Dr Raju Ranjan Prasad
सन् 1893 में जन्मे ईश्वरीप्रसाद शर्मा आरा नगर के मिश्रटोला मुहल्ले के निवासी सारंगधर मिश्र के इकलौते पुत्र थे। आपका परिवार आरंभ ही से शिक्षित-प्रतिष्ठित एवं गण्यमान्य रहा है। आपके पूर्वजों में चाचा पंडित श्रीधर मिश्र, पितामह पिनाकधर मिश्र तथा हिन्दी के आदि-गद्य लेखकों में शुमार पंडित सदल मिश्र रहे हैं।आप सात वर्ष के हुए तभी आपके पिताजी का देहांत हो गया। 1909 ईस्वी में आपकी माताजी भी चल बसीं। अब तो चाचा-चाची का प्यार ही ईश्वर का एकमात्र सहारा था। चाचा-चाची प्यार से इन्हें ‘बच्चनजी’ कहकर पुकारते। बचपन के साथी आपको ‘दीना’ या ‘दीनानाथ’ कहा करते। ‘मनोरंजन’ के संपादक स्वयं भी मनोरंजन-मूर्ति थे। हँसाने, गुदगुदाने या चिकोटी काटने का उनका स्वभाव था। रामवृक्ष बेनीपुरी ने लिखा है, ‘एक बार काशी में मैं एक मारवाड़ी वासे में पालथी मारकर भोजन कर रहा था। पीछे से आकर किसी ने ऐसा गुदगुदा दिया कि मैं उठ खड़ा हुआ। मुड़कर देखता हूँ शर्मा जी खिलखिला रहे हैं।’ (रामवृक्ष बेनीपुरी, ‘मुझे याद है’, नई धारा, वर्ष 4, अंक 10, पृष्ठ 83)
आपकी आरंभिक स्कूली शिक्षा आरा के ‘कायस्थ जुबली एकेडमी’ में हुई जहां के बाद में आप हिन्दी-शिक्षक नियुक्त हुए। सन् 1905 ईस्वी के स्वदेशी आंदोलन के युग में, इसी स्कूल की एक सभा में आपने अपना पहला व्याख्यान किया था। आपका पहला लेख, जो गद्य-काव्य था, 1909 ईस्वी में ‘भारत-जीवन’ में छपा था।
आरा के महामहोपाध्याय पंडित सकलनारायण शर्मा के संपादन में 1900 ई. में ‘शिक्षा’ नामक साप्ताहिक की शुरुआत खड्गविलास प्रेस (पटना) से हुई थी जिसके संपादकों के इतिहास में भी ईश्वरीप्रसाद शर्मा का नाम जुड़ा है। 1912 ईस्वी में आपने आरा से सचित्र हिन्दी-मासिक ‘मनोरंजन’ का प्रकाशन किया, जिसकी उन दिनों बड़ी धूम थी। उस समय की प्रसिद्ध मराठी मासिक पत्रिका ‘मनोरंजन’ के तर्ज पर शर्मा जी ने इसे निकाला था। यद्यपि शर्मा जी की पत्रिका अपने मिजाज में साहित्यिक थी, किंतु शिक्षा संबंधी सामग्री की वजह से शीघ्र ही छात्रों के बीच लोकप्रिय हो गई। इस पत्रिका ने तीन वर्ष के अल्पकाल का जीवन प्राप्त किया था।
यह नये ढंग का बहुत ही सुसज्जित और सुंदर मासिक था। तृतीय बिहार प्रादेशिक हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सभापति बाबू शिवनन्दन सहाय के शब्दों में : ‘मनोरंजन खूब सज-धज कर निकलता था और अपने सुंदर लेखों से मन को रंजित किया करता था’। इसके दो महत्त्वपूर्ण विशेषांक भी प्रकाशित हुए थे। इस सर्वांगसुंदर विशेषांक के प्रकाशन का सारा खर्च श्रीरघुवीर नारायणजी ने राजाबहादुर कीर्त्यानन्द सिंह से दिलवाया था। इसके बाद आरा से ऐसी सर्वगुणसंपन्न कोई पत्रिका प्रकाशित नहीं हो सकी।
