Khursheeid Ahmad
सोशल मीडिया में कई बार ऐसे लेख दिखाई पड़ते हैं कि साइंस में मुसलमानों के पिछड़ने का मुख्य कारण इमाम ग़ज़ाली (1058-1111 ) हैं इमाम ग़ज़ाली ने अपनी किताबों में फिलासफी व गणित के विरुद्ध लिखा जिस से मुसलमान प्रभावित हुए और उन्होंने गणित विज्ञान और फिलासफी जैसे इल्म को छोड़ दिया
क्या यह बात सच है क्या सच में इमाम ग़ज़ाली विज्ञान व फिलासफी के विरुद्ध थे लेकिन इसे जानने से पहले यह जानना जरूरी है कि क्या इमाम ग़ज़ाली इतना प्रभाव रखते थे कि उन्होंने लिख दिया और पूरे मुसलमानों ने आंख बंद करके मान लिया
1- इमाम ग़ज़ाली न कोई नबी थे न रसूल फिर उनकी बातें मुसलमानों को इतनी प्रभावित कैसे कर सकती है ?
2- इमाम ग़ज़ाली फिकह के इमाम भी न थे कि पूरे मुसलमानों को न सही कम से कम किसी एक ग्रुप या मसलक को प्रभावित कर सकते हों जैसे इमाम अबु हनीफा इमाम जाफर सादिक इमाम मालिक इमाम शाफई इमाम अहमद बिन हंबंल और इमाम दाऊद ज़ाहिरी थे
3- इमाम ग़ज़ाली कोई शासक या शासकीय परिवार के संस्थापक भी न थे कि उन्होंने या उनके वंशजों ने अपनी सोच को जबरदस्ती लागू कर दिया
4- सबसे बढ़ कर हम आप मुसलमान हैं बचपन से उल्मा की तकरीरे सुनते हैं जुमा व ईद के खुतबों में हाज़िर होते हैं जलसों , मजलिसों व इजतिमात में शरीक होते हैं आडियो व वीडियो क्लिप्स देखते व सुनते हैं क्या कभी ऐसा हुआ है कि किसी आलिम ने कहा हो कि विज्ञान फिलासफी और गणित जैसे विषयों को न पढ़ो क्योंकि इमाम ग़ज़ाली ने मना किया है
5- इमाम ग़ज़ाली का इंतकाल सन् 1111 में हुआ उनके इंतकाल के कम से कम 300 साल बाद तक विज्ञान के क्षेत्र में मुसलमानों का वर्चस्व रहा उनमें एक से बढ़कर एक वैज्ञानिक गणितज्ञ , खगोलशास्त्री व इंजीनियर पैदा होते रहे उन्होंने इमाम ग़ज़ाली की किताबों को भी पढ़ा पर उन पर नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा फिर बाद वालों ने ऐसा क्या देख लिया कि वह उनसे प्रभावित हो कर पिछड़ गए
सच तो यह है कि इमाम ग़ज़ाली पर यह झूठा आरोप है कि वह फिलासफी विज्ञान व गणित के विरुद्ध थे
वह खुद एक महान शिक्षाविद थे उस समय विश्व की सबसे शानदार युनिवर्सिटी ( मदरसा निज़ामिया बग़दाद ) के वाइस चांसलर थे और इसी मदरसे के अंतर्गत जो विज्ञान फैकल्टी थी उसके जिम्मेदार महान वैज्ञानिक व गणतिज्ञ उमर खैयाम थे दोनों में बहुत पटती भी थी अगर दोनों की विचारधारा में इतनी दूरी होती तो जरूर मनमुटाव होता
इमाम गजाली के समय फिलासफी के नाम पर कुछ ग़लत चीजें हो रही थीं जिसे उन्होंने दूर किया तारों के इल्म के नाम पर खगोलशास्त्र की जगह पर ज्योतिष शास्त्र को परोसा जा रहा था उसे उन्होंने समाप्त किया वह किसी भी विधा के विरोधी नहीं थे लेकिन उस में बदलाव ला कर उसे अधिक लाभकारी बनाना चाहते थे और वही किया भी
लेकिन पता नहीं कहां से उन्हीं को विज्ञान विरोधी बता दिया गया
पिछली शताब्दी में इस्लामी फिलासफी के सबसे बड़े जानकार और मुतकल्लिमे इस्लाम अल्लामा इक़बाल ने फिलसाफी में इमाम ग़ज़ाली की सेवाओं को सराहा है उन्होंने इमाम ग़ज़ाली की तारीफ करते हुए जवाबे शिकवा में कहा है
रह गई रस्मे आज़ां रूहे बिलाली न रही
फलसफा रह गया तलकीने ग़ज़ाली न रही
आज़ान मे हज़रत बिलाल की रूह और फलसफा में इमाम ग़ज़ाली की तलक़ीन को एक बराबर रख कर उन्होंने बता दिया कि इमाम ग़ज़ाली कौन थें और वह फिलासफी के विरोधी नहीं बल्कि उसके खिदमतगार थे


