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पंडित रविशंकर और ‘सुरबहार’ की एक महान् कलाकार का दुःखद अंत!

Pankaj Parashar

सुप्रसिद्ध फ़नकार उस्ताद अल्लाउद्दीन खाँ की सबसे छोटी बेटी रोशन आरा खाँ उर्फ अन्नपूर्णा देवी के जीवन-संघर्ष और संगीत-साधना के बारे में पता चला, तो कई बातें विस्मित करने वाली लगीं. मसलन अपने आप में किंवदंती बन चुके बाबा अल्लाउद्दीन खाँ ने बेटी अन्नपूर्णा के लिए कहा, ‘अगर मुझे और अली अकबर (उनके पुत्र, पद्मभूषण से सम्मानित सुप्रसिद्ध सरोदवादक ) को एक तरफ रख दिया जाए और अन्नपूर्णा को दूसरी तरफ तो उसके संगीत का ही पलड़ा भारी रहेगा.’ अन्नपूर्णा देवी की जिंदगी कला और रोचक किस्सों से भरपूर रही. 23 अप्रैल, सन् 1927 को मध्यप्रदेश के मैहर में पैदा हुई अन्नपूर्णा का नाम उनके मां-बाप ने रोशनआरा खां रखा था, लेकिन कुछ ही दिन में उन्हें एक नया नाम मिल गया-अन्नपूर्णा. दरअसल अलाउद्दीन खां ने जब मैहर के महाराज बृजनाथ सिंह को बेटी के जन्म के बारे में बताया, तो महाराज ने बच्ची का नाम अन्नपूर्णा रख दिया. आठ-नौ साल की बच्ची अन्नपूर्णा अपने आँगन में इच्ची-दुच्ची खेल रही थी. अंदर भाई अली अकबर खाँ रियाज़ कर रहे थे. अचानक खेल छोड़कर अन्नपूर्णा घर के अंदर गई और भाई से कहा, भैया, बाबा ने ऐसा नहीं बताया है और खेल छोड़कर वह भाई को गाकर बताने लगी कि बाबा ने किस तरह बताया है. बाबा कहीं पास ही थे और वहीं से अन्नपूर्णा का गाना सुन रहे थे. पूरा गाना सुनकर बाहर आए, तो बेटी डर गई. बाबा उसे कमरे में ले गए, प्यार किया और सिर पर हाथ फेरते हुए कहा कि मैं अपना प्रण तोड़कर तुम्हें सिखाऊंगा. पहले जैसा चलन था, उस हिसाब से ध्रुपद से शुरू किया, फिर सितार. एक दिन अचानक बाबा ने उनसे कहा, सुरबहार सीखो. यह थोड़ा बड़ा है और सीखना भी कठिन है, लेकिन यह ज़्यादा नेमतें देगा. मैं तुम्हें अपने गुरू की विद्या सिखाना चाहता हूँ. सितार को आम आदमी भी समझता है, लेकिन इसे सिर्फ संगीत के गहरे जानकार ही समझेंगे. यह मुमिकन है सुरबहार बजाने पर लोग तुम्हें हूट भी करें. बेटी ने हाँ कर दी. बाबा ने बाद में कहा कि यह बेटी नहीं, साक्षात् देवी सरस्वती थी.

तालीम के इन्हीं दिनों में उनके यहाँ 18 साल के रवीन्द्र शंकर सितार सीखने आए थे. यहीं रविशंकर और अन्नपूर्णा की मित्रता हुई और बाद में दोनों ने शादी करने का फैसला किया. यह विवाह 1941 में हुआ. 1944 में रविशंकर मैहर छोड़कर अन्नपूर्णा देवी के साथ मुंबई पहुंच गए. संगीत सभाओं में उनके सुरबहार की धूम थी. रविशंकर तब तक उतने लोकप्रिय नहीं हुए थे. उन्हें विश्व स्तरीय पहचान अमेरिका में बीटल्स के साथ सितार की संगत बिठाने के बाद मिली. पांचवें दशक के मध्य तक रविशंकर, अपने गुरु उस्ताद अलाउद्दीन खां, बड़े भाई और महान बेले नर्तक उदय शंकर और पत्नी अन्नपूर्णा के आभामंडल से बाहर नहीं आ पाए थे. शायद अन्नपूर्णा के साथ संबंधों में बढ़ती खटास की यही एक बड़ी वजह थी.
जब घर में कलह और टकराव बढ़ने लगा तो शादी बचाने की खातिर अन्नपूर्णा देवी ने बाबा अलाउद्दीन खान और अपने आराध्य मैहर देवी के सामने जिंदगी में कभी प्रस्तुति ना देने की कसम खाई. मगर उनका यह त्याग और समर्पण भी इस शादी को बचा नहीं पाया. 1961 में आखिरकार दोनों अलग हो गए. संगीत के जानकारों का कहना था कि पिछली सदी के चौथे और पांचवे दशक में अन्नपूर्णा देवी अपने पति से कहीं अधिक प्रतिभाशाली समझी जाती थीं. 2012 में अपनी आत्मकथा “रागमाला” में पंडित रविशंकर ने अफ़सोस के साथ कहा कि उन्हें अन्नपूर्णा देवी के साथ निबाह लेना चाहिए था. रविशंकर से तलाक के बाद द टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए इंटरव्यू में अन्नपूर्णा देवी ने कहा था, ‘1950 के दशक में हम दोनों जब भी किसी शो में एक साथ कार्यक्रम पेश करते तो समीक्षक मेरी ज्यादा तारीफ करते. पंडित जी को यह अच्छा नहीं लगता था. सो वे जता देते थे कि पत्नी को ज्यादा तारीफ मिलने से वे खुश नहीं हैं. रविशंकर के अहम् ने सुरबहार जैसे कठिन वाद्य की अप्रतिम कलाकार को अपनी महारत दुनिया के सामने पेश करने के वंचित कर दिया. कहते हैं कि वर्ष 1973 में ऋषिकेश मुख़र्जी के निर्देशन में बनी फिल्म “अभिमान” इन्हीं दोनों संगीतज्ञों के ईर्ष्याजनित वैवाहिक कलह की सच्ची घटना से प्रेरित है. फर्क सिर्फ इतना रहा कि फ़िल्मी कहानी में पति –पत्नी अलगाव के बाद दोबारा मिल जाते हैं, लेकिन असली कहानी में ऐसा नहीं हुआ. अन्नपूर्णा देवी ने एक बार जो संगीत की महफ़िल छोड़ने की कसम खाई, तो उस पर ताउम्र कायम रहीं और रविशंकर जी से उनका अलगाव भी अंत तक बना रहा.

देश की पहली महिला सुरबहार वादक अन्नपूर्णा देवी

Pankaj Parashar

सुप्रसिद्ध फ़नकार उस्ताद अल्लाउद्दीन खाँ की सबसे छोटी बेटी रोशन आरा खाँ उर्फ अन्नपूर्णा देवी के जीवन-संघर्ष और संगीत-साधना के बारे में पता चला, तो कई बातें विस्मित करने वाली लगीं. मसलन अपने आप में किंवदंती बन चुके बाबा अल्लाउद्दीन खाँ ने बेटी अन्नपूर्णा के लिए कहा, ‘अगर मुझे और अली अकबर (उनके पुत्र, पद्मभूषण से सम्मानित सुप्रसिद्ध सरोदवादक ) को एक तरफ रख दिया जाए और अन्नपूर्णा को दूसरी तरफ तो उसके संगीत का ही पलड़ा भारी रहेगा.’ अन्नपूर्णा देवी की जिंदगी कला और रोचक किस्सों से भरपूर रही. 23 अप्रैल, सन् 1927 को मध्यप्रदेश के मैहर में पैदा हुई अन्नपूर्णा का नाम उनके मां-बाप ने रोशनआरा खां रखा था, लेकिन कुछ ही दिन में उन्हें एक नया नाम मिल गया-अन्नपूर्णा. दरअसल अलाउद्दीन खां ने जब मैहर के महाराज बृजनाथ सिंह को बेटी के जन्म के बारे में बताया, तो महाराज ने बच्ची का नाम अन्नपूर्णा रख दिया. बाबा यानी उस्ताद अल्लाउद्दीन खाँ की तीन बेटियाँ थीं- शारिजा, जहाँआरा और रोशनआरा और एक बेटा अली अकबर खाँ. शारिजा की बचपन में ही मौत हो गई. जहाँआरा को तानपूरे में महारत हासिल थी. वे बाबा के साथ संगत भी करती थीं. बाबा ने जहाँआरा का एक पारंपरिक मुसलमान परिवार में विवाह कर दिया. जहाँआरा के ससुराल वालों को संगीत की जरा भी समझ नहीं थी. एक दिन उनकी सास ने तानपूरे को उठाया और चूल्हे में जला दिया. इस घटना से बेहद संवेदनशील उस्ताद अल्लाउद्दीन खाँ साहब इतने आहत हुए कि उन्होंने तय किया कि वे अब किसी बेटी को संगीत नहीं सिखाएंगें. लेकिन होनी को तो जैसे कुछ और ही मंजूर था. आठ-नौ साल की बच्ची अन्नपूर्णा अपने आँगन में इच्ची-दुच्ची खेल रही थी. अंदर भाई अली अकबर खाँ रियाज़ कर रहे थे. अचानक खेल छोड़कर अन्नपूर्णा घर के अंदर गई और भाई से कहा, भैया, बाबा ने ऐसा नहीं बताया है और खेल छोड़कर वह भाई को गाकर बताने लगी कि बाबा ने किस तरह बताया है. बाबा कहीं पास ही थे और वहीं से अन्नपूर्णा का गाना सुन रहे थे. पूरा गाना सुनकर बाहर आए, तो बेटी डर गई. बाबा उसे कमरे में ले गए, प्यार किया और सिर पर हाथ फेरते हुए कहा कि मैं अपना प्रण तोड़कर तुम्हें सिखाऊंगा.

