उमा से टुनटुन तक का सफ़र

Entertainmentउमा से टुनटुन तक का सफ़र

– वीर विनोद छाबड़ा

सिनेमा जगत में आज का दिन ख़ास है. आज उमा देवी का जन्म दिन है. उस उमा का जिसने गाया था – अफ़साना लिख रही हूँ दिल-ऐ-बेक़रार का… इस गाने आज भी गुनगुनाया जाता था. मगर उनकी नियति में गायिका बनना नहीं लिखा था. उन्हीं की याद रिपीट कर रहा हूँ.

जब हमने साठ के सालों में फ़िल्में देखनी शुरू की थीं तो पर्दे पर एक मोटी, थुलथुल महिला दिखाई देती थी. उसे देख कर बरबस हंसी छूट जाती थी, उसके मोटापे पर नहीं, उसकी सहज हंसी पर. वो ऐसी भोली-भाली हरकतें करती थी कि कोई हंसे बिना रह ही नहीं सकता था. उनका नाम टुनटुन था. कुछ समय बाद जाना कि उसका असली नाम उमा देवी खत्री है और वो फ़िल्मों में गाने के लिए आई थी, उसने एक नहीं पैंतालीस गाने गाये. मगर बंबई वो जगह थी और जो आज मुंबई है, कि बंदा जो चाहता है उसे मिलता नहीं है. लाखों में किसी एक की किस्मत का सितारा चमकता है, बाकी गुमनामी के अँधेरे में गुम हो जाते हैं, अनाम ही रह जाते हैं. उमा देवी की दास्तान भी विचित्र और दुखदायी है. उत्तर प्रदेश के फैज़ाबाद के पास जन्मी थीं.
कभी एक इंटरव्यू में उमा ने बताया था, माता-पिता की सूरत याद नहीं है. ज़मीन-जायज़ाद के फेर में रिश्तेदारों ने उनका क़त्ल कर दिया, तब वो तीन साल की थी. भाई ने पाला-पोसा. लेकिन वो भी एक दिन ग़ायब कर दिया गया. कब मथुरा आ गयी, पता नहीं. रिश्तेदारों ने नौकरानी की तरह रखा. ऐसे में पढ़ाई-लिखाई का तो सवाल ही नहीं पैदा होता. भाग कर दिल्ली आ गयी. यहां अख़्तर अब्बास काज़ी मिले, एक्ससाईज़ इंस्पेक्टर. उन्होंने उनका ख्याल रखा. पार्टीशन हुआ तो काज़ी साहब पाकिस्तान चले गए. उमा फिर अकेली रह गयी.

उमा गाती बहुत अच्छा थी. किसी ने उसे मशहूर डायरेक्टर नितिन बोस के असिस्टेंट जव्वाद हुसैन का पता दिया. उमा बंबई आ गयी, सिंगर बनने. तब वो चौबीस की रही होगी. यहां उमा की भेंट आज के गोविंदा के माता-पिता अरुण अहुजा और उनकी पत्नी निर्मला से हुई. उन्होंने उमा को कई संगीतकारों से मिलवाया. उन्हीं में से एक थे अल्लाहरक्खा. उन्होंने उमा को एक फिल्म में गवाया जिसके लिए दो सौ रूपए फीस मिली. ये बहुत बड़ी रकम थी उमा के लिए.

मगर उमा का लक्ष्य था उनके आइडियल नौशाद अली. उमा अब्दुर रशीद कारदार के स्टूडियो पहुँच गयी, उस दौर के बहुत बड़े प्रोड्यूसर-डायरेक्टर. उनसे ही उमा ने पूछ लिया, कारदार कौन है. मैं गाने के लिए आयी हूँ, मर जाउंगी मगर गाये बिना जाउंगी नहीं. कारदार को उमा का कॉन्फिडेंस बहुत अच्छा लगा. नौशाद अली के पास भेज दिया. नौशाद ने कहा, गाओ. उमा ने नूरजहां का एक गाना सुना दिया. नौशाद बोले, वाह! उमा की आवाज़ को थोड़ा तराशा और ‘दर्द’ (1947) में गवा दिया, अफ़साना लिख रही हूँ, दिले बेक़रार का… और उमा छा गयी बॉलीवुड में. लोग-बाग़ दीवाने हो गए. उमा की ख्याति साउथ भी पहुंची. जैमिनी वाले एसएस वासन हिंदी में ‘चंद्रकला’ (1948) बना रहे थे. उमा को बुलवा लिया. क्लासिकल गाने थे. उमा पेशोपेश में पड़ गयी. उसने संगीत तो कहीं सीखा नहीं है. मगर संगीत निर्देशक राजेश्वर राव को विश्वास था. उमा का हौंसला बढ़ाया. और उमा सफल भी हो गयी.

