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ज़कात और उसके चार भाग के बारे सभी को जानना चाहिए।

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Mohd Zahid

मैंने कुछ दिन पहले एक पोस्ट की थी कि मुसलमान मस्जिद मदरसों में इतना चन्दा देता है उस चंदे कि सही प्रयोग कैसे हो तो आईये रमजान के महीने में ज़कात की गणना कैसे की जाए और किस हकदार को दी जाए वह समझते हैं

ज़कात ( दान) का जिक्र हर मजहब में है। मिसाल के तौर पर जैन धर्म में जिस अपरिग्रह (जरूरत से ज्यादा धन/वस्तुएँ अपने पास नहीं रखना) की बात की गई है उसकी बुनियाद में जकात ही तो है यानी जमा मत करो और जरूरतमंदों को बाँट दो , दान कर दो।

इसी तरह सनातन धर्म में भी त्याग करते हुए उपभोग (तेन व्यक्तेन भुंजीथः) की बात कही गई है। यह त्याग दरअसल जकात की ही तो पैरवी है। बाइबल में भी कहा गया है कि ‘फ्रीली यू हेव सिसीव्ड /फ्रीली यू गिव’ यानी तुम्हें खूब मिला है। तुम ख़ूब दो (दान करो)।

इस्लाम मजहब में भी जकात की बड़ी अहमियत है। क़ुरआने-पाक के पहले पारे (प्रथम अध्याय) अलिफ़-लाम-मीम की सूरह अल बकरह की आयत नंबर तिरालीस (आयत-43) में अल्लाह का इरशाद (आदेश) है ‘और नमाज कायम रखो और जकात दो।

जकात, दोस्ती का दस्तावेज तो है ही रोजे का ज़ेवर भी है। ज़कात का जेवर रोजे की गौरव और गरिमा को बढ़ाता है। ज़कात में दिखावा नहीं होना चाहिए। ज़कात का दिखावा, ‘दिखावे’ की जकात बन जाएगा।

दिखावा शैतानियत का निशान है, इंसानियत की पहचान नहीं। रोजा स्वच्छता और इंसानियत का हमदम है रोजा, रोजे की ताकत है जकात। हजरत मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़र्माया ‘रोजा रखते हुए शख़्स को बुरी बात कहने से बचना चाहिए, यह भी ज़कात है।

यह तो हुई सभी धर्मों में दान देने की स्थिति का आकलन ।जहां तक मुसलमानों की बात है तो एक समय में जितना धन इस समुदाय के एक एक व्यक्ति द्वारा दान किया जाता है ऐसा उदाहरण दुनिया में और कहीं नहीं मिलेगा और यह भी सच है कि इस दान का जितना लूट खसोट होता है उतना पूरी दुनिया में और कही नहीं होता होगा, मैने देखा है कि मस्जिद मदरसों के मौलाना इसी ज़कात के धन को बटोरने के लिए सऊदी अरब और इस्लामिक मुल्कों में रमजान के महीने में हर साल जाते हैं और वहाँ मौजूद अपने कुछ दलालों के जरिये सऊदी शेखों के निकाले गये ज़कात को बटोर लाते हैं । चुकी शेखों की समस्या होती है कि ज़कात किसे दें क्योंकि उनके समाज में कोई गरीब तो होता नहीं इसलिए वह भी इस सुविधा को अच्छा मानते हैं और अपनी कमाई या जमा किये माल का ज़कात दे देते हैं जो करोड़ों में होता है । ज़कात है क्या और कैसे इसकी गणना होती है।

इस्लाम में ज़कात की मात्रा निर्धारणऔर उन चीजों को इंगित भी कर दिया जिस पर ज़कात फर्ज है।

इस आधार पर ज़कात को चार भागों में बांटा जा सकता है।

  1. खेती व बाग
  2. चौपाय – पशु, ऊँट, गाय, बकरी इत्यादि
  3. सोना-चांदी इत्यादि
  4. व्यापार में हुआ लाभ

ज़कात साल में एक बार फर्ज है खेती व बाग का साल उस समय पूरा समझा जायेगा जब फसल पक जाये। अगर ज़कात हर हफ्ते और हर महीने देनी होती तो दौलतमंद लोगों के लिए यह बड़े घाटे की बात होती I यदि जीवन में एक बार फर्ज होती तो इसका घाटा दीन-दुखियों को उठाना पड़ता।

ज़कात की मात्रा व गणना :-

ज़कात की मात्रा व निसाब का निर्धारण मालिको की मेहनत, प्रयास, उनकी सहूलियत एवं मेहनत को सामने रखकर किया गया।

अचानक प्राप्त माल पर व ज़कात :-

अत: जो माल आदमी को अचानक एवं एक बारगी में मिल जाये, (जैसे खनन से प्राप्त धन) तो उन पर साल बितने का इंतजार न किया जाये और जिस समय ऐसे धन की प्राप्ती होती है उसी समय उसका पांचवा हिस्सा उस पर वाजिब हो जाता है कि दान कर दे ।

खेती व बाग ( बरानी खेती ) व ज़कात :-

जिस धन की प्राप्ती में स्वयं उसकी मेहनत शामिल हो तो उस पर 10वां हिस्सा वाजिब होगा। जैसे खेती व बाग इत्यादि जिसके जोतने व बोने का कार्य जो स्वयं करता है ,
किन्तु उसकी न सिंचाई की जरूरत पड़ती है, और न उसके लिए कुआँ खोदने और रहट् आदि लगाने की आवश्यकता पड़ती हो बल्कि बरसात के पानी से सिंचाई ( बरानी खेती ) हो जाती है।

सिंचाई खेती व ज़कात :-

अगर कोई व्यक्ति डोल अथवा किसी अन्य साधन से सिंचाई करता है तो उस पर 20वाँ हिस्सा वाजिब हो जाता है।

धन की देखरेख , सुरक्षा व ज़कात :-

अगर कोई ऐसा काम हो जिसमें बढ़ोतरी मालिक की मेहनत पर निर्भर हो और उसकी देखरेख व सुरक्षा उसके जिम्मे हो तो उस पर 40वाँ हिस्सा वाजिब हो जाता है।

पशु- पशु, ऊँट, गाय, बकरी इत्यादि ज़कात :-

चौपायों पर ज़कात का निसाब अलग -अलग हैं , जैसे: 5 ऊंट पर ही ज़कात देना आवश्यक है और ऐसे ही 40 बकरियां , 30 गायें ।
अर्थात जिस आदमी के पास पशुओं की यह संख्या है उन पर धन के कुल मूल्य का 40 वां हिस्सा अर्थात 2 .5 % ज़कात निकालना वाजिब हो जाता है I

सोना -चाँदी व ज़कात :-

सोने की सीमा = 7 . 5 ,साढ़े सात तोला I
चाँदी की सीमा = 52 .5 , साढ़े बावन तोला I

अर्थात जिस आदमी के पास सोना -चाँदी की इससे अधिक मात्रा है उन पर धन के कुल मूल्य का 40 वां हिस्सा अर्थात 2 .5 % ज़कात निकालना वाजिब हो जाता है I

