एक फ़िल्म के हिट होने का मापदंड पैसा कैसे हो सकता है ?

Entertainmentएक फ़िल्म के हिट होने का मापदंड पैसा कैसे हो सकता है ?

 

Saquib Salim

राजा हिंदुस्तानी’ भाई सुपरहिट हुई है तीन महीने से सिनेमा में लगी हुई है इतने दिन तो DDLJ भी नहीं चली थी”

आज से बीस पच्चीस साल पहले तक भी एक फ़िल्म के हिट होने का मापदंड यही था कि वह कितने दिन सिनेमा हॉल में लगी रही और कितने हाउसफुल हुए। सिनेमा को दर्शकों की कसौटी से परखा जाता था कि कितने लोग उसको देखना चाहते हैं या देख कर दोबारा आते हैं। आप मुग़ले आज़म की बात कीजिये या शोले की फ़िल्म की सफलता ये थी कि वह कितने हफ़्ते हाउसफुल रही।

लेकिन आज वक़्त बदल चुका है। दुनिया समझदार हो चली है तो फ़िल्म निर्माता भी पीछे कैसे रहते। अब फ़िल्म के हाउसफुल होने की ख़बर नहीं आती। न कोई यह बताता है कि कितने दिन फ़िल्म सिनेमा में थी अब सफलता पैसे से नापी जाती है। पहले दिन इतने करोड़ कमाए, दूसरे दिन इतने और इतने दिन में सौ करोड़ कमा लिए बस यही ख़बर है और यही सफलता का मापदंड। फ़िल्म दर्शक को कैसी लगी इससे किसी को क्या फ़र्क़ पड़ता है। पैसा कमा लिया मतलब सफल हो गए। 50 करोड़ में नेटफ़्लिक्स को राइट्स बेचे, किसी का विज्ञापन किया, किसी TV को बेचा और आ गया आंकड़ा के 100 करोड़ हो गए।

बेहूदगी तो यह है कि कुछ समाचार वाले बताते हैं कि देखो फलां फ़िल्म रिलीज़ से पहले ही हिट हो गयी। अब इस पर हंसा जाये कि मातम किया जाये कि हम एक ऐसे दौर में जी रहें हैं जहाँ फ़िल्म को कोई न भी देखे तो उसे हिट घोषित किया जा सकता है।

लेकिन यह कोई केवल फ़िल्मों की विडंबना नहीं है यह हमारे समाज की सच्चाई है। हम इस समाज में साँस ले रहें हैं जहाँ पैसा अगर ख़ुदा नहीं भी है तो ख़ुदा से कम भी नहीं। जिसने पैसा कमा लिया वह सफल है। पहले की तरह अब खिलाड़ी के रिकॉर्ड नहीं छपते यह छपता है कि उसने कितने करोड़ का अनुबंध किया, कितने लाख की गाड़ी ख़रीदी और उसकी शादी का ख़र्च कितना ज़्यादा था। आप कमाते कितना हैं इससे सी ही समाज आपको भी आंकेगा। ये समाज अपने पतन की तरफ़ तेज़ी से भाग रहा है और हम उस पतन की तरफ एक दूसरे से तेज़ भाग रहें हैं।

कहाँ के नाम ओ नसब इल्म क्या फ़ज़ीलत क्या
जहान-ए-रिज़्क़ में तौक़ीर-ए-अहल-ए-हाजत क्या

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