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1857 का विद्रोह और सूबेदार सीताराम की आपबीती

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By Shubhneet Kaushik

सन सत्तावन के विद्रोह को उसकी समग्रता में समझने के लिए विष्णुभट्ट गोडसे, मिर्ज़ा ग़ालिब, सैयद अहमद खाँ और सत्तावनी क्रांति से जुड़े गीतों, लोकगाथाओं (जिन्हें अमृतलाल नागर ने ‘ग़दर के फूल’ में बड़े परिश्रम से संगृहीत किया) के साथ-साथ सूबेदार सीताराम की यह आपबीती भी पढ़नी चाहिए। अवध के तिलोई गाँव में वर्ष 1797 में जन्मे सीताराम पांडे युवावस्था में ही ईस्ट इंडिया कम्पनी की फ़ौज में दाखिल हो गए और अगले पाँच दशकों तक कम्पनी की फ़ौज से जुड़े रहे। यह किताब 1812 से लेकर 1860 तक कम्पनी के सिपाही और सूबेदार के रूप में हासिल हुए उनके अनुभवों का विस्तृत लेखा-जोखा है।

सीताराम मौत के मुँह में जाने से बाल-बाल बचते हैं, अफगानिस्तान में ग़ुलाम बनकर दो साल गुज़ारते हैं और विद्रोह के दौरान अपने विद्रोही बेटे को मृत्युदंड दिए जाते देखने को अभिशप्त होते हैं। उनकी यह आपबीती 1857 के विद्रोह से पहले ईस्ट इंडिया कम्पनी द्वारा चलाए गए सैन्य अभियानों जैसे भरतपुर, ग्वालियर, नेपाल और अफगानिस्तान, सिखों से हुई लड़ाईयों का भी सिलसिलेवार ब्यौरा देती है। सीताराम ठगों और पिंडारियों के विरुद्ध चले अभियानों में भी भागीदार रहे थे। ठगों और पिंडारियों का शिकार होने से बचने की उनकी रोमांचक कहानी रोंगटे खड़े कर देती है।

ख़ुद सूबेदार सीताराम भले ही विद्रोही न बने हों, लेकिन उनकी यह आपबीती उन स्थितियों का, हालात का विवरण ज़रूर देती है, जिसने 1857 के विद्रोह की पृष्ठभूमि तैयार की। वह चाहे अंग्रेज़ सैन्य अधिकारियों द्वारा किया जाने वाले नस्लीय दुर्व्यवहार हो, वेतन-भत्ते का सवाल हो, धर्म द्वारा निषिद्ध क्षेत्रों में सिपाहियों को जबरन ले जाना हो, या फिर सिपाहियों के सामाजिक जीवन से जुड़ी समस्याएँ हों। इन सभी का परिचय इस किताब में मिलता है।

सूबेदार सीताराम की यह आपबीती ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों और नीति निर्माताओं के मन में चल रही उथल-पुथल का भी विवरण देती है। मसलन उन्नीसवीं सदी में ब्रिटिश अधिकारियों, गवर्नर-जनरलों के मन में छाया हुआ रूस के आक्रमण का भय। रूसी हमले के इसी भय ने कम्पनी के अधिकारियों को अफगानिस्तान में राजनीतिक हस्तक्षेप करने और दोस्त मुहम्मद को गद्दी से हटाकर शाह शुजा को गद्दी पर बैठाने के लिए सैन्य अभियान चलाने को प्रेरित किया। इसी अभियान के दौरान काबुल में सीताराम को ग़ुलाम बनाकर बेच दिया गया। बड़ी मुश्किल से वे वहाँ से भागने में सफल हुए। हिंदुस्तान लौटकर वे लम्बी जद्दोजहद के बाद फिर से सेना में शामिल हुए। लेकिन यहाँ सेना में उनके साथ भेदभाव किया जाने लगा – अंग्रेजों द्वारा ही नहीं हिंदुस्तानी सिपाहियों द्वारा भी।

इसी संदर्भ में सूबेदार सीताराम ने लिखा है कि ‘मैं ज़िंदगी से थक गया था। काबुल में मैं वहाँ से निकल भागने के बारे में सोच-सोचकर ज़िंदा रहा। रोज़ वही सपना देखता। अब आज़ाद हूँ लेकिन इस आज़ादी से मुझे क्या मिला? इतना दुःख झेला लेकिन न तरक़्क़ी मिली, न इनाम।’ यह आपबीती हिंदुस्तानी सिपाहियों के अपने जातिगत पूर्वग्रहों और उनकी संकीर्णताओं की भी झलक देती है। सत्तावन के विद्रोह के तीन साल बाद लिखी गई इस आपबीती का अनुवाद जेम्स नॉरगेट ने ‘फ्राम सिपॉय टू सूबेदार : बीइंग द ऑटोबायोग्रफ़ी ऑफ़ ए सिपॉय’ शीर्षक से किया। इस महत्त्वपूर्ण पुस्तक का हिंदी अनुवाद मधुकर उपाध्याय ने किया है, जो वाणी प्रकाशन से छपा है। ज़रूर पढ़ें।

दरभंगा नरेश रामेश्वर सिंह के बिना बी.एच.यू. का सपना पूरा नहीं हो ​पाता, सत्य तो यही है

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मेड़तिया-गोडवाड़

वैसे विगत सौ वर्षों में ​काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने देश को अनगिनत प्रतिभाएं दी हैं। बड़े साहित्यकार, वैज्ञानिक, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और भी न जाने कितने क्षेत्रों में कितनी प्रतिभाएं। परन्तु, जो एक सत्य है​,​ उसे पिछले ​दस दसकों में, चाहे जिन कारणों छुपा कर रखा गया, या फिर उसे उतना तबज्जो नहीं दिया गया​,​ जिसके लिए हकदार था।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के १०० साल होने पर महाराजा दरभंगा के परिवार से जुड़े एक लेखक ने सभी साक्ष्यों के आधार पर, उस ज़माने में हुए सभी पत्राचार साथ जो पुस्तक का प्रकाशन किये हैं समस्त बातों को सामने परोस दिए हैं जो महामना को आगे बढ़ाने के लिए बहुत सारी बातों को किनारे कर दिया है।

​”द इन्सेप्शन ऑफ़ बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी: हू वाज द फाउण्डर इन द लाईट ऑफ़ हिस्टोरिकल डाकुमेंट्स” ​नामक पुस्तक के लेखक श्री तेजकर झा। तेजकर झा पटना विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में ऍम ए किये और पिछले कई वर्षों से महाराजा दरभंगा, जिन्होंने अपने जीवनकाल में भारतीय शैक्षणिक जगत में आमूल परिवर्तन लाने के लिए अथक प्रयास किये और दान दिए, से सम्बंधित सभी दस्तावेज इकठ्ठा कर रहे हैं चाहे बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय हो या पटना विश्वविद्यालय, या कलकत्ता विश्वविद्यालय, या बम्बई विश्वविद्यालय या मद्रास विश्वविद्यालय या अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय।

​इस पुस्तक में लेखक ने दावा किया है बेशक बीएचयू की स्थापना और उसके बाद उसके विकास में मालवीयजी से जुड़े ऐसे अनेकानेक प्रसंग हैं, जो यह साबित करते हैं कि महामना की इच्छाशक्ति, ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और संघर्ष के बीच सृजन के बीज बोने की लालसा ने बीएचयू को उस मुकाम की ओर बढ़ाया, जिसकी वजह से आज यह दुनिया के प्रतिष्ठित संस्थानों में शामिल है, लेकिन अब जब बीएचयू 100 साल का हो गया है, तो कुछ ऐसी कहानियों को जान लेना जरूरी है, जो इतिहास के पन्ने में जगह पाये बिना ही दफन हैं।

इस विश्वविद्यालय की स्थापना में मदनमोहन मालवीय की जो भूमिका थी, वह तो सब जानते हैं, लेकिन कुछ और लोगों की ऐसी भूमिका थी, जिनके बिना बीएचयू का यह सपना पूरा नहीं हो ​पाता। महामना के अलावा दो प्रमुख नामों में एक एनी बेसेंट का है और दूसरा अहम नाम दरभंगा के नरेश रामेश्वर सिंह का है। यहां यह महत्वपूर्ण है कि बीएचयू के लिए पहला दान भी बिहार से ही मिला था।

रामेश्वर सिंह ने ही पहले दान के रूप में पांच लाख रुपये दिये थे और उसके बाद दान का सिलसिला शुरू हुआ था।​ बी एच यू की नींव चार फरवरी 1916 को रखी गयी थी, उसी दिन से सेंट्रल हिंदू कॉलेज मेंं पढ़ाई भी शुरू हो गयी थी। नींव रखने लॉर्ड हार्डिंग्स बनारस आये थे।

इस समारोह की अध्यक्षता दरभंगा के महाराज रामेश्वर सिंह ने की थी। बीएचयू के स्थापना से जुड़ा एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि इसकी स्थापना भले 1916 में हुई, लेकिन 1902 से 1910 के बीच एक साथ तीन लोग हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की कोशिश में लगे हुए थे।

एनी बेसेंट, पहले से बनारस में हिंदू कॉलेज चला रही थी, वह चाहती थीं कि एक हिंदू विश्वविद्यालय हो। इसके लिए इंडिया यूनिवर्सिटी नाम से उन्होंने अंगरेजी सरकार के पास एक प्रस्ताव भी आगे बढ़ाया, लेकिन उस पर सहमति नहीं बन सकी।

महामना मालवीय ने भी 1904 में परिकल्पना की और बनारस में सनातन हिंदू महासभा नाम से एक संस्था गठित कर एक विश्वविद्यालय का प्रस्ताव पारित करवाया। सिर्फ प्रस्ताव ही पारित नहीं करवाया बल्कि एक सिलेबस भी जारी किया। इस प्रस्ताव में विश्वविद्यालय का नाम भारतीय विश्वविद्यालय सोचा गया।

उसी दौरान दरभंगा के राजा रामेश्वर सिंह भारत धर्म महामंडल के जरिये शारदा विश्वविद्यालय नाम से एक विश्वविद्यालय का प्रस्ताव पास करवाये। तीनों बनारस में ही विश्वविद्यालय चाह रहे थे, तीनों अंगरेजी शिक्षा से प्रभावित हो रहे भारतीय शिक्षा प्रणाली से चिंतित होकर इस दिशा में कदम बढ़ा रहे थे, लेकिन अलग-अलग प्रयासों से तीनों में से किसी को सफलता नहीं मिल रही थी।

अंगरेजी सरकार ने तीनों के प्रस्ताव को खारिज कर दिया। बात आगे बढ़ न सकी तो अप्रैल 1911 में महामना मालवीय और एनी बेसेंट की मीटिंग हुई। तय हुआ कि एक ही मकसद है, तो फिर एक साथ काम किया जाए। बात तय हो गयी, लेकिन एनी बेसेंट उसके बाद इंगलैंड चली गयीं। उसी साल सितंबर-अक्तूबर में जब इंगलैंड से एनी बेसेंट वापस लौटीं तो दरभंगा के राजा रामेश्वर सिंह के साथ मीटिंग हुई और फिर तीनों ने साथ मिलकर अंगरेजी सरकार के पास प्रस्ताव आगे बढ़ाया। तब बात हुई कि अंगरेजी सरकार से बात कौन करेगा ?