व्यापार के मुनाफे पर ज़कात :-

व्यापार के मुनाफे को = 52 .5 , साढ़े बावन तोला सोने पर ज़कात रखा गया है I ध्यान रहे की तिजारत के कुल धन पर ज़कात लागु होगा और कुल लाभ पर भी अलग से लागु होगा I अगर किसी व्यक्ति को हानि होती है उस स्थिति में उसके कुल व्यापार के माल में से हानि घटाकर शेष धन पर ज़कात वाजिब हो जाता है I

( अर्थात व्यापार के धन के कुल मूल्य व लाभ का 40 वां हिस्सा अर्थात 2 .5 % ज़कात निकालना वाजिब हो जाता है I )

ज़कात के हकदार

इस्लाम में ज़कात के 8 हकदार बयान किये गए हैं ।

जिनका विवरण ये है-

  1. फकीर – ये वे लोग है जिन के पास कुछ न कुछ माल तो हो, मगर उन की जरूरत के लिए काफी न हो। जो बेहद गरीबी में गुजर बसर करते हो एवं किसी से मांगते न हो।
  2. मिसकीन -ये लोग बहुत ही तबा हाल लोग है जिनके पास अपने तन की जरूरतो को पूरा करने के लिए कुछ भी न हो।
  3. आमिलीन अलैहा – वे मुराद लोग जिनसे इस्लामी हुकुमत ज़कात वसूल करने के लिए मुकरर करे उनको ज़कात के मद से तनख्वाह दी जायेगी।
  4. मोअल्लफतुल कुलूब – वे मुराद लोग जिन को इस्लाम की हिमायत के लिए या इस्लाम की मुखालिफत से रोकने के लिए रूपया देने की जरूरत पेश की जाये।
  5. फ़िरिकाब -इनसे मतलब यह है की जो शख्स गुलामी के बंधनों से छूटना चाहता हो उसको ज़कात दी जाये अर्थात् मालिक को रूपया देकर उनको गुलामी से छूड़ा दे ।
  6. अलगारिमीन – वे लोग जो कर्जदार हो अर्थात् इतना कर्ज की उसे अदा करने के बाद उसके पास कुछ ना बचता हो तो उसे ज़कात दी जा सकती है।
  7. फी सबीलिल्लाह – ये आम लफ्ज है जो सभी ने कामों पर इस्तेमाल होता है अर्थात् सच्चेदीन का झण्डा ऊँचा करने वालों की मदद करना, जो जरूरत मंद हो।
  8. मुसाफिर -सफर की हालत में अगर वह मोहताज है तो उसे ज़कात देनी चाहिए।

ज़कात किसे नहीं देनी चाहिए ?

  1. कोई आदमी अपने बाप या बेटे को ज़कात नहीं दे सकता। शौहर अपनी बीवी को और बीवी अपने शौहर को ज़कात नहीं दे सकती। नजदिकी रिश्तेदार ज़कात के हकदार नहीं है।
  2. ज़कात सिर्फ मुसलमानों का हक है। लेकिन गैर मुस्लिम को आम खैरात व सदके में से हिस्सा दिया जा सकता है बल्कि आम खैरात में फर्क करना गैर वाजिब है I
  3. ज़कात अपनी ही आबादी के गरीबों में खर्च होनी चाहिए। अगर अपनी आबादी में ज़कात के हकदार नहीं है तो फिर अन्य आबादी में भेजी जा सकती है।
  4. इमाम अबू हनीफा रह. के अनुसार जिसके पास 50 रूपये से ज्यादा हो उसे ज़कात नहीं लेनी चाहिए।

यह है विस्तार से ज़कात का पूरा हिसाब किताब, सच यह है कि केवल भारत में लगभग सभी मुसलमान जो इस मापदंड के अनुसार ज़कात के फर्ज से बंधे हैं वह 19-20 गणना करके ज़कात देते ही देते हैं इस्लामिक देशों से आरहे ज़कात जो हैं वह अलग हैं ।
इस लेख को लिखने का आशय बस इतना मात्र है कि रमज़ान आते ही ज़कात के धन की लूटखसोट के कारण सही लोगों तक ना पहुंच पाना एक समस्या है और ज्यादातर फर्जी चंदे की रसीद छपवाकर लोग निकल जाते हैं चंदा वसूलने जो गलत है ऐसे लोगों को बिल्कुल ज़कात नहीं देनी चाहिए ।ज़कात का अधिकतर पैसा मदरसों में जाता है पर वह खर्च कहां और कैसे होता है इसको देखने के लिए कोई व्यवस्था नहीं है।

मैने अपनी सोसायटी की मीटिंग में ही एक प्रस्ताव रखा था कि एक वालेंटरी कमेटी बने जहाँ सभी लोग ज़कात के पैसे जमा करें और वह कमेटी निष्पक्ष रूप से इस धन को जहां जैसी ज़रूरत हो वहाँ खर्च करे , चाहे मदरसा चाहे गरीब बेटियों की शादी हो , इससे कमीशन और बंदरबांट रुक जाएगी , मेरी सोसायटी के ही मौलानाओं ने तुरंत इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया ।

मेरा मानना है कि यह सिस्टम इमानदारी से यदि हर जिले तहसील कस्बे और गांव में लागू कर दिया जाए तो बिना सरकारी मदद के मुसलमानों की बहुत सी समस्याओं का हल केवल ज़कात के पैसे से हो जाऐगा ।

नोट :- मैं इस्लाम का बहुत बड़ा जानकार तो नहीं इसलिए ज़कात की गणना में कोई गलती हो तो आप सुधार कर सकते हैं। 1400 साल पहले गणित पर आधारित इस व्यवस्था को इस्लाम ने बताया जिसे दरों में हेर फेर कर पूरी दुनिया ने लागू किया , टैक्स वसूलने के लिए।

निकाह, तलाक़, हलाला और ख़ुला के बारे में भ्रान्तियाँ दूर करने की ज़रूरत है।

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Mohd Zahid

भारतीय संविधान ही नहीं पूरी दुनिया के व्यवस्था की पड़ताल कर लीजिए हर जगह यदि कुछ सुविधाएं दी गई हैं तो उन सुविधाओं के गलत इस्तेमाल पर दंड का प्रावधान भी किया गया है ।इसे चेक ऐंड बैलेंस कहते हैं कि कोई किसी नियम या अधिकार का कोई गलत फायदा ना उठा ले।

आज़ादी के पहले या बाद में मुसलमानों की यह बहुत बड़ी नाकामयाबी रही है कि वह इस देश में इस्लाम के सही रूप को प्रस्तुत नहीं कर सके।मौलवी मौलाना जितना चंदा वसूलने में अपना प्रयास दिखाते हैं उसका एक 1% भी इस्लाम के सही रूप को सामने लाने की कोशिश करते तो अन्य मजहब के लोगों में इस्लाम के खिलाफ झूठा प्रचार कर पाना किसी के लिए सभंव नहीं होता , सही रूप से प्रस्तुत करने का अर्थ धर्मांतरण से नहीं बल्कि इस्लाम में दी गई व्यवस्था को तर्क और व्यवहार की कसौटी पर सभी समाज के लोगों के सामने रखना कि यह व्यवस्था इस कारण से है और आज के दौर में इसके यह फायदे हैं। इसीलिये इस्लाम धर्म और इसकी व्यवस्थाओं के बारे में झूठी कहानी किस्से गढ़ कर संघ इस देश के कुछ लोगों को इस्लाम के बारे में बरगलाने और हृदय में घृणा भरने में सफल रहे।

