Shubhneet Kaushik
अधिकांश खिलाड़ियों के लिए खेल उनके जीवन को दिशा देने वाला, जीवन का अर्थवत्ता देने वाली अहम चीज़ होती है। और जब इसमें उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि भी जुड़ जाती है तो यही खेल उसकी पहचान/अस्मिता को भी निर्धारित करते हैं। वंचित और शोषित समुदाय से आने वाले खिलाड़ियों के लिए खेल एक ऐसे दायरे में तब्दील हो जाता है, जहाँ वह अवमानना के अतीत और वर्तमान से ऊपर उठकर अपनी इयत्ता को गढ़ता है, ख़ुदी को बुलंद करता है।
पा रंजीत द्वारा निर्देशित तमिल फ़िल्म ‘सारपट्टा परंबरै’ बॉक्सिंग रिंग में अपनी अस्मिता की तलाश करते, जीवन का अर्थ खोजते मुक्केबाज कबिलन की प्रेरक कहानी है। बीसवीं सदी में सत्तर के दशक के तमिलनाडु की यह कहानी सिर्फ़ मुक्केबाजी से जुड़े सारपट्टा, इडियप्पा जैसे कुछ कुलों की ही कहानी नहीं है, बल्कि यह बॉक्सिंग रिंग में अपने खोए हुए आत्मसम्मान को हासिल करने के संघर्ष की कहानी है। अकारण नहीं कि आत्मसम्मान आंदोलन के नायक पेरियर रामास्वामी और डॉक्टर आम्बेडकर फ़िल्म के अनेक फ़्रेमों में सशक्त राजनीतिक संदेश के साथ उपस्थित हैं।
खेल के मैदान विषमता और भेदभाव के विरुद्ध ऐसे संघर्षों के साक्षी रहे हैं। वह चाहे अमेरिका में मुहम्मद अली जैसे काले खिलाड़ियों द्वारा अपने जीवन में नस्लीय भेदभाव के विरुद्ध किए गए संघर्ष हों और उस संघर्ष के लिए चुकाई गई क़ीमत हो। या बीसवीं सदी के मध्य में कैरेबियन क्रिकेट टीम के खिलाड़ियों द्वारा क्रिकेट के मैदान पर अपने आत्मसम्मान के लिए दिखाया गया जुझारूपन हो। जिसे इतिहासकार सीएलआर जेम्स ने अपनी बेहतरीन किताब ‘बियोंड ए बाउंड्री’ के पन्नों में ख़ूबसूरती से सहेजा है। कैरेबियाई खिलाड़ियों का वह जीवट, उनके सरोकार और नस्लीय भेदभाव के विरुद्ध क्रिकेट के मैदान पर उनका संघर्ष ‘फ़ायर इन बेबिलोन’ डॉक्युमेंटरी में भी प्रदर्शित हुआ है।
भारत की ही बात करें तो औपनिवेशिक काल में दिग्गज क्रिकेटर पलवनकर बालू को क्रिकेट टीम का कप्तान केवल इसलिए नहीं बनाया गया क्योंकि वे दलित थे। केवल बालू ही नहीं उनके भाइयों पलवनकर शिवराम, गणपत और विट्ठल को भी उनकी प्रतिभा के बावजूद क्रिकेट के मैदान में अवमानना का दंश झेलना पड़ा। सिर्फ़ इसलिए कि वे दलित समुदाय से आते थे। ‘सारपट्टा’ ख़ुद के आत्मसम्मान के साथ-साथ अपने परिवार, समुदाय के आत्मसम्मान के लिए लड़ने के जज़्बे की गाथा है।
मद्रास में स्थानीय स्तर पर मुक्केबाजी के विशिष्ट खेल के उभार और आत्मसम्मान की इस लड़ाई के साथ-साथ ‘सारपट्टा’ राजनीति और सामाजिक यथार्थ को भी बख़ूबी दर्शाती है। द्रविड़ राजनीति, एम करुणानिधि और एमजी रामचन्द्रन के बीच सत्ता के लिए संघर्ष और आपातकाल के दौरान तमिल राजनीति में चल रही उठापटक भी ‘सारपट्टा’ की दिलचस्प कहानी की पृष्ठभूमि में शामिल हैं। अपराध, राजनीति और मुक्केबाजी के जुड़ाव और इन सबके बीच जूझते हुए कबिलन और सारपट्टा कुल के लोगों के जीवट की कहानी पा रंजीत ने इस फ़िल्म में शानदार ढंग से पिरोई है। मुख्य कलाकार आर्या के साथ-साथ पशुपति, कलैयारासन, जॉन विजय जैसे दूसरे कलाकारों ने भी बेहतरीन अभिनय किया है। ज़रूर देखें यह फ़िल्म।


