मुहम्मद रफ़ी : हम तुम्हें यूं भुला न पाएंगे !

Entertainmentमुहम्मद रफ़ी : हम तुम्हें यूं भुला न पाएंगे !

Dhruv Gupt

हिंदी फिल्मों की संगीत यात्रा में मरहूम मोहम्मद रफ़ी एक ऐसा पड़ाव है जहां कान तो क्या, कुछ देर के लिए रूह भी ठिठक जाया करती है। वे संगीत की वह अज़ीम शख्सियत थे जिनकी आवाज़ की शोख़ियों, गहराईयों, उमंग और दर्द के साथ इस देश की कई पीढियां जवान और बूढ़ी हुईं ! उनकी आवाज़ और जज़्बों की रूहानी अदायगी ने हमारी मुहब्बत को लफ्ज़ बख्शे, सपनों को पंख दिए, शरारतों को अंदाज़ और व्यथा को बिस्तर अता की। आवाज़ की विविधता और रेंज ऐसी कि प्रेम की असीमता से वैराग्य तक, गंभीरता से चुलबुलापन तक, अध्यात्म से मासूमियत तक, ग़ालिब की ग़ज़ल से कबीर के पद तक, भजन से कव्वाली तक, शास्त्रीय गायन से लोकगीत तक – सब एक ही गले में समाहित हो जाय। अमृतसर के कोटला सुल्तान सिंह में हज़ामत की दुकान से भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे लोकप्रिय आवाज़ तक का उनका सफ़र किसी परीकथा जैसा लगता है। 1944 में पंजाबी फिल्म ‘गुल बलोच’ के गीत ‘सोनिये नी, हीरीये नी’ से बहुत छोटी सी शुरूआत करने वाले रफ़ी की आवाज़ को संगीतकार नौशाद और शंकर जयकिशन ने निखारा और बुलंदी दी।

चालीस साल लंबे फिल्म कैरियर में हिंदी, मराठी, तेलगू, असमिया, पंजाबी,भोजपुरी भाषाओं में छब्बीस हजार से ज्यादा गीतों को आवाज़ देने वाले इस सर्वकालीन महानतम गायक और सदा हंसते चेहरे वाली बेहद प्यारी शख्सियत मोहम्मद रफ़ी के इंतकाल के बाद संगीतकार नौशाद ने कहा था – कहता है कोई दिल गया, दिलबर चला गया/ साहिल पुकारता है समंदर चला गया / लेकिन जो बात सच है वो कहता नहीं कोई/ दुनिया से मौसिकी का पयंबर चला गया।’

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