‘मनोरंजन’ ने जिस समय बिहार प्रान्त में कार्य करना आरंभ किया था, उस समय इस प्रान्त में एकमात्र लक्ष्मी ही एक ऐसी मासिक पत्रिका थी जो अच्छी श्रेणी में गिनी जाती थी, परमात्मा की दया और हिन्दी के धुरन्धर लेखकों और कवियों की लेखनी का साहाय्य पाकर ‘मनोरंजन’ ने वर्ष ही भर में पत्र-साहित्य में एक अच्छा स्थान प्राप्त कर लिया, पर कहते दुःख होता है कि इसके प्रकाशन का भार भी हमारे ही निर्बल स्कन्धों पर रहने के कारण अर्थ की कृच्छ्रता से और प्रेस अपना न होने से गत वर्ष इसका जीवन नितान्त ही संशयापन्न हो गया था और यदि हरदास एण्ड कम्पनी के सुयोग्य संचालक पण्डित हरिदासजी वैद्य अपनी दयालुता से इसे फिर नहीं अपनाते तो शायद ‘मनोरंजन’ फिर नहीं निकल पाता, पर उक्त महोदय ने जिस प्रकार उत्साह देकर प्रथम वर्ष इसे निकलवाया उसी प्रकार मरने से भी इसका उद्धार किया और इसने फिर दुनिया का मुँह देखा। अबके प्रबन्ध अच्छा कर लिया गया है और यदि हमारे ग्राहकों ने पुरानी गड़बड़ी का खयाल छोड़कर सहायता की कमर कसी तो दो ही चार महीनों में इसकी रही-सही त्रुटियाँ भी दूर हो जायेंगी और कुछ ही अंकों के बाद चित्र और पृष्ठ तथा कागज की किस्म बढ़ाने का उद्योग किया जायगा। आशा है कि हमारे पाठक ‘मनोरंजन’ की सहायता को अग्रसर होंगे।’
रामसहाय लाल बुकसेलर ने 1921 ई. में द्विजदेव नारायण लाल के संपादकत्व में ‘श्रीविद्या’ नामक मासिक पत्रिका शुरू की थी जिसके संपादकों में लाला भगवानदीन, अखौरी शिवनन्दन सहाय के साथ ईश्वरीप्रसाद शर्मा का भी नाम है। लाला भगवानदीन के बाद आपने गया से निकलनेवाली पत्रिका ‘लक्ष्मी’ का भी संपादन किया था।
ईश्वरीप्रसाद शर्मा हास्य-व्यंग्य के उस्ताद, फक्कड़ों के बादशाह, मतवाला मंडल के सहयोगी थे। दफ्तर कभी वक्त से न जाते थे। मित्रों से कहते थे-‘त्यागपत्र हमेशा जेब में रखता हूं’। स्वादिष्ट भोजन करना, आये दिन थियेटर देखना, मित्रों के साथ गप लगाना, दूसरों को काम न करने देना-यही उनका दैनिक कार्यक्रम था। उनकी स्मृति इतनी तीक्ष्ण थी कि सैंकड़ों कविताएँ याद थीं। संस्कृत, बंगला, हिन्दी, उर्दू जब जिस भाषा की जरूरत हुई, सुनाने लगते थे। इस वैविध्य का वे यथोचित लाभ लेते। अनुवाद से लेकर व्यापारियों के लिए विज्ञापन लिखने तक जब जैसा काम मिला, वह आनन-फानन कर डालते थे और क्या मजाल कि कभी लिखे को काटना पड़ा हो।