दरअसल इस लेख को पुनः पोस्ट करने का कारण यह है कि मेरी तमाम पोस्ट हिन्दू भाई “निकाह , तलाक और हलाला” के बारे में गलत और अज्ञानता भरा कमेन्ट करना है । एक हिन्दू मित्र का कमेंट था जिसमें उन्होंने इस्लाम की एक व्यवस्था “हलाला” पर एक टिप्पणी कुछ यूँ की ” हलाला वो है जो तलाक दी गई बीवी दूसरे व्यक्ति से विवाह करके उसका बिस्तर गर्म करे और तब तक करे जब तक कि उस नये पति का मन ना भर जाए और वह तलाक ना देदे , और फिर उसके तलाक देने के बाद पहला पति उस महिला से विवाह कर सकता है” ।

ज़ाहिर सी बात है कि शब्द बेहद गंदे हैं और देश में पनप चुकी एक संस्कृति का उदाहरण मात्र ही है । तब सोचा कि अपने सभी हिन्दू मित्रों को इसकी व्याख्या करके हलाला का अर्थ समझाऊँ , क्या पता संघी साहित्य पढ़ने के बाद उनके मनमस्तिष्क में भी यही भ्रम हो। हालाँकि “संघी” खुद के मन में घर कर गयी इस्लाम के प्रति ज़हर से पक्षपात और नफरत में अंधे होकर संघी “इस्लाम” पर टिप्पणी करते हैं , मेरा अनुभव रहा है कि मुस्लिम ऐसी टिप्पणियाँ कभी “सनातन धर्म” और उसकी मान्यता तथा विश्वासों पर नहीं करता । खैर विषय पर आते हैं ,

निकाह :-

इस्लाम में विवाह की व्यवस्था एक “चेक ऐंड बैलेंस” के आधार पर है जहाँ निकाह एक अनुबंध (एग्रीमेंट) होता है जिसमें लड़के और लड़की की रजामंदी ली जाती है , लड़की के बाप को यह अधिकार है कि वह अपनी बेटी के भविष्य की सुरक्षा के लिए कोई भी “मेहर देन” निर्धारित कर सकता है , और इसकी ज़रूरत भी इसी लिये है कि यदि निकाह ( एग्रीमेंट) टूटा तो मेहर उस लड़की के भविष्य को सुरक्षित करेगा।

यह सब कुछ लिखित में होता है और इसके दो गवाह और एक वकील होते हैं जो सामान्यतः लड़की वालों की तरफ से रहते हैं जिससे कि लड़की के साथ अन्याय ना हो , धोखा ना हो , सब तय होने के बाद सबसे पहले लड़की से निकाह पढ़ाने की इजाज़त उन्ही वकील और गवाहों के सामने ली जाती है और यदि लड़की ने इजाजत देकर एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर कर दिया तब निकाह की प्रक्रिया आगे बढ़ती है नहीं तो वहीं समाप्त , सब कुछ सर्वप्रथम लड़की के निर्णय पर ही आधारित होता है ।

लड़की की इजाज़त के बाद पूरे बारात और महफिल में “मेहर की रकम” को एलान करके सभी शर्तों गवाहों और वकील की उपस्थिति में निकाह पढाया जाता है जो अब लड़के के उपर है कि वह कबूल करे या ना करे , यदि इन्कार कर दिया तो मामला खत्म परन्तु निकाह कबूल कर लिया तो फिर उस एग्रीमेंट पर वह हस्ताक्षर करता है और सभी गवाह वकील और निकाह पढ़ाने वाले मौलाना हस्ताक्षर करके एक एक प्रति दोनो पक्षों को दे देते हैं और इस तरह निकाह की एक प्रक्रिया पूरी होती है ।

ध्यान रहे की लड़की को मिलने वाले मेहर की रकम तुरंत बिना विलंब के मिलना चाहिए , और बिना उसका मेहर दिये उस लड़की को छूने का भी अधिकार उस लड़के को नहीं है । और लड़की के उस “मेहर” पर उसके पति का भी अधिकार नहीं है , वह उस लड़की की अपनी “भविष्यनिधि” है।

तलाक :-

निकाह के बाद जीवन में यदि ऐसी परिस्थितियाँ पैदा हो जाती हैं कि साथ जीवन जीना मुश्किल है तो आपसी सहमति से तलाक की प्रक्रिया अपनाई जाती है जो तीन चरण में होती है , पहले “तलाक” के बाद दोनों के घर वाले सुलह सपाटे का प्रयास करते हैं और पति-पत्नी में जो कोई भी समस्या हो उससे सुलझा कर वैवाहिक जीवन सामान्य कर देते हैं , अक्सर मनमुटाव या कोई कड़वाहट आगे के भविष्य की परेशानियों को देखकर दूर हो ही जाती है और यदि नहीं हुई और लगा कि अब जीवन साथ संभव नहीं तो दूसरा तलाक दिया जाता है पर वह भी दोनो की सहमति से ही ।

दूसरे तलाक के बाद गवाह वकील या समाज के अन्य असरदार लोग बीच बचाव करते हैं और जिसकी भी गलती हो मामले को सामान्य बनाने की कोशिश करते हैं , अक्सर अंतिम चेतावनी देखकर और बिछड़ने के डर से वैवाहिक जोड़े गलतफहमी दूर कर लेते हैं या समझौता कर लेते हैं और यदि सब सामान्य हो गया तो फिर से दोनो में “निकाह” उसी प्रकिया के अनुसार होता है क्योंकि दो तलाक के बाद निकाह कमज़ोर हो जाता है।

यदि सुलह समझौता नहीं हुआ तो अंतिम और तीसरा तलाक देकर संबंध समाप्त कर दिया जाता है ।इस तीन तलाक की सीमा लगभग 2•5 महीने होती है , अर्थात लड़की के तीन “माहवारी” की अवधि और पहला तलाक पहली माहवारी , दूसरा तलाक दूसरी माहवारी तथा तीसरा तलाक इसी तरह तीसरी माहवारी के बाद दिया जाता है , वह इस लिए होती है कि अक्सर “बच्चे” की संभावना दोनों में प्रेम को पुनः पैदा कर सकती है और अलग होने का फैसला बदला जा सकता है । ध्यान रखें कि इस्लाम अंतिम अंतिम समय तक विवाह ना टूटने की संभावना को जीवित रखता है ।

सामान्यतः तलाक के बाद लड़की अपने माँ बाप के यहाँ जाती है और “इद्दत” का तीन महीना 10 दिन बिना किसी “नामहरम” (पर पुरुष) के सामने आए पूरा करती है । संघी साहित्य इसे औरतों के ऊपर इस्लाम का अत्याचार बताता है जबकि इसका आधार यह है कि यदि वह लड़की या महिला “गर्भ” से है तो वह शारीरिक रूप से स्पष्ट होकर पूरे समाज के सामने आ जाए और ना उस महिला के चरित्र पर कोई उंगली उठा पाए और नाही उसके नवजात शिशु के नाजायज़ होने पर ।

इद्दत की अवधि पूरी होने के बाद वह लड़की अपना जीवन अपने हिसाब से जीने के लिए स्वतंत्र है। और अक्सर ऐसी तलाक शुदा लड़कियों का पुनः विवाह खानदान के लोग कुछ महीनों अथवा साल दो साल में करा ही देते हैं और इसी छोटी अवधि में उसे निकाह मे मिले “मेहर” का धन उपयोग में आता है ।

