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दिलीप कुमार पर निजी यादें और कुछ बातें।

 

Alok Bajpai

मैं जिस दौर में होश वाला हुआ उसमे दिलीप साहब का नाम व शोहरत तो थी ही लेकिन उस तरह से बहुत सी फिल्में नही थीं। मुझे उनकी पहली फ़िल्म जो बचपन की याद है वो 1981 में आई क्रांति थी। दिलवाले दिलवाले तेरा नाम क्या है तेरा काम क्या है — क्रांति क्रांति क्रांति।

फिर आयी शक्ति शायद 1982 में। हम तब अमिताभ बच्चन की ढिशुम ढिशुम के दीवाने थे। लंबा कद ,झुके कंधे ,चलने का अंदाज शायद अच्छा लगता था । मुझे याद है डैडी जब दिखाने ले गए तो बोले अब अमिताभ बच्चन को पता चलेगा कि एक्टिंग क्या होती है। पहली बार थोड़ी समझ के साथ दिलीप कुमार को एक्टिंग करते देखा। फ़ोन पर उनका बोलना कि मार डालो मेरे बच्चे को, कर दो उसका खून। जब फ़िल्म देख कर लौटा तो फ़िल्म समझने में थोड़ा mature होकर लौटा था और यह भी अहसास कि अमिताभ बच्चन दिलीप कुमार के आगे फीके रहे जबकि स्क्रिप्ट के हिसाब से तो उन्हें ज्यादा सहानुभूति मिलनी चाहिए थी। अमिताभ को दुबारा शाहरुख खान के आगे एक्टिंग में कमजोर होते देखा मोहब्बतें में जिसमे आखिर में वो सीन है कि लेकिन सर जहां से मैं देख रहा हूँ आप हार गए।

दिलीप कुमार की फ़िल्म आई विधाता। हमको था कि डैडी ये फ़िल्म तो जरूर दिखाने ले जाएंगे । लेकिन डैडी हम लोग को नही ले गए और एक नाईट शो चुपके से देख आये बिना हमे पहले से बताए। अब घर जब आये तो बहुत खुश खुश। हम लोग पीछे पड़ गए कि बताइये क्या बात है। उन्होंने नही बताया कि फ़िल्म देख आये अकेले। पर पिक्चर के सीन बताने लगे खूब मजे ले ले के। हम लोग पीछे पड़ गए कि क्या आप देख आये? टाब उन्होंने हंसते हुए कहा हाँ।

इधर बाद में जब इतिहास पढ़ना शुरू हुआ तो धीरे धीरे हर चीज में दिलचस्पी रखनी हुई क्योंकि एक इतिहासकार को अपनी सोच का दायरा फैलाना होता है। तो फिल्मी दुनिया पर भी एक नजरिया बनना शुरू हुआ।

अब दिलीप कुमार के बारे में।

दिलीप कुमार नेहरू युग की देन हैं। वह दौर था जब लोग ऊंची तबियत के होते थे ,उनमे एक गहराई और एक सच्चाई होती थी।लोग खुश थे ,उत्साह से भरे थे, भारत पे नाज था ,एक आत्मविश्वास था ,पश्चिम से खौफ न खाते थे, सुंदर और गरिमामय थे, और जी हां सेक्युलर थे। कला ,संस्कृति एक सेक्युलर माहौल में ही अपने उरूज पे पहुच सकती है , साम्प्रदायिक चिरकुटई में नही। दिलीप कुमार की आत्मकथा एक पठनीय किताब है जिसमे यह सब मिलेगा।
दिलीप कुमार ने एक्टिंग में एक नया आयाम जोड़ा। उन्होंने नाटकीयता और सहजता व ठेठ भारतीय अंदाज को आपस मे पिरोया और अपना एक मेथड एक्टिंग का स्कूल कायम किया जिसमें लगभग सभी सराहनीय मानवीय संवेदनाओं को अभिव्यक्ति दी जा सकती थी। उनका improvisation कमाल का था । उनके बाद राजेश खन्ना की एक्टिंग में यह चीज शानदार ढंग से दिखती है और इधर के एक्टर्स में शाहरुख खान में।