इसके लिए महाराजा रामेश्वर सिंह के नाम पर सहमति बनी। रामेश्वर सिंह ने 10 अक्तूबर को उस समय के शिक्षा विभाग के सदस्य या यूं कहें कि शिक्षा विभाग के सर्वेसर्वा हारकोर्ट बटलर को चिट्ठी लिखी कि हमलोग आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ भारतीय शिक्षा प्रणााली को भी आगे बढ़ाने के लिए इस तरह के एक विश्वविद्यालय की स्थापना करना चाहते हैं।

12 अक्तूबर को बटलर ने जवाबी चिट्ठी लिखी और कहा कि यह प्रसन्नता की बात है और बटलर ने चार बिंदुओं का उल्लेख करते हुए हिदायत दी कि ऐसा प्रस्ताव तैयार कीजिए, जो सरकार द्वारा तय मानदंड पर खरा उतरे। यह हुआ, यूनिवर्सिटी के लिए सेंट्रल हिंदू कॉलेज को दिखाने की बात ​हुई।

17 अक्तूबर को मेरठ में एक सभा हुई, जिसमें रामेश्वर सिंह ने यह घोषणा की कि हम तीनों मिलकर एक विश्वविद्यालय स्थापित करना चाहते हैं, इसमें जनता का समर्थन चाहिए। जनता ने उत्साह दिखाया। उसके बाद 15 दिसंबर 1911 को सोसायटी फॉर हिंदू यूनिवर्सिटी नाम से एक संस्था का निबंधन हुआ, जिसके अध्यक्ष रामेश्वर सिंह बनाये गये. उपाध्यक्ष के तौर पर एनी बेसेंट और भगवान दास का नाम रखा गया और सुंदरलाल सचिव बने।

एक जनवरी को रामेश्वर सिंह ने पहले दानदाता के रूप में पांच लाख रुपये देने की घोषणा हुई और तीन लाख रुपये उन्होंने तुरंत दिये। खजूरगांव के राजा ने सवा लाख रुपये दान में दिये। इस तरह से चंदा लेने और दान लेने का अभियान शुरू हुआ। बिहार और बंगाल के जमींदारों और राजाओं से महाराजा रामेश्वर सिंह ने धन लेना शुरू किया और 17 जनवरी 1912 को टाउन हॉल, कोलकाता में उन्होंने कहा कि इतने ही दिनों में 38 लाख रुपये आ गये हैं।

दान लेने का अभियान आगे बढ़ते रहे, इसके लिए 40 अलग-अलग कमिटियां बनायी गयी। राजा रजवाड़ों से चंदा लेने के लिए अलग कमिटी बनी, जिसका जिम्मा रामेश्वर सिंह ने लिया और इसके लिए वे तीन बार देश भ्रमण पर निकले, जिसकी चर्चा उस समय के कई पत्रिकाओं में भी हुई।

विश्वविद्यालय के लिए जमीन की बात आयी तो काशी नरेश से कहा गया। काशी नरेश ने तीन अलग-अलग स्थलों को इंगित कर कहा कि जो उचित हो, ले लें। 22 मार्च 1915 को इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में बीएचयू बिल पेश किया गया। बहस हुई. इस बिल को बटलर ने पेश किया। महाराजा रामेश्वर सिंह, मालवीयजी समेत कई लोगों ने भाषण दिये। बहस हुई और बिल पास होकर एक्ट बन गया। शुरुआत के लिए कई तिथियों का निर्धारण हुआ लेकिन आखिरी में, तिथि चार फरवरी 1916 निर्धारित हुई। हार्डिंग्स शिलान्यासकर्ता रहे, महाराजा रामेश्वर सिंह अध्यक्षीय भाषण दिया और जोधपुर के राजा ने धन्यवाद ज्ञापन ​किया।

परन्तु यदि देखा तो आज विश्वविद्यालय के बनने की यह कहानी दफन है। रामेश्वर सिंह ने अगर भूमिका निभायी, जिसके सारे दस्तावेज और साक्ष्य मौजूद हैं तो फिर क्यों महज एक दानकर्ता के रूप में विश्वविद्यालय में उनका नाम एक जगह दिखता है ?

1914 और 1915 में लंदन टाइम्स, आनंद बाजार पत्रिका से लेकर स्टेट्समैन जैसे अखबारों तक में रिपोर्ट भरे हुए हैं, जिसमें महाराजा रामेश्वर सिंह के प्रयासों की चर्चा है और विश्वविद्यालय के स्थापना के संदर्भ में विस्तृत रिपोर्ट है। इस पुस्तक के माध्यम से लेखक ने यह दावा किया है कि वे जो बाते कहे हैं उसका मकसद मालवीयजी की क्षमता को कम करके आंकना नहीं है, लेकिन बिहार के जिस व्यक्ति ने इतनी बड़ी भूमिका निभायी, उसकी उचित चर्चा नहीं होना अखरता रहा।

बीएचयू के किस्सों में ​यह भी कहा जाता है कि इस विश्वविद्यालय की स्थापना महामना मदनमोहन मालवीय जब कर रहे थे, तो भिक्षा मांगते हुए हैदराबाद के निजाम के पास भी पहुंचे और निजाम ने जब जूती दान में दिया तो महामना ने उसकी बोली लगवायी। इसी तरह एक कहानी यह कहा जाता है कि काशी के महाराज के पास जब विश्वविद्यालय के लिए जमीन दान मांगने महामना गये तो महाराज ने कहा कि जितनी जमीन पैदल चलकर नाप सकते हैं, वह सब विश्वविद्यालय के लिए होगा और फिर मालवीयजी ने ऐसा किया। परन्तु, सत्य को हमेशा दफ़न किया गया।

औपनिवेशिक बिहार के साहित्यिक हीरो : ईश्वरीप्रसाद शर्मा

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Dr Raju Ranjan Prasad

सन् 1893 में जन्मे ईश्वरीप्रसाद शर्मा आरा नगर के मिश्रटोला मुहल्ले के निवासी सारंगधर मिश्र के इकलौते पुत्र थे। आपका परिवार आरंभ ही से शिक्षित-प्रतिष्ठित एवं गण्यमान्य रहा है। आपके पूर्वजों में चाचा पंडित श्रीधर मिश्र, पितामह पिनाकधर मिश्र तथा हिन्दी के आदि-गद्य लेखकों में शुमार पंडित सदल मिश्र रहे हैं।आप सात वर्ष के हुए तभी आपके पिताजी का देहांत हो गया। 1909 ईस्वी में आपकी माताजी भी चल बसीं। अब तो चाचा-चाची का प्यार ही ईश्वर का एकमात्र सहारा था। चाचा-चाची प्यार से इन्हें ‘बच्चनजी’ कहकर पुकारते। बचपन के साथी आपको ‘दीना’ या ‘दीनानाथ’ कहा करते। ‘मनोरंजन’ के संपादक स्वयं भी मनोरंजन-मूर्ति थे। हँसाने, गुदगुदाने या चिकोटी काटने का उनका स्वभाव था। रामवृक्ष बेनीपुरी ने लिखा है, ‘एक बार काशी में मैं एक मारवाड़ी वासे में पालथी मारकर भोजन कर रहा था। पीछे से आकर किसी ने ऐसा गुदगुदा दिया कि मैं उठ खड़ा हुआ। मुड़कर देखता हूँ शर्मा जी खिलखिला रहे हैं।’ (रामवृक्ष बेनीपुरी, ‘मुझे याद है’, नई धारा, वर्ष 4, अंक 10, पृष्ठ 83)

आपकी आरंभिक स्कूली शिक्षा आरा के ‘कायस्थ जुबली एकेडमी’ में हुई जहां के बाद में आप हिन्दी-शिक्षक नियुक्त हुए। सन् 1905 ईस्वी के स्वदेशी आंदोलन के युग में, इसी स्कूल की एक सभा में आपने अपना पहला व्याख्यान किया था। आपका पहला लेख, जो गद्य-काव्य था, 1909 ईस्वी में ‘भारत-जीवन’ में छपा था।

आरा के महामहोपाध्याय पंडित सकलनारायण शर्मा के संपादन में 1900 ई. में ‘शिक्षा’ नामक साप्ताहिक की शुरुआत खड्गविलास प्रेस (पटना) से हुई थी जिसके संपादकों के इतिहास में भी ईश्वरीप्रसाद शर्मा का नाम जुड़ा है। 1912 ईस्वी में आपने आरा से सचित्र हिन्दी-मासिक ‘मनोरंजन’ का प्रकाशन किया, जिसकी उन दिनों बड़ी धूम थी। उस समय की प्रसिद्ध मराठी मासिक पत्रिका ‘मनोरंजन’ के तर्ज पर शर्मा जी ने इसे निकाला था। यद्यपि शर्मा जी की पत्रिका अपने मिजाज में साहित्यिक थी, किंतु शिक्षा संबंधी सामग्री की वजह से शीघ्र ही छात्रों के बीच लोकप्रिय हो गई। इस पत्रिका ने तीन वर्ष के अल्पकाल का जीवन प्राप्त किया था।