ध्यान दीजिए कि इस्लाम मे “तलाकशुदा” का पुनर्विवाह और “विधवा विवाह” कराना बेहद पुण्य का काम माना गया है और ऐसे विवाह को ही अपनी कौम में इसे मान्य बनाने के लिए हज़रत मुहम्मद स•अ•व• ने खुद ही ऐसी “विधवा और तलाकशुदा महिला” से विवाह करके उदाहरण प्रस्तुत किया है और इस कारण से ऐसा करना “सुन्नत” है जो बेहद पुण्य का काम है । सदैव ही यदि स्त्री की इच्छा होती है तो उसका पुनर्विवाह कुछ ही दिनों में हो जाता है , ना तो उसे कोई कुलटा , कलमुही कहता है और ना ही कोई उसके विवाह टूटने का जिम्मेदार उसे मानता है ।

हलाला :-

तलाक की प्रक्रिया इतनी सुलझी हुई और समझौतों की गुंजाइश समाप्त करते हुए है कि तलाक के बाद पुनः विवाह की गुंजाइश नहीं रहती क्युँकि बहुत कड़वाहट लेकर संबंध टूटते हैं। एक दूसरे को देखना तक पसंद नहीं करते अलग होने वाले तो पुनः विवाह का तो सोचना भी असंभव है।

एक और तरह का तलाक की संभावना होती है , वह होती है जल्दबाजी में या बिना सोचे समझे हवा हवाई तरीके से तलाक दे देना , या पति पत्नी की छोटी मोटी लड़ाई में तलाक दे देना , या गुस्से में आकर तलाक दे देना। सामान्यतः ऐसी स्थिति में पति-पत्नी में प्रेम और आपसी समझ तो होती है पर क्षणिक आवेश में आकर पुरुष तलाक दे देते हैं , लोग ऐसा ना करें और इसे ही रोकने के लिए “हलाला” की व्यवस्था की गई है कि जब गलती का एहसास हो तो समझो कि तुमने क्या खोया है , और जीवन भर घुट घुट कर रहो क्युँकि हलाला वह रोक पैदा करता है कि गलती का एहसास होने पर फिर कोई उसी पत्नी से विवाह ना कर सके । ध्यान दीजिए कि “हलाला” तलाक को रोकने का एक ऐसा बैरियर है जिसे सोचकर ही पुरुष “तलाक” के बारे में सोचना ही बंद कर देता है , अन्यथा तलाक और फिर से शादी की घटनाओं की बाढ़ आ जाए और तलाक एक मजाक बन कर रह जाए ।

मैने आज तक अपने जीवन तो छोड़िए अपने समाज अपने माता पिता नाना नानी के मुँह से भी “हलाला” की प्रक्रिया पूरी करके किसी का उसी से पुनः विवाह हुआ है ऐसा नहीं सुना ना देखा , यहाँ तक कि बी आर चौपड़ा की इसी विषय पर बनी बेहतरीन फिल्म “निकाह” भी तलाकशुदा सलमा आगा (निलोफर) , अपने दूसरे विवाह (राज बब्बर से) बाद पहले पति (दीपक पराशर) से निकाह को इंकार कर देती है ।

हलाला मुख्य रूप से महिलाओं की इच्छा के उपर निर्भर एक प्रक्रिया है जिसमे वह तलाक के बाद अपनी मर्जी से खुशी खुशी किसी और बिना किसी पूर्व योजना के अन्य पुरुष से विवाह कर लेती है और फिर दूसरे विवाह में भी ऐसी परिस्थितियाँ पैदा होती हैं कि यहाँ भी निकाह , तलाक की उसी प्रक्रिया के अनुसार टूट जाता है तब ही वह इद्दत की अवधि के बाद पूर्व पति के साथ पुनः निकाह कर सकती है वह भी उसकी अपनी खुशी और मर्जी से ।

हलाला इसलिए नहीं कि कोई पुर्व पति से विवाह करने के उद्देश्य के लिए किसी अन्य से विवाह करके तलाक ले और यदि कोई ऐसा सोच कर करता है तो वह गलत है गैरइस्लामिक है और हलाला का दुस्प्रयोग है । परन्तु सच तो यह है कि इस दुस्प्रयोग और गलती का भी कोई उदाहरण नहीं ।

यह सारी (निकाह , तलाक , हलाला) प्रक्रिया स्त्रियों के निर्णय के उपर होता है और इसके लिए उस महिला पर कोई ज़बरदस्ती नहीं कर सकता और कम से कम हर समाज की महिला तो ऐसी ही होती है कि वह बार बार पुरुष ना बदलें , पुरुष तो खैर कुछ भी कर सकते हैं ।

तो हलाला अनिवार्य होने के कारण पूर्व पति के लिए अपनी वह पत्नी पाना लगभग असंभव हो जाता है और वह पूर्व पत्नी उसके लिए “हराम” हो जाती है ।

“हलाला” इस्लाम का दिया औरतों का “सुरक्षा का कवच” है कि पति तलाक देने के पहले हजार बार सोचे और जल्दबाजी में या छोटे मोटे गुस्से में अपना बसा बसाया घर ना उजाड़े और यदि उसने गलती की तो हलाला के कारण उसे फिर से ना पाने की सजा भुगते और घुट घुट कर मरे ।

फिर समझ लीजिए कि हलाला एक स्वभाविक प्रक्रिया है जो इस नियत से नहीं की जाती कि फिर से “पहले” पति पत्नी एक हों बल्कि महिला का दूसरा विवाह किसी अन्य कारणों से विफल हुआ तभी वह पहले पति से विवाह कर सकती है, अर्थात यह कि वह महिला अब अपने पहले पूर्व पति के लिए “हलाल” है और इसी लिए महिला के इसी तीन बार निकाह की प्रक्रिया को “हलाला” कहते हैं।

इस्लाम महिलाओं के चरित्र और सोच को जानता है कि कोई भी महिला ऐसा नहीं करेगी कि वह पूर्व पति से पुनः विवाह करने के उद्देश्य से किसी अन्य पुरुष से विवाह करे और फिर तलाक ले , तलाक हुआ मतलब , पुनः पति-पत्नी होने की संभावना “हलाला” ने समाप्त कर दी । एक और तर्क है हलाला के संबंध में कि कोई भी व्यक्ति , कितना भी गिरा हुआ हो अपनी पत्नी से कितनी भी घृणा करता हो , वह उसे किसी और पुरुष के साथ “वैवाहिक बंधन” में नहीं देख सकता । और पुरुष की यही सोच “हलाला” से डरने के लिए और प्रभावी बनाती है कि “तलाक” की प्रक्रिया के पहले 100 बार सोचो ।

ध्यान रखें कि यह धार्मिक व्यवस्था है जो पति-पत्नी के वैवाहिक भविष्य के लिए बनाई गयी है और इसे कोई दुरुपयोग करता है तो वह वैसा ही है जैसे देश के संविधान के कानून का उल्लंघन होता है तो उसे गैरकानूनी कहते हैं वैसे ही इसका दुरुपयोग “गैरइस्लामिक” है । “निक़ाह , तलाक , हलाला” महिला की इच्छा पर ही है और ऐसा करने के लिए उसे बाध्य करना “गैरइस्लामिक” है गुनाह है ।

