लोग ख़ुद अपने नायक की क़दर नही करते हैं, और दूसरे से उम्मीद करते हैं।

Opinionलोग ख़ुद अपने नायक की क़दर नही करते हैं, और दूसरे से उम्मीद करते हैं।

Md Umar Ashraf

प्रोफ़ेसर अब्दुल बारी स्वतंत्रता आंदोलन के बिहार के आख़री शहीद थे। 28 मार्च 1947 को प्रोफ़ेसर साहब फ़तुहा के पास शहीद कर दिये गए। उन्हें ख़िराज ए अक़ीदत पेश करते हुवे Tarique भाई ने एक लाइन लिखा “अपना नायक ख़ुद गढ़ना पड़ता है।”

थोड़ा अटपटा लगेगा, लेकिन मामला यही है। जब तक आप अपने नायक को ख़ुद नही उठाइएगा, कोई पूछेगा नही। इसके सैंकड़ों उदाहरण मिल जाएँगे। पर यहाँ हम अब्दुल बारी साहब पर ही रहते हैं। आज उनकी 75वीं शहादत दिवस है।

पटना में सबसे मसरूफ़ एक सड़क है, जिसका नाम है बारी पथ। अब आप उसी सड़क पर ज़माने से रह रहे किसी भी इंसान से पूछ लीजिए के इसका नाम बारी पथ क्यूँ है? तो अधिकतर कोई जवाब नही देंगे। एकाध आदमी कह देंगे की यहाँ पर ठाकुरबाड़ी है, इसलिए इसका नाम बारी पथ है। असल में ये सड़क प्रोफ़ेसर अब्दुल बारी साहब के नाम पर है, क्यूँकि इसी सड़क पर अंदर एक गली में उनका मकान है।

अब पूछिएगा की प्रोफ़ेसर अब्दुल बारी साहब की क्या ख़ूबी थी के उनके नाम पर सड़क का नाम है। तो मामला कुछ यूँ है की प्रोफ़ेसर अब्दुल बारी टाटा वर्कर्स यूनीयन के संस्थापक थे। और उसके अध्यक्ष भी रहे, और इसी पद पर रहते हुवे उन्हें शहीद कर दिया गया था। इसके इलावा वो एक और पद पर थे, और वो था बिहार कांग्रेस का अध्यक्ष पद। मतलब ये कि जिस वक़्त प्रोफ़ेसर अब्दुल बारी शहीद किए गए बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष थे। टाटा वर्कर्स यूनीयन वाले तो अपने लीडर को हमेशा याद रखते हैं, टाटा से लेकर पटना तक उनकी याद में कुछ न कुछ करते हैं, वहीं बिहार कांग्रेस ने ट्वीट कर के भी उन्हें याद करना गवारा नही किया। और ये कोई पहला मामला नही है। ये हर साल का है। लेकिन दिक़्क़त इससे भी नही है, दिक़्क़त है हमारे फ़ेसबुक पर मुस्लिम नौजवानो से। उनके सामने कुछ भी जानकारी पेश कीजिए तो कमेंट आ जाएगा की ये तो हमें पढ़ाया ही नही गया। इनके नाम मिटा दिए गए, इनके बारे में बात नही होती है। इनको कोई पूछता नही है। ये सब बात लिखने के लिए लम्बी लम्बी पोस्ट लिख देंगे, कमेंट छाप देंगे, लेकिन दो लाइन उन नायकों पर लिखना गवारा नही करेंगे। बाक़ी बात करवा लो बड़ी बड़ी।

वो प्रोफ़ेसर अब्दुल बारी जिनके नाम पर बिहार का मशहूर कोईलवर पुल है, जिनके नाम पर जमशेदपुर से लेकर जहानाबाद तक कुछ न कुछ है। उनके ऊपर दो किताब हिंदी में लिखी जा चुकी है। उनको सिलेबल में पढ़ाया भी गया, पर उन्हें याद करने की फ़ुरसत किसी को नही है।

आज आज़ादी के अमृत महत्सव की वजह कर दो मिनट का प्रोग्राम प्रोफ़ेसर अब्दुल बारी पर आकाशवाणी और दूरदर्शन ने ज़रूर दिखाया गया है। बाक़ी जो है सो है ही है। लोग ख़ुद याद करते नही, और दूसरे से उम्मीद करते हैं।

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