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आज कादंबनी गांगुली की 160वीं जयंती है, इस मौक़े पर गूगल ने भी आज 18 जुलाई को कादंबिनी गांगुली का 160वां जन्मदिन अपने अन्दाज़ में मनाया है. गूगोल ने एक डूडल बनाया है। बेंगलुरू के अतिथि कलाकार ओद्रिजा द्वारा तैयार आज के Google Doodle में मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल की पृष्ठभूमि में कादंबिनी गांगुली का एक स्केच दिखाई दे रहा है. कादंबिनी गांगुली भारत में एक चिकित्सक के रूप में प्रशिक्षित होने वाली पहली महिला थीं.

शिव शंकर सिंह का ये लेख आपको कादंबिनी गांगुली के बारे में जानने में काफ़ी सहयोग करेगा।
डाक्टर यह शब्द और खासकर महिला फिजीशीयन डाक्टर से आपके मन में क्या सबसे पहले आता होगा मैं नहीं जानता किंतु मेरे ज़हन में भारत की पहली दो महिला डाक्टर आनंदीबेन जोशी एवं कादंबनी गांगुली का नाम आता है। कादंबनी गांगुली भारत में पश्चिमी चिकित्सा पद्धति का प्रयोग करने वाली पहली महिला फिजीशियन डाक्टर थी,और यह अपनी पहली नौकरी में ही आज के हिसाब से लगभग 2 से 2.5 लाख महिना कमा लेती थी। और उन्हें हम भारत की पहली वर्किंग मां भी कह सकते हैं, जिसने अपने पढ़ाई और काम के दौरान अपने बच्चों का ध्यान रखा,इनके कुल आठ बच्चे थे जिनमें पांच बच्चे इनके पति के पहली पत्नी से थे किंतु इन्होंने बच्चों में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया।।अब आगे बात करते हैं,
* वह आज का ही दिन था जब एक छोटी बच्ची का जन्म होता है, जिसने बड़े होकर रूढ़िवादिता को तोड़ते हुए भारत की चिकित्सा, समाजिक, स्वतंत्रता आन्दोलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
जी हां वह आज ही का दिन था जब भागलपुर के ब्रहमसमाजी ब्रजकिशोर बसु की पुत्री कादंम्बनी गांगुली का जन्म यहीं 18 जुलाई 1861 को हुआ था. वे उन्नीसवीं शताब्दी की पहली महिला थी जिन्हे ब्रिटिश शासन काल मे पहली महिला स्नातक और पहली महिला चिकित्सक होने का गौरव प्राप्त था. उनकी प्रारम्भिक शिक्षा भागलपुर मे वर्ष 1868 ई मे स्थापित बर्नाकुलर मिडिल गर्ल स्कूल से हुई थी, वह समय ऐसा था जब लड़कियों को शिक्षा का अधिकार नहीं था और थोड़ा बड़े होते ही उनका विवाह कर दिया जाता था और उस समय मौजूद शिक्षण संस्थान भी समाज के डर से लड़कियों को स्कूल में भर्ती नहीं करते थे, ठीक इसी तरह का व्यवहार कादंबनी गांगुली के साथ हुआ किन्तु सारी चीजों एवं विरोध को दरकिनार करते हुए सन् 1878 में कलकत्ता विश्वविद्यालय की इंट्रेंस परीक्षा पास करने वाली पहली महिला बनीं और 1883 ई मे ग्रेजुएशन की परीक्षा पास की थी, उस जमाने मे वे न केवल तत्काल बंगाल अपितु सम्पूर्ण ब्रिटिश भारत की पहली महिला स्नातक (ग्रेजुएट )थी , उन्होने जब कलकत्ता मेडिकल कालेज मे दाखिला लेना चाहा तब उन्हे दाखिला नहीं मिला क्योंकि उस समय लड़कियो के लिए मेडिकल की पढ़ाई करना वर्जित था. तब कादंबनी के गुरु द्वारकानाथ गांगुली जो बाद मे इनके पति भी बने। इन्हीं द्वारकानाथ गांगुली ने वायसराय से लेकर गवर्नर तक कादम्बनी के मेडिकल कालेज मे दाखिला को लेकर आन्दोलन चलाया जिसके फलस्वरूप 1883 ई मे उन्हे कलकत्ता मेडिकल कालेज मे दाखिला मिला,इसी वर्ष इन्होंने द्वारकानाथ के साथ विवाह कर लिया। द्वारकानाथ गांगुली उस समय पांच बच्चों के पिता एवं विधुर थे इसके साथ ही यह कादम्बनी गांगुली के गुरु एवं मार्गदर्शक भी थे, इस विवाह का विरोध समाज एवं कुछ ब्रह्मो समाज के सदस्यों ने भी किया किन्तु वह आगे बढ़ी और अपनी पढ़ाई जारी रखी एवं सन् 1886 में अपनी चिकित्सा शास्त्र की डिग्री ली और चिकित्सा शास्त्र की डिग्री लेने वाली वे पहली भारतीय महिला बनीं। इनके जुझारूपन एवं लगन देखकर उस वक्त की दो महान महिलाएं फ्लोरेंस नाइटेंगल एवं एनी बेसेंट भी प्रभावित हुई। फ्लोरेंस नाइटेंगल ने अपने एक मित्र