अशोक कुमार के दौर में एक्टिंग में सहजता की नई शुरुआत हुई थी। दिलीप कुमार ने उसमे थियेटर अभिनय भी जोड़ा।
दिलीप कुमार में अभिनय में एक खास बात थी जो बाद में नही दिखती। वह है बिना बोझिल हुए समय गति को ठहरा देना । एक सुकून था उनकी अभिनय शैली में और शनैः शनैः संगीतमय गत्यात्मकता थी।पूर्णतः अहिंसक आत्मा वाले के लिए ही यह सम्भव होता है।

सिनेमा के इतिहास में और फ़िल्म प्रेमियों के सीलोन में भी दिलीप कुमार हमेशा राज करेंगे।

दो बार के ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता केशव दत्त का निधन, हॉकी के थे खिलाड़ी

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हॉकी में दो बार के ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता केशव दत्त का आज बुधवार 7 जुलाई 2021 को उम्र जनित बीमारियों के कारण निधन हो गया है। कोलकाता के अपने निवास में उन्होंने अंतिम सांस ली। वह 95 वर्ष के थे।

1948 में स्वतंत्र भारत के रूप में लंदन ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने वाली टीम का हिस्‍सा रहे केशव दत्त ने भारत चीन युद्ध के बाद इस मेडल को आर्मी फंड को दान में दे दिया था।

केशव ने आजादी के बाद भारत को हॉकी में 1948 और 1952 ओलंपिक स्वर्ण पदक दिलाने में अहम योगदान दिया था।

मिडफील्डर केशव दत्त 1948 के ओलंपिक में भारत की ऐतिहासिक उपलब्धि का हिस्सा थे, जहां उन्होंने लंदन के वेम्बली स्टेडियम में ब्रिटेन को 4-0 से हराकर अपनी पहली स्वर्णिम स्वतंत्रता हासिल की।


29 दिसंबर, 1925 को अविभाजित भारत के लाहौर में जन्मे केशव दत्त 1952 में हेलसिंकी खेलों में भी भारतीय टीम का भी हिस्सा थे, जहां उन्होंने नीदरलैंड को 6-1 से हराकर भारत को लगातार पांचवीं बार ओलंपिक चैंपियन बनाया।

वह 1948 और 1952 के ओलंपिक के एकमात्र जीवित सदस्य थे।

केशव दत्त ने 1951-1953 तक और फिर 1957-1958 में मोहन बागान हॉकी टीम की कप्तानी भी की। मोहन बागान के खिलाड़ी के रूप में उन्होंने छह बार हॉकी लीग और 10 की अवधि में तीन बार बेटन कप जीता।

उन्हें 2019 में मोहन बागान रत्न से सम्मानित किया गया, जो सम्मान प्राप्त करने वाले पहले गैर-फुटबॉलर बने।

स्वतंत्रता संग्राम 1857 में बिहार के पहले शहीद वारिस अली की शहादत देश के लिए धरोहर है: प्रोफेसर अरविन्द कुमार

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इंसाफ मंच ने 1857 संग्राम में बिहार के पहले शहीद वारिस अली का 164 वा शहादत दिवस मनाया

 

महान स्वतंत्रा सेनानी वारिस अली को 1857 स्वतंत्रा संग्राम में बिहार तिरहुत के पहले शहीद होने का गौरव प्राप्त है। अंग्रेज़ों ने 06 जुलाई 1857 को पटना दानापुर छावनी में अहले-सुबह उन्हें फाँसी पर चढ़ा दिया गया था। वारिस अली को 23जून 1857 को मुजफ्फरपुर से गिरफ्तार कर दानापुर छावनी में ले जाकर फांसी की सजा दी गयी थी।

छह जुलाई को उनके 164 वीं शहादत दिवस पर स्थानीय गाईडेनस आईटीआई काॅलेज कच्ची सराय के सभागार में इंसाफ मंच के बैनर तले शहीद वारिस अली की शहादत दिवस पर इंसाफ मंच बिहार के उपाध्यक्ष आफताब आलम की अध्यक्षता में शहादत समारोह का आयोजन किया गया। समारोह में शिरकत कर रहे लोगों ने 2 मिनट का मौन रख कर शहीद वारिस अली और फादर स्टेन स्वामी को अपनी श्रद्धांजलि देते हुए देश की साझी विरासत-साझी शहादत के नारे को बुलंद किया।

