कोई हिन्दू मुसलमानों के प्रति सहिष्णु नहीं हो सकता जब तक की वह उसके साथ ही वर्ण और सम्पत्ति के विरुद्ध और स्त्रियों के हक में काम न करे । उदार और कट्टर हिन्दू धर्म की लड़ाई अपनी सबसे उलझी हुई स्थिति में पहुंच गयी है और संभव है उसका अंत भी नजदीक ही हो । कट्टरपंथी हिन्दू अगर सफल हुए तो चाहे उनका उद्देश्य कुछ भी हो भारतीय राज्य के टुकड़े कर देंगे न सिर्फ हिन्दू मुस्लिम दृष्टि से बल्कि वर्णों और प्रान्तों की दृष्टि से भी । केवल उदार हिन्दू ही राज्य को कायम कर सकते हैं । अत: पांच हजार वर्षों से अधिक की लड़ाई अब इस स्थिति में आ गयी है कि एक राजनीतिक समुदाय और राज्य के रूप में हिन्दुस्तान के लोगों की हस्ती ही इस बात पर निर्भर है कि हिन्दू धर्म में उदारता की कट्टरता पर जीत हो । धार्मिक और मानवी सवाल आज मुख्यत: एक राजनीतिक सवाल है । हिन्दू के सामने आज यही एक रास्ता है कि अपने दिमाग में क्रांति लाये , या फिर गिर कर दब जाय । उसे मुसलमान और ईसाई बनना होगा उन्हीं की तरह महसूस करना होगा । मैं हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात नहीं कर रहा , क्योंकि वह एक राजनीतिक , संगठनात्मक या अधिक-से-अधिक सांस्कृतिक सवाल है । मैं मुसलमान और ईसाई के साथ हिन्दू की रागात्मक एकता की बात कर रहा हूं , धार्मिक विश्वास और व्यवहार में नहीं , बल्कि इस भावना में कि ” मैं वह हूं” ऐसी रागात्मक एकता हासिल करना कठिन मालूम पड़ सकता है , या अक्सर एक तरफा हो सकता है और उसे हत्या और रक्तपात की पीड़ा सहनी पड़ सकती है । मैं यहां अमेरिकन गृहयुद्ध की याद दिलाना चाहूंगा जिसमें चार लाख भाई ने भाई को मारा और छ: लाख व्यक्ति मरे लेकिन जीत की घड़ी में अब्राहम लिंकन और अमेरिका के लोगों ने उत्तरी और दक्षिणी भाइयों के बीच ऐसी ही रागात्मक एकता दिखाई ।हिन्दुस्तान का भविष्य चाहे जैसा भी हो , हिन्दू को अपने आप को बदल कर मुसलमान के साथ ऐसी रागात्मक एकता हासिल करनी होगी । सारे जीवों और वस्तुओं की रागात्मक एकता हासिल करनी होगी । सारे जीवों और वस्तुओं की रागात्मक एकता में हिन्दू का विश्वास भारतीय राज्य की राजनीतिक जरूरत भी है कि हिन्दू मुसलमान के साथ एकता महसूस करे । इस रास्ते पर बड़ी रुकावटें और हार हारें हो सकती हैं , लेकिन हिन्दू दिमाग को किस रास्ते पर चलना चाहिए , यह साफ है । कहा जा सकता है हिन्दू धर्म में उदारता और कट्टरता की इस लड़ाई को खतम करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि धर्म से ही लड़ा जाय। यह हो सकता है। लेकिन रास्ता टेढा है और कौन जाने कि चालाक हिन्दू धर्म , धर्म विरोधियों को भी अपना एक अंग बनाकर निगल जाय । इसके अलावा कट्टर पंथियों का जो भी अच्छे समर्थक मिलते हैं , वह कम पढ़े-लिखे लोगों में और शहर में रहने वालों में ; गांव के अनपढ लोगों में तत्काल चाहे जितना भी जोश आ जाय पर वे उनके स्थायी आधार नहीं बन सकते । सदियों की बुद्धि के कारण पढ़े-लिखे लोगों की तरह गांव वाले भी सहिष्णु होते हैं । कम्युनिज्म या फासिज्म जैसे लोकतंत्रविरोधी सिद्धान्तों से ताकत पाने की खोज में , जो वर्ण और नेतृत्व के मिलते जुलते विचारों पर आधारित हैं , हिन्दू धर्म का कट्टरपंथी अंश भी धर्मविरोधी का बाना पहन सकता है । अब समय है कि हिन्दू सदियों से इकट्ठा हो रही गन्दगी को अपने दिमाग से निकाल कर उसे साफ करे । जिन्दगी की असलियतों और अपनी परम सत्य की चेतना , सगुण सत्य और निर्गुण सत्य के बीच उसे एक सच्चा और फलदायक रिश्ता कायम करना होगा । केवल इसी आधार पर वह वर्ण , स्त्री , सम्पत्ति और सहिष्णुता के सवालों पर हिन्दू धर्म के कट्टर्पंथी को हमेशा के लिए जीत सकेगा जो इतने दिनों तक उसके विश्वासों को गन्दा करते रहे हैं और उसके देश के इतिहास में बिखराव लाते रहे हैं । पीछे हटते समय हिन्दू धर्म में कट्टरता अक्सर उदारता के अन्दर छिप कर बैठ जाती है । ऐसा फिर न होने पाये । सवाल साफ है । समझौते से पुरानी गलतियां फिर दुहरायी जाएंगी । इस भयानक युद्ध को अब खतम करना ही होगा । भारत के दिमाग की एक नई कोशिश तब शुरु होगी जिसमें बौद्धिक का रागात्मक से मेल होगा , जो विविधता में एकता को निष्क्रिय नहीं बल्कि सशक्त सिद्धान्त बनायेगी और जो स्वच्छ लौकिक खुशियों को स्वीकार करके भी सभी जीवों और वस्तुओं की एकता को नजर से ओझल न होने देगी ।
– राममनोहर लोहिया ( जुलाई १९५०)


