Abhayanand IPS
न्यायालय, सज़ा, दंड, आदि शब्दों से पाला 21 वर्ष की उम्र से यानी जब से पुलिस विभाग में नौकरी शुरू की, तब से पड़ने लगा था। चूंकि विद्यार्थी था विज्ञान का और प्रशिक्षण ली कानून में, तो सोच का दायरा बना “आपराधिक न्यायिक व्यवस्था” का। एक असीम और अटूट आस्था इस व्यवस्था की प्रणाली और फलाफल में हो गई। समाज में रहना है तो सबों को इस न्यायिक व्यवस्था में ही अपनी आस्था रखनी होगी। यही कारण है कि “न्यायालय पर पूरा विश्वास है” और “अपराध साबित हो जाएगा तो पद छोड़ दूंगा” जैसे वाक्य अपराधियों के मुँह से सुनने को मिलते हैं।
पूरे 37 साल इस बिंदु पर मंथन करता रहा। मैंने ज़िन्दगी में एक बात सीखी थी कि जब समस्याओं का हल ढूंढना हो, तो समस्या को पहले परिभाषित करो। अर्थात एक ऐसा प्रश्न अपनेआप से करो जो सरल और सटीक हो, जो तुमको हल की दिशा में ले जाए। प्रश्न मैंने ढूंढ लिया।
“यह सज़ा मुझे किस अपराध की मिली है ?”
प्रायः सभी अपराधी इस प्रश्न के बोझ तले दबे रहते हैं। स्वयं आपराधिक न्यायिक प्रणाली का एक भाग था, इसलिए इस मानसिकता से बोझिल अपराधियों को परेशान होते देखता था। अब कुछ हद तक उत्तर भी मिला। न्यायालय दो हैं। एक समाज के द्वारा स्थापित और दूसरा प्रकृति के द्वारा। आस्तिक इसको भगवान अथवा ऊपर वाला की संज्ञा भी दे सकते हैं।
सज़ा प्रकृति के न्यायालय से ही मिलती है। देखने में लगता है कि जिस समाज के न्यायालय पर अपराधी ऊपरी मन से बेबस होकर सार्वजनिक रूप से आस्था जताता है, उससे सज़ा मिली है।
प्रकृति के न्यायालय की प्रक्रिया सर्वथा भिन्न होती है। साक्ष्य के मूल्यांकन का पैमाना भी भिन्न होता है। इसलिए समाज का न्यायालय जिस अपराध की सज़ा सुनाता है, शायद वह उचित न हो परन्तु प्रकृति ने उसे यह सज़ा दुसरे अपराध की दी होगी जिसका कोई सबूत समाज के सामने नहीं आता।
कहते हैं, “भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं। ”
लेखक बिहार के पुर्व डीजीपी हैं।