पंडित ईश्वरीप्रसाद शर्मा, शिवपूजन सहाय के गुरु कहे जाते हैं। आरंभ में इन्हीं के प्रोत्साहन से शिवपूजन सहाय ने हिन्दी-सेवा का व्रत लिया था। कुछ दिन तक आगरे में साथ रहकर दोनों ‘धर्माभ्युदय’ पत्र में काम कर चुके थे। इस पत्रिका का आधा अंश गुजराती में रहता था। आपने कुछ ही दिनों बाद उसे सर्वांग हिन्दीमय कर डाला। शर्मा जी केवल साहित्यिक गुरु न थे बनियों से पैसा वसूल करने की कला में कलकत्ते के हिन्दी लेखकों के ‘आचार्य’ थे। शिवपूजन सहाय को समझाते, ‘सीधी उंगली से घी नहीं निकलता। पेशगी रुपया मांगो; मिल जाय तो कहो, बकाया वसूल पाया।’
थियेटर देखने के शौकीन तो थे ही, अभिनय में भी बेजोड़ थे। आरा में आपने एक ‘मनोरंजन नाटक मंडली’ स्थापित कर ली थी, जो अच्छे-अच्छे नाटकों का सदा अभिनय करती थी। इस मंडली द्वारा प्रस्तुत नाटकों में आप भी एक सफल हास्य अभिनेता के रूप में रंगमंच पर उतरते थे। इस नाटक मंडली ने आपके द्वारा लिखित ‘सूर्योदय’ नामक नाटक का सफलतापूर्वक अभिनय किया था। इसमें आप स्वयं रंगमंच पर उतरे थे। इस मंडली द्वारा ‘सत्यहरिश्चन्द्र’, ‘मयूरध्वज’ आदि और भी कई नाटक अभिनीत हुए थे। ‘सत्यहरिश्चन्द्र’ में आपने डोम का स्वांग धारण किया था और ‘मयूरध्वज’ में भगवान श्रीकृष्ण का। एक बार ‘आरा नागरी-प्रचारणी सभा’ के वार्षिकोत्सव के अवसर पर आपने स्व. प. शिवनाथ शर्मा (‘आनंद’-संपादक) द्वारा रचित नागरी-निरादर’ नामक प्रहसन में मौलाना के वेष में रंगमंच पर उतरकर जबानदानी के बड़े-बड़े मौलवियों को भी हैरत में डाल दिया था। ‘सत्य हरिश्चंद्र’ में डोम का पार्ट इतना बढि़या किया था कि शिवपूजन सहाय हंसते-हंसते लोट-पोट हो गए थे।
एक अनुवादक के रूप में आपकी बड़ी ख्याति है। मराठी से आपने ‘इन्दुमती’ और ‘रत्नदीप’ नामक उपन्यास का अनुवाद किया था। गुजराती से आपने जैनधर्म संबंधी पुस्तकों का अनुवाद किया था। ये पुस्तकें एक जैन प्रकाशक के नाम से प्रकाशित हुई हैं। बंगला से आपने किन्नरी’, ‘अन्नपूर्णा का मन्दिर’, ‘जल-चिकित्सा’ आदि अनेक प्रसिद्ध ग्रंथों का अनुवाद किया था। ‘पंजाब-हत्याकांड’ जैसी पुस्तक का बंगला-अनुवाद आपने एक ही महीने में करके श्रीनिहालचन्द्र वर्मा को दे डाला था। कलकत्ता के हरिदास एंड कंपनी से प्रकाशित ‘बंगला-हिन्दी कोश’ आपके केवल तीन महीने का फल है। मेरी कॉरेली लिखित ‘थेल्मा’ का अनुवाद आपने रामवृक्ष बेनीपुरी के अनुरोध पर एक पखवारे में ही कर डाला था। एक बार ग्रियर्सन्स ‘मैगजीन’ के पुराने अंकों की कुछ कहानियों का दस-पन्द्रह दिनों में ही अनुवाद कर आपने ‘प्रेमगंगा’ के नाम से पुस्तक तैयार कर ली, जो लखनऊ की गंगा पुस्तकमाला से प्रकाशित और बनैली राज के कुमार रामानन्द सिंह को समर्पित हुई। इसके लिए कुमार साहब ने आदरपूर्वक बुलाकर आपको पांच सौ रुपये दिये थे। संस्कृत से हिन्दी अनुवाद के लिए प्रसिद्ध नवलकिशोर प्रेस से वाल्मीकीय रामायण के विषय में बहुत दिनों से पत्र-व्यवहार हो रहा था।