यह नये ढंग का बहुत ही सुसज्जित और सुंदर मासिक था। तृतीय बिहार प्रादेशिक हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सभापति बाबू शिवनन्दन सहाय के शब्दों में : ‘मनोरंजन खूब सज-धज कर निकलता था और अपने सुंदर लेखों से मन को रंजित किया करता था’। इसके दो महत्त्वपूर्ण विशेषांक भी प्रकाशित हुए थे। इस सर्वांगसुंदर विशेषांक के प्रकाशन का सारा खर्च श्रीरघुवीर नारायणजी ने राजाबहादुर कीर्त्यानन्द सिंह से दिलवाया था। इसके बाद आरा से ऐसी सर्वगुणसंपन्न कोई पत्रिका प्रकाशित नहीं हो सकी।

‘मनोरंजन’ ने जिस समय बिहार प्रान्त में कार्य करना आरंभ किया था, उस समय इस प्रान्त में एकमात्र लक्ष्मी ही एक ऐसी मासिक पत्रिका थी जो अच्छी श्रेणी में गिनी जाती थी, परमात्मा की दया और हिन्दी के धुरन्धर लेखकों और कवियों की लेखनी का साहाय्य पाकर ‘मनोरंजन’ ने वर्ष ही भर में पत्र-साहित्य में एक अच्छा स्थान प्राप्त कर लिया, पर कहते दुःख होता है कि इसके प्रकाशन का भार भी हमारे ही निर्बल स्कन्धों पर रहने के कारण अर्थ की कृच्छ्रता से और प्रेस अपना न होने से गत वर्ष इसका जीवन नितान्त ही संशयापन्न हो गया था और यदि हरदास एण्ड कम्पनी के सुयोग्य संचालक पण्डित हरिदासजी वैद्य अपनी दयालुता से इसे फिर नहीं अपनाते तो शायद ‘मनोरंजन’ फिर नहीं निकल पाता, पर उक्त महोदय ने जिस प्रकार उत्साह देकर प्रथम वर्ष इसे निकलवाया उसी प्रकार मरने से भी इसका उद्धार किया और इसने फिर दुनिया का मुँह देखा। अबके प्रबन्ध अच्छा कर लिया गया है और यदि हमारे ग्राहकों ने पुरानी गड़बड़ी का खयाल छोड़कर सहायता की कमर कसी तो दो ही चार महीनों में इसकी रही-सही त्रुटियाँ भी दूर हो जायेंगी और कुछ ही अंकों के बाद चित्र और पृष्ठ तथा कागज की किस्म बढ़ाने का उद्योग किया जायगा। आशा है कि हमारे पाठक ‘मनोरंजन’ की सहायता को अग्रसर होंगे।’

रामसहाय लाल बुकसेलर ने 1921 ई. में द्विजदेव नारायण लाल के संपादकत्व में ‘श्रीविद्या’ नामक मासिक पत्रिका शुरू की थी जिसके संपादकों में लाला भगवानदीन, अखौरी शिवनन्दन सहाय के साथ ईश्वरीप्रसाद शर्मा का भी नाम है। लाला भगवानदीन के बाद आपने गया से निकलनेवाली पत्रिका ‘लक्ष्मी’ का भी संपादन किया था।

ईश्वरीप्रसाद शर्मा हास्य-व्यंग्य के उस्ताद, फक्कड़ों के बादशाह, मतवाला मंडल के सहयोगी थे। दफ्तर कभी वक्त से न जाते थे। मित्रों से कहते थे-‘त्यागपत्र हमेशा जेब में रखता हूं’। स्वादिष्ट भोजन करना, आये दिन थियेटर देखना, मित्रों के साथ गप लगाना, दूसरों को काम न करने देना-यही उनका दैनिक कार्यक्रम था। उनकी स्मृति इतनी तीक्ष्ण थी कि सैंकड़ों कविताएँ याद थीं। संस्कृत, बंगला, हिन्दी, उर्दू जब जिस भाषा की जरूरत हुई, सुनाने लगते थे। इस वैविध्य का वे यथोचित लाभ लेते। अनुवाद से लेकर व्यापारियों के लिए विज्ञापन लिखने तक जब जैसा काम मिला, वह आनन-फानन कर डालते थे और क्या मजाल कि कभी लिखे को काटना पड़ा हो।

पंडित ईश्वरीप्रसाद शर्मा, शिवपूजन सहाय के गुरु कहे जाते हैं। आरंभ में इन्हीं के प्रोत्साहन से शिवपूजन सहाय ने हिन्दी-सेवा का व्रत लिया था। कुछ दिन तक आगरे में साथ रहकर दोनों ‘धर्माभ्युदय’ पत्र में काम कर चुके थे। इस पत्रिका का आधा अंश गुजराती में रहता था। आपने कुछ ही दिनों बाद उसे सर्वांग हिन्दीमय कर डाला। शर्मा जी केवल साहित्यिक गुरु न थे बनियों से पैसा वसूल करने की कला में कलकत्ते के हिन्दी लेखकों के ‘आचार्य’ थे। शिवपूजन सहाय को समझाते, ‘सीधी उंगली से घी नहीं निकलता। पेशगी रुपया मांगो; मिल जाय तो कहो, बकाया वसूल पाया।’

थियेटर देखने के शौकीन तो थे ही, अभिनय में भी बेजोड़ थे। आरा में आपने एक ‘मनोरंजन नाटक मंडली’ स्थापित कर ली थी, जो अच्छे-अच्छे नाटकों का सदा अभिनय करती थी। इस मंडली द्वारा प्रस्तुत नाटकों में आप भी एक सफल हास्य अभिनेता के रूप में रंगमंच पर उतरते थे। इस नाटक मंडली ने आपके द्वारा लिखित ‘सूर्योदय’ नामक नाटक का सफलतापूर्वक अभिनय किया था। इसमें आप स्वयं रंगमंच पर उतरे थे। इस मंडली द्वारा ‘सत्यहरिश्चन्द्र’, ‘मयूरध्वज’ आदि और भी कई नाटक अभिनीत हुए थे। ‘सत्यहरिश्चन्द्र’ में आपने डोम का स्वांग धारण किया था और ‘मयूरध्वज’ में भगवान श्रीकृष्ण का। एक बार ‘आरा नागरी-प्रचारणी सभा’ के वार्षिकोत्सव के अवसर पर आपने स्व. प. शिवनाथ शर्मा (‘आनंद’-संपादक) द्वारा रचित नागरी-निरादर’ नामक प्रहसन में मौलाना के वेष में रंगमंच पर उतरकर जबानदानी के बड़े-बड़े मौलवियों को भी हैरत में डाल दिया था। ‘सत्य हरिश्चंद्र’ में डोम का पार्ट इतना बढि़या किया था कि शिवपूजन सहाय हंसते-हंसते लोट-पोट हो गए थे।

एक अनुवादक के रूप में आपकी बड़ी ख्याति है। मराठी से आपने ‘इन्दुमती’ और ‘रत्नदीप’ नामक उपन्यास का अनुवाद किया था। गुजराती से आपने जैनधर्म संबंधी पुस्तकों का अनुवाद किया था। ये पुस्तकें एक जैन प्रकाशक के नाम से प्रकाशित हुई हैं। बंगला से आपने किन्नरी’, ‘अन्नपूर्णा का मन्दिर’, ‘जल-चिकित्सा’ आदि अनेक प्रसिद्ध ग्रंथों का अनुवाद किया था। ‘पंजाब-हत्याकांड’ जैसी पुस्तक का बंगला-अनुवाद आपने एक ही महीने में करके श्रीनिहालचन्द्र वर्मा को दे डाला था। कलकत्ता के हरिदास एंड कंपनी से प्रकाशित ‘बंगला-हिन्दी कोश’ आपके केवल तीन महीने का फल है। मेरी कॉरेली लिखित ‘थेल्मा’ का अनुवाद आपने रामवृक्ष बेनीपुरी के अनुरोध पर एक पखवारे में ही कर डाला था। एक बार ग्रियर्सन्स ‘मैगजीन’ के पुराने अंकों की कुछ कहानियों का दस-पन्द्रह दिनों में ही अनुवाद कर आपने ‘प्रेमगंगा’ के नाम से पुस्तक तैयार कर ली, जो लखनऊ की गंगा पुस्तकमाला से प्रकाशित और बनैली राज के कुमार रामानन्द सिंह को समर्पित हुई। इसके लिए कुमार साहब ने आदरपूर्वक बुलाकर आपको पांच सौ रुपये दिये थे। संस्कृत से हिन्दी अनुवाद के लिए प्रसिद्ध नवलकिशोर प्रेस से वाल्मीकीय रामायण के विषय में बहुत दिनों से पत्र-व्यवहार हो रहा था।

आपकी लिखी सबसे पहली मौलिक पुस्तक ‘चन्द्रकुमार’ उपन्यास है, जिसका प्लॉट घर की मजदूरिन के मुंह से सुनी कहानी के आधार पर रचा गया था। इसके बाद आपने ‘हिरण्यमयी’ की रचना की। इन दोनों पुस्तकों के बाद आपने अनेक पुस्तकें लिखीं और अनूदित कीं। इनकी संख्या लगभग 150 तक होगी। लगभग डेढ़ दर्जन पुस्तकें तो आपने दूसरों के लिए लिखीं।

आप पद्य रचना में भी सिद्धहस्त थे। आपके लिखे नीति-शिक्षापूर्ण सरस पद्यों का संग्रह ‘सौरभ’ के नाम से छपकर अप्रकाशित ही रहा। आपने व्यंग्य-विनोदमयी अपनी पद्य-रचनाएं ‘चना-चबेना’ के नाम से स्वयं प्रकाशित की थीं। इसी शैली की एक गद्य-पद्य रचना कचालू-रसीला’ के नाम से प्रकाशित करने की आपकी इच्छा पूरी नहीं हो सकी। आपका लिखा ‘मान-मर्दन’ नाटक भी अप्रकाशित ही है।