पहले जैसा चलन था, उस हिसाब से ध्रुपद से शुरू किया, फिर सितार. एक दिन अचानक बाबा ने उनसे कहा, सुरबहार सीखो. यह थोड़ा बड़ा है और सीखना भी कठिन है, लेकिन यह ज़्यादा नेमतें देगा. मैं तुम्हें अपने गुरू की विद्या सिखाना चाहता हूँ. सितार को आम आदमी भी समझता है, लेकिन इसे सिर्फ संगीत के गहरे जानकार ही समझेंगे. यह मुमिकन है सुरबहार बजाने पर लोग तुम्हें हूट भी करें. बेटी ने हाँ कर दी. बाबा ने बाद में कहा कि यह बेटी नहीं, साक्षात् देवी सरस्वती थी. तालीम के इन्हीं दिनों में उनके यहाँ 18 साल के रवीन्द्र शंकर सितार सीखने आए थे. यहीं रविशंकर और अन्नपूर्णा की मित्रता हुई और बाद में दोनों ने शादी करने का फैसला किया. यह विवाह 1941 में हुआ. बाबा चाहते थे कि रविशंकर और अन्नपूर्णा दोनों यहीं मैहर में ही बस जाएं और उनकी परंपरा को आगे बढ़ाएं. दोनों का घर बसाने के लिए एक जमीन का भी इंतजाम कर लिया था क्योंकि वे रविशंकर को अपना उत्तराधिकारी मान चुके थे. लेकिन रविशंकर को मुंबई की चकाचौंध अपनी ओर खींच रही थी. वे अपने भाई उदयशंकर के कलावैभव से परिचित हो चुके थे. और अंततः 1944 में रविशंकर मैहर छोड़कर अन्नपूर्णा देवी के साथ मुंबई पहुंच गए. संगीत सभाओं में उनके सुरबहार की धूम थी. रविशंकर तब तक उतने लोकप्रिय नहीं हुए थे. उन्हें विश्व स्तरीय पहचान अमेरिका में बीटल्स के साथ सितार की संगत बिठाने के बाद मिली. पांचवें दशक के मध्य तक रविशंकर, अपने गुरु उस्ताद अलाउद्दीन खां, बड़े भाई और महान बेले नर्तक उदय शंकर और पत्नी अन्नपूर्णा के आभामंडल से बाहर नहीं आ पाए थे. शायद अन्नपूर्णा देवी के साथ संबंधों में बढ़ती खटास की यही एक बड़ी वजह थी. जब घर में कलह और टकराव बढ़ने लगा तो शादी बचाने की खातिर अन्नपूर्णा देवी ने बाबा अलाउद्दीन खान और अपने आराध्य मैहर देवी के सामने जिंदगी में कभी प्रस्तुति ना देने की कसम खाई. मगर उनका यह त्याग और समर्पण भी इस शादी को बचा नहीं पाया. 1961 में आखिरकार दोनों अलग हो गए. संगीत के जानकारों का कहना था कि पिछली सदी के चौथे और पांचवे दशक में अन्नपूर्णा देवी अपने पति से कहीं अधिक प्रतिभाशाली समझी जाती थीं. 2012 में अपनी आत्मकथा “रागमाला” में पंडित रविशंकर ने अफ़सोस के साथ कहा कि उन्हें अन्नपूर्णा देवी के साथ निबाह लेना चाहिए था. रविशंकर से तलाक के बाद द टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए इंटरव्यू में अन्नपूर्णा देवी ने कहा था, ‘1950 के दशक में हम दोनों जब भी किसी शो में एक साथ कार्यक्रम पेश करते तो समीक्षक मेरी ज्यादा तारीफ करते. पंडित जी को यह अच्छा नहीं लगता था. सो वे जता देते थे कि पत्नी को ज्यादा तारीफ मिलने से वे खुश नहीं हैं. रविशंकर के अहम् ने सुरबहार जैसे कठिन वाद्य की अप्रतिम कलाकार को अपनी महारत दुनिया के सामने पेश करने के वंचित कर दिया. कहते हैं कि वर्ष 1973 में ऋषिकेश मुख़र्जी के निर्देशन में बनी फिल्म “अभिमान” इन्हीं दोनों संगीतज्ञों के ईर्ष्याजनित वैवाहिक कलह की सच्ची घटना से प्रेरित है. फर्क सिर्फ इतना रहा कि फ़िल्मी कहानी में पति –पत्नी अलगाव के बाद दोबारा मिल जाते हैं, लेकिन असली कहानी में ऐसा नहीं हुआ. अन्नपूर्णा देवी ने एक बार जो संगीत की महफ़िल छोड़ने की कसम खाई, तो उस पर ताउम्र कायम रहीं और रविशंकर जी से उनका अलगाव भी अंत तक बना रहा.

के कामराज: आजाद भारत के पहले ‘किंगमेकर’, निधन के वक्‍त जिनके पास थे सिर्फ 130 रुपये

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Premkumar Mani

एक नेता ,जो न हिंदी जानता है, और न अंग्रेजी . जिसने बस छठी कक्षा तक की पढाई की हुई है और भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के बाद लगभग सर्वसम्मत रूप से प्रधानमंत्री मान लिया जाता है , लेकिन जो यह कह कर इंकार कर देता है कि मैं न हिंदी बोल सकता हूँ ,न अंग्रेजी ,इसलिए मुझे काम करने में असुविधा होगी. वह इस पद को ग्रहण करने से इंकार कर देता है . वह अपने होते दो प्रधानमंत्रियों – लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गाँधी — के चुनाव में निर्णायक भूमिका अदा करता है और जब मरता है ,तब उसके पास बस तीन जोड़ी कपडे और सौ रुपये मिलते हैं . मृत्यु के बाद उसे भारत रत्न से नवाजा जाता है .

आज अपने घरेलु किताबी -जमावड़े को ढूँढ़ते एक किताब मिली – ” Kamraj : The Iron man ” . एक आईसीएस अधिकारी आर पी कपूर की लिखी यह किताब कोई चालीस या पैंतालीस साल पहले पढ़ी थी ,और अत्यंत जीर्ण अवस्था में इसे आज देखने पर थोड़ा दुःख भी हुआ . लेकिन कामराज एक दफा मेरी स्मृतियों में कौंध गए . उनका जमाना भी झिलमिल ही सही याद आया .

कामराज उन नेताओं में एक हैं .जिन्हे अपने बचपन में देख सका हूँ . पिता जी कांग्रेस की राजनीति से जुड़े थे . उन्ही के साथ होने के कारण कामराज को नजदीक से देख सका था . बल्कि उन्हें छू भी सका था . उसकी एक झीनी स्मृति है . लेकिन तब मैं उनका महत्व बिलकुल नहीं जानता था .

मैं नहीं जानता आज की पीढ़ी उन्हें कितना जानती है . लेकिन , वह कई रूपों में आज याद करने लायक हैं . खास कर कांग्रेस से जुड़े लोगों को उनसे सीख लेनी चाहिए . उन लोगों को भी सीख लेनी चाहिए ,जो लगातार कई दफा मुख्यमंत्री बने ,लेकिन यह नहीं जान सके कि मुख्यमंत्री बनना क्या होता है . कपडे बदलना और अपनी कोठी सजाना ही अधिकांश मुख्यमंत्रियों का व्यसन है . ऐसे लोगों के लिए कामराज को जानना ज्यादा जरुरी है .

कामराज दक्षिण भारत के नेता थे . तमिलनाडु ,उन दिनों मद्रास कहा जाता था . जो लोग इस राज्य की राजनीति से परिचित होते हैं ,वे वहाँ के ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलन से भी परिचित होते हैं . लेकिन अभी मैं उस आंदोलन की कथा नहीं बतलाऊंगा . मुझे कामराज पर बात करनी है ,जो वहाँ के कांग्रेस नेता थे . आज उस प्रान्त में कांग्रेस का कोई प्रभावी वजूद नहीं है . लेकिन कभी था . इसकी कहानी दिलचस्प है . लेकिन यह फिर कभी . अभी तो बस कामराज .

कामराज का जन्म 15 जुलाई 1903 को मद्रास के एक पिछड़े हुए गाँव में हुआ ,जो विरूधनगर इलाके में था .नाडारों का परिवार . नाडार जाति हमारे उत्तर भारत में पासी कही जाती है . बचपन का नाम था कामची ,जो बाद में कामराजार और अंततः कामराज हो गया . पिता कुमारसामी का नाम आरम्भ में जुड़ कर कुमारसामी कामराज हो गया . कोई दस किलोमीटर पैदल चल कर स्कूल जाना होता था . लेकिन दादा और पिता की अचानक मौत से दादी ,माँ और एक बहन को सँभालने की जिम्मेदारी बालक कामराज पर आ गयी और नतीजतन स्कूल छोड़ना पड़ा . तब वह छठी जमात में थे . मुश्किलों का अनुमान बहुत मुश्किल नहीं है . लेकिन कामराज ने स्वाध्याय से घरेलु पढाई जारी रखी. वह अख़बार पढ़ते और देश -दुनिया की खबरों से वाकिफ होते . जालियावाला बाग़ की घटना ने कामराज को बहुत परेशान किया , कुछ ही समय के बाद तय कर लिया कि आज़ादी की लड़ाई में शामिल होऊंगा . 1921 के सितम्बर महीने में गांधी मदुरै आये . 21 तारीख थी . कामराज ने उनसे मिलने की जिद की और मिले . इस तरह मिले कि उनके पूरे व्यक्तित्व को आत्मसात कर लिया . सादगीपूर्ण जीवन और समाज सेवा उनका हंमेशा के लिए आदर्श बन गया . उनका कोई आधार नहीं था . न धन ,न शिक्षा -दीक्षा . राजाजी जैसे नेताओं के साथ काम करना आसान नहीं था . लेकिन कामराज लगे रहे . ब्राह्मणविरोधी आंदोलन का एक अलग पाखंड था . दरअसल यह खाते -पीते बिचौलिया जातियों का शगल था ,जिसके नेता जस्टिस पार्टी के लोग थे . इन सब में उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष का अभाव था . इसलिए कामराज इनसे अलग रहे . 1936 में वह मद्रास कांग्रेस कमिटी के सचिव बन गए और 1939 में प्रांतीय कांग्रेस के अध्यक्ष . राजगोपालाचारी के कांग्रेसी ब्राह्मणवाद से उनकी अंदरूनी लड़ाई चलती रही . इसकी एक झांकी उन्होंने 1950 में ही रखी थी जब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में राजाजी के उम्मीदवार को 99 के विरुद्ध 150 वोटों से पराजित कर वह अध्यक्ष चुने गए . कामराज ने पार्टी पर पकड़ इतनी मजबूत कर ली कि 1954 में राजगोपालाचारी को मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा और अप्रैल 1954 में कामराज मुख्यमंत्री चुने गए .