को इनको नौकरी दिलाने में मदद करने के लिए कहा फिर कादम्बनी गांगुली को लेडी डेफरिन वूमेन हास्पिटल मे नौकरी मिली,उस समय इन्हें महीने के 300रू प्रति माह मिलते थे मतलब आज के अनुसार लगभग 2 -2.5लाख प्रति माह होंगे। पाँच वर्ष तक नौकरी करने के दौरान उन्हें अंग्रेज सीनियर डाक्टर से भारतीय एवं महिला होने के कारण परेशानी झेलनी पड़ती थी इसके साथ ही उस समय हमारे देश के लोग ही काम करने वाली महिला को हीन भावना से देखते थे,इसी कारण पांच वर्ष तक नौकरी करने के बाद वे पुनःमेडिकल की उच्च शिक्षा लेने के लिए 1892 ई मे वो विदेश गई और ग्लासगो और ऐडिनबर्ग विश्वविद्यालयों से चिकित्सा की उच्च डिग्रियां प्राप्त की,और ऐसा करने वाली आनंदीबेन जोशी के साथ पहली महिला बनीं।

लेकिन भारत में पश्चिमी चिकित्सा शास्त्र का अभ्यास करने वाली कादम्बनी गांगुली पहली डाक्टर फिजीशियन बनी कई बार आनंदीबेन जोशी का नाम भी आता है, किंतु उनकी भारत में पश्चिमी चिकित्सा पद्धति का प्रयोग करने से पहले ही उनकी मृत्यु टूव्यरकुलैसिस से हो गई थी।
डॉ कादंम्बनी गांगुली मे देश के प्रति प्रेम कूट कूट कर भरा हुआ था, क्योंकि कादंबिनी बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय की रचनाओं से बहुत प्रभावित थीं। उनमें देशभक्ति की भावना बंकिमचन्द्र की रचनाओं से ही जागृत हुई थी। और उन्होने बंबई मे 1889 मे आयोजित इंडियन नेशन कॉंग्रेस के अधिवेशन मे भाग लिया और महिलाओ की स्थिति मे सुधार की वकालत की थी. उन्हे बंगाल महिला संघ का सचिव बनाया गया और उहोने 1906ई मे कलकत्ता मे महिला सम्मेलन का आयोजन भी किया था।
कादम्बिनी ने समाज सेवा में भी अपना समय दिया. उन्होंने अपने पति द्वारकनाथ के साथ से समाज सुधार और खासकर महिलाओं के लिए काम करना शुरू कर दिया. उन्होंने वैसे तो कई सामाजिक कार्य किये थे।
लेकिन,कोयले की खानों में काम करने वाली बिहार और ओडिशा की महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए किया गया काम सबसे ज्यादा अहम रहा था. उन्होंने गाँधी जी के लिए साउथ अफ्रीका में किये जा रहे आंदोलन के लिए चंदा भी इकट्ठा किया था।
इसके अलावा,कादम्बिनी को कांग्रेस अधिवेशन में सबसे पहले भाषण देने वाली महिला का सम्मान भी प्राप्त है. साथ ही, वह कांग्रेस की 6 महिला सदस्यों में से भी एक थीं. इस तरह उन्होंने हर जगह अपनी उपस्तिथि दर्ज की थी।
बात चाहे सामाजिक कार्य हो या राजनीतिक. उन्होंने हर जगह महिलाओं का प्रतिनिधित्व किया था।
यकीनन, कादम्बिनी की पहल ने उस समय महिलाओं में आगे बढ़ने की हिम्मत दी थी. साथ ही, उस हर रुढ़िवादी सोच के इंसान की मानसिकता पर गहरा प्रहार किया था. उन्हें अपने हकों के लिए लड़ना पड़ा, रास्ते में कई रूकावटे भी आईं, लेकिन उन्होंने हर मुश्किलों का सामना करते हुए खुद के लिए एक जगह स्थापित की।
उस समय लोग उनका विरोध कर रहे थे,लोगों की घटिया मानसिकता का मंजर कुछ ऐसा था कि वो अपने लेखों में उन्हें वेश्या कहकर अपनी भड़ास निकालते थे।
इस काम को एक रूढ़िवादी मैगजीन ‘बंगाबासी’ के एडिटर किया करते थे. उनका नाम मोहेश चंद्र पाल था. ये उन्हें बदनाम करने की कोई कसर नहींं छोड़ते थे. किन्तु, मोहेश भूल गए थे कि वह इस बार किसी बेचारी महिला से नहीं, बल्कि एक सशक्त महिला से टक्कर ले रहे थे. क्योंकि, कादम्बिनी ने अपने इस अपमान को नहीं सहा।
लिहाज़ा, 1891 में एक बार जब मोहेश ने उनके वेश्या होने की बात कही. तब उन्होंने अपनी आपत्ति दर्ज करते हुए उन पर मुकदमा दायर कर दिया. वह इस मुकदमे में जीती भी. इसके तहत मोहेश पर 6 महीने की सजा हो गई। यही वजह है कि जब भी महिलाओं के संघर्ष की बात होगी, तब उनका नाम शीर्ष लोगों में लिया जाएगा।
3 अक्टूबर, 1923 को उन्होंने आखिरी सांस ली और इस सशक्त और बहादुर महिला ने दुनिया को अलविदा कह दिया किंतु लोगो के जहन में हमेशा जिन्दा रह गई।