ख़ुला :-

एक बात और ध्यान रखें कि जैसे पति तलाक दे सकता है वैसे ही पत्नी भी अपना वैवाहिक जीवन तोड़ने के लिए अपने पति से “खुला” प्रक्रिया अपना कर अलग हो सकती है और वह उसके अधिकार में है ।

आशा करता हूँ कि अब सब स्पष्ट हो गया होगा । इस्लाम की इसी व्यवस्था के कारण मुसलमानों के घरों में बहुएँ बेटियों को जलाया , मारा अथवा मारकर लटकाया नहीं जाता क्युँकि अलगाव की प्रक्रिया बेहद आसान है ना कि “अदालत” की तरह जटिल जहाँ पति-पत्नी के पूरे परिवार के इज़्ज़त की धज्जियाँ पति-पत्नी के अलगाव के लिए ही उड़ा दी जाती हैं । पत्नी का दूसरे पुरुष से नाजायज़ संबंध बताया जाता है और पति को नपुंसक। और इसी बेईज़्ज़ती से बचने के लिए बहुएँ मार या मरवा दी जाती हैं।

सेंट्रल विस्टा के नाम : विज्ञान भवन और नेहरू

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Shubhneet Kaushik

साठ साल पहले जवाहरलाल नेहरू की यह तस्वीर विज्ञान भवन की दीवारों पर बने भित्ति चित्रों के अनावरण के अवसर पर ली गई थी। वर्ष 1956 में अपने स्थापना काल से ही राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय महत्त्व के अनेक महत्त्वपूर्ण आयोजनों, सम्मेलनों और बैठकों का गवाह रहा विज्ञान भवन आज राष्ट्रीय अभिलेखागार, राष्ट्रीय संग्रहालय, इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र जैसी राष्ट्रीय महत्त्व की दूसरी इमारतों के साथ सेंट्रल विस्टा की बलि चढ़ाया जा रहा है। विज्ञान भवन नेहरू की आधुनिक भारत की संकल्पना का एक मूर्त रूप था। अकारण नहीं कि विज्ञान भवन के निर्माण में नेहरू ने शुरू से ही गहरी दिलचस्पी ली।

मसलन, 11 जून 1956 को स्वर्ण सिंह को लिखे पत्र में विज्ञान भवन से जुड़े कुछ मुद्दों पर नेहरू ने अपनी राय रखी थी। इसमें विज्ञान भवन की दीवारों पर भित्ति चित्रों का सवाल भी शामिल था। नेहरू ने कहा कि वे भित्ति चित्रों के पक्ष में हैं और ये चित्र ऐसे होने चाहिए कि इनमें आधुनिक भारत की झलक मिल सके। उनका कहना था कि ‘आज भारत नए जीवन की धड़कन और नए-नए रचनात्मक कार्यों से रूबरू हो रहा है और इसलिए कांफ्रेंस हॉल जैसी जगह पर प्राचीन या मध्यकालीन भारत की जगह हमें आधुनिक भारत को प्रस्तुत करना चाहिए। ताकि विदेशों से आने वाले हज़ारों लोग आज और आने वाले कल के भारत की झलक देख सकें।’

साथ ही, नेहरू ने जोड़ा कि कांफ्रेंस हॉल ऐसा हो कि वह भारत की शांतिप्रियता का सूचक हो और विश्व को शांति का संदेश दे सके। उक्त निर्माणाधीन कांफ्रेंस हॉल के लिए ‘शांति भवन’, ‘बुद्ध भवन’ आदि कई नाम भी सुझाए गए थे। मसलन, स्वर्ण सिंह ने ‘बुद्ध भवन’ और सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने ‘बुद्ध जयंती भवन’ का नाम सुझाया था। क्योंकि वर्ष 1956 में भगवान बुद्ध की 2500वीं जयंती भी मनाई जा रही थी। अंततः नेहरू के सुझाव पर इस कांफ्रेंस हॉल का नाम ‘विज्ञान भवन’ रखा गया।

1956 में ही विज्ञान भवन में भगवान बुद्ध की 2500वीं जयंती के अवसर पर ‘कला, सहित्य एवं दर्शन पर बौद्ध धर्म के प्रभाव एवं योगदान’ विषय पर अंतरराष्ट्रीय सिंपोजियम आयोजित किया गया। 26 नवम्बर से 29 नवम्बर 1956 तक चले इस सिंपोजियम के समापन समारोह की अध्यक्षता स्वयं जवाहरलाल नेहरू ने की थी।

उसी वर्ष विज्ञान भवन में यूनेस्को का नौवां महासम्मेलन आयोजित हुआ। यह सम्मेलन इसलिए भी महत्त्वपूर्ण था क्योंकि एशिया में पहली बार संयुक्त राष्ट्र संघ की कोई बड़ी बैठक आयोजित हुई थी। बाद के वर्षों में विज्ञान भवन कई अन्य महत्त्वपूर्ण आयोजनों का गवाह बना, जिसमें गुटनिरपेक्ष सम्मेलन, राष्ट्रमंडल देशों के सम्मेलन और दक्षेस सम्मेलन प्रमुख हैं। विज्ञान भवन में ही 1 अगस्त 1957 को राष्ट्रीय पुस्तक न्यास की स्थापना उपराष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन द्वारा की गई थी। उस अवसर पर जवाहरलाल नेहरू, शिक्षा मंत्री मौलाना आज़ाद और राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के पहले चेयरमैन सी.डी. देशमुख भी मौजूद थे।

वर्ष 1957 में प्रख्यात मूर्तिकार अमरनाथ सहगल (1922-2007) को विज्ञान भवन में भित्ति चित्र बनाने का काम दिया गया। अमरनाथ सहगल ने पाँच वर्षों में विज्ञान भवन में कांसे के भित्तिचित्र बनाए और यह कार्य वर्ष 1962 में पूरा हुआ। हमारा दुर्भाग्य ही है कि आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अहं की तुष्टि के लिए भारत की राष्ट्रीय अस्मिता और आधुनिकता के प्रतीक विज्ञान भवन की बलि दी जा रही है।

संस्कृत, भोजपुरी और इतिहास की त्रिवेणी

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Shubhneet Kaushik

यह दुर्लभ तस्वीर है बलिया के सोनबरसा गाँव में जन्मे संस्कृत, भोजपुरी और इतिहास के अप्रतिम अध्येता उपाध्याय बंधुओं की। इनमें संस्कृतज्ञ वामदेव उपाध्याय चचेरे बड़े भाई थे, तो संस्कृत के प्रकांड विद्वान आचार्य बलदेव उपाध्याय, इतिहासकार वासुदेव उपाध्याय और भोजपुरी लोकगीत और साहित्य के मर्मज्ञ कृष्णदेव उपाध्याय सहोदर भाई थे। उपाध्याय बंधुओं के बारे में आगे पढ़ें।

आचार्य बलदेव उपाध्याय : काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान उन्हें पंडित रामावतार शर्मा, आनंदशंकर ध्रुव और पंडित गोपीनाथ कविराज जैसे विद्वानों का सान्निध्य मिला। जुलाई 1922 में वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में प्रवक्ता के पद पर नियुक्त हुए। संस्कृत विभाग में उन्होंने 38 वर्षों तक अध्यापन किया और मार्च 1960 में वे सेवानिवृत्त हुए। सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने पाँच वर्षों तक सम्पूर्णानन्द विश्वविद्यालय के इतिहास-पुराण विभाग में अनुसंधान विभाग का संचालन किया।