आपकी लिखी सबसे पहली मौलिक पुस्तक ‘चन्द्रकुमार’ उपन्यास है, जिसका प्लॉट घर की मजदूरिन के मुंह से सुनी कहानी के आधार पर रचा गया था। इसके बाद आपने ‘हिरण्यमयी’ की रचना की। इन दोनों पुस्तकों के बाद आपने अनेक पुस्तकें लिखीं और अनूदित कीं। इनकी संख्या लगभग 150 तक होगी। लगभग डेढ़ दर्जन पुस्तकें तो आपने दूसरों के लिए लिखीं।
आप पद्य रचना में भी सिद्धहस्त थे। आपके लिखे नीति-शिक्षापूर्ण सरस पद्यों का संग्रह ‘सौरभ’ के नाम से छपकर अप्रकाशित ही रहा। आपने व्यंग्य-विनोदमयी अपनी पद्य-रचनाएं ‘चना-चबेना’ के नाम से स्वयं प्रकाशित की थीं। इसी शैली की एक गद्य-पद्य रचना कचालू-रसीला’ के नाम से प्रकाशित करने की आपकी इच्छा पूरी नहीं हो सकी। आपका लिखा ‘मान-मर्दन’ नाटक भी अप्रकाशित ही है।
आपके द्वारा लिखित मौलिक, अनूदित एवं संपादित प्रमुख पुस्तकों के नाम हैं-‘कोकिला’, ‘स्वर्णमयी’, ‘मागधी कुसुम’, ‘मालिनी बाबू’, ‘गल्पमाला’, ‘हिन्दी-बंगला-कोश’, ‘चन्द्रधर’, ‘अन्योक्ति तरंगिनी’, ‘मातृवन्दना’, ‘सन सत्तावन का गदर’, ‘सूर्योदय’(नाटक), ‘रंगीली दुनिया’, ‘ईसप की कहानियां’ (तीन भाग), ‘सिपाही विद्रोह’, ‘सीता’, ‘शकुन्तला’, ‘सती-पार्वती’, ‘पंचशर’ (गद्य-काव्य), ‘उद्भ्रान्त प्रेम’, ‘अन्नपूर्णा का मंदिर’, ‘किन्नरी’, ‘इन्दुमती’, ‘प्रेमगंगा’, प्रेमिका, जल-चिकित्सा, सुशील-शिक्षा, ‘चन्द्रकुमार का मनोरमा’, ‘सच्ची मैत्री’, बाल-गल्पमाला’, पंजाब-हत्याकांड’, हिन्दी-बंगला-कोश’, ‘रामचरित्र’ आदि। ‘रामचरित्र’ ग्रंथ के प्रकाशित होने पर बनैली-नरेश कीर्त्यानन्द सिंह बहादुर ने आपको एक हजार रुपये का सम्मान-पुरस्कार दिया था। यह ग्रंथ उन्हीं को समर्पित है।
ऊपर से निठल्ले और हंसोड़ लगनेवाले शर्मा जी गहरी सूझ-बूझ के आदमी थे और कविता के साथ इतिहास के भी पंडित थे। 1922 ई. में उन्होंने ‘गदर का इतिहास’ लिखा और उसे भारत का स्वाधीनता संग्राम कहा था।
