Shubhneet Kaushik
साठ साल पहले जवाहरलाल नेहरू की यह तस्वीर विज्ञान भवन की दीवारों पर बने भित्ति चित्रों के अनावरण के अवसर पर ली गई थी। वर्ष 1956 में अपने स्थापना काल से ही राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय महत्त्व के अनेक महत्त्वपूर्ण आयोजनों, सम्मेलनों और बैठकों का गवाह रहा विज्ञान भवन आज राष्ट्रीय अभिलेखागार, राष्ट्रीय संग्रहालय, इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र जैसी राष्ट्रीय महत्त्व की दूसरी इमारतों के साथ सेंट्रल विस्टा की बलि चढ़ाया जा रहा है। विज्ञान भवन नेहरू की आधुनिक भारत की संकल्पना का एक मूर्त रूप था। अकारण नहीं कि विज्ञान भवन के निर्माण में नेहरू ने शुरू से ही गहरी दिलचस्पी ली।
मसलन, 11 जून 1956 को स्वर्ण सिंह को लिखे पत्र में विज्ञान भवन से जुड़े कुछ मुद्दों पर नेहरू ने अपनी राय रखी थी। इसमें विज्ञान भवन की दीवारों पर भित्ति चित्रों का सवाल भी शामिल था। नेहरू ने कहा कि वे भित्ति चित्रों के पक्ष में हैं और ये चित्र ऐसे होने चाहिए कि इनमें आधुनिक भारत की झलक मिल सके। उनका कहना था कि ‘आज भारत नए जीवन की धड़कन और नए-नए रचनात्मक कार्यों से रूबरू हो रहा है और इसलिए कांफ्रेंस हॉल जैसी जगह पर प्राचीन या मध्यकालीन भारत की जगह हमें आधुनिक भारत को प्रस्तुत करना चाहिए। ताकि विदेशों से आने वाले हज़ारों लोग आज और आने वाले कल के भारत की झलक देख सकें।’
साथ ही, नेहरू ने जोड़ा कि कांफ्रेंस हॉल ऐसा हो कि वह भारत की शांतिप्रियता का सूचक हो और विश्व को शांति का संदेश दे सके। उक्त निर्माणाधीन कांफ्रेंस हॉल के लिए ‘शांति भवन’, ‘बुद्ध भवन’ आदि कई नाम भी सुझाए गए थे। मसलन, स्वर्ण सिंह ने ‘बुद्ध भवन’ और सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने ‘बुद्ध जयंती भवन’ का नाम सुझाया था। क्योंकि वर्ष 1956 में भगवान बुद्ध की 2500वीं जयंती भी मनाई जा रही थी। अंततः नेहरू के सुझाव पर इस कांफ्रेंस हॉल का नाम ‘विज्ञान भवन’ रखा गया।
1956 में ही विज्ञान भवन में भगवान बुद्ध की 2500वीं जयंती के अवसर पर ‘कला, सहित्य एवं दर्शन पर बौद्ध धर्म के प्रभाव एवं योगदान’ विषय पर अंतरराष्ट्रीय सिंपोजियम आयोजित किया गया। 26 नवम्बर से 29 नवम्बर 1956 तक चले इस सिंपोजियम के समापन समारोह की अध्यक्षता स्वयं जवाहरलाल नेहरू ने की थी।
उसी वर्ष विज्ञान भवन में यूनेस्को का नौवां महासम्मेलन आयोजित हुआ। यह सम्मेलन इसलिए भी महत्त्वपूर्ण था क्योंकि एशिया में पहली बार संयुक्त राष्ट्र संघ की कोई बड़ी बैठक आयोजित हुई थी। बाद के वर्षों में विज्ञान भवन कई अन्य महत्त्वपूर्ण आयोजनों का गवाह बना, जिसमें गुटनिरपेक्ष सम्मेलन, राष्ट्रमंडल देशों के सम्मेलन और दक्षेस सम्मेलन प्रमुख हैं। विज्ञान भवन में ही 1 अगस्त 1957 को राष्ट्रीय पुस्तक न्यास की स्थापना उपराष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन द्वारा की गई थी। उस अवसर पर जवाहरलाल नेहरू, शिक्षा मंत्री मौलाना आज़ाद और राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के पहले चेयरमैन सी.डी. देशमुख भी मौजूद थे।
वर्ष 1957 में प्रख्यात मूर्तिकार अमरनाथ सहगल (1922-2007) को विज्ञान भवन में भित्ति चित्र बनाने का काम दिया गया। अमरनाथ सहगल ने पाँच वर्षों में विज्ञान भवन में कांसे के भित्तिचित्र बनाए और यह कार्य वर्ष 1962 में पूरा हुआ। हमारा दुर्भाग्य ही है कि आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अहं की तुष्टि के लिए भारत की राष्ट्रीय अस्मिता और आधुनिकता के प्रतीक विज्ञान भवन की बलि दी जा रही है।