आपके द्वारा लिखित मौलिक, अनूदित एवं संपादित प्रमुख पुस्तकों के नाम हैं-‘कोकिला’, ‘स्वर्णमयी’, ‘मागधी कुसुम’, ‘मालिनी बाबू’, ‘गल्पमाला’, ‘हिन्दी-बंगला-कोश’, ‘चन्द्रधर’, ‘अन्योक्ति तरंगिनी’, ‘मातृवन्दना’, ‘सन सत्तावन का गदर’, ‘सूर्योदय’(नाटक), ‘रंगीली दुनिया’, ‘ईसप की कहानियां’ (तीन भाग), ‘सिपाही विद्रोह’, ‘सीता’, ‘शकुन्तला’, ‘सती-पार्वती’, ‘पंचशर’ (गद्य-काव्य), ‘उद्भ्रान्त प्रेम’, ‘अन्नपूर्णा का मंदिर’, ‘किन्नरी’, ‘इन्दुमती’, ‘प्रेमगंगा’, प्रेमिका, जल-चिकित्सा, सुशील-शिक्षा, ‘चन्द्रकुमार का मनोरमा’, ‘सच्ची मैत्री’, बाल-गल्पमाला’, पंजाब-हत्याकांड’, हिन्दी-बंगला-कोश’, ‘रामचरित्र’ आदि। ‘रामचरित्र’ ग्रंथ के प्रकाशित होने पर बनैली-नरेश कीर्त्यानन्द सिंह बहादुर ने आपको एक हजार रुपये का सम्मान-पुरस्कार दिया था। यह ग्रंथ उन्हीं को समर्पित है।

ऊपर से निठल्ले और हंसोड़ लगनेवाले शर्मा जी गहरी सूझ-बूझ के आदमी थे और कविता के साथ इतिहास के भी पंडित थे। 1922 ई. में उन्होंने ‘गदर का इतिहास’ लिखा और उसे भारत का स्वाधीनता संग्राम कहा था।
‘महादेवप्रसाद सेठ की प्रेरणा से’ भारत के ‘भाग्य-विधाता सीरीज’ के तहत ‘दादाभाई नौरोजी’ नामक चरित-पुस्तक लिखी। हिन्दी में दादाभाई की कोई बड़ी-सी जीवनी या उनके उपदेशों का संग्रह अबतक नहीं प्रकाशित हुआ था, इसलिए लेखक ने इकट्ठे ही दोनों अभावों की पूर्ति का प्रयत्न किया। इस पुस्तक को लिखने में लेखक ने मद्रास की जी.ए. नटेसन एण्ड कंपनी द्वारा प्रकाशित ‘स्पीचेज एण्ड राइटिंग्स ऑफ दादाभाई नौरोजी’ नामक ग्रंथ से पूरी सहायता ली थी। यह किताब ‘नागरी प्रचारिणी सभा’, आरा के पुस्तकालयाध्यक्ष बाबू शुकदेव सिंह को समर्पित की गई थी। लिखा था : ‘मित्रवर! जिन दिनों मैं दादाभाई की यह जीवनी रोगशय्या पर पड़े-पड़े लिख रहा था, उस समय संसार में तुम्हारे सिवा मेरा कोई सहायक न था। तुम्हारी सेवा शुश्रषा और सहायता के अभाव में मेरी मृत्यु हो जानी संभव थी और तब यह पुस्तक शायद ही मेरे हाथों पूरी हो पाती। उन्हीं स्मरणीय दिनों की स्मृति को बनाये रखने के लिये यह पुस्तक तुम्हीं को समर्पित है।’

‘अन्नपूर्णा का मन्दिर’ हिन्दी-ग्रन्थ-रत्नाकर-सीरीज का तेरहवां ग्रंथ है। यह पुस्तक बंगाल की प्रसिद्ध उपन्यास-लेखिका श्रीमती निरुपमा देवी के ‘अन्नपूर्णार मन्दिर’ का भाषांतर है। मूल पुस्तक को बंगाल में बहुत ही ऊंचा स्थान प्राप्त है। शर्मा जी के हिन्दी अनुवाद से पहले ‘बंगाल इंपीरियल लाइब्रेरी’ के बाबू शरच्चन्द्र सेन इसका अंग्रेजी भाषा में अनुवाद कर चुके थे। उनकी राय थी कि ‘इन दिनों किसी भी बंगला उपन्यास-लेखक ने इससे अच्छा उपन्यास नहीं लिखा’।

ईश्वरीप्रसाद शर्मा इस धारणा के माननेवाले थे कि ‘प्रत्येक बालक और युवा को अपने देश के प्रसिद्ध-प्रसिद्ध पुरुषों की जीवनियां पढ़नी चाहिए।’ साथ यह भी कि ‘इस तरह की छोटी-छोटी जीवनियों को सीधी-सादी भाषा में लिखकर बालकों और युवाओं के हाथ में देना प्रत्येक लेखक का कर्त्तव्य होना चाहिए।’ इससे बड़ा कर्त्तव्य है कि ‘ऐसी पुस्तकों की भाषा बोलचाल की और जल्द समझ में आने योग्य होनी चाहिए।’ इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु शर्मा जी ने ‘बाल-विनोद-वाटिका का बीसवां पुष्प’ अर्थात ‘भगवान गौतम बुद्ध’ की रचना की। बालकों एवं युवाओं को ध्यान में रखकर लिखी इस किताब की भाषा तो अवश्य ही सरल, सहज और बोधगम्य है, किन्तु इस प्रयास में एकाध स्थलों पर लेखक भूल गया लगता है कि वह किसी मिथकीय नहीं बल्कि ऐतिहासिक पुरुष की जीवनी लिख रहा है। एक जगह वे लिखते हैं, ‘‘अयोध्या के राजा दशरथ और उनके पुत्र ईश्वर के अवतार रामचन्द्र का नाम भला किस हिन्दू से छिपा है? आज से दो हजार वर्ष पहले उसी वंश के राजा शुद्धोदन हिमालय की तराई में अपने पिता के बसाए हुए ‘कपिलवास्तु’-नामक नए नगर में राज्य करते थे।‘‘

कहने की जरूरत नहीं कि बीसवीं शती के तीसरे दशक में हिन्दी साहित्य में बालक-बालिकाओं और स्त्रियों के पढ़ने योग्य पुस्तकों और पत्रों का बड़े धड़ल्ले से हो रहा था। कलकत्ते की प्रसिद्ध आर.एल. बर्म्मन एण्ड कम्पनी के अध्यक्ष बाबू रामलाल बर्म्मा ने इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु ‘रमणी रत्नमाला’ नाम से एक पुस्तकमाला निकालनी आरंभ की। इस माला की ‘सावित्री-सत्यवान’ और ‘नल-दमयन्ती’ जैसी पुस्तकें समाचारपत्रों एवं हिन्दी पाठकों के बीच खासी ख्याति अर्जित कर चुकी थीं। रामलाल जी ही के अनुरोध से, उनकी इस स्त्री-पाठ्य-ग्रंथमाला के लिए ईश्वरीप्रसाद शर्मा ने ‘रमणी रत्नमाला का तीसरा रत्न’ अर्थात ‘सीता’ नामक पुस्तक की रचना की। इस पुस्तक को तैयार करने में लेखक ने गोस्वामी तुलसीदास के ‘रामचरितमानस’, महर्षि वाल्मीकि प्रणीत ‘रामायण’ और महाकवि भवभूति-रचित ‘उत्तररामचरित’ से सहायता ली है; इसी से यत्र-तत्र इन ग्रंथों के भावों की झलक इस पुस्तक में दिखलाई देती है।

वन में पहुंचाने के लिए गये हुए अपने देवर लक्ष्मण के मुंह से अपने पति की आज्ञा सुनकर सीता बोलीं-‘‘महाराज ने मुझे घर से निकालकर प्रजा को संतुष्ट किया है। मैं भी अपने स्वामी के आदेश को फिर आंखों पर रख, हंसते-हंसते सारे कष्ट सहने को तैयार हूं। दुख कैसा?’’ यह न सिर्फ सीता का आदर्श है बल्कि लेखक भी अपने समय और समाज में इसी आदर्श की स्थापना करना चाता हैं।

मठिला-डुमरांव-निवासी पंडित रघुवीरदत्त शर्मा को समर्पित ‘चना-चबेना’ की अधिकतर रचनाएं ‘मतवाला’, ‘मौजी’, ‘गोलमाल’, ‘भूत’ और ‘मनोरमा’ में छप चुकी थीं। कुछ इधर-उधर के हैं तो कुछ एकदम कोरे हैं। पंडित जी की रचनाओं के विषय में तत्कालीन सुप्रसिद्ध विनोदी पत्र मतवाला’ ने पहले वर्ष के दूसरे अंक में लिखा था : ‘हम अपने सुप्रसिद्ध विनोदी मित्र ‘‘मनोरंजन’’-संपादक पण्डित ईश्वरप्रसाद शर्मा को भी बड़े प्रेम और आदर के साथ याद करते हैं, जिनकी हास्य-रसमयी कविताओं ने समय-समय पर ‘‘मतवाला’’ को विशेष चित्ताकर्षक बनाया है। शर्मा जी को विनोद का व्यसन है। वे मनोरंजन की मूर्ति हैं।’

शिवपूजन सहाय के नेतृत्व और मार्गदर्शन में चार खंडों में हिंदी साहित्य और बिहार जो संपादित किया गया, उसकी पहली प्रेरणा ईश्वरीप्रसाद शर्मा ही के हृदय में हुई थी। उन्होंने ही इस कार्य के लिए शिवपूजन सहाय जी को प्रेरित किया और आरा की नागरी-प्रचारिणी सभा के पुस्तकालय-संचालक शुकदेवसिंह को उनकी सहायता के लिए उत्साहित किया था। हिंदी-प्रेमियों से इतिहास के लिए सामग्री-संकलन के निमित्त अनुरोध करते हुए सबसे पहले सूचना उन्होंने ही लिखी थी और सामग्री-संकलन हेतु उसके साथ ही एक विवरण-पत्र भी तैयार कर दिया था। (हिन्दी-साहित्य और बिहार, प्रथम खण्ड, भूमिका, पृष्ठ ठ।)

