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मौलाना आबिद कासमी बने दिल्ली जमीयत उलेमा के अध्यक्ष

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सेंट्रल ऑब्जर्वर कमेटी की देखरेख में हुए चुनाव में मौलाना आबिद कासिम को 187 वोट मिले और उन्होंने जीत दर्ज की।

इसी तरह, उपाध्यक्षों में
मौलाना हिशामुद्दीन साहब को 253 वोट
मौलाना खलील अहमद साहब को 197 वोट
मौलाना शाहिद कासमी साहिब को 182 वोट और हाजी मुहम्मद यूसुफ साहिब को 192 वोट मिले।
खजांची के लिए हाजी इकरामुद्दीन साहिब को 182 वोट मिले और उन्होंने चुनाव जीता।


मतदान में कुल 286 मुंताजिमा के सदस्यों ने भाग लिया।
इस चुनाव की निगरानी जमीयत उलेमा-ए-हिंद की कार्यकारी समिति के सदस्य हजरत मौलाना कारी शौकत अली, जमीयत उलेमा हरियाणा, पंजाब, हिमाचल चंडीगढ़ के अध्यक्ष हजरत मौलाना मुहम्मद याह्या करीमी और जमीयत उलेमा उत्तर प्रदेश के सचिव श्री जहीन अहमद ने की।

हजरत मौलाना हकीम-उद-दीन साहिब कासमी, जमीयत उलेमा-ए-हिंद के महासचिव और केंद्रीय कार्यालय के सभी कर्मचारी विशेष आमंत्रित के रूप में उपस्थित थे।

मौलाना नजीबुल्लाह, मौलाना कलीमुद्दीन कासमी, मौलाना एहतेशम कासमी, हाजी मुहम्मद मुबशीर और हाजी मोहम्मद आरिफ आदि ने चुनाव संपन्न कराने में उल्लेखनीय योगदान दिया हैं।
मौलाना मुहम्मद याह्या करीमी की प्रार्थना के साथ बैठक समाप्त हुई।

JMI conducts class 11th Science entrance test, 74 percent candidates appears

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Jamia Millia Islamia (JMI) today conducted entrance test for admission to class 11th Science stream in various schools run by the university. It is worth mentioning that about 74 percent candidates out of the total 12566 applicants appeared in the entrance test conducted at 31 test centres across the national capital.

Out of the 31 test centres, 15 were setup on the university campus while 16 others were created at different private schools across the national capital.

JMI Vice Chancellor Prof. Najma Akhtar said that turning up of such a large number of candidates even in the Covid-19 pandemic period reflects the value of JMI in the eyes of the applicants and others.

The Vice Chancellor congratulated the organising team including the Controller of Examination, Deans coordinating the exam and other staff for successful organisation of the test.

All Covid-19 related guidelines and protocols are being followed during entrance tests. Examination Centres were sanitised a day before the exam and candidates were asked to bring their own water bottle and pocket size hand sanitizer.

Examinees were allowed to enter examination centres while following social distancing norms, with proper face masks and temperature check. Seating arrangements inside the examination halls were also made following the social distancing norms.

Waiting areas for parents/guardians have also been created at various test centres on the university campus with chairs to sit, pedestal fans etc.

Entrance test for admission to class 11th Arts and Commerce will be conducted tomorrow and days after tomorrow respectively.

उमा से टुनटुन तक का सफ़र

– वीर विनोद छाबड़ा

सिनेमा जगत में आज का दिन ख़ास है. आज उमा देवी का जन्म दिन है. उस उमा का जिसने गाया था – अफ़साना लिख रही हूँ दिल-ऐ-बेक़रार का… इस गाने आज भी गुनगुनाया जाता था. मगर उनकी नियति में गायिका बनना नहीं लिखा था. उन्हीं की याद रिपीट कर रहा हूँ.

जब हमने साठ के सालों में फ़िल्में देखनी शुरू की थीं तो पर्दे पर एक मोटी, थुलथुल महिला दिखाई देती थी. उसे देख कर बरबस हंसी छूट जाती थी, उसके मोटापे पर नहीं, उसकी सहज हंसी पर. वो ऐसी भोली-भाली हरकतें करती थी कि कोई हंसे बिना रह ही नहीं सकता था. उनका नाम टुनटुन था. कुछ समय बाद जाना कि उसका असली नाम उमा देवी खत्री है और वो फ़िल्मों में गाने के लिए आई थी, उसने एक नहीं पैंतालीस गाने गाये. मगर बंबई वो जगह थी और जो आज मुंबई है, कि बंदा जो चाहता है उसे मिलता नहीं है. लाखों में किसी एक की किस्मत का सितारा चमकता है, बाकी गुमनामी के अँधेरे में गुम हो जाते हैं, अनाम ही रह जाते हैं. उमा देवी की दास्तान भी विचित्र और दुखदायी है. उत्तर प्रदेश के फैज़ाबाद के पास जन्मी थीं.
कभी एक इंटरव्यू में उमा ने बताया था, माता-पिता की सूरत याद नहीं है. ज़मीन-जायज़ाद के फेर में रिश्तेदारों ने उनका क़त्ल कर दिया, तब वो तीन साल की थी. भाई ने पाला-पोसा. लेकिन वो भी एक दिन ग़ायब कर दिया गया. कब मथुरा आ गयी, पता नहीं. रिश्तेदारों ने नौकरानी की तरह रखा. ऐसे में पढ़ाई-लिखाई का तो सवाल ही नहीं पैदा होता. भाग कर दिल्ली आ गयी. यहां अख़्तर अब्बास काज़ी मिले, एक्ससाईज़ इंस्पेक्टर. उन्होंने उनका ख्याल रखा. पार्टीशन हुआ तो काज़ी साहब पाकिस्तान चले गए. उमा फिर अकेली रह गयी.

उमा गाती बहुत अच्छा थी. किसी ने उसे मशहूर डायरेक्टर नितिन बोस के असिस्टेंट जव्वाद हुसैन का पता दिया. उमा बंबई आ गयी, सिंगर बनने. तब वो चौबीस की रही होगी. यहां उमा की भेंट आज के गोविंदा के माता-पिता अरुण अहुजा और उनकी पत्नी निर्मला से हुई. उन्होंने उमा को कई संगीतकारों से मिलवाया. उन्हीं में से एक थे अल्लाहरक्खा. उन्होंने उमा को एक फिल्म में गवाया जिसके लिए दो सौ रूपए फीस मिली. ये बहुत बड़ी रकम थी उमा के लिए.