अपने लगभग सौ साल के जीवन में आचार्य बलदेव उपाध्याय ने संस्कृत साहित्य, दर्शन से जुड़ी अनेक विद्वत्तापूर्ण पुस्तकें लिखीं। संस्कृत साहित्य का इतिहास, संस्कृत शास्त्रों का इतिहास जैसी पुस्तकें लिखने के साथ ही उन्होंने सूक्ति मुक्तावली, संस्कृत कवि चर्चा, रसिक गोविंद और उनकी कविता, संस्कृत वांगमय, भारतीय साहित्यशास्त्र, काव्यानुशीलन, संस्कृत सुकवि समीक्षा, वैदिक कहानियाँ जैसी पुस्तकों की रचना की।

वासुदेव उपाध्याय : पटना विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्त्व विभाग में प्राध्यापक रहे वासुदेव उपाध्याय ने मुद्राशास्त्र, अभिलेखों और सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास जैसे विविध विषयों पर हिंदी और अंग्रेज़ी में अनेक पुस्तकें लिखीं। अनंत सदाशिव अलतेकर उनके गुरु थे और वासुदेव शरण अग्रवाल, मोतीचंद्र, कृष्णदत्त वाजपेयी सरीखे इतिहासकारों से भी उनकी गहरी आत्मीयता रही। पूना में 1940 में आयोजित हिंदी सहित्य सम्मेलन वार्षिक अधिवेशन में उन्हें मंगला प्रसाद पारितोषिक से सम्मानित किया गया।

अपने अग्रज आचार्य बलदेव उपाध्याय के प्रति कृतज्ञता व अनुराग प्रकट करते हुए वे लिखते हैं कि ‘‘उन्होंने मेरे हृदय में भारतीय इतिहास तथा संस्कृति के प्रति नैसर्गिक प्रेम पैदा कर मेरे जीवन की धारा को बदल दिया।’ वासुदेव जी की प्रमुख पुस्तकें हैं : गुप्त साम्राज्य का इतिहास, पूर्वमध्यकालीन भारत, भारतीय सिक्के, विजयनगर साम्राज्य का इतिहास, भारतीय गौरव, प्राचीन भारतीय अभिलेखों का अध्ययन, सोशियो रिलीजस कंडीशन ऑफ़ नादर्न इंडिया।

कृष्णदेव उपाध्याय : लोक-संस्कृति और भोजपुरी के अप्रतिम अध्येता डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा हासिल की। कृष्णदेव जी वाराणसी स्थित भारतीय लोक-संस्कृति शोध-संस्थान के संस्थापक-संचालक थे। उन्होंने प्रयाग, मुंबई और उज्जैन में आयोजित अखिल भारतीय लोक-संस्कृति सम्मेलन का संयोजन किया। ये सम्मेलन वर्ष 1958 से 1961 के दौरान आयोजित हुए।

वे वाराणसी में वर्ष 1964-65 के दौरान आयोजित अखिल भारतीय भोजपुरी सांस्कृतिक सम्मेलन के मंत्री और स्वागताध्यक्ष रहे। इसके साथ ही बरहज में आयोजित अखिल भोजपुरी साहित्य सम्मेलन की उन्होंने अध्यक्षता की। वर्ष 1942 में भोजपुरी लोकगीतों का उनका संकलन हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा प्रकाशित किया गया। वे भारतीय लोक संस्कृति शोध संस्थान (वाराणसी) से प्रकाशित शोध पत्रिका ‘जर्नल ऑफ इंडियन फ़ोक कल्चर’ के प्रधान संपादक रहे। साथ ही साथ, वे भारतीय लोक संस्कृति ग्रंथमाला के प्रधान संपादक रहे।

‘भोजपुरी और उसका साहित्य’, ‘भोजपुरी लोक साहित्य का अध्ययन’, ‘भोजपुरी लोक संस्कृति का अध्ययन’, ‘भोजपुरी ग्राम-गीत’, ‘हिन्दू विवाह की उत्पत्ति और विकास’, भारतीय लोक विश्वास’, ‘हिन्दी प्रदेश के लोकगीत’, ‘लोक साहित्य की भूमिका’ उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं।

डेल्टा प्लस रूपांतर और आज का परस्पर सम्बद्ध विश्व

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Dr Rajendra Jha

कोविड से जंग जारी है. पिछले अठारह महीनों में हम ने बहुत खोया, लेकिन बहुत सीखा भी और अनेक उल्लेखनीय विजय भी हासिल की: कोविड के लिए निश्चित औषधि बन गयीं हैं, संक्रमण रोकने के लिए हम अनेक टीके ला पाए हैं लेकिन जंग जारी है और तनिक भी आत्मसंतोष आत्मघाती सिद्ध हो सकता है. दुश्मन मायावी है, अपने को कमजोर पड़ते देख वह फ़ौरन अपना रूप बदल लेता है और हम फिर कई कदम पीछे चले जाते हैं.

इजराइल एक उदाहरण है. छोटा देश है, सरकार टीकाकरण के प्रति कटिबद्ध थी, नागरिक अनुशासित हैं और इज़राइल दुनिया का पहला देश हुआ जहाँ साठ प्रतिशत से अधिक लोग पूरी तरह टीकाकृत होगये. इज़राइली वैज्ञानिकों के विचार से देश में यूथ प्रतिरक्षा (हर्ड इम्युनिटी) की स्थिति आगयी थी. कुछ दिन इन्तजार कर कोविड के चलते जितने प्रतिबन्ध थे – नकाब, सामाजिक दूरी वगैरह सब हटा दिए गए. पर यह एक महीने भी नहीं चला. वाइरस के डेल्टा रूपांतर पर टीकों के कम प्रभावी पाए जाने पर इस्राएल में प्रतिबन्ध फिर वापस लागू कर दिए गए. टीके के बावजूद वाइरस के विरुद्ध सबसे प्रभावी हथियार हैं नकाब, दूरी और हाथों को धोते रहना. लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि टीके किसी काम के नहीं हैं. इस लड़ाई में टीके का मूल्य नहीं आँका नहीं जा सकता. यह सच है कि टीकाकरण के बाद भी कुछ रूपांतरों से संक्रमण हो रहे हैं लेकिन यह भी सच है कि टीका लिए व्यक्ति की बीमारी गंभीर रूप नहीं ले रही.

वाइरस के बदलते रूप मिथकों के प्राणियों की याद दिलाते हैं. प्रायः सभी धर्मों के मिथकों में ऐसे प्राणियों की चर्चा है जो मनुष्यों पर हावी होने के लिए अपने रूप बदल लेते हैं. हिन्दुओं में ऐसे अनेक राक्षसों के उल्लेख हैं, अब्राहमिक धर्मों में शैतान ऐसा करते रहता है. सार्स कोवी 2 भी वैसा ही करता दिख रहा है. यह वाइरस, जिसके आदि स्रोत पर अभी तक पर्दा पड़ा हुआ है, दिसंबर 2019 में चीन के वुहान नगर में प्रकट हुआ और कुछ ही महीनों में इसने पूरी दुनिया को अपनी गिरफ्त में ले लिये. और आज अठारह महीने बाद भी स्थिति सामान्य नहीं हो पायी है.

