शिक्षा, संघर्ष और संगठन : बीएचयू में छह साल तक चले संघर्ष कहानी

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Shubhneet Kaushik

शिक्षा, संघर्ष और संगठन

डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर के इस नारे को बीएचयू लाइब्रेरी आंदोलन से जुड़े साथियों ने अपने संघर्षों से साकार करके दिखाया है। उनके छह साल तक चले संघर्ष के बाद कल बीएचयू प्रशासन ने सयाजी राव गायकवाड़ केंद्रीय ग्रंथालय के साइबर लाइब्रेरी स्टडी सेंटर को इक्कीस घंटे तक खोलने का निर्णय लिया है। लाइब्रेरी आंदोलन का हिस्सा रहे सभी साथियों के संघर्षों को सलाम!

मुझे वर्ष 1916 में बीआर अम्बेडकर का लिखा वह ख़त भी आज याद आता है, जो उन्होंने ‘द क्रॉनिकल’ के सम्पादक को लिखा था। याद रहे कि 1916 बी॰एच॰यू॰ का स्थापना वर्ष भी है। हुआ यह था कि बंबई नगरपालिका ने सर फ़िरोज़शाह मेहता के निधन के बाद उनकी याद में एक मूर्ति बनाने का प्रस्ताव रखा था। इस प्रस्ताव से अपनी असहमति जाहिर करते हुए तब कोलम्बिया यूनिवर्सिटी के छात्र रहे अम्बेडकर ने लिखा था कि सर फ़िरोज़शाह मेहता की स्मृति में लाइब्रेरी स्थापित करना ही उस महान भारतीय नेता के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी, न कि उनकी मूर्ति बनाना।

अभी दो दिन पहले राज्यसभा में भाषण देते हुए भाजपा सांसद राकेश सिन्हा सदन को नालंदा विश्वविद्यालय की याद दिला रहे थे, उसकी पुस्तकों और पांडुलिपियों को संख्या गिना रहे थे। और नालंदा के पुस्तकालय की याद में आँसू बहा रहे थे। जो अतीत हो चुका है, जिसे बदलना अपने वश में नहीं, उसके लिए घड़ियाली आँसू बहाना और वर्तमान से नज़रें चुराना अतीतजीवी समाज का लक्षण है। जाहिर है आज की नालंदाओं का जो हश्र हो रहा है, उसके बारे में सोचना, उसकी बात करना सत्ता में क़ाबिज़ लोगों को क़तई स्वीकार नहीं।

यह कितना दुखद है कि विश्वविद्यालय में लाइब्रेरी चौबीस घंटे खुले, ऐसी बुनियादी सुविधा के लिए छात्रों को वर्षों तक संघर्ष करना पड़े, आंदोलन चलाना पड़े। और सिर्फ़ आंदोलन नहीं, जेल जाना पड़े, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के चक्कर काटने पड़े। लेकिन यह सब हुआ है और हो रहा है। बीएचयू में, जेएनयू में, दिल्ली विश्वविद्यालय में और देश के दूसरे तमाम विश्वविद्यालयों में। कोरोना काल में लॉकडाउन होने और पुनः परिस्थितियाँ सामान्य होने के बाद भी लाइब्रेरी खोलना और पहले की तरह सुचारु रूप से चलाना विश्वविद्यालय प्रशासन की प्राथमिकता में कभी नहीं रहा। लाइब्रेरी खुलवाने के लिए छात्रों को लामबंद होना पड़ा और संघर्ष चलाना पड़ा।

बीएचयू लाइब्रेरी आंदोलन के लिए कल का दिन सफलता का दिन रहा और सीख का भी। सीख इसलिए कि यह लड़ाई ख़त्म नहीं हुई है। सम्भव है कि आने वाले दिनों में प्रशासन द्वारा फिर साइबर लाइब्रेरी को बंद करने या उसकी समयावधि घटाने की कोशिश हो। लेकिन कल की यह सीख, यह प्रेरणा हमें हिम्मत देगी। मशाल की तरह हमारी राह प्रशस्त करेगी। यह लड़ाई जारी रहेगी ताकि शिक्षा, संघर्ष और संगठन की राह मज़बूत हो सके। ज़िंदाबाद दोस्तों।

और आख़िर में आंदोलन से जुड़े तमाम साथियों के लिए वह शेर जो बी॰एच॰यू॰ सेंट्रल लाइब्रेरी में प्रवेश करते ही हम संगमरमर की किताब पर पढ़ते हैं :

साक़ी की मुहब्बत में दिल साफ़ हुआ इतना
जब सर को झुकाता हूं शीशा नज़र आता है।

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