मगर उमा का लक्ष्य था उनके आइडियल नौशाद अली. उमा अब्दुर रशीद कारदार के स्टूडियो पहुँच गयी, उस दौर के बहुत बड़े प्रोड्यूसर-डायरेक्टर. उनसे ही उमा ने पूछ लिया, कारदार कौन है. मैं गाने के लिए आयी हूँ, मर जाउंगी मगर गाये बिना जाउंगी नहीं. कारदार को उमा का कॉन्फिडेंस बहुत अच्छा लगा. नौशाद अली के पास भेज दिया. नौशाद ने कहा, गाओ. उमा ने नूरजहां का एक गाना सुना दिया. नौशाद बोले, वाह! उमा की आवाज़ को थोड़ा तराशा और ‘दर्द’ (1947) में गवा दिया, अफ़साना लिख रही हूँ, दिले बेक़रार का… और उमा छा गयी बॉलीवुड में. लोग-बाग़ दीवाने हो गए. उमा की ख्याति साउथ भी पहुंची. जैमिनी वाले एसएस वासन हिंदी में ‘चंद्रकला’ (1948) बना रहे थे. उमा को बुलवा लिया. क्लासिकल गाने थे. उमा पेशोपेश में पड़ गयी. उसने संगीत तो कहीं सीखा नहीं है. मगर संगीत निर्देशक राजेश्वर राव को विश्वास था. उमा का हौंसला बढ़ाया. और उमा सफल भी हो गयी.

इस बीच उमा की आवाज़ सरहद पार पाकिस्तान भी पहुंच गयी. दिल्ली में उमा को सहारा देने वाले अख़्तर अब्बास काज़ी ने भी सुनी, जो पार्टीशन के दौरान दिल्ली से लाहोर आ गए थे. वो दीवाने हो गए. सीधे बंबई जा पहुंचे. उमा से मिले. दोनों में प्यार हो गया. ये प्यार भी बड़ा अजीब अहसास होता है, न धर्म देखता है और न सरहदें. दोनों शादी करके इक-दूजे के हो गए. उमा प्रेगनेंट हुईं. फ़िल्में छोड़ गृहस्थी संभाल ली. बच्चा हुआ. खर्चे बढ़े. एक की कमाई से घर चलाना मुश्किल हो गया. उमा ने फिर से फिल्मों में गाने का फ़ैसला किया. लेकिन बात बनी नहीं. उमा की आवाज़ का स्कोप सीमित था. और फिर गायकी के क्षेत्र में शमशाद बेगम, लता और आशा जैसे बड़े नाम चमक रहे थे. उमा की क्या बिसात?

मगर नौशाद ने समझाया, मायूस होने की ज़रूरत नहीं. तुम्हारा मोटा डील-डौल और तुम्हारे चेहरे की सहजता तुम्हें अच्छी एक्ट्रेस बना सकती है. और उमा मान गयी, लेकिन एक शर्त पर, दिलीप कुमार के साथ काम करूंगी. नौशाद उन दिनों दिलीप कुमार की ‘बाबुल’ में संगीत दे रहे थे. उन्होंने दिलीप कुमार से कह कर उमा को रोल दिलवा दिया. पहले ही सीन में खूब हंसे सब. दिलीप कुमार को उमा पकड़ना चाहती है, दिलीप भाग रहे हैं एक चारपाई के इर्द-गिर्द. अचानक उमा चारपाई पर गिर पड़ी और दिलीप उनके ऊपर. हंसते-हंसते दिलीप का पेट फूल गया. पूछा, तुम्हारा नाम क्या है? उन्होंने बताया – उमा. दिलीप बोले – ये नहीं चलेगा. तुम्हारा नाम टुनटुन होना चाहिए. और उस दिन वो उमा से टुनटुन हो गयीं.

अब टुनटुन हर दूसरी-तीसरी फिल्म में नज़र आने लगीं. और अक्सर कई कई बच्चों की मां के रोल में. हंसी का पर्याय बन गयीं वो. डिस्ट्रीब्यूटरों की मांग पर प्रोड्यूसर-डायरेक्टर फिल्मों में ख़ासतौर पर रोल बनाने लगे. सेंस ऑफ़ ह्यूमर गज़ब था. सेट पर हर समय खाते-पीते देख किसी ने व्यंग्य किया तो बोलीं, अपने मोटापे को भी तो मेंटेन करना है. भगवान दादा, जॉनी वॉकर, राजेंद्रनाथ, महमूद, मारुती, मुकरी आदि उस ज़माने के तमाम टॉप कॉमेडियंस के साथ काम किया. पचास, साठ और सत्तर के सालों में दो सौ से ज़्यादा फ़िल्में की. कुछ मशहूर फ़िल्में हैं, आरपार, मिस्टर एंड मिसेज़ 55, प्यासा, नमक हलाल, कुली, बीवी ओ बीवी, क़ुरबानी, सत्यम शिवम सुंदरम, चाचा-भतीजा, नागिन, हीरा, ललकार,पहचान, शराफ़त, उपकार आदि.

उमा के साथ 1992 में ट्रेजडी हुई. उनके पति गुज़र गए. उमा टूट गयीं. वो एक छोटे से घर में अपने बच्चों और पोते-पोतियों के साथ पुराने फ़िल्मी नग़में सुनते हुए रिटायर्ड ज़िंदगी जीने लगीं. 11 जुलाई 1923 को जन्मीं उमा उर्फ़ टुनटुन 24 नवंबर 2003 को अस्सी की उम्र में ज़िंदगी से ही रिटायर्ड हो गयीं. और इस तरह ख़त्म हुआ उमा देवी से टुनटुन तक सफ़र. एक बढ़िया बायोपिक बन सकती है.

