शिवम् सौरभ
कांग्रेस के तरफ से मोदी सरकार को मिल रहा वॉक ऑवर लगता है अब खत्म हो गया है। मृतप्राय हो चुकी कांग्रेस में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी और युवा कांग्रेस के अध्यक्ष श्रीनिवास बीवी लगातार जान फुंक रहे हैं। 2014 के बाद 2020 तक मानिए कांग्रेस की एक्टिविटी तो शुन्य हो चुकी थी।
गांव देहात में एक कहावत है “ढ़ोरबा के फुफकार भारी” इस कहावत को पूरा कांग्रेस फॉलो कर रहा था सिवाय 10 से 20% लोगों को छोड़कर। ऐसे ऐसे लोग कांग्रेस संगठन के नेता है जिन्हें अपने जिले में 10 लोग ठीक से नहीं जानते। जिन्हें कुछ पहचान नहीं वह टिकट की बात करते। लेकिन राहुल गांधी की सक्रियता अब बता रही है की कांग्रेस को बहादुर लोगों की जरूरत है। राहुल गांधी पिछले दिन कह भी चुके हैं कि जिन्हें भाजपा से डर लगता है वह छोड़कर चले जाए।

पंजाब कांग्रेस प्रकरण को आप गौर से देखे तो पता चलेगा जिस कैप्टन ने पंजाब में कांग्रेस के अपना बपौती समझ रखा था, वहां का कप्तान ही बदल कर तमाम जमे हुए लोगों को औकात दिखा दिया गया। राजस्थान में जिस प्रकार अशोक गहलोत मनमर्जी कर रहे थे उन्हें भी अब शांत किया जा रहा है। उन्हें भली-भांति अब औकात दिखाया जा रहा है कि सड़क से उठाकर आपको अगर राजस्थान के सदन का सबसे बड़ा नेता बना सकते हैं तो वापस आपको वही पहुंचा भी सकते हैं। किसान आंदोलन को धारदार बनाने के लिए राहुल गांधी का संसद ट्रैक्टर से जाना हो या फिर कांस्टीट्यूशन क्लब में विपक्षी दलों के साथ बैठक करके महंगाई के विरोध में साइकल मार्च हो। राहुल गांधी को यह सब घटना अब पप्पू से विपक्ष का मजबूत, बुलंद और जननेता बनने की ओर अग्रसर कर रहा है। दिल्ली में 9 वर्षीय दलित बच्ची के साथ जघन्यता के बाद प्रशासन द्वारा जबरन अंतिम संस्कार में पीड़ित परिवार के पक्ष में मजबूती से खड़ा रहना हो या हाथरस में राहुल की सक्रियता। यकीन मानिए कांग्रेस नेतृत्व के क्रियाकलाप का यह पुनर्जन्म है। अब सांगठनिक रूप से बड़े फेरबदल कांग्रेस को भाजपा के सामने एक मजबूत विपक्ष बनाएंगी। राहुल अब पार्टी के नेताओं या आसपास के चमचे के बजाय खुद पर भी ज्यादा निर्भर लग रहे हैं पिछले कुछ घटनाओं से यह स्पष्ट समझा जा सकता है।
आज यूथ कांग्रेस के द्वारा संसद घेराव का आयोजन किया गया है। यह आयोजन किसान बिल, पेगासस और महंगाई के खिलाफ है। बहुत ही तरीके से घेराव का नेतृत्व किया जा रहा है। यूथ कांग्रेस के दलित लड़कों की टोली संविधान बचाने की बात लेकर अग्रेसिव रूप से शामिल हो रही है। अन्य उत्साही कार्यकर्ता महंगाई और अन्य मुद्दे पर उत्साह से भरपूर हैं।
खैर पिछले 7 वर्षों के वनवास ने कांग्रेस को संघर्ष तो लगता है अब सिखा दिया। अब जरूरत है सांगठनिक फेरबदल की। वैसे लोग जो सत्ता में आते ही सक्रिय हो जाते हैं और सत्ता की जाती हैं, तो संगठन की राजनीति से संगठन को बढ़ने नहीं देते हैं, अब उन्हें भगा कर वैसे नये लोगों को लाने की जरूरत है जिनमें में मोदी-शाह, भाजपा-आरएसएस के षड्यंत्रों से लड़ने का कुवत है।
ऐसे लोगों को अब आगे बढ़ाकर कॉन्ग्रेस खुद को रिबोर्न कर सकती है। देखना शेष है कि राहुल गांधी अपने में बदलाव के साथ क्या अब सांगठनिक बदलाव भी करते हैं।
(लेखक बिहार के युथ एक्टिविस्ट हैं और समसामयिक मुद्दों पर प्रखरता के साथ अपना विचार रखते हैं।)