कामराज ने अपने मुख्यमंत्री काल के पल -पल का इस्तेमाल किया . राजाजी ने शिक्षा में गाँधीवादी अवयवों का खतरनाक इस्तेमाल किया था . बुनियादी शिक्षा के नाम पर जातिगत पेशों को बल दिया जा रहा था . जो छात्र जिस जाति का होता था ,कौशल विकास के नाम पर उसे वैसी ही शिक्षा दी जाने की योजना थी . इसे ‘ आनुवंशिक शिक्षा योजना ‘ कहा जाता था . अभी मोदी सरकार ने जो नई शिक्षा नीति बनाई है ,इसमें भी कुछ ऐसी बातें हैं . कामराज ने आते -आते इस शिक्षा नीति को खत्म किया . वह बिना किसी पूर्व सूचना के दूरस्थ इलाकों का निरीक्षण करते रहते थे . एक बार उन्होंने देखा कि कुछ बच्चे खेतों में काम कर रहे हैं . उन्हें अपना बचपन याद आया . उन बच्चों को बुला कर बात की . बच्चों ने कहा कि नहीं काम करेंगे ,तब खाएंगे क्या . मुख्यमंत्री दफ्तर लौटे . कैबिनेट बुलाया और मिड डे मिल यानी मध्यान्न भोजन योजना को अपने प्रदेश में लागू किया . ब्रिटेन के बाद मद्रास प्रान्त मध्यान्न भोजन योजना को लागू करने वाला दुनिया में दूसरा इलाका बना . पूरे भारत में इस योजना को बहुत बाद में लागू किया गया . कामराज ने 1954 में ही इसे लागू कर दिया था . बाद में उन्होंने छात्रों के लिए पोशाक- योजना भी लागू किया . हर एक के लिए अधिकतम तीन किलोमीटर पर स्कूल और हर पंचायत में हाई स्कूल उन्होंने बहुत कम समय में संभव किया . कामराज ही थे जिन्होंने सिंचाई और बिजली को पूरे प्रदेश में संभव कर दिया . इन सब कार्यों में उन्हें बस पांच से छह साल लगे . 1962 में उन्होंने प्रधानमंत्री नेहरू से मिल कर बता दिया कि मुख्यमंत्री के रूप में मेरा काम ख़त्म हो गया है . अब मैं पार्टी संगठन का काम करना चाहूँगा . 2 अक्टूबर 1963 को उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा कर दिया . उनके प्रभाव में छह मुख्यमंत्रियों और छह कैबिनेट मंत्रियों ने भी इस्तीफा किया . इसे कामराज योजना कहा गया . कामराज ने मद्रास (1969 से तमिलनाडु ) कांग्रेस के अध्यक्ष रूप में ही काम करने की इच्छा जताई थी . लेकिन नेहरू के जोर पर उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया . 9 अक्टूबर 1963 को उन्होंने कांग्रेस आलाकमान का कार्यभार संभाला . कांग्रेस तब काफी कमजोर हो गयी थी . पिछड़े और उपेक्षित सामाजिक समूहों से कांग्रेस को जोड़ने का आरम्भ उन्होंने ही किया . आदिवासी ,दलित और दूसरे पिछड़े तबके के लोगों को कांग्रेस से जोड़ने की विशेष पहल की गयी .

मई 1964 में नेहरू की अचानक मृत्यु हो गयी . मोरारजी इस पद के लिए जोर लगाए हुए हुए थे और अपनी दावेदारी पेश कर रहे थे ..उनकी लॉबी भी मजबूत थी . कामराज ने लाल बहादुर शास्त्री को प्रधानमंत्री बनवाया . शास्त्री जी की मौत के बाद फिर एक बार उहापोह हुआ . इंदिरा गाँधी का चुनाव कामराज का था . वोटिंग की नौबत हुई ,लेकिन मोरारजी को भान हो गया था . उन्होंने इंदिरा के नाम पर सहमति दे दी . आंतरिक चुनाव टल गया .

कामराज का मद्रास छोड़ना कांग्रेस के लिए महँगा पड़ा . कहा जाता है , उनके ही द्वारा हुए बिजलीकरण से कस्बों तक में सिनेमा हाल खुल गए थे . इन सिनेमा हालों से डीएमके के फ़िल्मी नेता काफी लोकप्रिय हो गए थे . 1965 में संविधान के पंद्रह साल पूरे हो रहे थे . राजभाषा के रूप में अंग्रेजी की मियाद पूरी हो रही थी . हिंदी को पूरे देश में राजभाषा के रूप में लागू किये जाने की चर्चा उठी . दक्षिण में इसे लेकर विरोध हुआ . इस विरोध ने आंदोलन का रूप ले लिया . अखिल भारतीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में कामराज ने दो कार्यकाल पूरे कर लिए थे . उनकी योजना प्रांतीय राजनीति में लौट जाने की थी . 1967 में उन्होंने अपने इलाके विरूधनगर से असेंबली चुनाव लड़ा लड़ा और एक छात्र पी सिनिवास से पराजित हो गए . भाषा मामले पर हिंदी का पक्ष लेना उन्हें महँगा पड़ा . उन्होंने तुरंत कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा कर दिया . बाद में उपचुनाव में वह लोकसभा के लिए चुने गए . इंदिरा गाँधी की राजनीति से भी टकराव हुआ और वह संगठन कांग्रेस के साथ रहे . 1971 का लोकसभा चुनाव जीता . इंदिरा गाँधी ने उन्हें अपनी राजनीति से जुड़ने का आग्रह किया .लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया . गांघी जयंती 2 अक्टूबर 1975 की सुबह वह उठे नहीं . सोये हुए ही उन्हें हृदयाघात हुआ और दिवंगत हो गए .
जानकारी यही है कि मृत्यु के बाद उनके पास संपत्ति के रूप में तीन जोड़ी कपडे और सौ रुपये नकद थे . भारत सरकार ने मृत्युपरांत उन्हें भारतरत्न का ख़िताब दिया।

 

 

ब्रिगेडियर उस्मान : पाकिस्तान को मात देने वाला मुस्लिम अफ़सर

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Adwait Bahuguna

जिन्ना – मै तुममें पाकिस्तान की ताकत देखता हूं, बर्मा के मोर्चे पर तुम्हारी बहादुरी के किस्से सुने हैं मैने ।

उस्मान – पाकिस्तान और ताकत ? जनाब दिन में सपने न देखा करें तो आपके पैदा होने वाले मुल्क के लिये बेहतर होगा ।

जिन्ना – तुम तो मुसलमान हो तुम्हें पाकिस्तान की तरफ होना चाहिए ।

उस्मान – ये जिस्म हिन्दोस्तां की मिट्टी से बना है पाकिस्तान की नहीं । जनाब मेरा वक्त न जाया कीजिये ।

जिन्ना – पाकिस्तान आ जाओ ! मैं तुम्हें आर्मी चीफ बना दूंगा ।

उस्मान – जनाब आपको पहले भी बता चुका हूं कि ये जिस्म हिन्दोस्तां की मिट्टी से बना है और हिन्दोस्तां की ही हिफाजत में फनाॅ होगा ।

ये बातचीत है 1946 अप्रैल में मोहम्मद अली जिन्ना और ब्रिगेडियर उस्मान के बीच । (द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रिगेडियर उस्मान की वीरता के किस्से चर्चा में थे ।)

मोहम्मद उस्मान ने 10वीं बलूच रेजिमेंट की 14वीं बलाटियन की कमान अप्रैल 1945 से अप्रैल 1946 तक संभाली, इसी दौरान जिन्ना उनके पास पाकिस्तान चलने का ऑफर लेकर आए थे। बंटवारे के बाद जब बलूच रेजिमेंट पाकिस्तान में चली गई तो मोहम्मद उस्मान का ट्रांसफर डोगरा रेजिमेंट में कर दिया गया। डोगरा रेजिमेंट में अपने साथी सैनिकों की भावनाओं का ख्याल रखते हुए मोहम्मद उस्मान शाकाहारी हो गए ।

कश्मीर को हासिल न कर पाने की टीस पाकिस्तान के मन में हमेशा से थी. पाकिस्तान ने 1947 में कबायली घुसपैठियों को जम्मू-कश्मीर की रियासत में भेजा । मोहम्मद उस्मान उस वक्त 50 पैरा ब्रिगेड के कमांडर थे और उन्हें नौशेरा की सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई थी।

5000 कबायली नौशेरा में आ चुके थे वे मस्जिद की आड़ लेकर भारतीय सेना पर फायरिंग कर रहे थे, भारतीय सेना मस्जिद होने की वजह से कबायलियों पर जवाबी फायरिंग करने से हिचकिचा रही थी, ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान सामने आए और कबायलियों पर टूट पडे । 1032 कबायली जमींदोज हो गये बाकी के उल्टे पांव भाग लिये ।

ब्रिगेडियर उस्मान को नौशेरा का शेर कहा जाने लगा । मई 1948 में पाकिस्तान की रेगुलर आर्मी ने एक बार फिर भयंकर गोलीबारी और शेलिंग शुरू कर दी।

भयंकर युद्ध छिड गया , ब्रिगेडियर उस्मान अपनी टुकड़ी के साथ पाकिस्तानी फौज को धकेलते जमींदोज करते नौसेरा से झांगर पोस्ट पहुंच चुके थे पोस्ट पर तिरंगा फहराने के दौरान 3 जुलाई 1948 के दिन एक तोप का गोला ब्रिगेडियर उस्मान के पास आकर फट गया !