लालू यादव और ऑटो ड्राइवर अंसारी की अनसुनी कहानी

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मैं उस दिन बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स के एशियन हार्ट इंस्टीट्यूट जा रहा था। वहां आरजेडी के मुखिया लालू प्रसाद यादव एडमिट थे। मैं उनसे ‘गोपालगंज टू रायसीना’ किताब के सिलसिले में ही मिलने में जा रहा था। मैं एयरपोर्ट पहुंचा और एक रिक्शा लिया। रिक्शे में कुछ देर होने के बाद मैंने रास्ते में ऑटो वाले से पूछा- क्या तुम लालू प्रसाद यादव को जानते हो? उसने हां में जवाब देते हुए कहा, इस समय वो बीमार हैं और अस्पताल में भर्ती हैं।

थोड़े सोचने के बाद मैंने उस ऑटो ड्राइवर से कहा, मैं अभी उनसे ही मिलने जा रहा हूं। इतना सुनते ही उस ऑटो वाले ने अपनी ऑटो सड़क किनारे रोक दी और बोला- क्या आप मुझे लालूजी से मिलवा सकते हैं? अगर आप मुझे उनसे मिलवाने में मदद करेंगे तो मैं आपके लिए उपर वाले से दुआ करूंगा। मैं सोचने लगा कि मैंने ऑटो ड्राइवर को बताकर गलती तो नहीं कर दी। उससे भी बड़ी बात मैं इस ऑटो वाले को लालूजी से मिलवा पाउंगा या नहीं, पता नहीं था। मैंने ड्राइवर को तसल्ली देने के लिए उसे एक कागज पर अपना नाम और फोन नंबर लिखकर देने को कहा और वादा किया कि मिलवाने की कोशिश करूंगा।

उस ऑटो ड्राइवर ने अपना नाम अंसारी लिखा और उसके आगे अपना फोन नंबर लिख दिया। मैंने उस कागज को अपनी जेब में रख लिया। ऑटो ड्राइवर ने खुश होते हुए बताया- अगर मुझे लालूजी और अभिताभ बच्चन से एक ही टाइम में मिलने का मौका मिले तो मैं लालूजी से मिलूंगा। अस्पताल के गेट पर छोड़ते हुए उसने एक बार फिर से लालूजी से मिलने के लिए आखिरी जोर लगाया और मैं भी हां कहते हुए अस्पताल में घुस गया। लालूजी के सहयोगी लाॅबी में मेरा इंतजार कर रहे थे। मैं उनके साथ चौथी मंजिल के कमरे में पहुंच गया, जहां लालूजी एडमिट थे।

लालू यादव की तबीयत बहुत खराब थी। हाल ही में उनके दिल की सर्जरी हुई थी। बीपी और शुगर अस्थिर थे। डाॅक्टर और नर्स उनको समझा रहे थे कि क्या खाएं और क्या नहीं? लालूजी को देखकर अब तक मैं ऑटो ड्राइवर से किया हुआ वादा भी भूल गया था। बीमार होने के बावजूद लालूजी ने अपनी ही स्टाइल में गर्मजोशी से हमसे मुलाकात की और बातें की। किताब के सिलसिले में उनसे लगभग दो घंटे तक बात करता रहा। बीच-बीच में डाॅक्टर और नर्स उनका बीपी चेक करके चली जातीं।

लालू यादव हमेशा से खुशमिजाज थे। वे नर्स से भी उसी अंदाज में बात कर रहे थे। लालू यादव ने नर्स से कहा- तुम्हें शादी कर लेनी चाहिए, शादी में अब देर मत करो। तुम्हें अपने माता-पिता और परिवार के दूसरे बुजुर्गों की सेवा करनी चाहिए। नर्स कुछ बोली नहीं, बस मुस्कुरा दी। बात खत्म करते-करते लगभग 6 बज गये थे। मैं वहां से निकलने ही वाला था कि मुझे ऑटो ड्राइवर का वायदा याद आ गया। मैंने पूरा किस्सा लालूजी को सुना दिया। मेरी मुलाकात के बाद लालूजी को बिहार और महाराष्ट के कुछ नेताओं से मिलना था। जो बाहर ही बुलावे का इंतजार कर रहे थे।

मेरी बात सुनकर लालूजी बैचेन हो उठे और मुझसे बोले, आपने उसका नंबर लिया था, वो मुझे दीजिए। मैंने जेब में हाथ डाला और वो तुड़ा-मुड़ा कागज पकड़ा दिया जिस पर उस ऑटो ड्राइवर ने अपना नाम और फोन नंबर लिखकर दिया था। लालू यादव ने पार्टी विधायक भोला यादव से उस ड्राईवर को फोन मिलाने को कहा। फोन मिलते ही लालूजी उस डाइवर से बोले- आपका नाम क्या है? आप जल्दी हमसे मिलने आ जाओ और ढाई सौ ग्राम कच्चा कलेजी भी साथ लेते आना। आज बकरीद का दिन है, कुर्बानी वाला कलेजी लाना।

फोन पर बात होने के बाद लालूजी ने विधायक भोला यादव से कहा, बाहर बैठे विधायकों से कह दो कि वे किसी और दिन मिलने आएं। करीब आधे घंटे बाद सफेद पाॅलीथन में मीट लपेटकर ऑटो ड्राइवर कमरे में आया। लालू यादव को देखकर ऑटो ड्राइवर वाला रोने लगा। लालू यादव ने अंसारी से कहा, रोईए मत। लालू यादव ने अपने एक और सहयोगी लक्ष्मण से कहा जाइए, इनको साथ ले जाइए और मटन को पका कर लाइए फिर साथ में खाते हैं। कमरे के बगल में किचन बनी थी, जिसे अस्पताल ने लालू प्रसाद यादव के लिए ही बनवाई थी।

कुछ देर बाद प्लेट में पका हुआ मीट आया। लालू यादव बिस्तर पर ही खाने को बैठ गये। लालू यादव ने अंसारी को साथ में खाने के लिए कहा। अंसारी ने हाथ जोड़कर कहा,

‘हुजूर आपकी प्लेट में कैसे खाऊं। मैं तो गरीब आदमी हूं, ऑटोरिक्शा चलाता हूं। आपसे मिल लिया, मुझे सब कुछ मिल गया।’
लालू यादव ने ने उसे झड़पते हुए कहा-

‘चुपचाप आकर साथ में खाओ नहीं तो दो थप्पड़ मारूंगा’।
अंसारी चुपचाप लालूजी की प्लेट में ही खाने लगा। तभी एक नर्स आई और लालू यादव को बोली, आपको डाॅक्टर ने मीट खाने का मना किया है, आप मीट क्यों खा रहे हैं? लालू यादव मुस्कुराकर बोले- ‘डॉक्टर साहब तो भोले हैं। उनको पता नहीं है कि अंसारी के मीट में जितना फायदा है उतना फायदा पूरे अस्पताल की दवाई में नहीं है, ये कुर्बानी का मीट है’।

