फ़ैज़ुल बारी
शहर भोपाल का नाम बदल कर अब भोजपाल करने की कोशिश हो रही है मध्य प्रदेश के राज्य मंत्री विश्वास सारंग कहते है के मैं लंबे समय से भोपाल को भोजपाल करने की माँग कर रहा हूँ.
मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ये स्पष्ट किया के केंद्रीय सरकार ने होशंगाबाद का नाम बदल कर नर्मदापुरम करने की मंजूरी दे दी है।
इसी तरह 22 नवंबर को भोपाल के हबीबगंज स्टेशन का नाम भी बदल कर रानी कमलापति स्टेशन रखा गया और अब भोपाल शहर के नाम को बदलने की तैयारी शुरू जो गई है। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल का ऐतिहास कई सदी पुराना है यहा पर गोण्ड और मुस्लमान राजाओं के हुकूमत रही है। इस शहर पर लगभग 250 साल तेरह मुसलमान नवाबो ने हुकूमत की हालांकि भोपाल का नाम किसी नवाब के नाम पर नहीं है फिर भी उन्हों ने शहर के नाम को परिवर्तित करने की ओर नहीं सोचा।
इतिहासकारों का मानना है के भोपाल शहर का नाम राजा भोपालह के नाम पर है। अब आजादी के 75 साल बाद भोपाल के नाम को गुलामी का परतीत बता कर इसका नाम बदल कर भोजपाल करने की माँग हो रही है।
2014 के बाद बीजेपी सरकार ने 25 शहरों का नाम बदल चुके है इलाहबाद ऐ प्रयागराज मुगलसराय रेलवे स्टेशन से दीनदयाल उपाध्याय और दुनया का सबसे बड़ा क्रिकेट स्टेडियम मोटेरा स्टेडियम अहमदाबाद का नाम बदल कर नरेंद्र मोदी स्टेडियम रखा गया है।
इन शहरों और स्थानों के नाम बदलने की लिस्ट पड़ी लम्बी है। नाम बदलने वाली सरकार अक्सर यह तर्क देती है के वोह अपने संस्कृति का संरक्षण और राष्ट्रीय एकीकरण को मजबूत कर रहे है।
हालांकि ये तर्क और लॉजिक अपने आप मे एक भद्दा मज़ाक है क्यूँकि लोग ये जानते है के ये तमाम फैसले नफ़रत और सांप्रदायिकता कर आधार पर लिया गया है।
और ऐसे स्टेप्स भारत के संस्कृति की ऐतिहास को मिटा देगा और तो और विशेषज्ञ ये मानते है की ऐसे नाम बदलने के निर्णय असल मे संसाधन और आम लोगों के पैसे का दुरूपयोग है।
क्यूँकि किसी एक शहर के नाम परिवर्तन मे 200 से 500 करोड़ से भी ज़्यादा खर्च होता है ज़रा सोच कर देखिये अगर उन पैसों का उपयोग विश्वविद्यालय अस्पताल और दूसरे विकास के कामों पर किया जाए तो वो शहर विकसित और परिपूर्ण हो जाएगा मगर सवाल ये है की ये बहस करें कौन और सरकार से ऐसे समस्याओ सवाल पूछें क्यूँकि हमारी मेनस्ट्रीम मीडिया तो सरकार की इशारो पर काम कर रही हैं।