अपने 36 वें जन्मदिन के 12 दिन पहले आजमगढ में पैदा हुआ ये शेर ब्रिगेडियर उस्मान ! जिन्ना को किये गये वादे को पूरा कर भारत मां की गोद में फनां हो कर सो गया । हिन्दुस्तान का प्रधानमंत्री उस शेर को कांधां देने जामिया मिल्लिया पहुंचा । और एक स्वर में हिन्दोस्तां ने कहा “महावीर चक्र” ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान – अमर रहे अमर रहे ।

आसान नहीं अफगानिस्तान के अच्छे दिन

पुष्परंजन

रूसी नेतृत्व को भ्रम था कि तालिबान उनके ताबेदार हो गये। तीन दिन पहले तालिबान द्वारा तबाही बरपाने वाले रुख को देखकर रूस और तुर्की ने उत्तरी अफगानिस्तान के मजारे शरीफ में अपने वाणिज्य दूतावास बंद कर दिये। कंधहार कौंसुलेट से भारतीय दूतावास के कूटनीतिक बुला लिये गये हैं. काबुल स्थित भारतीय दूतावास की चौकसी बढ़ा दी गयी है. पांच सीमावर्ती देशों ईरान, पाकिस्तान, चीन, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान की नींद उड़ चुकी है। क्या हो सकती है इसकी वजह?

सबसे अधिक बेचैनी में चीन है। वह तीन सवालों से रूबरू है। पहला, तालिबान लड़ाके ओबीओआर को यथावत रहने देंगे, दूसरा, तांबे के विशाल भंडार से खनन का कार्य अवरुद्ध तो नहीं कर देंगे, और तीसरा, शिन्चियांग की स्वायत्तता को लेकर तालिबान का कोई समूह मदद तो नहीं करेगा? यह तीनों विषय चीनी मीडिया में जेरे बहस है। चीन का मुंह पहले से जला हुआ है, इसलिए वह शीतल जल भी फूंक-फूंक कर पी रहा है। चीन फरवरी 1993 की घटना को याद रखता है, जब काबुल स्थित दूतावास पर रॉकेट से ताबड़तोड़ हमले हुए थे। इस घटना के तुरंत बाद चीन ने काबुल दूतावास स्थाई रूप से बंद कर दिया था। इसके तीन साल बाद1996 में तालिबान सत्ता में आए और 2001 तक राज किया। तालिबान शासन की समाप्ति के बाद 6 फरवरी 2002 को चीन ने दोबारा से काबुल में दूतावास खोला। धीरे-धीरे चीन ने अफगानिस्तान में पांव जमाना आरंभ किया । वन बेल्ट वन रोड (ओबीओआर) के बहाने चीन छह कॉरिडोर का निर्माण करना चाहता है। इनमें से दो, चीन-पाकिस्तान कॉरिडोर और सेंट्रल-वेस्ट एशिया कॉरिडोर इस इलाके में पेइचिंग के लिए प्राणवायु जैसे हैं।

अफगानिस्तान-चीन की सीमा 76 किलोमीटर लंबी है। इस सीमा का उत्तरी सिरा तेगरमांसू दर्रे को छूता है, और दक्षिण सिरा वाखजिर दर्रे को। इनके बीच वखान कॉरिडोर एक ऐसे त्रिकोण पर है, जो पाकिस्तान, चीन और ताजिकिस्तान की सीमाओं को छूता है। पाकिस्तान के काराकोरम मार्ग का यह उद्गम स्थल है। अफगानिस्तान का बदख्वशान प्रांत हिंदूकुश पर्वतमाला और आमू दरिया के बीच है। वखान कॉरिडोर चीन को मिडिल ईस्ट के देशों तक शार्ट कट से पहुंचाता है। इस रूट से मध्य-पूर्व की दूरी मात्र 3 हजार 700 किलोमीटर रह जाती है, वरना मलक्का जलडमरूमध्य की परिक्रमा करते हुए उसे 15 हजार 900 किलोमीटर की दूरी तय करनी होती है। यही कारण है कि चीन की महत्वाकांक्षी ‘ओबीओआर’ के लिए ‘सेंट्रल-वेस्ट एशिया कॉरिडोर’ सर्वाधिक अहम होता चला गया है।

कनेक्टिीविटी के अलावा दूसरा महत्वपूर्ण कारण शिन्चियांग की उईगुर आबादी है। उरूम्छी शिन्चियांग की राजधानी है, जहां आबादी का घनत्व सबसे अधिक है। जो लोग शिन्चियांग से बाहर निकलें, उन्होंने कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, किर्गिस्तान, तुर्की, सऊदी अरब, जार्डन, ऑस्ट्रेलिया, रूस, स्वीडेन जैसे देशों में उईगुर डायसपोरा को मजबूत किया। इन देशों से शिन्चियांग को स्वायत किए जाने की मांग निरंतर उठ रही है। चीन की चिंता यह रही है कि तालिबान ने सत्ता की बागडोर संभाल ली, तो उईगुर अलगाववाद को ताकत मिलनी शुरू हो जाएगी।

1996 से 2001 तक सत्ता में रहते तालिबान ने उईगुर युवाओं के वास्ते अफगानिस्तान व उससे लगे पाक सरहदों में कैंप खोले, उन्हें जिहादी बनाया। इनके पंख इतने फैले कि अल कायदा और आइसिस के मोर्चे तक पर कुछ उईगुर लड़ाकों को लोगों ने लड़ते देखा। 25 सितंबर 2018 को जकार्ता पोस्ट ने एक खबर दी थी कि एक करोड़ 40 लाख की आबादी वाले शिन्चियांग में 24 हजार 400 मस्जिद हैं, और उनकी देखरेख के लिए 29 हजार मौलाना तैनात हैं। समझिए कि इतनी मस्जिदें अमरीका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस को मिला दें, तो भी नहीं होंगी। इंडोनेशिया जहां 250 मिलियन मुस्लिम आबादी है, वहां आठ लाख मस्जिदें हैं। भारत में तीन लाख से अधिक एक्टिव मस्जिदें हैं, उसके मुकाबिल शिन्चियांग जैसे प्रांत में इतनी बड़ी संख्या में मस्जिदें हैरान करती हैं। चीन को शिन्चियांग से मक्का हज के लिए हर साल चार्टर विमान मुहैया करानी होती है, यह भी एक तथ्य है। शिन्चियांग की कुल आबादी में उईगुर 45 प्रतिशत और हान 40 प्रतिशत बताए जाते हैं।

2019 में 51 देशों के राजदूतों ने जेनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय को साझा पत्र लिखकर शिकायत की कि शिन्चियांग में चीन अल्पसंख्यक मुसलमानों पर सितम ढा रहा है। उनके मानवाधिकारों की रक्षा होनी चाहिए। यह दीगर है कि हस्ताक्षर करने वाले 51 कूटनीतिकों में से 28 ओआईसी (आर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन) सदस्य देशों के राजदूत थे। चीन हर हाल में उईगुर अलगाववाद को रोकना चाहता है, इसलिए तालिबान लीडरशिप उसकी मजबूरी बनती चली गई।
शिन्चियांग वर्षों से सुलगता रहा है, इस बात के लिए तारीख गवाह है। 5 जुलाई 2009 को शिन्चियांग की राजधानी उरूम्छी में लोग सरकार के दमन के विरुद्ध हिंसक हो उठे, जिसमें 197 प्रदर्शनकारी मारे गए और 1700 से अधिक घायल हुए थे।

25 फरवरी 1992 में उरूम्छी शहर से गुजरने वाली एक बस में विस्फोट हुआ, जिसमें नौ लोग मारे गए और 68 घायल हो गए। चीनी खुफिया तंत्र को शक हुआ कि इस कांड के पीछे कहीं न कहीं तालिबान के लोग शामिल रहे थे। इस तरह की हिंसक वारदातें समय-समय पर होती रही हैं । चीन दावा करता है कि अब तक 270 लोेगों की मौत के लिए तुर्किस्तान समर्थक अतिवादी जिम्मेदार हैं । 2002 से ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट (ईटीआईएम) अमरीका की आतंकी सूची में था, मगर 2020 आते-आते अमरीका ने इसे उस सूची से बाहर कर दिया। चीन ने आरोप लगाया कि ‘ईटीआईएम’ को सीआईए मदद दे रहा है। अमरीका चाहता है कि शिन्चियांग अशांत रहे।

शिन्चियांग में चीनी उत्पीड़न के विरुद्ध सबसे अधिक आवाज तुर्की ने उठाई थी। तुर्की में कोई 45 हजार उईगुर मुसलमान रहते हैं, इनके पूर्वज 1952 में तुर्की आए, जब इन्हें शरण देने की अनुमति अंकारा से मिली। नई पीढ़ी ने अब भी बेटी-रोटी का रिश्ता शिन्चियांग में रहने वाले मुस्लिम परिवारों से बनाए रखा है। तुर्की और उईगुर खान-पान, संस्कृति और भाषा के स्तर पर भी एक दूसरे से हमनवा हैं। शिन्चियांग स्वायत प्रदेश बने, उस वास्ते तुर्की ने बाकायदा अभियान छेड़ रखा था। 2009 में रिजेब तैयप एर्दोआन ने बयान दिया था कि शिन्चियांग में चीन, उईगुर मुसलमानों का नरसंहार कर रहा है। ऐसे बयानों से पेइचिंग और अंकारा के बीच तनातनी बनी रहती थी। शिन्चियांग का नाम बदलकर ‘पूर्वी तुर्किस्तान’ रखा जाए, इसका भी अहद अलगाववादियों ने किया था। तुर्किस्तान इस्लामिक पार्टी (टीआईपी), तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट (टीआईएम), ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट (ईटीआईएम) जैसे संगठन को नैतिक और आर्थिक समर्थन अंकारा दे रहा था। फिर शी ने ऐसा क्या सुंघाया कि एर्दोआन बदल गए?

