आज़ान और हनुमान चालीसा के बहाने नफ़रत कौन लोग फैला रहे हैं?

Opinionआज़ान और हनुमान चालीसा के बहाने नफ़रत कौन लोग फैला रहे हैं?

Md Umar Ashraf

जैसा ये आम है कि मस्जिद में पाँच वक़्त आज़ान होती है, पर कुछ संगठन के लोग इसके मुक़ाबिल हनुमान चालीसा की पाठ करने की बात कर रहे हैं, इसको लेकर सोशल मीडिया पर बहस भी छिड़ा हुआ है। लोग इस तरह से पेश कर रहे मानो मंदिर में आरती और हनुमान चालीसा का पाठ होता ही नही था। होता भी था और लाउडस्पीकर पर ही होता था। वैसे आज भी होता है।

हमारे घर से एक किलोमीटर की दूरी पर एक घाट है, गंगा किनारे, अलखनाथ घाट (बाढ़, पटना), बचपन में सुबह सुबह दूर से बड़ी सुरीली आवाज़ आया करती थी।

जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बंदि महा सुख होई।

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा।

काफ़ी लम्बा भजन है, बजता ही रहता था, फ़जर की अज़ान होती थी, उस वक़्त हिंदुओं की एक बड़ी संख्या गंगा की जानिब डुबकी लगाने जाती थी, अधिकतर अधेड़ उम्र और बुज़ुर्ग लोग हुआ करते थे, कुछ अपने मवेशी की ख़िदमत में लग जाते थे, मुसलमानो की एक छोटी अबादी ही मस्जिद जाया करती थी। अब शहर बड़ा हो गया है, आबादी बहुत घनी हो गई है, इसलिए आवाज़ अब सुनाई नही देती है। बहरहाल, कहने का मतलब ये है की आज़ान और हनुमान चालीसा हमेशा से आम लोगों तक पहुँचाया गया है लाउडस्पीकर के ज़रिया। पहले लाउडस्पीकर कि ताक़त कम होती थी, और क़स्बे में आबादी भी कम हुआ करती थी, पुराने लोग थे, साथ में रहने का पुराना तजुर्बा था, इसलिए साथ में ले देकर चलते थे। कोई दिक़्क़त नही होता था, आज़ान को लेकर कई सकारात्मक स्टोरी का तो मै ख़ुद गवाह हूँ।

तो फिर अब सवाल उठता है की आख़िर अब ये माइक पर आज़ान और हनुमान चालीसा को लेकर दिक़्क़त किसे हो रही है?? तब जवाब मिलेगा बाहरी लोगों को। असल में लोग बड़ी तेज़ी से गाँव से पलायन कर शहर और क़स्बे में पहुँच रहे हैं, वहाँ इनको कोई पूछता है नही, फिर ये अपने आप को वहाँ स्थापित और मज़बूत करने के लिए अजीब अजीब हरकत करते हैं। अलग अलग संगठन बनाएँगे, अलग अलग हरकत करेंगे, अधिकतर मज़हब के नाम पर ही होगा और इस संगठन में अधिकतर बाहर से आकर बसे हुए लोग जुड़ेंगे और साल दस साल में पूरे क़स्बे और शहर का अजेंडा बदल देंगे, बाक़ी कुछ संगठन तो हैं ही, जिनके प्रचारक पैसे के दम पर अपने मिशन के प्रचार में लगे हुवे हैं। ये हर शहर और क़स्बे की कहानी है। जो पुरानी हिंदू मुस्लिम आबादी है उनके बीच तो कई दशक का रिश्ता है, आपस में ये हर मामले ये एक दूसरे के साथ देते हैं। लेकिन ये बाहर से आए हुए लोग धीरे धीरे इतने हावी हो जाते हैं की पुराने स्थानीय लोग बस मूकदर्शक की हैसियत निभाते हैं, या फिर कुछ समय बाद उन्ही के अजेंडे का शिकार हो जाते हैं। फिर इनको हर चीज़ से तकलीफ़ होने लगती है। आज़ान के मामले में भी यही हुआ है।

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