Pankaj Parashar
सुप्रसिद्ध फ़नकार उस्ताद अल्लाउद्दीन खाँ की सबसे छोटी बेटी रोशन आरा खाँ उर्फ अन्नपूर्णा देवी के जीवन-संघर्ष और संगीत-साधना के बारे में पता चला, तो कई बातें विस्मित करने वाली लगीं. मसलन अपने आप में किंवदंती बन चुके बाबा अल्लाउद्दीन खाँ ने बेटी अन्नपूर्णा के लिए कहा, ‘अगर मुझे और अली अकबर (उनके पुत्र, पद्मभूषण से सम्मानित सुप्रसिद्ध सरोदवादक ) को एक तरफ रख दिया जाए और अन्नपूर्णा को दूसरी तरफ तो उसके संगीत का ही पलड़ा भारी रहेगा.’ अन्नपूर्णा देवी की जिंदगी कला और रोचक किस्सों से भरपूर रही. 23 अप्रैल, सन् 1927 को मध्यप्रदेश के मैहर में पैदा हुई अन्नपूर्णा का नाम उनके मां-बाप ने रोशनआरा खां रखा था, लेकिन कुछ ही दिन में उन्हें एक नया नाम मिल गया-अन्नपूर्णा. दरअसल अलाउद्दीन खां ने जब मैहर के महाराज बृजनाथ सिंह को बेटी के जन्म के बारे में बताया, तो महाराज ने बच्ची का नाम अन्नपूर्णा रख दिया. बाबा यानी उस्ताद अल्लाउद्दीन खाँ की तीन बेटियाँ थीं- शारिजा, जहाँआरा और रोशनआरा और एक बेटा अली अकबर खाँ. शारिजा की बचपन में ही मौत हो गई. जहाँआरा को तानपूरे में महारत हासिल थी. वे बाबा के साथ संगत भी करती थीं. बाबा ने जहाँआरा का एक पारंपरिक मुसलमान परिवार में विवाह कर दिया. जहाँआरा के ससुराल वालों को संगीत की जरा भी समझ नहीं थी. एक दिन उनकी सास ने तानपूरे को उठाया और चूल्हे में जला दिया. इस घटना से बेहद संवेदनशील उस्ताद अल्लाउद्दीन खाँ साहब इतने आहत हुए कि उन्होंने तय किया कि वे अब किसी बेटी को संगीत नहीं सिखाएंगें. लेकिन होनी को तो जैसे कुछ और ही मंजूर था. आठ-नौ साल की बच्ची अन्नपूर्णा अपने आँगन में इच्ची-दुच्ची खेल रही थी. अंदर भाई अली अकबर खाँ रियाज़ कर रहे थे. अचानक खेल छोड़कर अन्नपूर्णा घर के अंदर गई और भाई से कहा, भैया, बाबा ने ऐसा नहीं बताया है और खेल छोड़कर वह भाई को गाकर बताने लगी कि बाबा ने किस तरह बताया है. बाबा कहीं पास ही थे और वहीं से अन्नपूर्णा का गाना सुन रहे थे. पूरा गाना सुनकर बाहर आए, तो बेटी डर गई. बाबा उसे कमरे में ले गए, प्यार किया और सिर पर हाथ फेरते हुए कहा कि मैं अपना प्रण तोड़कर तुम्हें सिखाऊंगा.