2017 में कोई 200 उईगुर शरणार्थियों को एर्दोआन ने मिस्र के रास्ते चीन के हवाले किया। फिर यह सिलसिला रुका नहीं। फरवरी 2019 में तुर्की के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी किया कि शिन्चियांग क्षेत्र में उईगुर व अन्य मुसलमानों के साथ किसी तरह की जोर-जबर्दस्ती नहीं हो रही है। जो मुस्लिम यहां रह रहे हैं, एकदम खुशहाल हैं। यह वाकई हैरान कर देने वाला बयान था। मगर इससे भी अधिक धोखा और फरेब तब महसूस हुआ, जब तुर्की और चीन के बीच 26 दिसंबर 2020 में प्रत्यर्पण संधि पर मुहर लगी। इसकी पटकथा कई महीनों से लिखी जा रही थी। सारा कुछ तभी तय हो चुका था, जब तुर्की के राष्ट्रपति रेजेब तैयप एर्दोआन 2 जुलाई 2019 को पेइचिंग में थे। वह एक ऐसे ग्रेट गेम का हिस्सा बन चुके थे, जो अब अंकारा से स्थानांतरित होकर काबुल पहुंच चुका है। तुर्की से सैकड़ों उईगुर लोकतंत्रकामी चीन के हवाले किए जा चुके हैं । अफगानिस्तान और पाकिस्तान ने भी ऐसा ही किया। ओआईसी के देशों को यह क्यों नहीं दिखता?

आज की तारीख में चीन रूस के बाद दूसरा देश है जो तुर्की को माल निर्यात कर रहा है। 2016 से 2019 के बीच चीन ने तीन अरब डॉलर तुर्की में निवेश किए। इस्तांबुल के कुम्पोर्ट में तुर्की का तीसरा सबसे बड़ा कन्टेनर टर्मिनल चीनी सहयोग से बना है। इस्तांबुल में ही एशिया और यूरोप को जोड़ने वाला यावुज सुल्तान सेलिम ब्रिज का मेंटेनेंस ठेका इटली से छीन कर चीन के हवाले कर दिया गया। चीन इस समय तुर्की के नाभिकीय ऊर्जा से लेकर हथियार निर्माण के क्षेत्र में सहकार बना हुआ है। मगर अब असल खेल अफगानिस्तान में होना है। चीन तालिबान के साथ सेफ गेम खेल रहा है। तालिबान नेता जिस तरह लगातार पेइचिंग के संपर्क में रहे, चीन को भरोसा है कि शिन्चियांग में छेड़छाड़ नहीं होगी, आयनक माइंस से तांबा अयस्क के खनन में भी कोई बाधा नहीं पहुंचेगी। मगर, मामला फंसना है तुर्की के साथ।

ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट के नेताओं के साथ राष्ट्रपति एर्दोआन ने छल किया, उससे तालिबान का बड़ा खेमा उन्हें शक की निगाह से देख रहा है। तालिबान का एक बड़ा धड़ा अफगानिस्तान में तुर्की द्वारा सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने के पक्ष में नहीं दिखता। तीन दिन पहले तालिबान द्वारा तबाही बरपाने वाले रुख को देखकर रूस और तुर्की ने उत्तरी अफगानिस्तान के मजारे शरीफ में अपने वाणिज्य दूतावास बंद कर दिए । कोई एक हजार अफगान फोर्स के जवानों ने ताजिकिस्तान सीमा में भागकर शरण लिया है। रूसी नेतृत्व को भ्रम था कि तालिबान उनके ताबेदार हो गऐ। यह भ्रम बहुत जल्द टूट गया। एस. जयशंकर मास्को में इसी चिंता से रूबरू हो रहे थे। आगे की रणनीति भी भारतीय विदेश मंत्री मास्को से शेयर कर आए।

तालिबान को जब किसी पर ऐतबार नहीं, तो तुर्की क्या खाक अफगानिस्तान को महफूज रखेगा? राष्ट्रपति रेजेब तैयप एर्दोआन का ‘मिशन अफगानिस्तान’ फ्लॉप शो बनकर न रह जाए इसका अंदेशा मुझे बिल्कुल है। तुर्की ने स्वयं यह प्रस्ताव दिया था कि अमरीकी फोर्स के जाने के बाद काबुल स्थित हामिद करजई इंटरनेशनल एयरपोर्ट की चौकसी हम कर सकते हैं। एर्दोआन ने पाकिस्तान और हंगरी की मदद लेने की पेशकश की है । पांच किलोमीटर की परिधि में बने इस एयरपोर्ट के गिर्द कई सारे मिलिट्री बेस हैं, जिनकी सुरक्षा में नाटो फोर्स, अमरीकी सेना, इंटरनेशनल सिक्योरिटी असिस्टेंट फोर्स, अफगान एयरफोर्स के जवान लगे हुए थे। काबुल से 70 किलोमीटर दूर बगराम एयरफील्ड कभी भी तालिबान लड़ाकों के कब्जे में आ सकता है।

कुल मिलाकर अफगानिस्तान एक बार फिर सामरिक रूप से संवेदनशील हो चुका है। इसे लेकर पहली चिंता पांच सीमावर्ती देशों को होने लगी है। ईरान, पाकिस्तान, चीन, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान की नींद उड़ चुकी है। चैन से भारत भी नहीं सो सकता। कंधहार कौंसुलेट से भारतीय दूतावास के कूटनीतिक बुला लिये गये हैं. काबुल स्थित भारतीय दूतावास की चौकसी बढ़ा दी गयी है. अफगानिस्तान को हमने भी थोड़ा-बहुत संवारा है, और भारतीय मूल के लोग भी वहां हैं।

लेखक पुष्प रंजन ईयू-एशिया न्यूज के नई दिल्ली संपादक हैं।

आकाशीय बिजली की चपेट में आने से कैसे बचें, पढ़ें ये लेख

Tara Shanker 

भारत में हर साल क़रीब 2.5 से 3 हज़ार लोग आकाशीय बिजली की चपेट में आकर मरते हैं! जिसमें से अधिकांश मध्य प्रदेश, झारखण्ड, यूपी, उड़ीसा, बिहार, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल में होते हैं! आइये जानते हैं इससे कैसे बचें:

1. गरज-चमक के साथ होने वाली बारिश यथासंभव खुले मैदान में न रहें क्योंकि ऊपर से आती बिजली ज़मीन की सबसे ऊँची चीज़ पर आकर्षित होकर गिरती है! जैसे बड़े वृक्ष, बिजली के खंभे, पहाड़ी, ऊँची बिल्डिंग! बिजली अपने गिरने की जगह से 100 फुट की दूरी तक घातक हो सकती है!

2. जब बिजली कड़क रही हो तो किसी वृक्ष के नीचे बारिश से बचने के लिए शरण न लें, बिजली के खंभे के नीचे न खड़े हों! अभी परसों ही जयपुर में 4 लोग बारिश से बचने के लिए एक पेड़ के नीचे खड़े थे, चारों लोग मारे गये बिजली से और 9 लोग ऊँचे वाच टावर पर मारे गये! क्योंकि बिजली को Earthing आकर्षित करती है! गाँव में कहावत है कि बिजली दुधारू वृक्षों पर ज्यादा गिरती है जैसे बरगद, पीपल! असल में ये बात इस तरह सही है क्योंकि बरगद और पीपल दोनों विशाल और ऊँचे वृक्ष होते हैं!

3. अगर आप खेत में काम कर रहे हों तथा आस-पास घर न हो तो जहाँ हैं वहीं उकड़ू बैठ जाएँ पैर सटाकर! खड़े बिल्कुल भी न रहें और न ही लेटें और न ही किसी पेड़ के नीचे छिपें! अगर अपने आस-पास आप ही सबसे ऊँचे हैं तो बिजली आप पर ही गिरेगी इसलिए अपनी ऊँचाई कम करिए!

4. अपनी कार से जा रहे हैं और बिजली कड़कने लगे तो कार के अंदर ही दरवाज़े बंद करके बैठे रहें! क्योंकि बिजली कार पर गिरेगी तो उसकी ऊपरी सतह से होते हुए सीधे ज़मीन में चली जाएगी, कार के अंदर नहीं जाएगी! धारा प्रवाह का नियम है कि वो किसी मेटल की खोखली वस्तु की ऊपरी सतह पर ही प्रवाहित होती है, उसके भीतर नहीं! कोशिश करें कार रोक कर शीशे बंद करके अंदर ही बैठे रहें! ध्यान रहे कि खुली गाड़ी आपको बिजली से बचा नहीं सकती! गाड़ी हो तो बंद हो वर्ना खुली गाड़ी से उतर कर ज़मीन पर पैर सटाकर उकडू बैठ जाएँ!

5. साइकिल या मोटरसाइकिल से जा रहे हों तो उतर कर उकड़ू बैठ जाएँ साइकिल/मोटरसाइकिल से दूर! बिजली मेटल से ज़्यादा आकर्षित होती है! इस भ्रम में न रहे कि रबर या प्लास्टिक के जूते चप्पल आपको आकाशीय बिजली से बचा लेंगे!

6. छाता है तो उसे न खोलें! छाता भी बिजली को आकर्षित कर सकता है!

 

7. जब तक बिजली कडकना बंद न हो जाए तब तक घर के अन्दर रहें!

8. घर के सारे बिजली के स्विच बंद कर दीजिये! टीवी, बल्ब, और कुछ एप्लायंसेज ख़राब हो सकते हैं! इस दौरान शावर न लें, सारे बिजली के एप्लायंसेज बंद रखें! मेटल के नल से दूर रहें!

9. इस दौरान स्विमिंग न करें चाहे वो आउटडोर हो या इंडोर! अगर पूल, नदी, झील में हों तो तुरंत बाहर निकल कर घर में आ जायें या आने का मौका न हो तो निकलकर उकडूं बैठ जायें!

10. जंगल में हों तो छोटी झाड़ियों के पास आ जायें अथवा बड़े वृक्ष ही सब हों तो उससे थोड़ी दूर जाकर बैठ जायें!