‘महादेवप्रसाद सेठ की प्रेरणा से’ भारत के ‘भाग्य-विधाता सीरीज’ के तहत ‘दादाभाई नौरोजी’ नामक चरित-पुस्तक लिखी। हिन्दी में दादाभाई की कोई बड़ी-सी जीवनी या उनके उपदेशों का संग्रह अबतक नहीं प्रकाशित हुआ था, इसलिए लेखक ने इकट्ठे ही दोनों अभावों की पूर्ति का प्रयत्न किया। इस पुस्तक को लिखने में लेखक ने मद्रास की जी.ए. नटेसन एण्ड कंपनी द्वारा प्रकाशित ‘स्पीचेज एण्ड राइटिंग्स ऑफ दादाभाई नौरोजी’ नामक ग्रंथ से पूरी सहायता ली थी। यह किताब ‘नागरी प्रचारिणी सभा’, आरा के पुस्तकालयाध्यक्ष बाबू शुकदेव सिंह को समर्पित की गई थी। लिखा था : ‘मित्रवर! जिन दिनों मैं दादाभाई की यह जीवनी रोगशय्या पर पड़े-पड़े लिख रहा था, उस समय संसार में तुम्हारे सिवा मेरा कोई सहायक न था। तुम्हारी सेवा शुश्रषा और सहायता के अभाव में मेरी मृत्यु हो जानी संभव थी और तब यह पुस्तक शायद ही मेरे हाथों पूरी हो पाती। उन्हीं स्मरणीय दिनों की स्मृति को बनाये रखने के लिये यह पुस्तक तुम्हीं को समर्पित है।’
‘अन्नपूर्णा का मन्दिर’ हिन्दी-ग्रन्थ-रत्नाकर-सीरीज का तेरहवां ग्रंथ है। यह पुस्तक बंगाल की प्रसिद्ध उपन्यास-लेखिका श्रीमती निरुपमा देवी के ‘अन्नपूर्णार मन्दिर’ का भाषांतर है। मूल पुस्तक को बंगाल में बहुत ही ऊंचा स्थान प्राप्त है। शर्मा जी के हिन्दी अनुवाद से पहले ‘बंगाल इंपीरियल लाइब्रेरी’ के बाबू शरच्चन्द्र सेन इसका अंग्रेजी भाषा में अनुवाद कर चुके थे। उनकी राय थी कि ‘इन दिनों किसी भी बंगला उपन्यास-लेखक ने इससे अच्छा उपन्यास नहीं लिखा’।
ईश्वरीप्रसाद शर्मा इस धारणा के माननेवाले थे कि ‘प्रत्येक बालक और युवा को अपने देश के प्रसिद्ध-प्रसिद्ध पुरुषों की जीवनियां पढ़नी चाहिए।’ साथ यह भी कि ‘इस तरह की छोटी-छोटी जीवनियों को सीधी-सादी भाषा में लिखकर बालकों और युवाओं के हाथ में देना प्रत्येक लेखक का कर्त्तव्य होना चाहिए।’ इससे बड़ा कर्त्तव्य है कि ‘ऐसी पुस्तकों की भाषा बोलचाल की और जल्द समझ में आने योग्य होनी चाहिए।’ इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु शर्मा जी ने ‘बाल-विनोद-वाटिका का बीसवां पुष्प’ अर्थात ‘भगवान गौतम बुद्ध’ की रचना की। बालकों एवं युवाओं को ध्यान में रखकर लिखी इस किताब की भाषा तो अवश्य ही सरल, सहज और बोधगम्य है, किन्तु इस प्रयास में एकाध स्थलों पर लेखक भूल गया लगता है कि वह किसी मिथकीय नहीं बल्कि ऐतिहासिक पुरुष की जीवनी लिख रहा है। एक जगह वे लिखते हैं, ‘‘अयोध्या के राजा दशरथ और उनके पुत्र ईश्वर के अवतार रामचन्द्र का नाम भला किस हिन्दू से छिपा है? आज से दो हजार वर्ष पहले उसी वंश के राजा शुद्धोदन हिमालय की तराई में अपने पिता के बसाए हुए ‘कपिलवास्तु’-नामक नए नगर में राज्य करते थे।‘‘