लालू यादव ने आगे कहा- ‘मुझे गरीबों से बहुत प्यार मिला है। मुझे इससे ज्यादा क्या चाहिए? मैं मौत और बीमारी की नहीं सोचता, जिंदगी तो भगवान के हाथ में है’। फिर उन्होंने ऑटो ड्राइवर से कहा- ‘अंसारी अब जाओ। कोई तकलीफ होगी तो बताना’। अंसारी ने रोते हुए लालू यादव से विदा लेते हुए कहा, ‘या अल्लाह, लालूजी को आबाद रख’। अंसारी के जाने के बाद लालू यादव हमसे बोले, ‘आठ बज गए हैं। मैं आप लोगों के साथ मीट इसलिए नहीं खा सका क्योंकि ये 4-5 लोगों के लिए कम पड़ता। आप लोग होटल जाइए और अच्छा खाना और शराब लीजिए। बिहार में तो शराबबंदी है’।

Note : लालू प्रसाद यादव की आत्मकथा ‘गोपालगंज टू रायसीना’ के लेखक नलिन वर्मा ने ये क़िस्सा अंग्रेज़ी अख़बार टेलीग्राफ़ में 8 मई 2019 में लिखा था. पर ये किस्सा लालू प्रसाद यादव की आत्मकथा ‘गोपालगंज टू रायसीना’ में नहीं है! दरअसल जब ये वाक़्या हुआ तब तक किताब की पांडुलिपि छपने के लिए जा चुकी थी और नलिन वर्मा किताब के बारे में और उसकी पुष्टि करने के लिए लालू प्रसाद यादव से मिलने गये थे।

पेड़ पर चढ़ कर अंग्रेज़ों का शिकार करने वाली ऊदा देवी पासी

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Dhruv Gupt 

झांसी की रानी लक्ष्मी बाई की तरह अट्ठारह सौ सत्तावन के स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के छक्के छुडाने वाली एक और भी वीरांगना थी जिसे दुर्भाग्य से वह यश और सम्मान नहीं मिला जिसकी वह हकदार थी। शायद इसलिए कि वह किसी राजघराने या सामंती परिवार में नहीं, एक गरीब दलित परिवार में पैदा हुई एक मामूली सैनिक थी। इतिहास के पन्नों पर ऐसे मामूली लोगों को जगह देने की परंपरा हमारे देश में कम ही रही है। इतिहास द्वारा विस्मृत स्वाधीनता संग्राम की वह नायिका थी ऊदा देवी पासी जिसे 1857 के स्वाधीनता संग्राम की घटनाओं के कुछ अंग्रेज लेखकों द्वारा दिए गए विवरणों में ‘ब्लैक टाइग्रैस’ कहा गया था। लखनऊ के पास उजिरियांव गांव की ऊदा देवी उस दलित पासी जाति से थी जिसे अछूत माना जाता था, लेकिन जो अन्याय और अस्पृश्यता के प्रतिरोध में अपने जुझारू स्वभाव के लिए हमेशा से जानी जाती रही है। उसका पति मक्का पासी अवध के नवाब वाजिद अली शाह की पलटन में एक सैनिक था। देशी रियासतों पर अंग्रेजों के बढ़ते हस्तक्षेप के मद्देनज़र जब वाजिद अली शाह ने महल की रक्षा के उद्देश्य से स्त्रियों का एक सुरक्षा दस्ता बनाया तो उसके एक सदस्य के रूप में ऊदा देवी नियुक्त हुईं। अपनी बहादुरी और तुरंत निर्णय लेने की उसकी क्षमता से नवाब की बेगम और देश के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की नायिकाओं में एक बेगम हजरत महल बहुत प्रभावित हुई। नियुक्ति के कुछ ही अरसे बाद में ऊदा देवी को बेगम हज़रत महल की महिला सेना की टुकड़ी का कमांडर बना दिया गया।

महिला दस्ते के कमांडर के रूप में ऊदा ने देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जिस अदम्य साहस, दूरदर्शिता और शौर्य का परिचय दिया था उससे खुद अंग्रेज सेना भी चकित रह गई थी। ऊदा की वीरता पर उस दौर में लोक में कई गीत लिखे और गाए जाते थे। उन गीतों की कुछ पंक्तियां आज भी उपलब्ध हैं : कोई उसको हब्शी कहता / कोई कहता नीच अछूत / अबला कोई उसे बताए / कोई कहे उसको मजबूत !

ऊदा देवी को शौर्य और बलिदान की प्रेरणा अपने पति मक्का पासी की शहादत से मिली थी। यह वह समय था जब 10 मई 1857 को मेरठ के सिपाहियों द्वारा अंग्रेजों के विरुद्ध छेड़ा गया संघर्ष तेजी से पूरे उत्तर भारत में फैलने लगा था। 10 जून, 1857 को लखनऊ के क़स्बा चिनहट के निकट इस्माईलगंज में हेनरी लारेंस के नेतृत्व में ईस्ट इंडिया कम्पनी की फौज की मौलवी अहमदउल्लाह शाह की अगुवाई में संगठित विद्रोही सेना से ऐतिहासिक लड़ाई हुई थी। चिनहट की इस ऐतिहासिक लड़ाई में विद्रोही सेना की विजय तथा हेनरी लारेंस की फौज का मैदान छोड़कर भाग खड़ा होना प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की सबसे बड़ी उपलब्धियों में एक थी। देश को गौरवान्वित करने वाली और स्वाधीनता सेनानियों का मनोबल बढ़ाने वाली इस लड़ाई में सैकड़ों दूसरे सैनिकों के साथ मक्का पासी की भी शहादत हुई थी। ऊदा देवी ने अपने पति की लाश पर उसकी शहादत का बदला लेने की कसम खाई थी। मक्का पासी के बलिदान का प्रतिशोध लेने का वह अवसर ऊदा देवी को मिला चिनहट के महासंग्राम की अगली कड़ी सिकंदर बाग़ की लड़ाई में।