11. बारिश में नहाने का अपना आनंद है लेकिन जब बिजली कड़क रही हो तो ये आनंद न लें! बाहर नहाने न निकलें!

12. याद रखें अगर आप खुले में हैं तो अपने आस-पास सबसे ऊँची चीज़ बनने से बचें! ऊपर से गिरती बिजली को जो सबसे पहले मिलेगा, उसी पर गिरेगी! और इस दौरान मेटल (या पानी) की किसी भी चीज़ के डायरेक्ट संपर्क से बचें! बिजली के कुचालक और सुचालक आपको मालूम ही होंगे!

संविधान सभा में हरि विष्णु कामथ का भाषण

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Kanak Tiwari 

कामथ ने उन भारतीय बुद्धिजीवियों की खिल्ली उड़ाई जो आज़ाद भारत की रचनात्मक बुनियाद में विदेशों से आयातित मूल्यों के प्रति अपनी नतमस्तकता का बौद्धिक आडम्बर में डूबकर प्रचार करते रहे। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ में भारतीय प्रतिनिधि श्रीमती विजय लक्ष्मी पण्डित के उस कथन का भी प्रतिवाद किया जिसके अनुसार श्रीमती पण्डित ने संयुक्त राष्ट्र संघ के सम्मेलन में गौरवान्वित होकर यह कहा था कि भारत स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आदर्शों को फ्रांस से ग्रहण कर कृतज्ञ है। उन्होंने नये भारत के निर्माण की पृष्ठभूमि में सुविकसित भारतीय मूल्यों की पुष्टि का अहसास तक नहीं कराया।

कामथ ने कहा कि अम्बेडकर आभिजात्य शहरी भद्रपुरुषों की नकचढ़ी वृत्ति के प्रतीक हैं । यदि इस तरह के दृष्टिकोण से भारत के संविधान की रचना की गई तो इस देश का भगवान ही मालिक है । उन्होंने कहा कि गांधी ने पंचायत राज के आखिरी मंत्र के द्वारा इस देश की नई तवारीख लिखने का आह्वान हमसे किया है। कामथ ने आरोप लगाया कि संविधान लिखने की उपसमिति के सभी सदस्यों के कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के अपवाद को छोड़कर भारतीय आज़ादी के सिपाही नहीं रहने के कारण उनकी आत्मा में देश के लिए वह गरमी ही नहीं रही है, जिस ऊष्मा ने गांधी का रूप धारण कर पूरे देश को अभिभूत किया है।

कामथ ने अपने भाषण में अम्बेडकर से असहमति का इज़हार किया। उन्होंने कहाः ‘‘मेरे विचार से उन्होंने यह कहने में गौरव समझा कि इस विधान में बहुत कुछ भारत शासन अधिनियम से लिया गया है और यथेष्ट मात्रा में ब्रिटेन, अमरीका, आस्ट्रेलिया के विधानों और कदाचित् कनाडा के विधान में से भी लिया गया है। मैं उनसे यह आशा करता था कि वे हमें यह बताते कि हमारे राजनैतिक अतीत से भारतीय जनता की अपूर्व राजनैतिक तथा आध्यात्मिक प्रतिभा से क्या लिया गया है। इस बारे में सम्पूर्ण भाषण में एक भी शब्द नहीं था।…..एक बात में मैं डाक्टर अम्बेडकर का विरोध करता हूं। उन्होंने गांवों का उल्लेख ‘‘स्थानीयता की गंदी नालियां तथा अज्ञानता, विचार संकीर्णता और साम्प्रदायिकता की कन्दराओं‘‘ के रूप में किया है और ग्रामीण जनता के लिए हमारे करुण विश्वास का श्रेय किसी मेटकाफ नाम के व्यक्ति को दिया है।. मैं यह कहूंगा कि यह श्रेय मेटकाफ को नहीं है, वरन् उससे कहीं ज्यादा उस महान व्यक्ति को है जिसने अभी हमें हाल ही में स्वतंत्र कराया है। गांवों के लिये जो प्रेम हमारे हृदय में लहरा रहा है, वह तो हमारे पथप्रदर्शक तथा राष्ट्रपिता के कारण पैदा हुआ था। उन्हीं के कारण ग्राम जनतन्त्र में तथा अपनी देहाती जनता में हमारा विश्वास बढ़ा और हमने अपने सम्पूर्ण हृदय से उसका पोषण किया। यह महात्मा गांधी के कारण है। यह आपके कारण है और यह सरदार पटेल, पंडित नेहरू और नेताजी बोस के कारण है कि हम अपने देहाती भाइयों को प्यार करने लगे हैं।‘‘

 

उजियारपुर विधानसभा क्षेत्र में कोरोना वैक्सीन जागरूकता के लिए युवाशक्ति बिहार ने चलाया अभियान

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कोरोना वैक्सीन जागरूकता के लिए युवाशक्ति बिहार ने चलाया अभियान, उजियारपुर विधानसभा क्षेत्र के विभिन्न पंचायत में लोगों को किया जागरूक।

 

समस्तिपुर/उजियारपुर : कोरोना महामारी के दौरान युवा शक्ति बिहार संगठन ने लगातार उजियारपुर विधानसभा क्षेत्र में कार्य कर रही है, जिसमें उसने विभिन्न मुहिमों द्वारा जनप्रातिनिधि की जवाबदेही तय की। इस क्रम में दिनांक 13 जुलाई 2021 को उजियारपुर के विभिन्न पंचायत् में घूम घूम कर युवा शक्ति से युवक और युवतियों ने लोगों को वैक्सीन लेने के लिए प्रेरित किया।


उजियारपुर ब्लॉक के प्रधान लिपिक पदाधिकारी चंद्रकांत कर्ण ने हरी झंडी दिखा कर युवा शक्ति के सदस्यों को रवाना किया, इन लोगों ने रायपुर और निकशपुर पंचायत में घूम घूम कर लोगों को जागरुक किया, साथ ही पाँच हज़ार पर्चा भी बाँटा जिसमें वैक्सीन क्यूँ लें; ये बताया गया था।

उजियारपुर ब्लॉक के प्रधान लिपिक पदाधिकारी चंद्रकांत कर्ण ने मीडिया से बात करते हुवे युवा शक्ति के काम की तारीफ़ करते हुवे कहा के युवा शक्ति से जुड़े युवा अपना समय निकाल कर समाज के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण विषय पर कार्य कर रहे है, प्रशासन का भी पूरा सहयोग है। साथ ही उन्होंने बताया के प्रशासन भी अपने लेवल पर टीकाकरण जागरूकता कैंपेंन चला रही है।

 

युवा शक्ति से जुड़ी सरिता कुमारी ने मीडिया से बात करते हुए कहा के युवा शक्ति 5000 युवाओं का संगठन है, जिसने पिछले माह ‘जवाब दो’ नामक मुहिम चलाई थी, जिसके तहत लोकल विधायक और सांसद से पीएचसी में ऑक्सिजन बेड और सबको वैक्सीन मिले; इसकी माँग रखी थी। उसी क्रम हुवे सर्वे में एक बात सामने आई थी के लोगों में वैक्सीन को लेकर बहुत डर है, उसी डर को कम करने के लिए युवा शक्ति ने जागरूकता अभियान चलाया है।

उन्होंने आगे बताया की ये अभियान अभी उजियारपुर के विभिन्न पंचायत में हफ़्ते भर तक चलेगा, ताके अधिक से अधिक लोगों को जागरुक किया जा सके; और जल्द से जल्द भारत से कोरोना को जड़ से ख़त्म किया जा सके।


इस मौक़े पर उजियारपुर के विभिन्न पंचायत से युवाशक्ति के पंचायत लीडर मौजूद थे। जिनके अनामिका, बिट्टू, पंकज, प्रियंका, अनुपम, पूनम, अबु क़ैस, सूरजीत कु, संजीत, कंचन, काजल, जानकी पिंकी आदि मौजूद थी। लोगों में काफ़ी उत्साह देखा गया।

ज्ञात रहे कि युवा शक्ति के कैडर ने विधानसभा के विभिन्न पंचायत में सर्वे किया था; जिसमें लोगों में जागरूकता की कमी के साथ वैक्सीन को लेकर डर साफ़ तौर पर देखने को मिली। साथ ही कोविड टेस्ट भी काफ़ी धीमी गति से हो रही है। ऑक्सिजन की भी भारी कमी देखने को मिल रही थी। इन तमाम चीज़ को नज़र में रख कर युवा शक्ति ने ‘जवाब दो’ नामक कैम्पेन शुरू किया था, जिससे जनप्रतिनिधि की जवाबदेही तय किया जाए। इसके लिए हर पंचायत में युवा शक्ति ने सर्वे किया; और जो फ़ाइंडिंग आई उसे कॉल और पोस्ट कार्ड के ज़रिये जनप्रतिनिधि यानी सांसद और विधायक को बताया गया। और इस सिलसिले में युवा शक्ति टीम विधायक से मिल कर अपनी माँग रखी थी।

ઈસ્લામ અને મુસલમાન (ગેરસમજો અને પૂર્વગ્રહો)