वाइरस की संरचना से अब हम सब परिचित हो गए हैं. वसा और प्रोटीन की एक झिल्ली (खोल) के अंदर उसकी जेनेटिक सामग्री (उसका आरएनए) रहती है, खोल से कांटे जैसे प्रोटीन निकले रहते हैं जिन्हे स्पाइक प्रोटीन कहा जाता है. (स्पाइक के ऊपर पॉलीसैकेरॉइड्स रहते हैं जिससे यह अपने मेजबान के प्रतिरक्षा तंत्र की चौकसी से बच सके.) इस स्पाइक प्रोटीन के दो पृथक अंश (संघटक) हैं एस-1 और एस-2. एस-1 घटक हमारे शरीर की कोशिकाओं की बाहरी सतह पर मिलने वाले एक एन्ज़ाइम एसीई-2 से जुड़ता है और एस-2 घटक वाइरस की झिल्ली और हमारी कोशिका की झिल्ली को मिलाकर एक करता है जिससे वाइरस का आरएनए हमारी कोशिकाओं के अंदर पँहुच जाता है.

सार्स कोवी 2 का आरएनए अपेक्षाकृत लंबा है, तुलना के लिए, एचआईवी के आरएनए से तीन गुने से अधिक लम्बा. आरएनए जितना लंबा होता है उत्परिवर्तन प्रायः उतना ही कम उसमे देखा जाता है. इन्फ्लुएंजा वायरस और एचआईवी के उत्परिवर्तन दर सार्स कोवी 2 के उत्परिवर्तन दर से क्रमशः दो गुने और चार गुने अधिक हैं. मानव शरीर में प्रवेश करने के बाद वायरस के प्रतिजन (ऐंटीजेन) में कुछ बदलाव आते हैं, जितनी बार प्रवेश करता है उतने अधिक बदलाव आते हैं. धीरे धीरे इन बदलावों के चलते वायरस के व्यवहार में परिवर्तन दिखने लगते हैं और हम कहते हैं वायरस का नया रूपांतर आगया. विज्ञानियों की वायरस के प्रमुख रूपांतर में दिलचस्पी (वैरिएंट ऑफ़ इंटरेस्ट) रहती है और यदि किसी रूपांतर के गुण आशंका जगाते दीखते हैं तो इसे चिन्ताजनक रूपांतर (वैरिएंट ऑफ़ कंसर्न) कहा जाने लगता है.

डेल्टा प्लस रूपांतर को चिंताजनक रूपांतर करार किया जा चुका है. हर रोज किसी नए प्रान्त में इसके दिखने की बात आ रही है. यद्यपि हमारी चिंता हाल के हफ़्तों में बढ़ी है, इसके द्वारा हुए संक्रमण के जो आँकड़े आ रहे हैं वे लगभग सभी अप्रैल और मई महीने के हैं – उनके जेनोम को पढ़ने में देर होने के चलते हमें आज पता चल रहा है. और तब लगता है हमारी दूसरी लहर में, जिसे हम डेल्टा रूपांतर की लहर कह रहे थे, डेल्टा प्लस का भी शायद काफी हाथ रहा था.

डेल्टा रूपांतर में जिस उत्परिवर्तन के चलते डेल्टा प्लस आया है उसे ‘के417एन’ कहते हैं. इसका अर्थ हुआ वायरस के आरएनए की श्रृंखला में 417वीं जगह पर ‘के’ नामके एमिनो एसिड की जगह ‘एन’ नामका एमिनो एसिड आगया है. नामकरण की इस पद्धिति से हो रहे उत्परिवर्तनों को समझने में सहूलियत होती है और यदि ऐसा उत्परिवर्तन कहीं और देखा गया हो तो वह पहचान में आता है और उससे नयी जगह पर हुए उस रूपांतर के स्वभाव के बार में अनुमान लगाए जा सकते हैं.

यह उत्परिवर्तन, ‘के417एन’ पिछले साल के अंत में दिखे बीटा (दक्षिण अफ्रीकी) रूपांतर में पाए गए विहार उत्परिवर्तनों में से एक है. बीटा रूपांतर की संक्रामकता बहुत अधिक रही थी, उसी आधार पर यह अनुमान है कि डेल्टा प्लस की संक्रामकता भी बहुत अधिक है. बीटा रूपांतर टीकों से बने प्रतिरक्षियों (ऐंटीबॉडीज़) से बच निकलता था. उसी आधार पर अनुमान लगाया जा रहा है कि डेल्टा प्लस पर टीके उतने प्रभावी नहीं रहेंगे जितने वे वायरस के अब तक मिले रूपांतरों पर रहे हैं.

डेल्टा प्लस के पूर्वावतार डेल्टा रूपांतर का अभी यूके और यूरोप में खूनी दौर चल रहा है. यूके में आजकल 90% संक्रमण डेल्टा के बताए जा रहे हैं जो पहले अल्फा (पुराना नाम यूके या केंट) रूपांतर के होते थे.

स्मरण रहे, ऐस्ट्राज़ेनेका के टीके (हमारा कोविशील्ड वही है) का दक्षिण अफ्रीका में हुए तीसरे चरण के नैदानिक परीक्षण में बहुत अच्छा प्रदर्शन नहीं हुआ था. यह हमारे लिए विशेष चिंता की बात है क्योंकि भारत में अधिकांश लोगों को कोविशील्ड का टीका मिला है. वहीं हमारे दूसरे टीके कोवैक्सिन के बारे में जानकारी कम है क्योंकि अभी तक उसके परीक्षण के आँकड़े जन-साधारण के लिए उपलब्ध नहीं हुए हैं. इस लिए बहुत जरूरी है कि हम सब संभव सावधानियाँ बरतते रहें.

एक अच्छी खबर है कि टीका-उत्पादक टीकों के नए संस्करण बनाने में सक्रिय हो चुके हैं, ये नए टीके कुछ महीनों में उपलब्ध हो जाएंगे, और आशा की जाती है, वायरस के सभी रूपांतरों पर प्रभावी रहेंगे. भारतीयों के लिए एक और अच्छी खबर है कि भारत की कम्पनी जेनोवा फार्मा ने एमआरएनए पर आधारित अपने टीके का दूसरे चरण का नैदानिक पिछले अप्रैल से शुरु कर दिया है और उम्मीद है यह टीका भी कुछ महीनों में उपलब्ध हो जाएगा. पिछले सप्ताह केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि ज़ाइडस कैडिला का टीका भी जल्द उपलब्ध होगा जो 12 से 18 वर्ष वय वालों को दिया जा सकेगा.!

(औषधि विभाग, आरएमसीएच, राँची के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ Rajendra Jha के लेख का हिंदी रूपांतर। डॉ झा का, 28 जून 2021 के पायोनियर राँची में प्रकाशित हुवे लेख के अनुवाद कर्ता Sachidanand Singh हैं।)

मुहम्मद रफ़ी : हम तुम्हें यूं भुला न पाएंगे !