कहने की जरूरत नहीं कि बीसवीं शती के तीसरे दशक में हिन्दी साहित्य में बालक-बालिकाओं और स्त्रियों के पढ़ने योग्य पुस्तकों और पत्रों का बड़े धड़ल्ले से हो रहा था। कलकत्ते की प्रसिद्ध आर.एल. बर्म्मन एण्ड कम्पनी के अध्यक्ष बाबू रामलाल बर्म्मा ने इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु ‘रमणी रत्नमाला’ नाम से एक पुस्तकमाला निकालनी आरंभ की। इस माला की ‘सावित्री-सत्यवान’ और ‘नल-दमयन्ती’ जैसी पुस्तकें समाचारपत्रों एवं हिन्दी पाठकों के बीच खासी ख्याति अर्जित कर चुकी थीं। रामलाल जी ही के अनुरोध से, उनकी इस स्त्री-पाठ्य-ग्रंथमाला के लिए ईश्वरीप्रसाद शर्मा ने ‘रमणी रत्नमाला का तीसरा रत्न’ अर्थात ‘सीता’ नामक पुस्तक की रचना की। इस पुस्तक को तैयार करने में लेखक ने गोस्वामी तुलसीदास के ‘रामचरितमानस’, महर्षि वाल्मीकि प्रणीत ‘रामायण’ और महाकवि भवभूति-रचित ‘उत्तररामचरित’ से सहायता ली है; इसी से यत्र-तत्र इन ग्रंथों के भावों की झलक इस पुस्तक में दिखलाई देती है।
वन में पहुंचाने के लिए गये हुए अपने देवर लक्ष्मण के मुंह से अपने पति की आज्ञा सुनकर सीता बोलीं-‘‘महाराज ने मुझे घर से निकालकर प्रजा को संतुष्ट किया है। मैं भी अपने स्वामी के आदेश को फिर आंखों पर रख, हंसते-हंसते सारे कष्ट सहने को तैयार हूं। दुख कैसा?’’ यह न सिर्फ सीता का आदर्श है बल्कि लेखक भी अपने समय और समाज में इसी आदर्श की स्थापना करना चाता हैं।
मठिला-डुमरांव-निवासी पंडित रघुवीरदत्त शर्मा को समर्पित ‘चना-चबेना’ की अधिकतर रचनाएं ‘मतवाला’, ‘मौजी’, ‘गोलमाल’, ‘भूत’ और ‘मनोरमा’ में छप चुकी थीं। कुछ इधर-उधर के हैं तो कुछ एकदम कोरे हैं। पंडित जी की रचनाओं के विषय में तत्कालीन सुप्रसिद्ध विनोदी पत्र मतवाला’ ने पहले वर्ष के दूसरे अंक में लिखा था : ‘हम अपने सुप्रसिद्ध विनोदी मित्र ‘‘मनोरंजन’’-संपादक पण्डित ईश्वरप्रसाद शर्मा को भी बड़े प्रेम और आदर के साथ याद करते हैं, जिनकी हास्य-रसमयी कविताओं ने समय-समय पर ‘‘मतवाला’’ को विशेष चित्ताकर्षक बनाया है। शर्मा जी को विनोद का व्यसन है। वे मनोरंजन की मूर्ति हैं।’
शिवपूजन सहाय के नेतृत्व और मार्गदर्शन में चार खंडों में हिंदी साहित्य और बिहार जो संपादित किया गया, उसकी पहली प्रेरणा ईश्वरीप्रसाद शर्मा ही के हृदय में हुई थी। उन्होंने ही इस कार्य के लिए शिवपूजन सहाय जी को प्रेरित किया और आरा की नागरी-प्रचारिणी सभा के पुस्तकालय-संचालक शुकदेवसिंह को उनकी सहायता के लिए उत्साहित किया था। हिंदी-प्रेमियों से इतिहास के लिए सामग्री-संकलन के निमित्त अनुरोध करते हुए सबसे पहले सूचना उन्होंने ही लिखी थी और सामग्री-संकलन हेतु उसके साथ ही एक विवरण-पत्र भी तैयार कर दिया था। (हिन्दी-साहित्य और बिहार, प्रथम खण्ड, भूमिका, पृष्ठ ठ।)


