/11 के आतंकी हमले का बहाना बनाकर अफ़ग़ानिस्तान पर और फिर जनसंहारक हथियारों का झूठ फैलाकर इराक़ पर हमला किया। उसकी योजना इन दोनों देशों में अपनी पिट्ठू सरकारें बिठाकर ईरान पर हमला करने की थी जो 1979 के इस्लामी क्रान्ति के बाद उसके चंगुल से बाहर निकल गया था। लेकिन इस सदी के दो दशक बीतने के बाद आज अमेरिकी साम्राज्यवाद की हालत बिना दाँत और नाख़ून वाले बब्बर शेर जैसी हो गयी है जिसकी जगह इतिहास के चिड़ियाघर में सुरक्षित हो चुकी है। अमेरिकी साम्राज्यवाद को पहले इराक़ी प्रतिरोध के हाथों मुँह की खाने के बाद वहाँ से बेआबरू होकर लौटना पड़ा और अब अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की पकड़ मजबूत होता देख वह पतली गली से निकल लेने की पूरी तैयारी कर चुका है। लेकिन इस साम्राज्यवादी दुस्साहस का ख़ामियाजा अफ़ग़ानिस्तान सहित समूचे दक्षिण एशिया के लोगों को लम्बे समय तक बेपनाह हिंसा और बढ़ती अस्थिरता और के रूप में भुगतना पड़ेगा।
अमेरिकी साम्राज्यवाद द्वारा अफ़ग़ानिस्तान के लोगों पर थोपे गए इस आतंकी युद्ध के दौरान पिछले दो दशक में 2 लाख से भी ज़्यादा अफ़ग़ानियों की जान जा चुकी है। अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिका की वापसी के बाद वहाँ लम्बे समय तक गृहयुद्ध की परिस्थिति जारी रहने की सम्भावना है जिससे आम अफ़ग़ानियों की ज़िन्दगी बद से बदतर होनी तय है। अगर तालिबान एक बार फिर से काबुल की सत्ता में पहुँचने में और इस्लामी अमीरात क़ायम करने में क़ामयाब हो जाता है, जिसकी प्रबल सम्भावना है, तो इसका सीधा असर वहाँ की आम जनता और ख़ासकर महिलाओं के ऊपर बढ़ती बन्दिशों के रूप में सामने आएगा। तालिबान की पकड़ न सिर्फ़ उसके पारम्परिक गढ़ कान्धार के इर्द-गिर्द दक्षिणी अफ़ग़ानिस्तान में बल्कि उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान में भी बढ़ी है। नाटो की सेना की वापसी के बाद काबुल की सरकार अपने दम पर तालिबान के लड़ाकों का मुक़ाबला कर ही नहीं सकती। जहाँ एक ओर तालिबान और काबुल की सरकार के नुमाइन्दों के बीच दोहा में बातचीत का प्रहसन चल रहा है वहीं दूसरी ओर तालिबान दिन-ब-दिन अफ़ग़ानिस्तान के नये-नये इलाक़ों पर अपनी पकड़ मजबूत करता जा रहा है। एक अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी ने यह अनुमान लगाया है कि अमेरिकी सेना की वापसी के बाद काबुल की सरकार छह महीने के भीतर धराशायी हो जाएगी।
अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के इस बढ़ते प्रभुत्व का ही यह नतीजा है कि जहाँ कुछ वर्षों पहले तक उसे एक आतंकी संगठन समझा जाता था वहीं अब तमाम देश उसके साथ बातचीत की प्रक्रिया शुरू कर रही हैं जिनमें भारत भी शामिल है। भारत ने पिछले दो दशक के दौरान अफ़ग़ानिस्तान में अपने रणनीतिक और सामरिक हितों के मद्देनज़र सड़क, बाँध, बिजली घर तथा अन्य विकास कार्यों में 2 अरब से 3 अरब डॉलर का निवेश किया है जो तालिबान के बढ़ते प्रभुत्व की वजह से अब पानी में डूबता नज़र आ रहा है। इसलिए भागते भूत की लंगोटी भली वाले मुहावरे को चरितार्थ करते हुए भारत के फ़ासिस्ट हुक्मरान तालिबान से गुप्त बातचीत कर रहे हैं ताकि इस भारी निवेश को पूरी तरह से डूबने से बचाया जा सके और तालिबान को आर्थिक मदद का लालच देकर उसे लश्कर-ए-तोइबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे पाकिस्तानी आतंकी समूहों से दूरी बनाये रखने के लिए तैयार किया जा सके।
