Shubhneet Kaushik
यह दुर्लभ तस्वीर है बलिया के सोनबरसा गाँव में जन्मे संस्कृत, भोजपुरी और इतिहास के अप्रतिम अध्येता उपाध्याय बंधुओं की। इनमें संस्कृतज्ञ वामदेव उपाध्याय चचेरे बड़े भाई थे, तो संस्कृत के प्रकांड विद्वान आचार्य बलदेव उपाध्याय, इतिहासकार वासुदेव उपाध्याय और भोजपुरी लोकगीत और साहित्य के मर्मज्ञ कृष्णदेव उपाध्याय सहोदर भाई थे। उपाध्याय बंधुओं के बारे में आगे पढ़ें।
आचार्य बलदेव उपाध्याय : काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान उन्हें पंडित रामावतार शर्मा, आनंदशंकर ध्रुव और पंडित गोपीनाथ कविराज जैसे विद्वानों का सान्निध्य मिला। जुलाई 1922 में वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में प्रवक्ता के पद पर नियुक्त हुए। संस्कृत विभाग में उन्होंने 38 वर्षों तक अध्यापन किया और मार्च 1960 में वे सेवानिवृत्त हुए। सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने पाँच वर्षों तक सम्पूर्णानन्द विश्वविद्यालय के इतिहास-पुराण विभाग में अनुसंधान विभाग का संचालन किया।
अपने लगभग सौ साल के जीवन में आचार्य बलदेव उपाध्याय ने संस्कृत साहित्य, दर्शन से जुड़ी अनेक विद्वत्तापूर्ण पुस्तकें लिखीं। संस्कृत साहित्य का इतिहास, संस्कृत शास्त्रों का इतिहास जैसी पुस्तकें लिखने के साथ ही उन्होंने सूक्ति मुक्तावली, संस्कृत कवि चर्चा, रसिक गोविंद और उनकी कविता, संस्कृत वांगमय, भारतीय साहित्यशास्त्र, काव्यानुशीलन, संस्कृत सुकवि समीक्षा, वैदिक कहानियाँ जैसी पुस्तकों की रचना की।
वासुदेव उपाध्याय : पटना विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्त्व विभाग में प्राध्यापक रहे वासुदेव उपाध्याय ने मुद्राशास्त्र, अभिलेखों और सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास जैसे विविध विषयों पर हिंदी और अंग्रेज़ी में अनेक पुस्तकें लिखीं। अनंत सदाशिव अलतेकर उनके गुरु थे और वासुदेव शरण अग्रवाल, मोतीचंद्र, कृष्णदत्त वाजपेयी सरीखे इतिहासकारों से भी उनकी गहरी आत्मीयता रही। पूना में 1940 में आयोजित हिंदी सहित्य सम्मेलन वार्षिक अधिवेशन में उन्हें मंगला प्रसाद पारितोषिक से सम्मानित किया गया।
अपने अग्रज आचार्य बलदेव उपाध्याय के प्रति कृतज्ञता व अनुराग प्रकट करते हुए वे लिखते हैं कि ‘‘उन्होंने मेरे हृदय में भारतीय इतिहास तथा संस्कृति के प्रति नैसर्गिक प्रेम पैदा कर मेरे जीवन की धारा को बदल दिया।’ वासुदेव जी की प्रमुख पुस्तकें हैं : गुप्त साम्राज्य का इतिहास, पूर्वमध्यकालीन भारत, भारतीय सिक्के, विजयनगर साम्राज्य का इतिहास, भारतीय गौरव, प्राचीन भारतीय अभिलेखों का अध्ययन, सोशियो रिलीजस कंडीशन ऑफ़ नादर्न इंडिया।
कृष्णदेव उपाध्याय : लोक-संस्कृति और भोजपुरी के अप्रतिम अध्येता डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा हासिल की। कृष्णदेव जी वाराणसी स्थित भारतीय लोक-संस्कृति शोध-संस्थान के संस्थापक-संचालक थे। उन्होंने प्रयाग, मुंबई और उज्जैन में आयोजित अखिल भारतीय लोक-संस्कृति सम्मेलन का संयोजन किया। ये सम्मेलन वर्ष 1958 से 1961 के दौरान आयोजित हुए।
वे वाराणसी में वर्ष 1964-65 के दौरान आयोजित अखिल भारतीय भोजपुरी सांस्कृतिक सम्मेलन के मंत्री और स्वागताध्यक्ष रहे। इसके साथ ही बरहज में आयोजित अखिल भोजपुरी साहित्य सम्मेलन की उन्होंने अध्यक्षता की। वर्ष 1942 में भोजपुरी लोकगीतों का उनका संकलन हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा प्रकाशित किया गया। वे भारतीय लोक संस्कृति शोध संस्थान (वाराणसी) से प्रकाशित शोध पत्रिका ‘जर्नल ऑफ इंडियन फ़ोक कल्चर’ के प्रधान संपादक रहे। साथ ही साथ, वे भारतीय लोक संस्कृति ग्रंथमाला के प्रधान संपादक रहे।
‘भोजपुरी और उसका साहित्य’, ‘भोजपुरी लोक साहित्य का अध्ययन’, ‘भोजपुरी लोक संस्कृति का अध्ययन’, ‘भोजपुरी ग्राम-गीत’, ‘हिन्दू विवाह की उत्पत्ति और विकास’, भारतीय लोक विश्वास’, ‘हिन्दी प्रदेश के लोकगीत’, ‘लोक साहित्य की भूमिका’ उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं।


