शिवम् सौरभ
कांग्रेस का रिबोर्न कब का हो गया होता लेकिन जहां तक मेरा समझ कहता है कि पुरे पार्टी में आत्ममुग्ध बौने भरे पड़े हैं, खासकर हिंदी पट्टी के राज्यों में।
पहचान शुन्य हो चुकी है लेकिन घमंड इतना अधिक की जवाब नहीं। आज आजादी के अमृत महोत्सव के पेंटिंग्स में आधुनिक भारत के निर्माता पंडित जवाहरलाल नेहरू के तस्वीर को हटा दिया गया। यह एक निहायत ही घटियापन भरा कदम है। लेकिन चंद कांग्रेसियों के अलावा कोई और कांग्रेस नेता आपको विरोध करता हुआ नजर नहीं आएगा।
राहुल गांधी जी ने पिछले दिन कहा था कि हमें बहादुर लोगों की जरूरत है बंदा ने बिल्कुल सही कहा। दस प्रतिशत कांग्रेसी छोड़कर नब्बे प्रतिशत कांग्रेसी कायर/सत्ता चिपकु है। नवनीत चतुर्वेदी, मनीष सिंह, सुंदर गुर्ज्जर सहित अनेकों नाम है जो भाजपा का विरोध दमभर करतें हैं और करने की कुव्वत रखते हैं। लेकिन मेरा समझ कहता है कि इनसे कोई भी वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सीधे संपर्क में नहीं है अगर हैं भी तो वह नहीं चाहता है कि आलाकमान के संपर्क में ऐसे लोग आए।
बहरहाल सिर्फ राहुल गांधी की सक्रियता कांग्रेस को कितना पुनर्जीवित करेगी। उन्हें अपनी सुरक्षा की भी चिंता है सीधे किसी से मिल भी नहीं सकते और आत्ममुग्ध बौने अच्छे लोगों को बढ़ने नहीं देंगे। आपको हंसी तो तब आएगी कि संगठन के ऐसे ऐसे छोकड़े जो साल में दो पोस्टर ठीक से नहीं लगवा सकते/दस लोगों को दस मिनट संबोधित नहीं कर सकते/साल में दस दिन फोर व्हीलर से घुम सकते वह वरिष्ठता का दंभ ऐसे भरेंगे जैसे वह राहुल गांधी के राइट हैंड हो।
राहुल गांधी को नयी नीति के साथ सड़े हुए आम को फेंकना होगा और अच्छे लोगों को जोड़ने की नीति को अपनाना होगा। राहुल गांधी जी को समझना चाहिए कि जो पदाधिकारी साल में दस नये कार्यकर्ता जोड़ नहीं पाया/ दुसरे दलों से एक आध कार्यकर्ता तोड़ नहीं पाया वह घंटा आपको दस वोट दिलाएगा।
कांग्रेस में जो भी लोग भरे हैं 90% अधिक इस आस में है कि वापस सरकार बनेगी और हम खजाने की लुट करेंगे। जो कि बड़ा दिव्य स्वप्न है नये लोग और प्रत्याशी आपसे जुड़ नहीं रहें हैं और आप सरकार बनाने की सोच रहे हो.
मोरल ऑफ द पोस्ट:- कांग्रेस को सांगठनिक फेरबदल की बड़ी जरूरत है और सुखी टहनी को छंटनी तथा नये पौधे को लगाने की।
(लेखक युथ एक्टिविस्ट हैं, देश और बिहार से जुड़े सामाजिक राजनीतिक मुद्दों पर प्रमुखता से अपना विचार रखते हैं।)