जहाँ तक पाकिस्तान का सवाल है तो वहाँ के फ़ौजी हुक्मरान तालिबान की बढ़त की वजह से दुविधा में हैं। जहाँ एक ओर तालिबान के बढ़ते प्रभुत्व से वे ख़ुश हैं क्योंकि इससे अफ़ग़ानिस्तान में भारत का प्रभाव कम होगा और भारत में आतंक का निर्यात करने और कश्मीर में अस्थिरता बढ़ाने में मदद मिलेगी, वहीं दूसरी ओर यह उनकी चिन्ता का सबब है कि अफ़ग़ानी तालिबान के मजबूत होने से पाकिस्तानी तालिबान (तहरीक़-ए-तालिबान पाकिस्तान) भी मजबूत होगा जिसका नतीजा पाकिस्तान के भीतर बढ़ती मज़हबी दहशतगर्दी के रूप में सामने आएगा। ग़ौरतलब है कि पाकिस्तानी तालिबान पाकिस्तान की हुक़ूमत को अपना मुख्य शत्रु मानती है और वह अल-क़ायदा जैसे आतंकी संगठनों के सहयोग से दुनिया भर में इस्लामी जेहाद को फैलाना चाहती है। ग़ौर करने वाली बात यह भी है कि पाकिस्तानी तालिबान की पाकिस्तान में दहशतगर्दी से आजिज़ आकर पाकिस्तानी फ़ौज को 2014 में अफ़ग़ानिस्तान की सीमा से लगे पाकिस्तानी प्रान्त ख़ैबर पख़तून्ख़्वाह के उत्तरी वज़ीरिस्तान हिस्से में ऑपरेशन ज़र्ब-ए-अज़्ब के तहत फ़ौजी कार्रवाई करनी पड़ी थी। पाकिस्तान अफ़ग़ानी तालिबान को मनाने की फ़िराक़ में है कि वह पाकिस्तानी तालिबान को फैलने से रोके। पाकिस्तान के फ़ौजी हुक्मरान वहाँँ की आवाम को यह बताते आए हैं कि अफ़गानी तालिबान और पाकिस्तानी तालिबान के बीच फ़र्क़ है और पाकिस्तानी तालिबान भारत द्वारा समर्थित है। लेकिन पाकिस्तान के फ़ौजी हुक्मरानों को यह भी अच्छी तरह से पता है कि अफ़ग़ानी तालिबान और पाकिस्तानी तालिबान के बीच कोई चीन की दीवार नहीं है। अफ़गानी तालिबान और पाकिस्तानी तालिबान दोनों में पश्तूनी लड़ाकों की बहुतायत है जो पाकिस्तान-अफ़ग़ान सीमा के दोनों ओर रहते हैं और जिनके बीच आपसी सम्बन्ध बेहद घनिष्ठ हैं। दोनों तरह के लड़ाकों को आतंकवाद की ज़हरीली वैचारिक ख़ुराक़ पाकिस्तान के मदरसों से ही मिलती है। इसलिए दोनों के बीच वैचारिक बिरादराना रिश्ता भी बेहद मजबूत है। इसलिए तालिबान का उभार पाकिस्तान की आवाम के लिए भी बेहद ख़तरनाक है।
उधर चीन अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिका की वापसी का लाभ उठाने की फ़िराक़ में है। तालिबान ने भी अपनी ओर से चीन के साथ बेहतर रिश्ते क़ायम करने की मंशा जतायी है। ग़ौरतलब है कि अफ़ग़ानिस्तान में कॉपर, कोयला, आयरन, गैस, मरकरी, सोना, लीथियम और थोरियम का अकूत भण्डार है। इस अकूत सम्पदा पर नियंत्रण पाने के अतिरिक्त चीन अपने महत्वाकांक्षी बेल्ट रोड पहल में अफ़ग़ानिस्तान को भी शामिल करना चाहता है। लेकिन चीन भी पाकिस्तानी तालिबान की बढ़ती ताक़त को लेकर आशंकित है। 62 बिलियन डॉलर के निवेश वाला चीन पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडॉर (जो बेल्ट रोड पहल का हिस्सा है) ख़ैबर पख़तून्ख़्वाह से होकर जाता है। लेकिन पाकिस्तानी तालिबान इस कॉरिडोर के निर्माण व अन्य विकास कार्यों में लगातार व्यवधान पहुँचा रहा है। अभी कुछ दिनों पहले ही पाकिस्तानी तालिबान ने एक बस पर आतंकी हमला किया जिसमें 9 चीनी मज़दूर मारे गये जो एक बाँध के निर्माण में लगे थे। इसके अलावा पाकिस्तानी तालिबान का सम्बन्ध ईस्ट तुर्कस्तान इस्लामिक मूवमेण्ट नामक आतंकी संगठन से भी है जो चीन का शिनजियांग प्रान्त में उइगर मुसलमानों के बीच सक्रिय है। ग़ौरतलब है कि चीन के शिनजियांग प्रान्त की सीमा अफ़गानिस्तान के बडकशान प्रान्त में स्थित वख़ान कॉरिडोर से लगती है। चीन तालिबान को आर्थिक मदद एक एवज में यह आश्वासन चाहेगा कि वख़ान कॉरिडोर का इस्तेमाल चीन में अस्थिरता बढ़ाने के लिए न किया जाए।
इस प्रकार तालिबान के उभार से एशिया के इस क्षेत्र में निश्चित रूप से भूराजनीतिक समीकरणों में अहम बदलाव आएंगे। यही नहीं अमेरिकी साम्राज्यवाद अपनी इस शर्मनाक पराजय और चीन के बढ़ते प्रभुत्व के मद्देनज़र अपनी गिरती साख़ को बचाने के लिए निश्चय ही कोई कार्रवाई करेगा जिससे अमेरिका और चीन के बीच जारी अन्तरसाम्राज्यवादी प्रतिस्पर्द्धा तीखी होगी। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अमेरिकी सेना की अफ़ग़ानिस्तान से झटपट वापसी का कारण पूछा जाने पर यह जवाब दिया कि वे अपना ध्यान चीन पर केन्द्रित करना चाहते हैं। स्पष्ट है कि आने वाले दिनों में साम्राज्यवाद के अन्तरविरोधों का नतीजा बढ़ती आतंकी घटनाएँ, बेपनाह हिंसा और भीषण युद्दों के रूप में सामने आएगा।