इस बीच उमा की आवाज़ सरहद पार पाकिस्तान भी पहुंच गयी. दिल्ली में उमा को सहारा देने वाले अख़्तर अब्बास काज़ी ने भी सुनी, जो पार्टीशन के दौरान दिल्ली से लाहोर आ गए थे. वो दीवाने हो गए. सीधे बंबई जा पहुंचे. उमा से मिले. दोनों में प्यार हो गया. ये प्यार भी बड़ा अजीब अहसास होता है, न धर्म देखता है और न सरहदें. दोनों शादी करके इक-दूजे के हो गए. उमा प्रेगनेंट हुईं. फ़िल्में छोड़ गृहस्थी संभाल ली. बच्चा हुआ. खर्चे बढ़े. एक की कमाई से घर चलाना मुश्किल हो गया. उमा ने फिर से फिल्मों में गाने का फ़ैसला किया. लेकिन बात बनी नहीं. उमा की आवाज़ का स्कोप सीमित था. और फिर गायकी के क्षेत्र में शमशाद बेगम, लता और आशा जैसे बड़े नाम चमक रहे थे. उमा की क्या बिसात?

मगर नौशाद ने समझाया, मायूस होने की ज़रूरत नहीं. तुम्हारा मोटा डील-डौल और तुम्हारे चेहरे की सहजता तुम्हें अच्छी एक्ट्रेस बना सकती है. और उमा मान गयी, लेकिन एक शर्त पर, दिलीप कुमार के साथ काम करूंगी. नौशाद उन दिनों दिलीप कुमार की ‘बाबुल’ में संगीत दे रहे थे. उन्होंने दिलीप कुमार से कह कर उमा को रोल दिलवा दिया. पहले ही सीन में खूब हंसे सब. दिलीप कुमार को उमा पकड़ना चाहती है, दिलीप भाग रहे हैं एक चारपाई के इर्द-गिर्द. अचानक उमा चारपाई पर गिर पड़ी और दिलीप उनके ऊपर. हंसते-हंसते दिलीप का पेट फूल गया. पूछा, तुम्हारा नाम क्या है? उन्होंने बताया – उमा. दिलीप बोले – ये नहीं चलेगा. तुम्हारा नाम टुनटुन होना चाहिए. और उस दिन वो उमा से टुनटुन हो गयीं.

अब टुनटुन हर दूसरी-तीसरी फिल्म में नज़र आने लगीं. और अक्सर कई कई बच्चों की मां के रोल में. हंसी का पर्याय बन गयीं वो. डिस्ट्रीब्यूटरों की मांग पर प्रोड्यूसर-डायरेक्टर फिल्मों में ख़ासतौर पर रोल बनाने लगे. सेंस ऑफ़ ह्यूमर गज़ब था. सेट पर हर समय खाते-पीते देख किसी ने व्यंग्य किया तो बोलीं, अपने मोटापे को भी तो मेंटेन करना है. भगवान दादा, जॉनी वॉकर, राजेंद्रनाथ, महमूद, मारुती, मुकरी आदि उस ज़माने के तमाम टॉप कॉमेडियंस के साथ काम किया. पचास, साठ और सत्तर के सालों में दो सौ से ज़्यादा फ़िल्में की. कुछ मशहूर फ़िल्में हैं, आरपार, मिस्टर एंड मिसेज़ 55, प्यासा, नमक हलाल, कुली, बीवी ओ बीवी, क़ुरबानी, सत्यम शिवम सुंदरम, चाचा-भतीजा, नागिन, हीरा, ललकार,पहचान, शराफ़त, उपकार आदि.

उमा के साथ 1992 में ट्रेजडी हुई. उनके पति गुज़र गए. उमा टूट गयीं. वो एक छोटे से घर में अपने बच्चों और पोते-पोतियों के साथ पुराने फ़िल्मी नग़में सुनते हुए रिटायर्ड ज़िंदगी जीने लगीं. 11 जुलाई 1923 को जन्मीं उमा उर्फ़ टुनटुन 24 नवंबर 2003 को अस्सी की उम्र में ज़िंदगी से ही रिटायर्ड हो गयीं. और इस तरह ख़त्म हुआ उमा देवी से टुनटुन तक सफ़र. एक बढ़िया बायोपिक बन सकती है.

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