अंग्रेजों की सेना चिनहट की पराजय का बदला लेने की तैयारी कर रही थी। उन्हें पता चला कि लगभग दो हजार विद्रोही सैनिकों ने लखनऊ के सिकंदर बाग में शरण ले रखी है। 16 नवंबर, 1857 को कोलिन कैम्पबेल के नेतृत्व में अंग्रेज सैनिकों ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत सिकंदर बाग़ की उस समय घेराबंदी की जब विद्रोही सैनिक या तो सो रहे थे या बिल्कुल ही असावधान थे। ऊदा के नेतृत्व में वाजिद शाह की स्त्री सेना की टुकड़ी भी हमले के वक्त इसी बाग में थी। असावधान सैनिकों की बेरहमी से हत्या करते हुए अंग्रेज सैनिक तेजी से आगे बढ़ रहे थे। हजारों विद्रोही सैनिक मारे जा चुके थे। पराजय सामने नजर आ रही थी। मैदान के एक हिस्से में महिला टुकड़ी के साथ मौजूद ऊदा ने पराजय निकट देखकर पुरुषों के कपडे पहन लिए। हाथों में बंदूक और कंधों पर भरपूर गोला-बारूद लेकर वह पीपल के एक ऊंचे पेड़ पर चढ़ गयी।

ब्रिटिश सैनिकों को मैदान के उस हिस्से में आता देख ऊदा ने उनपर निशाना लेकर फायरिंग शुरू कर दी। पेड़ की डालियों और पत्तों के पीछे छिपकर उसने हमलावर ब्रिटिश सैनिकों को सिकंदर बाग़ के उस हिस्से में में तब तक प्रवेश नहीं करने दिया था जबतक उसका गोला बारूद खत्म नहीं हो गया। ऊदा ने अपनी उस अकेली लड़ाई में ब्रिटिश सेना के दो बड़े अफसरों कूपर और लैम्सडन सहित 32 अंग्रेज़ सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था। गोलियां खत्म होने के बाद ब्रिटिश सैनिकों ने पेड़ को घेरकर उसपर अंधाधुंध फायरिंग की। कोई उपाय न देख जब वह पेड़ से नीचे उतरने लगी तो उसे गोलियों से छलनी कर दिया गया। ब्रिटिश सेना के हाथ पड़ने के पहले ही वह वीरगति को प्राप्त हो चुकी थी।

लाल रंग की कसी हुई जैकेट और पैंट पहने ऊदा की लाश जब पेड़ से ज़मीन पर गिरी तो उसका जैकेट खुल गया। कैम्पबेल यह देखकर हैरान रह गया कि वीरगति प्राप्त वह बहादुर सैनिक कोई पुरुष नहीं, एक महिला थी। कहा जाता है कि ऊदा देवी की स्तब्ध कर देने वाली वीरता से अभिभूत होकर कैम्बेल ने हैट उतारकर उसे सलामी और श्रद्धांजलि दी थी। ऊदा के शौर्य, साहस और शहादत पर देशी इतिहासकारों ने बहुत कम, अंग्रेज अधिकारियों और पत्रकारों ने ज्यादा लिखा। ब्रिटिश सार्जेण्ट फ़ॉर्ब्स मिशेल ने अपने एक संस्मरण में बिना नाम लिए सिकंदर बाग में पीपल के एक बड़े पेड़ के ऊपर बैठी एक ऐसी स्त्री का उल्लेख किया है जो अंग्रेजी सेना के बत्तीस से ज्यादा सिपाहियों और अफसरों को मार गिराने के बाद शहीद हुई थी। लंदन टाइम्स के तत्कालीन संवाददाता विलियम हावर्ड रसेल ने लड़ाई का जो डिस्पैच लंदन भेजा उसमें उसने पुरुष वेश में एक स्त्री द्वारा पीपल के पेड़ से फायरिंग कर अंग्रेजी सेना को भारी क्षति पहुंचाने का उल्लेख प्रमुखता से किया गया था। लंदन के कई दूसरे अखबारों ने भी ऊदा की बहादुरी पर लेख प्रकाशित किए थे।

ऊदा देवी हमारे राष्ट्रीय गौरव और स्वाभिमान की जीवंत प्रतीक हैं। जातिगत पूर्वग्रह से ग्रस्त इतिहास ने उसके साथ न्याय नहीं किया। अंग्रेजों से अपनी रियासत बचाने की लड़ाई लड़ रहे कई लोग देश के पहले स्वाधीनता आंदोलन के नायक और नायिका घोषित किए गए, मगर बिना किसी स्वार्थ के देश की आजादी के लिए लड़ने और मर मिटने वाले सैकड़ों आमलोग इतिहास के अंधेरे तहखानों में गुम कर दिए गए। वीरांगना ऊदा देवी उनमें से एक है। मात्र कुछ ही सालों पहले उत्तर प्रदेश की सरकार ने ऊदा देवी की एक मूर्ति सिकन्दर बाग़ परिसर में स्थापित की है। उसकी तरह सैकड़ों दूसरे लोग भी हैं जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में अपने प्राणों की आहुति दी थी,लेकिन न इतिहास को उनकी याद है और न लोकमानस को। अब वक़्त आ गया है कि भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास फिर से लिखा जाय और उसके अनाम नायकों-नायिकाओं के बलिदान को भी अपेक्षित सम्मान मिले।

लेखक पुर्व आईपीएस हैं।

(पहले स्वाधिनता संग्राम की अप्रतिम योद्धा ऊदा देवी पासी के शहादत दिवस पर ये लेख 16 नवम्बर 2018 को ‘निवाण टाइम्स’ में ये आलेख छप चुका है!)

गुरुदत्त : ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है !