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Hidayat Parmar

ઇસ્લામોફોબીયા એ નફરતી ગુનાઓના ઉદભવ તરફ દોરી જવું એ કોઈ નવી ઘટના નથી.વર્તમાનમાં ‘ઇસ્લામોફોબિયા’ દિવસે દિવસે વધતો જોઈ શકાય છે.ઇસ્લામ વિરુદ્ધ જેટલો દુષ્પ્રચાર કરવામાં આવી રહ્યો છે તેનાથી સહું સારી રીતે વાકેફ છે એનું કારણ માત્ર ઇસ્લામ વિષે જાણકારી યા અભ્યાસ નો અભાવ દેખાય છે.વધુમાં વોટ્સએપ યુનિવર્સિટી,ફોર્વર્ડેડ મેસેજ અને આધાર પુરાવા વગર ક્રોસ ચેક કર્યા વગરના મેસેજો,એવો દુષ્પ્રચાર કરવામાં આવે છે કે ઇસ્લામ તલવારના જોરથી ફેલાયો છે.જો આવું હોત તો સંસારમાં અનેક ધર્મ હોવા છતાં,છેલ્લે આવેલ ધર્મ હોવા છતાં આ રીતે લોકોએ અપનાવ્યો ન હોત.ઈસ્લામનો અર્થ જ થાય છે ‘માનવ કલ્યાણ’. એક તથ્ય એ પણ છે કે આરબ મુસલમાનોને હરાવનારા બિનમુસ્લિમ તાતારીયોએ જીત મેળવ્યા પછી પણ હારેલા આરબોના ધર્મ ઈસ્લામને સ્વીકાર્યો હતો.જો તલવારની વાત હોત તો જીતેલા શા માટે એ ધર્મ અંગીકાર કરતા.!! ઈસ્લામમાં સમાનતાના ભાવને ખૂબ જ મહત્વ આપવામાં આવ્યું છે.મહિલાને વારસામાં અધિકાર પણ એ ઇસ્લામ પ્રેરિત છે.ઇસ્લામની સાચી રીતે જાણવા માટે જરૂરી જ્ઞાન અને શિક્ષણ પ્રાપ્ત કરવાની ફરજચૂકના કારણે મુસલમાનોની સાથે અન્ય તમામ ઇસ્લામના આચાર -વિચાર અને જીવનપદ્ધતિ સમજવામાં ક્યાંક ઉણા ઉતર્યા છે.જેના પરિણામે દેશબંધુઓમાં ઇસ્લામ અને મુસલમાનો વિશે ગેરસમજ ઊભી થવી સહજ અને સરળ બની ગયું છે.

ભારત – મિશ્રિત સમાજ ધરાવતો દેશ :

એક વાસ્તવિકતા એ છે કે બંધારણની દષ્ટિએ ભારત એક ધર્મનિરપેક્ષ દેશ છે, જ્યાં તમામ ધર્મો, સંપ્રદાયો અને સંસ્કૃતિઓ સાથે સમાન વ્યવહાર કરવાની બાંહેધરી આપવામાં આવી છે. અહીં શાસન તરફથી કોઈ વિશેષ ધર્મ કે સંપ્રદાયને માન્યતા પ્રાપ્ત નથી અને કોઈના કોઈની સાપેક્ષમાં કે તુલનામાં વિશેષ અધિકારો નથી.

બીજી વાસ્તવિકતા એ છે કે ભારત એક મિશ્રિત સમાજ ધરાવતો દેશ છે.અહીં અનેક ધર્મો અને સભ્યતાઓ અસ્તિત્વ ધરાવે છે. અહીં સદીઓથી વિવિધ ધર્મો અને સંપ્રદાયોના લોકો પોત-પોતાની આસ્થા અને જીવનશૈલી અનુસાર જીવન વિતાવે છે. આ એક એવો દેશ છે જયાં વેદ, મહાભારત, રામાયણ, ગીતા જેવા ધર્મગ્રંથો ઉપર આસ્થા રાખવાવાળા લોકો વસે છે. આ જ ધરતી ઉપર મહાવીર સ્વામીએ જૈન ધર્મ અને ગૌતમ બુદ્ધે બૌદ્ધ ધર્મની બુનિયાદ નાખી, ગુરુ નાનકે શિખ સંપ્રદાયની સ્થાપના કરી. અહીં ઇસાઈઓ અને પારસીઓ પણ વસે છે તથા ઇસ્લામ ધર્મના અનુયાયી-મુસલમાનો પણ સદીઓથી પોતાનું જીવન અહીં વિતાવી રહ્યા છે. કેટલાક લોકો એવાં પણ છે, જેઓ કોઈ પણ ધર્મમાં વિશ્વાસ ધરાવતા નથી.

આરોપો અને ગેરસમજોના કારણો :

બિનમુસ્લિમો તરફથી ઇસ્લામ અને મુસલમાનો ઉપર વિવિધ બાબતે આરોપો મૂકવામાં આવે છે. તેનું કારણ એક તો એ છે કે ઇસ્લામનો સાચો પરિચય તેમના સુધી
પહોંચી શક્યો નથી અને બીજું , તેમણે પણ પ્રમાણિકતાથી ઇસ્લામને સાચી રીતે જાણવા-સમજવાનો પ્રયત્ન કર્યો નથી. તેઓ મોટાભાગે એ જ માહિતીને સાચી માની લે છે, જે માધ્યમોમાં પ્રસિદ્ધ થતી રહે છે કે પછી અપ્રત્યક્ષ સાધનોથી ઉપલબ્ધ થાય છે. અબૂ ઈમામુદ્દીન રામનગરી (બનારસ) પોતાના પુસ્તક “ઇસ્લામ એક પરિચય’માં લખે છે કે,

“વિજેતા પક્ષ પ્રત્યે પરાજિત પક્ષમાં સ્વાભાવિક રૂપે જે કડવાશ અને ઘૃણા ઉત્પન્ન થતી હોય છે, તે મુસલમાનો પ્રત્યે દેશવાસીઓમાં ઉત્પન્ન થઈ. તેનું પ્રાયશ્ચિત
માત્ર એ રીતે સંભવ હતું કે મુસલમાનો શુદ્ધ રૂપે ઇસ્લામી જીવન વ્યતીત કરતા અને દેશવાસીઓને એ જોવાનો-અનુભવવાનો અવસર મળતો કે ઇસ્લામી જીવન માનવજાતિ માટે કેટલું સુખદાયી, કેટલું કલ્યાણકારી અને કેટલું મંગળકારી હોય છે, પરંતુ આવું થયું નહીં. તેનું પરિણામ એ આવ્યું કે દેશબંધુઓમાં મુસલમાનો પ્રત્યે જે કડવાશ અને ઘૃણા હતી , તેનાથી ઇસ્લામ પ્રત્યે તેમના ભ્રમને ખુબ વધુ દ્રઢ બનાવી દીધો. દુઃખદ બાબત એ છે કે મુસલમાનોનું વર્તમાન જીવન પણ ઇસ્લામ અનુસાર નથી. જયારે કે મુસલમાનો સ્વયં પોતાના વ્યવહારિક જીવનથી ઇસ્લામ પ્રત્યે દ્વેષ અને ભ્રમનું સર્જન કરી રહ્યા હોય તો માત્ર વાતોનું કંઈ વિશેષ મૂલ્ય રહી જતું નથી, મૂલ્ય તો એ જ વાતોનું હોય છે, જેની પુષ્ટિ વ્યવહાર અને કર્મથી થઈ રહી હોય…”

ઈતિહાસ-લેખન અને તેની પ્રસ્તુતિ સંદર્ભે આગળ લખે છે,

“ઇસ્લામ વિશે વિભિન્ન પ્રકારની ભ્રમણાઓ ફેલાયેલી છે અને તેનાં કારણો અનેક છે. તેમાંથી એક કારણ બહારથી ભારતમાં આવનારાં મુસલમાનોનો ઇતિહાસ છે, જે સ્વયં પણ ઇસ્લામ સંબંધે ભ્રમયુક્ત છે અને તે જે કંઈ પણ છે, તેનાથી અધિક ઇસ્લામ વિરોધી વિદ્વાનો અને ઇતિહાસકારોએ તેને ઇસ્લામ વિરુદ્ધ બનાવી દીધો છે.”

બિનમુસ્લિમો ઈસ્લામથી અજાણ :

ભારતમાં મુસલમાનો એક હજાર વર્ષો ઉપરાંતથી વસી રહ્યા છે અને બિનમુસ્લિમોના સાથે તેમની મિશ્ર આબાદીઓ છે. તે ઉપરાંત વેપાર-વાણિજય , લેણ-દેણ અને અન્ય મામલાઓમાં ડગલે ને પગલે એકબીજાથી સંપર્કમાં રહે છે. તેમ છતાં એ હકીકત છે કે તેમના વચ્ચે એક મજબૂત દીવાલ ઊભી છે. ન તો મુસલમાનોને પોતાના દેશબંધુઓના રીત-રિવાજો, આસ્થાઓ , ઇતિહાસ અને પરંપરાઓ તેમજ અન્ય ધાર્મિક બાબતોનું જ્ઞાન છે અને ન બિનમુસ્લિમોને મુસલમાનોની આસ્થાઓ અને માન્યતાઓ,બંદગી અને ઉપાસનાની પદ્ધતિઓ , ધાર્મિક મહત્ત્વ ધરાવતી ઓળખો અને ઇસ્લામના પાયાના શિક્ષણની સાચી માહિતી છે. આ અપરિચિતતા અને અજનબીપણું તેમનામાં ઇસ્લામ અને મુસલમાનો સંબંધે વિભિન્ન પ્રકારની શંકાઓ અને ગેરસમજો ઊભી કરે છે,જે તેમના મનમાં વ્યગ્રતા અને મૂંઝવણ પેદા કરે છે. જેમ કે મુસલમાનો હઝરત મુહમ્મદ સલ્લ.ના ઈશદૂતત્વ ઉપર આસ્થા ધરાવે છે, જે તેમની આસ્થાનો એક ભાગ છે. દિવસ-રાત તેઓ આ નામનું રટણ કરે છે. તે જ રીતે મુસલમાનો દર વર્ષે સાઉદી અરબમાં આવેલ મક્કામાં હજયાત્રાએ જાય છે. ઇસ્લામની બુનિયાદી આસ્થાઓ અને હજયાત્રાના ઇતિહાસથી અનભિજ્ઞતાના કારણે બિનમુસ્લિમોના મનમાં એ સંદેહ ઊભો થાય છે કે મુસલમાનો પોતાના વતનના પૂર્વજો અને જન્મભૂમિથી પ્રેમ નથી કરતાં, બલ્કે તેમનો સંબંધ બીજા દેશની ધરતી અને ત્યાંના પૂર્વજોથી છે. મુસલમાનો દિવસ-રાતમા પાંચ વખત નમાઝ પઢે છે. પરંતુ બિનમુસ્લિમો મસ્જિદો અને તેમાં પઢાતી નમાઝથી પણ અજાણ હોય છે. તેમાં દોષ બિનમુસ્લિમો કરતાં મુસલમાનોનો વધુ છે.