राजेश्वरी बाबू : एक सर्वहारा शिक्षक

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Dr Raju Ranjan Prasad

तिनेरी हाई स्कूल में राजेश्वरी शर्मा सामाजिक विज्ञान (इतिहास-राजनीतिशास्त्र) के शिक्षक थे। वे हमें अंग्रेजी साहित्य भी पढ़ाते। वे बगल के गांव हरिबसपुर के वासी थे लेकिन मसौढ़ी उनका निवास-स्थान होता।

वे मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित थे। उनका मार्क्सवाद रहन-सहन की उनकी शैली में भी प्रकट होता। वे खादी का कुरता और धोती पहनते। पैर में चमड़े का चप्पल होता। कभी-कभी खादी की एक गमछी भी कंधे से झूलती होती। के सी पाल का छाता भी उनका सहचर होता। उन्हें खैनी खाने की बुरी लत थी लेकिन पास कभी न रखते। इस मामले में वे बिल्कुल ‘सर्वहारा’ थे। किसी खैनी खानेवाले को विद्यालय के आसपास भटकता हुआ देख लेते तो हममें से किसी एक बच्चे को उसके पीछे दौड़ा देते। खैनी देनेवाले को कभी ना- नुकुर करते नहीं देखा। खैनी सर्वहारा-संस्कृति की चीज लगती है। खैनी खानेवालों में एक अदृश्य परिचय होता है। कोई किसी से हाथ बढ़ाकर खैनी प्राप्त कर सकता है। राजेश्वरी बाबू इस संस्कृति का यथेष्ट लाभ लेते।

सन 80 की बात होगी जब एस एफ आई के छात्र-नेता श्री रविन्द्र राय को राजेश्वरी बाबू मेरे स्कूल ले गये थे। वहां उन्होंने हम बच्चों को संबोधित किया था। भाषण का क्या विषय था आज कुछ भी स्मरण नहीं है। इसके कुछ दिनों बाद ही राजेश्वरी बाबू ने एस एफ आई की कुछ रसीद थमा दी थी। 25 पैसे सदस्यता शुल्क लेकर छात्र को सदस्य बनाया जाता था। तब महीने में दो दिन-15 और 30 तारीख को छात्रों से शुल्क वसूला जाता। उधर वर्ग शिक्षक अपनी रसीद काटते और मैं अपनी। कुछ दिनों की मिहनत के बाद मेरे पास लगभग सात-आठ रुपये की राशि जमा हो चुकी थी। इसकी भनक मेरे छोटे चाचा को लग गई। उन्होंने बड़े चाचा का भय दिखाकर रुपये जब्त कर लिए। बड़े चाचा यद्यपि कम्युनिस्ट विचारों से प्रभावित कांग्रेसी थे। बाद में उनका कम्युनिस्टों से मोहभंग हुआ तो एक तरह की घृणा पाल बैठे थे। छोटे चाचा ने उनकी इस घृणा का लाभ लिया और पैसे हस्तगत कर लिए। पैसा उनकी कमजोरी भी था। अपने कई प्रयासों के बावजूद राजेश्वरी बाबू को मैं रसीद के पैसे न दे सका। एक-दो बार के तगादे के बाद वस्तुस्थिति का उन्हें भी ज्ञान हो चला था। अतः मांगना छोड़ दिए और अंततः मैं इस जिम्मेवारी से मुक्त हो गया।

सन 84 में जब मुझे मैट्रिक की परीक्षा देनी थी तो उन्होंने केंद्राधीक्षक के नाम का एक पत्र भिजवाया था। तब मेरा सेंटर हाई स्कूल साईं था और परीक्षा के दौरान बगल के गांव मोरियामा में एक पुराने रिश्तेदार के यहां ठहरा था। सहपाठी सतीश भी वहीं ठहरा था। उसने फार्म कुछ इस तरीके से भरा था कि बोर्ड से रॉल नं. आगे-पीछे आ सके ताकि परीक्षा में साथ बैठने की व्यवस्था हो। इस समझौते के लिए मैंने रोज शाम में एक सिगरेट की शर्त रखी थी। सिगरेट की लत यहीं से लगी। परीक्षा में चोरी का मैं शुरू से विरोधी था। अपने विद्यालय में भी मैं चोरी न करने के कारण बदनाम था। गांधीजी के बाद एक मैं ही होऊंगा जिसे चोरी के लिए शिक्षक भी उकसा जाते। चोरी करते बच्चों की धर-पकड़ के लिए कुख्यात दीनबंधु बाबू भी इधर-उधर झांक लेने की सलाह दे जाते किन्तु मेरा मन सदैव ही गांधी बना रहा। इसलिए राजेश्वरी बाबू की चिट्ठी मेरे लिए एक मुसीबत ही थी। मैं उस चिट्ठी को रोज प्रवेश-पत्र की तरह अचूक रूप से ले जाता लेकिन केंद्राधीक्षक महोदय से केवल अंतिम दिन ही मिल पाने का सुयोग हुआ। उन्हें चिट्ठी दी तो बोले पहले क्यों नहीं दिया। मैंने कहा कि मुझे किसी तरह की अनुचित छूट नहीं लेनी थी, इसलिए आज सौंप रहा हूँ। थोड़ी डांट लगाकर शिक्षक काफी खुश थे। मैं भी खुश था कि मैंने गुरु के ‘धर्म’ की रक्षा की।