पहले जैसा चलन था, उस हिसाब से ध्रुपद से शुरू किया, फिर सितार. एक दिन अचानक बाबा ने उनसे कहा, सुरबहार सीखो. यह थोड़ा बड़ा है और सीखना भी कठिन है, लेकिन यह ज़्यादा नेमतें देगा. मैं तुम्हें अपने गुरू की विद्या सिखाना चाहता हूँ. सितार को आम आदमी भी समझता है, लेकिन इसे सिर्फ संगीत के गहरे जानकार ही समझेंगे. यह मुमिकन है सुरबहार बजाने पर लोग तुम्हें हूट भी करें. बेटी ने हाँ कर दी. बाबा ने बाद में कहा कि यह बेटी नहीं, साक्षात् देवी सरस्वती थी. तालीम के इन्हीं दिनों में उनके यहाँ 18 साल के रवीन्द्र शंकर सितार सीखने आए थे. यहीं रविशंकर और अन्नपूर्णा की मित्रता हुई और बाद में दोनों ने शादी करने का फैसला किया. यह विवाह 1941 में हुआ. बाबा चाहते थे कि रविशंकर और अन्नपूर्णा दोनों यहीं मैहर में ही बस जाएं और उनकी परंपरा को आगे बढ़ाएं. दोनों का घर बसाने के लिए एक जमीन का भी इंतजाम कर लिया था क्योंकि वे रविशंकर को अपना उत्तराधिकारी मान चुके थे. लेकिन रविशंकर को मुंबई की चकाचौंध अपनी ओर खींच रही थी. वे अपने भाई उदयशंकर के कलावैभव से परिचित हो चुके थे. और अंततः 1944 में रविशंकर मैहर छोड़कर अन्नपूर्णा देवी के साथ मुंबई पहुंच गए. संगीत सभाओं में उनके सुरबहार की धूम थी. रविशंकर तब तक उतने लोकप्रिय नहीं हुए थे. उन्हें विश्व स्तरीय पहचान अमेरिका में बीटल्स के साथ सितार की संगत बिठाने के बाद मिली. पांचवें दशक के मध्य तक रविशंकर, अपने गुरु उस्ताद अलाउद्दीन खां, बड़े भाई और महान बेले नर्तक उदय शंकर और पत्नी अन्नपूर्णा के आभामंडल से बाहर नहीं आ पाए थे. शायद अन्नपूर्णा देवी के साथ संबंधों में बढ़ती खटास की यही एक बड़ी वजह थी. जब घर में कलह और टकराव बढ़ने लगा तो शादी बचाने की खातिर अन्नपूर्णा देवी ने बाबा अलाउद्दीन खान और अपने आराध्य मैहर देवी के सामने जिंदगी में कभी प्रस्तुति ना देने की कसम खाई. मगर उनका यह त्याग और समर्पण भी इस शादी को बचा नहीं पाया. 1961 में आखिरकार दोनों अलग हो गए. संगीत के जानकारों का कहना था कि पिछली सदी के चौथे और पांचवे दशक में अन्नपूर्णा देवी अपने पति से कहीं अधिक प्रतिभाशाली समझी जाती थीं. 2012 में अपनी आत्मकथा “रागमाला” में पंडित रविशंकर ने अफ़सोस के साथ कहा कि उन्हें अन्नपूर्णा देवी के साथ निबाह लेना चाहिए था. रविशंकर से तलाक के बाद द टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए इंटरव्यू में अन्नपूर्णा देवी ने कहा था, ‘1950 के दशक में हम दोनों जब भी किसी शो में एक साथ कार्यक्रम पेश करते तो समीक्षक मेरी ज्यादा तारीफ करते. पंडित जी को यह अच्छा नहीं लगता था. सो वे जता देते थे कि पत्नी को ज्यादा तारीफ मिलने से वे खुश नहीं हैं. रविशंकर के अहम् ने सुरबहार जैसे कठिन वाद्य की अप्रतिम कलाकार को अपनी महारत दुनिया के सामने पेश करने के वंचित कर दिया. कहते हैं कि वर्ष 1973 में ऋषिकेश मुख़र्जी के निर्देशन में बनी फिल्म “अभिमान” इन्हीं दोनों संगीतज्ञों के ईर्ष्याजनित वैवाहिक कलह की सच्ची घटना से प्रेरित है. फर्क सिर्फ इतना रहा कि फ़िल्मी कहानी में पति –पत्नी अलगाव के बाद दोबारा मिल जाते हैं, लेकिन असली कहानी में ऐसा नहीं हुआ. अन्नपूर्णा देवी ने एक बार जो संगीत की महफ़िल छोड़ने की कसम खाई, तो उस पर ताउम्र कायम रहीं और रविशंकर जी से उनका अलगाव भी अंत तक बना रहा.