ઇસ્લામ અને મુસલમાનો વિરુદ્ધ પ્રચાર :

ઇસ્લામ અને મુસલમાનો વિરુદ્ધ ષડયંત્રો, શંકા-કુશંકાઓ અને ગેરસમજો ફેલાવવાનો સિલસિલો વૈશ્ચિક અને રાષ્ટ્રીય સ્તરે આમ તો ઘણાં વર્ષોથી ચાલુ જ હતો,પણ છેલ્લા બે-ત્રણ દસકાઓથી તેમાં ખૂબ વધારો જોવા મળ્યો છે. આંતરરાષ્ટ્રીય રાજકારણમાં મોટાં પરિવર્તનો તેનું કારણ હોઈ શકે છે. અહીં આપણા દેશમાં પણ એક વિશેષ જૂથની ઇસ્લામ અને મુસ્લિમ દુશ્મની ખૂબ સ્પષ્ટ અને ઘણી જૂની છે. આવી નકારાત્મક કોશિશોથી ચોક્કસપણે મુસલમાનોને તો નુકસાન પહોંચ્યું જ છે, પણ તેના કારણે ભારત જેવા બહુલ-સંસ્કૃતિ ધરાવતા અને સૌથી મોટાં ધર્મનિરપેક્ષ પ્રજાતાંત્રિક દેશની છબીને મોટું નુકસાન થયું છે તથા તેના વિકાસની ગતિ પણ અવરોધાઈ છે. આ પરિસ્થિતિનું વિશ્લેષણ થવું જોઈએ.

ઇસ્લામ અને મુસલમાનો વિરુદ્ધ પ્રચાર કરીને સંચાર માધ્યમોએ ગેરસમજો ફેલાવવામાં મોટી ભૂમિકા નિભાવી છે. આ નકારાત્મક પ્રચારમાં છેલ્લા કેટલાક વર્ષોમાં ખૂબ તેજી આવી છે. વિવિધ પ્રકારની સામાજિક-રાજકીય ઘટનાઓને બુનિયાદ બનાવીને
ઇસ્લામ ઉપર પાયાવિ[હિન આરોપો મૂકવાએ તેમનું હંમેશાનું અભિયાન બની ગયું છે.તેમની રીત એ છે કે જૂઠને એટલી બધી વાર દોહરાવવું કે લોકો તેને સાચું માનવા લાગે.

કેટલાક ઉદાહરણો :

આવા નકારાત્મક પ્રચારના ઉદાહરણો દરરોજ સમાચારપત્રો અને માધ્યમોની શોભા બનતા રહ્યા છે. જેમ કે ઇસ્લામમાં “જિહાદ’નો અર્થ ઈશ્વરના માર્ગમાં સચ્ચાઈની સ્થાપના માટે સતત સંઘર્ષ થાય છે અને તેના આદેશો વિશેષ પશ્ચાદભૂમિ ધરાવે છે તેમજ તેની અનિવાર્યતા કેટલીક ખાસ શરતોનો તકાદો કરે છે. પણ પ્રચાર-પ્રસારની શક્તિથી તેને એટલું ભયાનક બનાવીને રજૂ કરવામાં આવ છે કે ‘જિહાદ’નો શબ્દ સાંભળતાં જ લોકોમાં ભય વ્યાપી જાય છે. ઇસ્લામને એવો લોહી તરસ્યો ધર્મ બનાવીને પ્રસ્‍તુત કરવામાં આવે છે કે એવું લાગે કે તે પરધર્મીઓનો જીવવાનો અધિકાર પણ છીનવી લે છે. જ્યારે કે ઇસ્લામમાં કોઈ એક વ્યક્તિને મારી નાખવું એ સમસ્ત માનવતાની હત્યા કરવા બરાબર છે. તે જ રીતે ઇસ્લામે મહિલાઓને જે અધિકારો અને આદર-માન આપ્યા છે, તે ધર્મો અને વિચારધારાઓના ઈતિહાસમાં બેનમૂન છે. ઇસ્લામે સ્રી અને પુરુષના જીવન-કાર્યોને ખૂબીથી વહેચી દીધા છે, જેથી સાંસારિક જીવન સુખ-ચેનથી ચાલે. તે માટે તેણે સ્રીના જીવન-નિર્વાહ માટે પુરુષને જવાબદાર બનાવ્યો અને સ્રીને ધરની જવાબદારી સોંપી. સ્રીને ઘર અને બજાર, એમ એકી સાથે બેજવાબદારીઓથી બચાવી , પણ આરોપ એ મૂકવામાં આવ્યો કે સ્રીને ઘરની ચાર દીવાલોમાં કેદ કરી દેવામાં આવી છે. ઇસ્લામે શરતોને આધિન ચાર પત્નીઓ કરવાની પરવાનગી આપી છે, એટલું જ નહિં, વિવાહના પવિત્ર બંધનને શરતોને આધીન અને અનેકથી ચાર સુધી મર્યાદિત કરીને તેને કાયદેસરતા બક્ષી છે. તેને પણ એ રીતે રજૂ કરવામાં આવે છે કે જાણે ઇસ્લામે ચાર પત્નીઓ કરવાની તાકીદ કરી હોય અને પ્રત્યેક મુસ્લિમ અનિવાર્યપણે ચાર પત્નીઓ કરે ! સાચી વાત તો એ છે કે સર્વેક્ષણો મુજબ બહુપત્નીત્વનું પ્રમાણ મુસલમાનો કરતાં અન્ય ધર્મો અને સંપ્રદાયોમાં વધુ છે. તે ઉપરાંત ગેરકાયદેસર સંબંધોની યાદી તો તેનાથી ઘણી લાંબી છે.

ટૂંકમાં ઇસ્લામ માતા પિતા-સગા વહાલા સાથે સદ્-વર્તન,પડોસીના અધિકારો, સામાજિક સંબંધોમાં સહિષ્ણુતા,ગરીબો અને નિર્ધનોને નાણાંકીય મદદ, ભેટ-સોંગાદોની આપ લે,આદર-માન અને સન્માન,પરસ્પર લેણદેણ અને વ્યવહાર,ગરીબો-શોષિતો-વંચિતોની મદદની સાથે માનવ કલ્યાણનો મજબૂત ઉપદેશની સાથે આ બધી બાબતોને અમલીકરણ કરવાની શીખ આપે છે.

સંદર્ભ : ઈસ્લામ અને મુસલમાન (ગેરસમજો અને પૂર્વગ્રહોનું નિવારણ)

तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय स्थापना दिवस (12 जुलाई) पर विशेष!

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Ravishankar Kumar Chaudhary 

डॉ रामधारी सिंह दिनकर 10 जनवरी, 1963 से 3 मई, 1965 तक भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति थे। अपने कुलपति काल मे ज़िला हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सचिव डॉ विष्णु किशोर झा ‘बेचन‘ और चित्रशाला स्टुडियो के संचालक तथा साहित्यनुरागी हरि लाल कुंज के निमंत्रण पर वे 25 अक्तूबर, 1964 को चित्रशाला स्टुडियो में एकल काव्य पाठ करने आए थे। उस मौके पर बंगला के प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ.बलाइ चन्द्र मुखर्जी ‘बनफूल‘ अपनी पत्नी के साथ उनकी कविताओ को सुनने आए। उस अवसर पर दिनकर जी ने भारत पर चीनी आक्रमण के संदर्भ मे लिखी अपनी महाकाव्यात्मक कविता ‘’परशुराम की प्रतीक्षा’‘ का सिंहनादी स्वर मे पाठ किया।

वे चीनी आक्रमण के समय भारत सरकार की नीतियो से बहुत क्षुब्ध थे। उन्होने कविता पाठ के क्रम मे बताया कि जब जवाहरलाल नेहरू को मेरी इस कविता पुस्तक ‘’परशुराम की प्रतीक्षा’‘ मे उनकी नीतियो को लेकर की गयी आलोचना का पता चला, तब उन्होने मुझे बुलाया और डांटा कि यह सब क्या बकवास है? मैंने उनसे कहा कि आपकी विदेश नीति बिलकुल असफल रही है। तो वे बहुत क्रोधित हो गए और गुस्से से मेज पर मुक्का मारते हुये मुझसे पूछा कि तुम्ही बताओ दिनकर मैं क्या करता ? वे परेशान होते रहे। लेकिन मैं शुरू से नेहरुजी के साथ बराबरी का बर्ताव करता रहा हूँ, इसलिए मैंने अपनी बात बिना झिझक उनके सामने रखी और चला आया। ‘
दिनकर जी ने कहा कि नेहरू जी जो चाहते थे, वह नही कर पाते थे। लोग उनको वैसा करने नहीं देते थे। उनके चारो ओर खुशामदियो की भीड़ रहती थी।

दिनकर जी अपनी कविता का पाठ करते-करते कभी कभी बहुत उत्तेजना मे आ जाते और क्रोध से उनकी आंखे लाल हो जाती। जब उन्होने कहा कि आज के नेता-
‘चोरो के हैं हितू ,ठगो के बल है
जिनके प्रताप से पलते पाप सकल हैं
जो छल प्रपंच ,सबको प्रश्रय देते हैं
या चाटुकार जन से सेवा लेते हैं
यह पाप उन्ही का हमको मर गया
भारत अपने ही घर मे हार गया।

और इस तरह दिनकर जी का एकल काव्य पाठ समाप्त हुआ।

एक बार का प्रसंग है कि नेहरू जी किसी कार्यक्रम में पटना में मंच पर चढ़ते समय लड़खरा गये तो उन्हें दिनकर जी ने आगे बढ़कर संभाला। नेहरू जी ने दिनकर जी से कहा- शुक्र है कि तुमने मुझे संभाल दिया। इस पर दिनकर जी ने कहा- राजनीति जब-जब लड़खडाती आती है, तब-तब साहित्य ही उसे संभालता है।