इमर्जेंसी की सालगिरह और स्मरण जेपी आंदोलन की—



शिवानन्द तिवारी

18 मार्च 1974 को छात्रों और युवाओं के द्वारा बिहार आंदोलन की शुरुआत हुई थी. आंदोलन का नेतृत्व करने वाले छात्र युवा नेताओं के अनुरोध पर 1942 की क्रांति के अग्रदूत रहे जयप्रकाश नारायण ने उस आंदोलन का नेतृत्व करना कबूल किया था. इसलिए उस आंदोलन को जयप्रकाश आंदोलन के रूप में भी जाना जाता है. भ्रष्टाचार, महंगाई, शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन जैसे मांगों को लेकर उस आंदोलन की शुरुआत हुई थी. जब जयप्रकाश जी द्वारा आंदोलन का नेतृत्व कुबूल कर लिये जाने की वजह से आंदोलन का स्वरूप बदल गया. उनके नेतृत्व की वजह से छात्र युवाओं का वह आंदोलन जन आंदोलन में बदल गया.
जयप्रकाश जी के नेतृत्व में उस आंदोलन का पहला कार्यक्रम 8 अप्रैल को मौन जुलूस के रूप में हुआ था. जुलूस में शामिल लोगों की संख्या सीमित रखी गई थी. नाम का चयन हुआ था. सबके मुंह पर काली पट्टी थी और उनके हाथ पीठ के तरफ़ थे. उसका संदेश था, ‘हमला चाहे जैसा होगा हाथ हमारा नहीं उठेगा’. अद्भुत दृश्य था वह. ऐसा लग रहा था जैसे औपचारिक रूप से समिति संख्या वाले उस जुलूस में पूरा पटना शहर ही शामिल गया हो. उसकी एक अद्भुत गरिमा थी. जुलूस में भी गरिमा होती है ! यह थोड़ा अटपटा लग सकता है. लेकिन उस मौन जुलूस में एक गंभीरता थी, गरिमा थी. उसके बाद अपने जीवन में कभी वैसा दृश्य मैंने फिर नहीं देखा. उसके अगले दिन जयप्रकाश जी ने गांधी मैदान में एक विशाल जनसभा को संबोधित किया. उसी सभा में उनको लोकनायक की उपाधि मिली थी.
अप्रैल महीने के ही 12 तारीख को आंदोलन का एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम था. संपूर्ण बिहार में सरकारी कामकाज को ठप कर देने की घोषणा हुई थी. उसी कार्यक्रम में दरमियान गया में छात्र नौजवानों के जुलूस के साथ पुलिस का टकराव हुआ था. पुलिस ने गोली चलाई. दुकानों और घरों में घुस घुस कर लोगों को मारा गया. भयानक दमन हुआ. हल्ला हुआ कि दो दर्जन लोग उक्त गोलीकांड में मारे गए हैं. लेकिन 9 लोगों का शव बरामद हुआ था. विधानसभा का सत्र चल रहा था. सरकार ने विधानसभा में उक्त गोलीकांड को जायज ठहराया. उसी के बाद सवाल उठा कि जो विधानसभा नौजवानों के ऊपर अंधाधुंध गोली चला कर हत्या और दमन करने को जायज ठहरा रही है वह जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करती है. 16 अप्रैल को जयप्रकाश जी गया गए. घटनाओं की जानकारी ली और वहीं आम सभा में उन्होंने विधानसभा को भंग करने की मांग का समर्थन किया.
तय हुआ कि बिहार के प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र से विधान सभा को भंग करने की मांग के समर्थन में मतदाताओं से हस्ताक्षर कराया जाए. हस्ताक्षर युक्त ग्यापन को बिहार के राज्यपाल को सौंपा जाए.
5 जून 74 को जयप्रकाश जी के नेतृत्व में छात्र-नौजवानों का एक जुलूस बिहार की विधानसभा को भंग करने की मांग का ज्ञापन देने राजभवन की ओर जा रहा था. उक्त जुलूस पर किसी ने गोली भी चलाई थी. उसी दिन गांधी मैदान की सभा में जयप्रकाश जी ने उदघोष किया था कि यह आंदोलन संपूर्ण क्रांति के लिए है.
इस बीच कांग्रेस पार्टी के अंदर भी चर्चा चल रही थी कि जयप्रकाश जी और इंदिरा जी के बीच यह टकराव ठीक नहीं है. बीच-बचाव की कोशिश हुई. परिणाम स्वरूप इंदिरा जी ने 1 नवंबर 74 को बातचीत के लिए जयप्रकाश जी को आमंत्रित किया. लेकिन विधानसभा को भंग करने की मांग को पूरा करने के लिए इंदिरा जी तैयार नहीं हुईं. उसी के बाद 4 नवंबर को पटना में इनकम टैक्स गोलंबर के पास जे पी के जुलूस पर भयानक लाठीचार्ज हुआ था. जेपी उस लाठीचार्ज में बाल बाल बचे थे.
उस आंदोलन में कई कार्यक्रम चले थे. लेकिन उसके दो कार्यक्रम मेरे मानस पटल पर आज तक अंकित हैं. पहला 4 नवंबर का जयप्रकाश जी के नेतृत्व वाला जुलूस, जिस पर लाठी चली थी. दूसरा तीन दिनों का बिहार बंद. तीन,चार और पांच अक्टूबर के वैसे बिहार बंद की कल्पना अब नहीं की जा सकती है. इन पंक्तियों के लेखक को उसका अनुभव है. मोटरसाइकिल से भभुआ से डिहरी, नासरीगंज, पीरो होते हुए बिहिया आया था. जीटी रोड जैसे देश के व्यस्ततम सड़क पर चिड़िया क्या, चिड़िया का पुत तक नहीं दिखाई दे रहा था. सन्नाटा भी डरावना होता है इसका पहला तजुर्बा मुझे उसी यात्रा में हुआ था.
इमरजेंसी के विषय में एक बात मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूं. मेरी मान्यता है उस आंदोलन की वजह से इंदिरा जी ने देश में इमरजेंसी नहीं लगाई थी. बल्कि अपनी सत्ता को बचाने के लिए इमरजेंसी के प्रावधान का नाजायज इस्तेमाल उन्होंने किया था. 1971 में इंदिरा जी रायबरेली से चुनाव लड़ी थीं. प्रसिद्ध समाजवादी नेता राज नारायण जी उस चुनाव में उनके प्रतिद्वंदी थे. चुनाव हारने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट में राज नारायण जी ने इंदिरा जी के विरुद्ध चुनाव याचिका दायर किया था. उनकाआरोप था कि इंदिरा जी ने अपने चुनाव में जीत के लिए भ्रष्ट तरीका अपनाया था. न्यायाधीश जगमोहन लाल सिंहा ने राज नारायण जी के आरोप को सही पाया और इंदिरा जी के चुनाव को रद्द कर दिया. इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले के विरुद्ध इंदिरा जी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर किया. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर संपूर्ण रोक नहीं लगाई. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आप संसद के सत्र में तो भाग ले सकती हैं. लेकिन वहां किसी भी विषय पर मतदान के अधिकार से आप वंचित रहेंगी. इस फैसले के बाद उनके सामने दो विकल्प थे. पहला यह कि सुप्रीम कोर्ट के आंशिक स्थगन के फैसले को मान लेतीं. क्योंकि उस समय संसद का सत्र भी नहीं चल रहा था. दूसरा विकल्प था कि वह अपने बदले किसी अन्य को प्रधानमंत्री बना देतीं और सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले का इंतजार करतीं. लेकिन इन दोनों विकल्पों में से किसी को नहीं चुनकर उन्होंने देश में इमरजेंसी लगा दिया. इमरजेंसी भी बिल्कुल और असंवैधानिक तरीके से लगाया. इमरजेंसी के प्रावधानों का इस्तेमाल पहले किया गया और मंत्रिमंडल से इमरजेंसी मंजूरी बाद में ली गई.
कहा जाता है के चुनाव कराने के पूर्व उन्होंने सरकार की गुप्तचर एजेंसी से देश में एक सर्वे कराया था. सर्वे का विषय था कि अगर इंदिरा जी अभी लोकसभा का चुनाव करवाती हैं तो उसका नतीजा क्या निकलेगा. कहा जाता है कि सर्वे का निष्कर्ष आया कि अगर अभी चुनाव होता है तो उसमें इंदिरा जी भारी बहुमत से जीतेंगी. कहा जाता है कि अंतरराष्ट्रीय दबाव और उस सर्वे के भ्रम में इंदिरा जी ने 1977 में चुनाव करा दिया. चुनाव का नतीजा सबके सामने है.

आपातकाल के दरम्यान जार्ज फ़र्नाडिस की गतिविधियों का कोई अर्थ नहीं था. वह एक तरह का एडभेंचरिज्म था.

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शिवानन्द तिवारी


आपातकाल के दरम्यान जार्ज फ़र्नान्डिस की गतिविधि का कोई अर्थ नहीं था. जैसे कोई युवा बगैर आगे-पीछे सोचे ‘थ्रील’ महसूस करने के लिए कुद-फाँद करता है, जार्ज वही कर रहे थे. अपने इस ‘एडभेंचरिज्म’ में रेवतीकांत सिंहा को तो बरबाद कर दिया उन्होने. बुरी मौत मरे रेवतीकांत जी. 65 में केबी सहाय की कांग्रेसी सरकार के विरूद्ध सरकारी कर्मचारियों का लंबा आंदोलन चलाने वाले रेवतीकांत जी लोहिया के अतिप्रिय थे. 67 के चुनाव में रेवती कांत जी पटना से केबी सहाय के ख़िलाफ़ लड़ें लोहिया की यह इच्छा थी. लेकिन महामाया बाबू को लड़ा दिया गया. लोहिया ने पटना में चुनावी भाषण तक नहीं किया. उस जुझारू समाजवादी रेवतीकांत के घर में आकर जार्ज ने डायनामाइट रखवा दिया. दो दिन उनके यहाँ लोगो से लगभग सार्वजनिक रूप से मिलते-जुलते रहे. बाद में पुलिस रेवती बाबू को पकड़ कर थाना ले गई. दो-चार हाथ मारा और रेवती कांत जी ने बयान दे दिया. उनपर मुखबिरी का आरोप लग गया. कोई उनसे बतियाने वाला नहीं था. लोग लगभग नफ़रत करने लगे थे. उनमें मैं भी था.
77 में बाबूजी एम पी बन गए थे. मैं भी दिल्ली में था. रेवतीबाबू को बचपन से मैं चाचा कहता आया था. लेकिन उस प्रकरण के बाद उनकी ओर ताकने की इच्छा नहीं होती थी. बाबूजी से मिलकर जब रेवती चाचा जाने लगे तो बाबूजी ने जेब से कुछ पैसा निकालकर उनकी जेब में डाल दिया. जब वे निकल गए तो मैंने बाबूजी से उनके पैसा देने का विरोध प्रकट किया. बाबूजी के चेहरे पर पीड़ा और दर्द वाली वह मुस्कान मुझ्अ भी भी याद है. उन्होने कहा कि ‘शिवानन्द रेवतीकांत के एगो ग़लती से जीवन भर के उनकर काम मीट जाई ? रेवतीकांत त जीवन कबहीं बम-गोली के राजनीति ना कइले. बेचारे फँस गइले. आ एगो बात जान ल-पुलिस के सामने केहु चार लाठी मे मुँह खोल देला त केहु चालीस लाठी में.’
बाबूजी की बात सुनकर मुझे अपने उपर बहुत ग्लानि हुई. रेवती चाचा के प्रति मैं अन्याय कर रहा था. जल्द मर गए. जीने की उनकी सारी प्रेरणा ख़त्म हो गई थी.
यह तो ग़नीमत था कि उसी समय पटना मे बाढ़ का पानी प्रवेश कर गया था. नही तो शायद मैं भी फँसता. आज याद करने पर सबकुछ बचकाना लगता है. लाड़ली जी का सफ़ारी सुट में पटना में घुमना. उस पोशाक में वैसे ही विशिष्ट लगते थे. कभी भी पकड़ा सकते थे. मेरे घर के सामने गुप्त बैठक. कैसे ‘कोड’ में तार आएगा. उसके बाद अहमदाबाद में कहाँ पहुँचना है आदि, आदि.बैठक में विनयन, रघुवति, अख़्तर, लाड़ली जी आदि. एक ढंग से मेरे घर में बैठक. आयोजन करता मैं. सबकुछ काग़ज़ पर नोट हो रहा था. यह तो कहिए कि प्रशासन ने घोषणा शुरू किया कि ‘घर ख़ाली कीजिए. शहर में पानी का प्रवेश हो रहा है.’
बैठक ख़त्म हुई. कुछ ही दिन बाद पानी में ही मैं मैं पकड़ लिया गया. बाद में विनयन ने डायनामाइट के साथ अपना ‘एडवेंचर’ सुनाया था. कहिए कि उनलोगो की जान बच गई. किसी को इस रास्ते का ज्ञान नहीं था. कोई प्रशिक्षण नहीं था. यह तो गनिमत है कि हमारे देश की पुलिस और ख़ुफ़िया विभाग इतना अक्षम और निकम्मा है, नहीं तो कितने लोग जार्ज के ‘बचकाना एटभेंचर’ मे बरबाद हो गए होते.
फेसबुक पर एक वरीय पत्रकार मित्र का पोस्ट देखा. तो उसीको देखकर मैंने भी लिख दिया. माफी चाहूँगा. जार्ज कभी मेरे आदर्श या प्रेरणा नहीं रहे. जो आदमी दिन में भाषण कर जिसकी वकालत करता है और शाम में उसीके ख़िलाफ़ खड़ा नज़र आता है वह किसी के लिए आदर्श या प्रेरणा कैसे बन सकता है !