Dhruv Gupt

हिंदी फिल्मों की संगीत यात्रा में मरहूम मोहम्मद रफ़ी एक ऐसा पड़ाव है जहां कान तो क्या, कुछ देर के लिए रूह भी ठिठक जाया करती है। वे संगीत की वह अज़ीम शख्सियत थे जिनकी आवाज़ की शोख़ियों, गहराईयों, उमंग और दर्द के साथ इस देश की कई पीढियां जवान और बूढ़ी हुईं ! उनकी आवाज़ और जज़्बों की रूहानी अदायगी ने हमारी मुहब्बत को लफ्ज़ बख्शे, सपनों को पंख दिए, शरारतों को अंदाज़ और व्यथा को बिस्तर अता की। आवाज़ की विविधता और रेंज ऐसी कि प्रेम की असीमता से वैराग्य तक, गंभीरता से चुलबुलापन तक, अध्यात्म से मासूमियत तक, ग़ालिब की ग़ज़ल से कबीर के पद तक, भजन से कव्वाली तक, शास्त्रीय गायन से लोकगीत तक – सब एक ही गले में समाहित हो जाय। अमृतसर के कोटला सुल्तान सिंह में हज़ामत की दुकान से भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे लोकप्रिय आवाज़ तक का उनका सफ़र किसी परीकथा जैसा लगता है। 1944 में पंजाबी फिल्म ‘गुल बलोच’ के गीत ‘सोनिये नी, हीरीये नी’ से बहुत छोटी सी शुरूआत करने वाले रफ़ी की आवाज़ को संगीतकार नौशाद और शंकर जयकिशन ने निखारा और बुलंदी दी।

चालीस साल लंबे फिल्म कैरियर में हिंदी, मराठी, तेलगू, असमिया, पंजाबी,भोजपुरी भाषाओं में छब्बीस हजार से ज्यादा गीतों को आवाज़ देने वाले इस सर्वकालीन महानतम गायक और सदा हंसते चेहरे वाली बेहद प्यारी शख्सियत मोहम्मद रफ़ी के इंतकाल के बाद संगीतकार नौशाद ने कहा था – कहता है कोई दिल गया, दिलबर चला गया/ साहिल पुकारता है समंदर चला गया / लेकिन जो बात सच है वो कहता नहीं कोई/ दुनिया से मौसिकी का पयंबर चला गया।’

किशोर कुमार : आए तुम याद मुझे !

Dhruv Gupt

अपने सार्वजनिक जीवन में बेहद चंचल, खिलंदड़े , शरारती और निजी जीवन में उदास, खंडित और अकेले किशोर कुमार रूपहले परदे के सबसे रहस्यमय और विवादास्पद व्यक्तित्वों में एक रहे हैं। बात अभिनय की हो तो अपने समकालीन दिलीप कुमार, राज कपूर, देवानंद, अशोक कुमार जैसे अभिनेताओं की तुलना में वे कहीं नहीं ठहरते, लेकिन वे ऐसे पहले अदाकार थे जिनके पास अपने समकालीन अभिनेताओं के बरक्स मानवीय भावनाओं और विडंबनाओं को अभिव्यक्त करने का अलग अंदाज़ था। हिंदी सिनेमा के वे ऐसे नायक थे जिन्होंने नायकत्व की स्थापित परिभाषाओं को बार-बार तोडा। वे ऐसे विदूषक थे जो जीवन की त्रासद से त्रासद परिस्थितियों को एक हंसते हुए बच्चे की निगाह से देख सकते थे। हाफ टिकट, चलती का नाम गाड़ी, रंगोली, दूर का राही, मनमौजी, झुमरू, दूर गगन की छांव में, पड़ोसन जैसी फिल्मों में उन्होंने अभिनय के नए अंदाज़, नए मुहाबरों से हमें परिचित कराया। अभिनय से ज्यादा स्वीकार्यता उन्हें उनके गायन से मिली। मोहम्मद रफ़ी के बाद वे अकेले गायक थे जिनकी विविधता सुनने वालों को हैरत में डाल देती है। ‘ओ मेरी प्यारी बिंदु’ की शोख़ी, ‘ये दिल न होता बेचारा’ की शरारत, ‘ज़िन्दगी एक सफ़र है सुहाना’ की मस्ती, ‘ये रातें ये मौसम नदी का किनारा’ का रूमान ,’चिंगारी कोई भड़के’ का वीतराग, ‘सवेरा का सूरज तुम्हारे लिए है’ की संजीदगी, ‘घुंघरू की तरह बजता ही रहा हूं मैं’ की निराशा, ‘कोई हमदम न रहा’ की पीड़ा, ‘मेरे महबूब क़यामत होगी’ की हताशा, ‘दुखी मन मेरे सुन मेरा कहना’ का वैराग्य – भावनाओं की तमाम मनःस्थितियां एक ही गले में समाहित ! उनके गाए सैकड़ों गीत हमारी संगीत विरासत का अनमोल हिस्सा हैं।

सुचेता कृपलानी : भारत के किसी भी राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री

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Raaj Tripathi

वह अरुणा आसफ अली और ऊषा मेहता के साथ आजादी के आंदोलन में शामिल हुई। सुचेता कृपलानी ने भारत छोड़ो आंदोलन में योगदान दिया और नोआखली में महात्मा गांधी के साथ दंगा पीडित इलाकों में गांधी जी के साथ चलते हुए पीड़ित महिलाओं की मदद की। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री के तौर पर उन्होंने हड़ताली कर्मचारियों को मजबूत इच्छाशक्ति के साथ हड़ताल वापस लेने पर मजबूर किया। वह एक ऐसी महिला थीं, जिसमें जुझारूपन कूट-कूट कर भरा था। अपने जुझारूपन और सूझ-बूझ का उदहारण उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान दिया। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब अंग्रेजी सरकार ने सारे पुरुष नेताओं को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया तब सुचेता कृपलानी ने अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए कहा, ‘बाकियों की तरह मैं भी जेल चली गई तो आंदोलन को आगे कौन बढ़ाएगा।’ इस दौरान भूमिगत होकर उन्होंने कांग्रेस का महिला विभाग बनाया और पुलिस से छुपते-छुपाते दो साल तक आंदोलन भी चलाया। उन्होंने इसके अंतर्गत ‘अंडरग्राउण्ड वालंटियर फोर्स’ भी बनाई और महिलाओं और लड़कियों को ड्रिल, लाठी चलाना, प्राथमिक चिकित्सा और आत्मरक्षा के लिए हथियार चलाने की ट्रेनिंग भी दी। इसके साथ-साथ वह राजनैतिक कैदियों के परिवार की सहायता की जिम्मेदारी भी उठाती रहीं।

आजादी के बाद
आजादी के बाद हुए पहले चुनाव में सुचेता कृपलानी नई दिल्ली लोकसभा सीट से 1952 व 57 में लगातार 2 बार सांसद चुनी गईं। इसके बाद 1962 में कानपुर से उत्तर प्रदेश विधानसभा की सदस्य चुनीं गयीं। सन 1963 में उन्हें उत्तर प्रदेश का मुख्य मंत्री बनाया गया। 5 साल तक प्रदेश की मुख्यमंत्री के रूप में कार्य करने के बाद वह वापस केंद्र में पहुंची। चौथी लोकसभा में उत्तर प्रदेश के गोंडा से वह सांसद चुनीं गयीं। सन 1971 में सुचेता कृपलानी ने राजनीति से संन्यास ले लिया था। 1 दिसंबर 1974 को उनकी मृत्यु हो गई थीं।