Dhruv Gupt

गुरुदत्त उर्फ़ वसंत शिवशंकर पादुकोन को हिंदी सिनेमा का सबसे स्वप्नदर्शी और अपने समय से आगे का फिल्मकार कहा जाता है। वे वैसे फिल्मकार थे जिनकी तीन फिल्मों – ‘प्यासा’, ‘साहब बीवी गुलाम’ और ‘कागज़ के फूल’ की गिनती विश्व की सौ श्रेष्ठ फिल्मों में होती हैं। गुरुदत्त का फिल्मों का सफ़र बहुत मोड़ों से होकर गुज़रा था। 1944 में प्रभात फिल्म कंपनी में उन्होंने नृत्य निर्देशक के तौर पर अपनी यात्रा शुरू की। कुछ फिल्मों में निर्देशक के सहायक रहे। उन्हें स्वतंत्र पहचान मिली अपने संघर्ष के दिनों के मित्र देवानंद की नवकेतन फिल्म कंपनी की दो फिल्मों – ‘बाज़ी’ और ‘जाल’ के निर्देशन के बाद । 1955 की सफल फिल्मों ‘आरपार’ और ‘मिस्टर एंड मिसेज 55’ ने उन्हें यश और लोकप्रियता दी। निर्माता, निर्देशक और अभिनेता के तौर पर उनकी फिल्म ‘प्यासा’ हिंदी सिनेमा का मीलस्तंभ बनी। ‘प्यासा’ में नायक की भूमिका के लिए उन्होंने ट्रेजेडी किंग दिलीप कुमार को चुना था, लेकिन दिलीप साहब के इन्कार करने के बाद उन्होंने चुनौती की तरह खुद ही यह भूमिका निभाई। उसके बाद जो हुआ वह इतिहास बना। उनकी कुछ अन्य प्रमुख फ़िल्में हैं – बाज़, सैलाब, हम सब एक हैं, सौतेला भाई, कागज़ के फूल, चौदवी का चांद, साहब बीवी गुलाम, भरोसा, सांझ और सवेरा, बहुरानी आदि। उनमें से ज्यादातर फिल्मों का या तो उन्होंने खुद निर्माण किया या निर्देशन।

गुरुदत्त फिल्मकार और अभिनेता के रूप में जितने सफल रहे, भावनात्मक अस्थिरता की वज़ह से अपने व्यक्तिगत जीवन में उतने ही असफल। चौथे दशक में उन्होने दो- दो शादियां की – पुणे की विजया और हैदराबाद की सुवर्णा से। दोनों शादियों के असफल हो गईं। फिल्मों में कामयाबी मिलने के बाद उन्होंने 1955 में पार्श्वगायिका गीता दत्त से ब्याह रचाया। कई वर्षों तक यह रिश्ता बेहतर चला, लेकिन इस रिश्ते के बीच आ गई खुद गुरुदत्त की ही खोज और उनकी कई फिल्मों की नायिका वहीदा रहमान। दांपत्य और प्रेम का यह त्रिकोण अंततः फिल्म इतिहास का सबसे दुखांत त्रिकोण साबित हुआ। गीतादत्त से अलगाव हुआ और सामाजिक दबाव में वहीदा जी ने भी उनसे दूरी बना ली। गहरे अवसाद की हालत में वे शराब और सिगरेट में डूब गए। अत्यधिक नशे की हालत में ही 1964 में उनकी मौत हुई। लोग कहते हैं कि यह आत्महत्या थी ! अगले कुछ सालों में तनहाई, शराब और लीवर की बीमारी ने गीतादत्त को भी निगल लिया।

हिंदी सिनेमा के महान फिल्मकार, लेकिन एक बेहद उदास शख्सियत गुरुदत्त के जन्मदिन (9 जुलाई) पर उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि, उनकी फिल्म ‘कागज़ के फूल’ के लिए लिखी कैफ़ी आज़मी की नज़्म की कुछ पंक्तियों के साथ !

उड़ जा उड़ जा प्यासे भंवरे
रस ना मिलेगा ख़ारों में
कागज़ के फूल जहां खिलते हैं
बैठ ना उन गुलज़ारो में
नादान तमन्ना रेती में
उम्मीद की कश्ती खेती है
इक हाथ से देती है दुनिया
सौ हाथों से लेती है
ये खेल है कब से जारी

देखी ज़माने की यारी
बिछड़े सभी, बिछड़े सभी बारी बारी !

– Dhruv Gupt
लेखक पुर्व आईपीएस हैं!

 

JMI organises online lecture “Reimagining South Asia: Ideas, Debates, and Realities”

 

The MMAJ Academy of International Studies,Jamia Millia Islamia(JMI) organised an Online Lecture on the topic “Reimagining South Asia: Ideas, Debates, and Realities” on 8th July 2021 as part of the South Asia Lecture Series. Prof. D. Suba Chandran, Dean, School of Conflict and Security Studies, National Institute of Advanced Studies, Bengaluru, delivered the lecture.

Prof. Ajay Darshan Behera, Officiating Director, MMAJ-AIS welcomed the speaker and the participants. In his initial remarks he introduced the theme of the lecture and underlined how making and unmaking a region is a function of politics and the dynamics of that particular region’s international relations. The idea of South Asia as a concept has historical connotations going back to the 1940s and increased interests of American scholarship on the region.

Prof. Chandran began his presentation by pointing out that in the 1990s and 2000s enough attention has been paid to the idea of re-imagining the region or concept of South Asia. He stated that there have been multiple ideas, debates ranging from economic, cultural and political while re-imagining the idea of South Asia. Instead of arguing from the given set of ideas and debates, Prof. Chandran divided his lecture into two broad categories, one dealing with a set of questions pertaining to the problematique and the second one discussing the prospects of re-imagining South Asia.

He put forward five broad hypotheses in order to understand the given debate on re-imagining South Asia. The hypotheses were, South Asia is not the only region trying to reimagine itself. There are also other regions, which are either in the category of re-imagining after the success of initial re-imagination and trying to do it again. There are regions which have not been successful in the initial attempt and thus attempting it again. The second hypothesis dealt with the question of geography as an important factor in the re-imagination of the region of South Asia. The third one was about the dissonance between the “dreamers” – those who imagine a region and the “doers” — those who are responsible for policy implementation. The fourth hypothesis was about the centrality of the state in the re-imagination of a region and how this centrality hinders the imagination itself. The fifth and last hypothesis dealt with the issue of how states are otherwise also disconnects themselves from the imagination and the disconnection between the states and the civil societies leading to multiple narratives pertaining to re-imagination.

He also raised questions about what shapes or has shaped the idea of a region and how regions have been constructed historically. Whether political and economic institutions dominantly play an important role in the idea of re-imagination, or even the military as an institution also plays an important role. And lastly, how international order becomes an important factor for re-imagination of regions. As regards, the imagination of South Asia he stressed on the fact that the concept did emerge from outside the region but there are also historical references by Aga Khan and K. M. Panikkar which points to the fact that there is a history of imagining South Asia even before it was labeled through western imagination.

Prof. Chandran also pointed out to the problems of re-imagining in terms of state’s centrality effectively hindering the process either by being inward looking or looking at extra regional ambitions. The problem of India being the largest state feeding into the fear of the smaller states has also been one of the important reasons in the problem of re-imagining South Asia. In terms of prospects, he visualised that the idea of Southern Asia, shorn of its security connotations, needs to be re-imagined taking into consideration historical, cultural, economic, religious and political factors.