25 जून 18

बिहार के एक बड़े नेत्र रोग विशेषज्ञ थे डॉ दुखन राम।

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Shivanand Tivary

देश के प्रथम राष्ट्रपति बनने के बाद डॉ राजेन्द्र प्रसाद की आंखों की सर्जरी पटना से दिल्ली जाकर उन्होंने ही की थी। राजेन्द्र बाबू के बाद भी वे अगले 4 राष्ट्रपतियों के नेत्र शल्य चिकित्सक सह नेत्र रोग विशेषज्ञ रहे थे। क्यों थे ये फिर कभी लिखूंगा।

अब, अगर इसी बिहार के मुख्य मंत्री श्री नीतीश कुमार ये कहते हैं कि उन्हें आंखों के इलाज के लिए दिल्ली जाना पड़ा तो ये पूरे राज्य की चिकित्सा व्यवस्था और यहां के नेत्र रोग विशेषज्ञों की बड़ी तौहीन है।

एम्स-पटना, इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान, पटना जैसे बड़े अस्पतालों के अतिरिक्त बिहार में निजी रूप से भी नेत्र रोगों की चिकित्सा प्रदान करने वाले कई बेहतरीन डॉक्टर मौजूद हैं।

मुख्य मंत्री कार्यालय के एक फ़ोन पर पूरी टीम उनके इलाज के लिये तैनात हो सकती है। याद रहे, ये वही नीतीश कुमार हैं जिन्होंने कथित रूप से पिछले वर्ष कोविड के इलाज के लिए अपने आधिकारिक आवास को अपने खास लोगों के लिये अलग अस्पताल में तब्दील करवाने की पहल की थी लेकिन मीडिया में शोर-शराबा मचने के बाद इस बात को खारिज करते हुए रफ़ा-दफ़ा कर दिया गया था।

क्या नीतीश कुमार को बिहार की चिकित्सा पर भरोसा नहीं या उन्हें ये लगता है कि यहां के चिकित्सा संस्थान और डॉक्टर उनका बेहतर इलाज नहीं कर सकते हैं?

अगर वाकई ऐसा है तो ये मुख्य मंत्री समेत पूरे राज्य के चिकित्सकों और जनता के लिए शर्म की बात है।

 

“और बहुत आएंगे! हम आखिरी थोड़े ही हैं “

Shyam Meera Singh


पुलिस की बंदूक द्वारा मरने से पहले “निषाद” के मुंह से निकली ये अंतिम पंक्तियां ही फ़िल्म “आर्टिकल 15” के आगे की कहानी लिखेंगी। फ़िल्म में “निषाद”.. भीम आर्मी के चंद्रशेखर “रावण” की भूमिका में हैं।

फ़िल्म का हीरो “आयुष्मान खुराना” होंगे, डायरेक्टर की चाह भी लगभग यही रही है। सिनेमा हॉल में आंख गड़ाए हुए नौजवानों ने भी आयुष्मान के लिए ही तालियां बजाईं। लेकिन मरने से पहले निषाद के मुंह से निकली इन अंतिम पंक्तियों को सुनने के बाद एक इतिहासकार की कुछ पंक्तियां याद आती हैं जिसने गुप्त काल को भारतीय समाज का स्वर्णिम काल मानने से मना कर दिया था। उस इतिहासकार ने कहा कि “गुप्त काल अभिजातीय वर्ग के लिए स्वर्णिम काल रहा होगा, हाशिए के समाज के लिए कोई भी काल कभी भी स्वर्णिम काल नहीं रहा, हाशिए के समाज का स्वर्णिम काल भूतकाल में नहीं, बल्कि भविष्य के गर्भ में है”

फ़िल्म में मिली तवज्जो के हिसाब से आयुष्मान को फ़िल्म का हीरो कहा जा सकता हैं। लेकिन “नायक” निषाद ही था। नायक निकलकर आते हैं, नायक बनाये नहीं जाते, उन्हें रचा नहीं जाता। नायक सड़कों पर खुद पैदा होते हैं। “निषाद” और उसकी प्रेमिका गौरा परिस्थितियों की उस उर्वरभूमि पर पैदा होते हैं जिसने कभी डॉ. अम्बेडकर को पैदा किया था।

“निषाद” आर्टिकल 15 फ़िल्म का एक ऐसा नायक है जिसपर फिल्मकार का कैमरा कम ही पहुंचा। लेकिन निषाद को नायक कहने के पीछे कइयों कारण हैं। निषाद ने असमानता और शोषण पर आधारित जातिव्यवस्था को “इंडियन एक्सप्रेस” अखबार के किसी आर्टिकल को पढ़कर नहीं जाना। और न ही जातिव्यवस्था को जानने के लिए उसने “रामशरण शर्मा” की भारतीय समाज व्यवस्था पर लिखी गई किताबें ही पढ़ीं।

“निषाद” का नायकत्व “सूवर खाने” के आंगन में जन्म लेता है। निषाद का नायकत्व पशुओं का चमड़ा उतारने वाले बाड़े में जन्म लेता है। निषाद का नायकत्व किसी फिल्मकार ने करिश्माई कहानी कहकर नहीं गढ़ा बल्कि उन तमाम परिस्थितियों में जन्मा जिसमें उसके समाज के लोग कभी हरिजन, कभी बहुजन, कभी दलित बनकर रह गए। आदमी न माने गए।

निषाद का नायकत्व उन परिस्थितियों में जन्म लेता है
जिनमें उन्हें क्लास के बाहर बैठकर पढ़ना पड़ता था। जिनके पानी के मटके अलग हुआ करते थे। जिनके बाप को आज भी चौधरी के घर जमीन पर बिठाया जाता है। जिनकी माँ को आज भी जमींदार अपनी हवस तुष्ट करने के लिए अपने खेतों में दबोच लिया करता है। जिन के बच्चों पर समाज ने ” पढ़ गए पूत कुमार के सोलह दूनी आठ” जैसी निर्योग्यताएँ लाद दीं। जिनकी माँ की शादी के अगले दिन ही मेहंदी लगे हाथों में टीन की दो परतें थमा दी गईं थीं, पूरे मोहल्ले के दरवाजे-दरवाजे मल साफ करने के लिए…

फ़िल्म आर्टिकल 15 की कहानी क्या है? उसके किरदार कौन हैं? ये बताना मेरा काम नहीं। लेकिन
इतना कहूंगा फ़िल्म आर्टिकल 15 अदम गोंडवी की कविता “चमारों की गली में ले जाता हूँ” से दो इंच अधिक नहीं है।

सिवाय इसके कि इसमें नायक सवर्ण है और शोषित दलित हैं। फिल्मों में ऐसा सम्भव है। लेकिन असल जीवन में हाशिए के समाज का नायक उसी समाज से निकलेगा। जिन्हें अपनी प्रेमिका को चूमने का भी वक्त न मिला। जिन्हें अपनी प्रेमिका की ओर पलभर हंसकर देखना भी पाप लगा। जिन्होंने महबूबा की गोदी में थके हुए सर आराम करने के लिए रखे तो सही! लेकिन महबूबा की गोदी में सर रखते हुए भी उनके मन में पूनम के गीत नहीं आए बल्कि मैला उठाती माँ की तस्वीरें आईं। जिन्होंने पांच मिनट भी किसी नदी में पैर लटकाकर प्रेमिका के साथ नहीं बिताए। जिन्होंने दो मिनट मनभर साथ में चांद नहीं देखा।

अपने संघर्ष के दिनों में निषाद और उसकी प्रेमिका गौरा के मन में ये मलाल तो होता है। लेकिन मरते वक्त निषाद के चेहरे पर इस बात को पढ़ा जा सकता था कि उसे इस बात का सब्र है कि निषाद अंतिम नहीं है कल और लोग जन्म लेंगे!

फ़िल्म अच्छी है, केवल इतना कहना भर कम है। फ़िल्म सम्भवतः दशक की सबसे अच्छी फिल्मों में से एक साबित हो सकती है। फ़िल्म आर्टिकल 15 इतिहास काल के उसी दर्जे में रखी जा सकती है जिस दर्जे में ओमप्रकाश वाल्मीकि की “जूठन” रखी गई है।

फ़िल्म बनाते समय डायरेक्टर ( Anubhav Sinha ) ने कहीं पर भी बैलेंसवादी बनने की कोशिश नहीं की है। उसने हर छोटी छोटी चीजों पर अपना कैमरा घुमाया है। एक ऐसे दौर में जहां बाजार ही क्रीम-पाउडर से लेकर क्रिकेट की हार जीत तय कर रहा है ऐसे में जितना स्पेस फिल्मकार को मिला है उसमें उसने समाज के सभी बदरंग अंगों को नग्न कर दिखाया है। फ़िल्म के लेखक Gaurav Solanki ने जिस तरह से संवादों को गढ़ा है हिंदी सिनेमा इसपर आने वाले समय में फक्र कर सकता है। एक्टिंग के लिहाज से आयुष्मान तो जचते ही हैं इसपर बहस करने की जगह नहीं मिलती लेकिन मनोज पाहवा की एक्टिंग अनुभव की भट्टी से तपकर निकली मालूम होती है। जिसके आसपास कोई नहीं।

अंत में एक ही बात कि फिल्मकार ने फ़िल्म के किरदारों की अभिव्यक्ति की आजादी का खूब सम्मान किया है। उसने अपने किरदारों के सामने आंखें नहीं नटेरीं, न ही उनकी गलेबान पकड़ी। एक ऐसे समय में जहां सिनेमाहॉल के दर्शकों में एक बड़ी संख्या सवर्णों की ही है ऐसे में जातिव्यवस्था के मुद्दे को सिनेमा की मुख्यधारा में लाकर फिल्मकार ने पीठ थपथपाने का काम किया है।

लेकिन फ़िल्म आर्टिकल 15 को जूम करके देखने पर आप यह पाएंगे कि भले ही फ़िल्म जातिव्यवस्था पर प्रभावी चोट करती है लेकिन निषाद को छोड़कर अन्य दलितों की स्थिति कृपापात्र जैसी ही है।