The lecture was well attended by participants from all across India. It was followed by a question-and-answer session where a number of questions were raised by the participants. Prof. Behera thanked the speaker for his insightful lecture and the participants for their enthusiastic participation.

JMI organises Extension Lecture on “Current Juncture in the Afghan Peace Process: An Appraisal from the Lenses of Peace Theory”

The Nelson Mandela Centre for Peace and Conflict Resolution (NMCPCR), Jamia Millia Islamia(JMI) organised a virtual Extension Lecture titled ” Current Juncture in the Afghan Peace Process: An Appraisal from the Lenses of Peace Theory” on July 6, 2021.

The keynote speaker was Dr. Ali Ahmed who has served as a United Nations Official, Academic and Retired Infantry Officer of the Indian Army.

Prof. Kaushikee, Honorary Director, NMCPCR welcomed the speaker and all the participants. She also briefly introduced the distinguished speaker.

Dr. Ahmed began his lecture by highlighting two important issues: that the current juncture in the Afghan Peace Process is to be understood in the backdrop of the pullout of US troops from Afghanistan. Secondly, the terms of the ongoing Afghan peace process are primarily based on the Taliban’s undertaking to not allow the Afghan territory to be used against US interests and that the US will proceed to exit from Afghanistan by September 2021. He mentioned that the implementation of the peace agreement reached between the Taliban and the US government in February 2020 is currently underway and there is a three-way contest going on within Afghanistan between the Afghan government, the Taliban and the ethnic and local militias which may lead to civil war in the future if not handled carefully.

In the second part of his lecture, the speaker focused on the Peace Theories and Models such as the Hour glass model, the Agenda for Peace framework etc. He then gave a snippet view of the Afghan Peace Process and emphasized in detail on the peacemaking and peace-building aspects. As part of the peacemaking initiatives, he spoke about the Geneva Accords, the UN Support Mission in Afghanistan, the Bonn International Conferences, the efforts made by the Obama and the Trump administration, culminating in the peace deal arrived at in Doha in February 2020.

Dr. Ahmed was optimistic about the prospects of peacemaking in Afghanistan. He emphasized that the initiative at this juncture is dependent on the condition set by the Taliban that they would engage in talks with the Afghan government once the US and its allies have left Afghanistan. He maintained that by engaging with the Taliban it may be influenced to be more moderate especially with respect to human rights in Afghanistan. The speaker was hopeful that from the Peace Theory perspective, it would be beneficial to continue talking to the Taliban as this may result in a political solution.

Speaking about peace-building, the speaker highlighted some of the major issues like credible elections, a likely review of the Constitution especially in relation to the question of women’s rights, minority rights etc., the Security Sector Reforms, the implementation of Rule of Law, interim arrangements before holding elections and transitional justice mechanisms and last but not the least the critical issue of development. He concluded by saying that military solutions have limited efficacy and it is important to go in for a political resolution by engaging with all the stakeholders through negotiation and dialogue. He was also appreciative of India’s recently reported outreach to the Taliban.

The lecture was followed by an engaging Q&A session wherein students and participants raised several critical questions. The event concluded with a proposal of a vote of thanks by the Honorary Director.

The lecture was attended by faculty members, students and research scholars of the Nelson Mandela Centre for Peace and Conflict Resolution, and by students of other centres and departments of JMI.

जामिया में “इनहेबिटिंग ए ग्लोबलाइज्ड वर्ल्ड: कॉन्सेप्ट्स, थियोरीज़, क्रिटिकल पर्सपेक्टिव्स” पर छठे स्पार्क कोर्स का उद्घाटन

 

जामिया मिल्लिया इस्लामिया (जेएमआई) की कुलपति प्रो. नजमा अख्तर ने 7 जुलाई, 2021 को “इनहेबिटिंग ए ग्लोबलाइज्ड वर्ल्ड: कॉन्सेप्ट्स, थियोरीज़, क्रिटिकल पर्सपेक्टिव्स” पर छठे स्पार्क कोर्स (ऑनलाइन) का उद्घाटन किया।

शैक्षणिक एवं अनुसंधान सहयोग प्रोन्नति योजना (स्पार्क), शिक्षा मंत्रालय (एमओई), भारत सरकार द्वारा समर्थित यह कोर्स अंग्रेजी विभाग, जामिइ तथा अमेरिकन स्टडीज यूनिवर्सिटी ऑफ़ वुर्जबर्ग, जर्मनी के सहयोग से आयोजित किया गया और प्रो. इसाबेल कर्रेमैन, अंग्रेजी विभाग, ज्यूरिख विश्वविद्यालय, स्विट्जरलैंड, इंटरनेशनल पीआई द्वारा पढ़ाया जाएगा।

उद्घाटन समारोह का संचालन अंग्रेजी विभाग, जामिया की पीएचडी स्कॉलर सुश्री श्रद्धा ए सिंह ने किया। जिसमें कई विभिन्न विषयों के विद्वानों, छात्रों और शिक्षकों ने बड़ी संख्या में उत्साहपूर्वक भाग लिया।

प्रो. सिमी मल्होत्रा, विभागाध्यक्ष, अंग्रेजी विभाग, जामिया, भारतीय पीआई ने अतिथियों, मेजबान संकाय और उपस्थित लोगों का स्वागत किया। उन्होंने 2019 में शुरू हुई स्पार्क योजना के तहत विश्वविद्यालय के एक बड़े शैक्षणिक एवं अनुसंधान सहयोग के हिस्से के रूप में पाठ्यक्रम के बारे में चर्चा की और बताया कि इसका उद्देश्य वैश्वीकृत दुनिया की अवधारणा है जिसमें हम सभी, व्याख्यान की एक श्रृंखला के माध्यम से जुड़े रहते हैं जो कि आने वाले हफ्तों के दौरान आयोजित किया जाएगा।

मुख्य अतिथि, जामिया की कुलपति, प्रो नजमा अख्तर ने पूरे भारत और विभिन्न विषयों के शिक्षाविदों और विद्वानों के समूह का स्वागत करते हुए उद्घाटन वक्तव्य दिया और भारत तथा दुनिया भर की समकालीन सांस्कृतिक प्रथाओं तथा ज्ञान प्रणालियों को समझने के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने एक वैश्वीकृत दुनिया में रहने की स्थितियों के लिए नवीन दृष्टिकोण और महत्वपूर्ण प्रतिक्रियाओं की पेशकश के पाठ्यक्रम की प्रतिबद्धता पर जोर दिया और प्रतिभागियों को उत्साह के साथ पाठ्यक्रम से सीखने और योगदान करने के लिए प्रोत्साहित किया।

पाठ्यक्रम को परिभाषित करने वाले विषयों पर विस्तार से बताते हुए, प्रो. इसाबेल कर्रेमैन ने पाठ्यक्रम की शुरुआत की और पाठ्यक्रम की सहभागी और सहयोगी प्रकृति के बारे में विवरण साझा करके इसके लिए अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।

समकालीन समय में एक घटनापूर्ण, रोमांचक और आवश्यक पाठ्यक्रम होने का वादा करते हुए, ज़हरा रिज़वी, पीएच.डी. अंग्रेजी विभाग, जामिया द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ छठे स्पार्क पाठ्यक्रम का वर्चुअल उद्घाटन हुआ। प्रतिभागियों की एक विस्तृत श्रृंखला और भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए पूरे उद्घाटन कार्यक्रम को यूट्यूब पर भी लाइव स्ट्रीम किया गया।

पंडित नेहरू : दिलीप कुमार के नायक और आदर्श

Shubhneet Kaushik

दिग्गज अभिनेता दिलीप ने अपनी आत्मकथा ‘द सब्सटेंस एंड द शैडो : एन ऑटोबायोग्राफ़ी’ में लिखा है कि अपनी ज़िंदगी में वे दो लोगों से सर्वाधिक प्रभावित हुए। एक तो उनके पिता (जिन्हें वे बड़े सम्मान से ‘आग़ा जी’ कहते थे) और दूसरे जवाहरलाल नेहरू। नेहरू को दिलीप कुमार अपना नायक और आदर्श मानते थे। यह भी सच है कि नेहरू के स्वप्नों, आदर्शों और मूल्यों को जितनी शिद्दत के साथ दिलीप कुमार ने रूपहले पर्दे पर जिया, उतना शायद ही किसी दूसरे अभिनेता ने। अकारण नहीं कि मेघनाद देसाई ने जब दिलीप कुमार की फ़िल्मों पर एक किताब लिखी, तो उन्होंने दिलीप कुमार को ‘नेहरुज हीरो’ कहा।

अपनी आत्मकथा में दिलीप कुमार ने ‘पैग़ाम’ फ़िल्म की शूटिंग के दौरान नेहरू से मुलाक़ात का एक दिलचस्प विवरण दिया है। जब नेहरू मद्रास के जैमिनी स्टूडियो में निर्माणाधीन ‘पैग़ाम’ के सेट पर पहुँचे। जैमिनी स्टूडियो के संस्थापक एस॰एस॰ वासन चाहते थे कि दिलीप कुमार ही दूसरे कलाकारों के साथ सेट पर नेहरू का स्वागत करें। लेकिन दिलीप कुमार ने सुझाव दिया कि नेहरू के स्वागत की ज़िम्मेदारी वैजयंती माला को मिलनी चाहिए। ख़ुद दिलीप कुमार सबसे पीछे खड़े हो गए। दिलीप साहब याद करते हैं कि नेहरू आए और भीड़ में किसी को खोजती हुई उनकी निगाह दिलीप कुमार पर आकर थम गई। नेहरू तेज़ी से दिलीप कुमार की ओर आगे बढ़े और उनके पीछे एस॰एस॰ वासन, वैजयंती माला और कलाकारों का समूह। नेहरू ने दिलीप कुमार के कंधे पर अपना हाथ रखा और मुस्कराते हुए कहा ‘यूसुफ़ मैंने सुना तुम यहाँ हो, इसलिए मैंने सोचा तुमसे मिलता चलूँ।’

उसके बाद नेहरू कुछ समय तक जैमिनी स्टूडियो में रुके और उन्होंने एस॰एस॰ वासन, दिलीप कुमार और दूसरे कलाकारों से रूबरू होकर सिनेमा के बारे में, समाज सुधार और राष्ट्र-निर्माण में फ़िल्मों की भूमिका के बारे में गुफ़्तगू की। नेहरू चाहते थे कि सिनेमा ऐसा सशक्त माध्यम बने कि वह समाज के दक़ियानूसी रवैये से लड़ने और समाज की जागृति का औज़ार बन सके।

उल्लेखनीय है कि फरवरी 1955 में जवाहरलाल नेहरू ने नई दिल्ली में सिनेमा पर आयोजित एक सेमिनार का उद्घाटन किया था, जिसमें दिलीप कुमार भी शरीक हुए थे। इस सेमिनार में दिलीप कुमार के साथ-साथ भारतीय सिनेमा की दिग्गज हस्तियों जैसे, वी. शांताराम, मोहन भवनानी, बी.एन. सरकार, एस.एस. वासन, किशोर साहू, नरेंद्र शर्मा, उदय शंकर, ख्वाज़ा अहमद अब्बास, दुर्गा खोटे, देविका रानी, नरगिस, राज कपूर, बिमल रॉय ने भी हिस्सा लिया था।

जब सेंसर बोर्ड ने दिलीप कुमार की फ़िल्म ‘गंगा जमना’ को सर्टिफिकेट देने से मना कर दिया और सूचना व प्रसारण मंत्री बी॰वी॰ केसकर ने दिलीप कुमार और निर्देशकों की अपील को अनसुना कर दिया। तब दिलीप कुमार 1960 के आख़िर में नेहरू से मिले और सेंसर बोर्ड के मनमाने रवैये पर अपनी बात रखी। दिलीप कुमार से सहमत होकर नेहरू ने सेंसर बोर्ड को ‘गंगा जमना’ और दूसरी फ़िल्मों के रिव्यू का आदेश दिया, जिसके बाद ये फ़िल्में रिलीज़ हो सकीं।

दिलीप कुमार ने ही रजनी पटेल के साथ मिलकर वर्ष 1972 में बम्बई में नेहरू की स्मृति में एक सांस्कृतिक केंद्र के रूप में ‘नेहरू सेंटर’ की स्थापना का प्रस्ताव रखा था। दिलीप साहब और रजनी पटेल की मेहनत रंग लाई और नवम्बर 1972 में इंदिरा गांधी वर्ली में ‘नेहरू सेंटर’ की आधार शिला रखी।