निषाद और उसकी प्रेमिका गौरा पर एक अलग फ़िल्म भी बन सकती है और ऐसा बिल्कुल नहीं है कि दलित नायक केंद्रित फिल्मों को दर्शक नहीं मिलते। फ़िल्म मशान और रजनीकांत की फ़िल्म काला अपने समय की सराही गई वो फिल्में हैं जिसके नायक भी हाशिए के समाज से ही आते हैं। उम्मीद है फिल्मकार बाजार के अदृश्य दवाब से बाहर निकल इस बात को जल्दी ही समझेंगे। और इस बात को भी समझेंगे कि बड़ोदा के ब्राह्मण राजा गायकवाड़ ने भले ही डॉक्टर अम्बेडकर की मदद की, उन्हें पढ़ाने के लिए स्कॉलरशिप दी। विदेश भेजा। हर संभव साथ भी दिया। लेकिन सन 47 के समय दलितों पर बनने वाली फ़िल्म के नायक अम्बेडकर ही होंगे गायकवाड़ नहीं।

बकराईद में महँगे जानवरों के नाम पर पाखंड

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Mohd Zahid

मैं एक बात बताता हूँ कि दुनिया में कैसे कैसे मुर्ख हैं उससे आपको अंदाजा हो जाएगा जो धर्म के नाम पर लड़ाई तो कर लेते हैं पर उसी धर्म को खुद नहीं मानते ।

आज से कोई 4 दिन बाद ईद उल अजहा है जिसे आम बोलचाल में बकराईद कहते हैं ।अब आप जानवरों की मंडी में बकरे खरीदते तमाम मुसलमानों को देखेंगे जो दरअसल कुरबानी के मुख्य उद्देश्य के बिल्कुल विपरीत कार्य करते दिखेंगे और इस अवसर का उपयोग अपनी शान और शौकत को दिखाने के लिए करेंगे जिसकी इस्लाम में बिल्कुल मनाही है ।

सबसे पहले यह समझिए कि बकराईद क्या है और उसका उद्देश्य क्या है ? और धार्मिक कारण क्या है ? करीब 5000 वर्ष पहले एक पैगंबर हुए थे हज़रत इब्राहिम अलैहिस्लाम जिन्हे उनकी 80 वर्ष की आयु में एक औलाद हुई हज़रत इस्माइल अलैहिस्लाम , इकलौती औलाद होने के कारण वह अपने वालदैन के बेहद प्रिय और दुलारे थे , कुछ वर्ष बाद हज़रत इब्राहिम अलैहिस्लाम ने ख्वाब देखा कि अल्लाह का हुक्म हुआ कि हज़रत इस्माईल अलैहिस्लाम की कुरबानी दे दी जाए , संक्षेप में यह कि हज़रत इब्राहिम अलैहिस्लाम ने अल्लाह का हुक्म मानकर अपनी इकलौती औलाद की गर्दन पर आंख बंद करके छुड़ी चला दी और जब आंख खोला तो उन्होंने हज़रत इस्माइल अलैहिस्लाम को पास खड़ा होकर मुस्कुराते हुए देखा और छुड़ी जो चलाई वह गर्दन दुम्बा (भेड़ ) की थी ।

अल्लाह को उनकी यह अदा इतनी पसंद आई कि कयामत तक सारी उम्मत पर यह कुरबानी वाजिब कर दी और तब से मुसलमानों द्वारा कुरबानी दी जाने लगी ।

सामाजिक रूप में इसका प्रभाव यह हुआ कि गरीब से गरीब तक कुछ पैसे पहुंचने लगे जो बकरे या जानवरों को पालते हैं और बहुतों के तो घर चलाने का यही ज़रिया होता है ।

परन्तु कुरबानी का भाव यह था कि अपनी पसंदीदा चीज कुर्बान करो और इसलिए घर पर पाले गये जानवरों की कुरबानी ही सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है क्युँकि घर के जानवर से 2 वर्ष में लगाव हो ही जाता है ।

अब उन मुर्खता की चर्चा जो इस बहाने की जाती है ।जानवर खरीदने की आपाधापी एक वाजिब को अदा करने के लिए नहीं बल्कि अपनी औकात का दिखावा करने के लिए किया जाता है और जो गरीब कम कीमत के जानवर खरीद कर लाता है उसे अनजाने में ही एहसास कराया जाता है कि वह गरीब है , उसके दिल को कचोटा जाता है ।

कुरबानी के लिए केवल स्वस्थ जानवर की ही आवश्यकता होती है जिसके कम से कम दो दाँत हो परन्तु उसकी खूबसूरती पर लाखों रुपये लुटाए जाते हैं , एक तरह से देखें तो यह उस जानवर के मालिक की मदद ही हुई और खरीदने वाले के माल की कुरबानी , पर यहाँ उद्देश्य उस गरीब कि मदद ना होकर दिखावा है जिसको इस्लाम में सख्ती से मना किया गया है।

बेहतर होता कि जो फालतू के पैसे बर्बाद किये जा रहे हैं वह किसी की बहन बेटी की पढ़ाई लिखाई शादी के लिए खर्च हों तो अधिक सार्थक होगा ।

खबर आ रही है कि जयपुर में एक बकरे की कीमत 48 लाख लग चुकी है जबकि बकरे का मालिक 60 लाख की कीमत माँग रहा है , जानते हैं क्या खास है ? क्युँकि उस बकरे पर मुहम्मद के शब्द जैसी कोई आकृति है ।

यही मुर्खता है और इसका खूब प्रदर्शन किया जाता है।

विज्ञान में मुसलमानों के पिछड़ने का कारण इमाम ग़ज़ाली हकीकत क्या है ?


Khursheeid Ahmad


सोशल मीडिया में कई बार ऐसे लेख दिखाई पड़ते हैं कि साइंस में मुसलमानों के पिछड़ने का मुख्य कारण इमाम ग़ज़ाली (1058-1111 ) हैं इमाम ग़ज़ाली ने अपनी किताबों में फिलासफी व गणित के विरुद्ध लिखा जिस से मुसलमान प्रभावित हुए और उन्होंने गणित विज्ञान और फिलासफी जैसे इल्म को छोड़ दिया

क्या यह बात सच है क्या सच में इमाम ग़ज़ाली विज्ञान व फिलासफी के विरुद्ध थे लेकिन इसे जानने से पहले यह जानना जरूरी है कि क्या इमाम ग़ज़ाली इतना प्रभाव रखते थे कि उन्होंने लिख दिया और पूरे मुसलमानों ने आंख बंद करके मान लिया

1- इमाम ग़ज़ाली न कोई नबी थे न रसूल फिर उनकी बातें मुसलमानों को इतनी प्रभावित कैसे कर सकती है ?

2- इमाम ग़ज़ाली फिकह के इमाम भी न थे कि पूरे मुसलमानों को न सही कम से कम किसी एक ग्रुप या मसलक को प्रभावित कर सकते हों जैसे इमाम अबु हनीफा इमाम जाफर सादिक इमाम मालिक इमाम शाफई इमाम अहमद बिन हंबंल और इमाम दाऊद ज़ाहिरी थे

3- इमाम ग़ज़ाली कोई शासक या शासकीय परिवार के संस्थापक भी न थे कि उन्होंने या उनके वंशजों ने अपनी सोच को जबरदस्ती लागू कर दिया

4- सबसे बढ़ कर हम आप मुसलमान हैं बचपन से उल्मा की तकरीरे सुनते हैं जुमा व ईद के खुतबों में हाज़िर होते हैं जलसों , मजलिसों व इजतिमात में शरीक होते हैं आडियो व वीडियो क्लिप्स देखते व सुनते हैं क्या कभी ऐसा हुआ है कि किसी आलिम ने कहा हो कि विज्ञान फिलासफी और गणित जैसे विषयों को न पढ़ो क्योंकि इमाम ग़ज़ाली ने मना किया है

5- इमाम ग़ज़ाली का इंतकाल सन् 1111 में हुआ उनके इंतकाल के कम से कम 300 साल बाद तक विज्ञान के क्षेत्र में मुसलमानों का वर्चस्व रहा उनमें एक से बढ़कर एक वैज्ञानिक गणितज्ञ , खगोलशास्त्री व इंजीनियर पैदा होते रहे उन्होंने इमाम ग़ज़ाली की किताबों को भी पढ़ा पर उन पर नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा फिर बाद वालों ने ऐसा क्या देख लिया कि वह उनसे प्रभावित हो कर पिछड़ गए

सच तो यह है कि इमाम ग़ज़ाली पर यह झूठा आरोप है कि वह फिलासफी विज्ञान व गणित के विरुद्ध थे

वह खुद एक महान शिक्षाविद थे उस समय विश्व की सबसे शानदार युनिवर्सिटी ( मदरसा निज़ामिया बग़दाद ) के वाइस चांसलर थे और इसी मदरसे के अंतर्गत जो विज्ञान फैकल्टी थी उसके जिम्मेदार महान वैज्ञानिक व गणतिज्ञ उमर खैयाम थे दोनों में बहुत पटती भी थी अगर दोनों की विचारधारा में इतनी दूरी होती तो जरूर मनमुटाव होता

इमाम गजाली के समय फिलासफी के नाम पर कुछ ग़लत चीजें हो रही थीं जिसे उन्होंने दूर किया तारों के इल्म के नाम पर खगोलशास्त्र की जगह पर ज्योतिष शास्त्र को परोसा जा रहा था उसे उन्होंने समाप्त किया वह किसी भी विधा के विरोधी नहीं थे लेकिन उस में बदलाव ला कर उसे अधिक लाभकारी बनाना चाहते थे और वही किया भी

लेकिन पता नहीं कहां से उन्हीं को विज्ञान विरोधी बता दिया गया

पिछली शताब्दी में इस्लामी फिलासफी के सबसे बड़े जानकार और मुतकल्लिमे इस्लाम अल्लामा इक़बाल ने फिलसाफी में इमाम ग़ज़ाली की सेवाओं को सराहा है उन्होंने इमाम ग़ज़ाली की तारीफ करते हुए जवाबे शिकवा में कहा है

रह गई रस्मे आज़ां रूहे बिलाली न रही
फलसफा रह गया तलकीने ग़ज़ाली न रही

आज़ान मे हज़रत बिलाल की रूह और फलसफा में इमाम ग़ज़ाली की तलक़ीन को एक बराबर रख कर उन्होंने बता दिया कि इमाम ग़ज़ाली कौन थें और वह फिलासफी के विरोधी नहीं बल्कि उसके खिदमतगार थे