इस मौके पर प्रोफेसर अरविन्द कुमार डे ने अपने संबोधन में कहा की शहीद वारिस अली की शहादत देश के लिए धरोहर है। आज समय की मांग है कि हम सब उन्के मार्ग पर चल कर उन्हे श्रद्धांजली पेश करें।

वारिस अली अंग्रेजी हुकूमत में पुलिस विभाग में कार्यरत थे। वह तिरहुत प्रमंडल जिले के बरूराज थाने में जमादार के पद पर थे लेकिन उनकी वफादारी दिल्ली की सल्तनत के साथ थी और उन्हें ही वह देश का शासक मानते थे। अंग्रेजों के बारे में उनकी धारणा थी कि वह लोग जबरन हमारे देश पर कब्जा किए हुए हैं।

इस मौके पर लोगों ने नीतीश सरकार एवं जिला प्रशासन से मांग किया कि शहर में शहीद वारिस अली स्मारक का निर्माण हो, मुजफ्फरपुर स्टेशन रोड का नामांकन वारिस अली को नाम पर रखा जाए साथी ही मुजफ्फरपुर समहर न्यायलय का नाम भी शहीद वारिस अली के नाम पर रखा जाए ताकि लोग अपने गौरवशाली इतिहास से प्रेरणा ले सकें।

शहादत समारोह में पत्रकार मोहम्मद आफाक आजम द्वारा लिखी पुस्तक ‘शहीद वारिस अली’ का विमोचन भी किया गया जो इंसाफ मंच के द्वारा प्रकाशित किया गया है।

इंसाफ मंच बिहार के प्रवक्ता असलम रहमानी ने शहीद वारिस अली की शहादत पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि 14 मई 1855 को मुजफ्फरपुर जेल में बंद क़ैदी उस समय लड़ने के लिए उठ खड़े हुए जब कैदियों से धातु का लोटा और बर्तन छीनकर उन्हें मिट्टी का बर्तन पकड़ाया गया। मिट्टी का बर्तन एक बार शौच के लिए इस्तेमाल हो जाए तो अपवित्र माना जाता है और अंग्रेज़ ये बात समझने को तैयार नहीं थे; उनको डर था कि धातु के लोटे और बर्तन को गलाकर हथियार और जेल तोड़ने का सामान बनाया जा सकता है।

क़ैदी बहुत नाराज़ हो गए तो मजिस्ट्रेट ने डरकर गोली चलवाई तो बात और बढ़ गई। जेल के कै़दी अधिकतर गांव के किसान थे। जेल के पास अफ़ीम वालों का एक गोदाम था, जहां 12 हज़ार किसान अपने-अपने काम से आए हुए थे। जेल में हो रही कार्यवाही की ख़बर फैली, तो वे तमाम किसान जेल की ओर दौड़े। उनके आने से क़ैदियों का हौसला भी बढ़ गया। हालांकि इस पूरे वाक़ये में कैदी और किसानों का बड़ा नुकसान हुआ, लेकिन आग अन्दर ही अन्दर सुलगती रही। इस पूरे वाक़ये को ‘लोटा तहरीक’ के नाम से जाना जाता है। इस पूरे घटनाक्रम के लिए वारिस अली को ज़िम्मेदार ठहराया गया। उन पर ये आरोप था कि उन्होंने हज़ारों किसानों को जेल का घेराव करने में सहयोग किया था।

‘तारीख़ ए बिहार’ और ‘नक़्श ए पैदार’ जैसी किताबें लिखने वाले उर्दू के मशहूर शायर और लेखक शाद अज़ीमाबादी ने भी ‘लोटा विद्रोह’ को वारिस अली की ही दिमाग़ी उपज बताया है, जो ख़ुद को मुग़ल ख़ानदान के फ़र्द मानते थे। जो बरुराज पुलिस चौकी में जमादार की हैसियत से तैनात थे।

एक सरकारी अफ़सर का विद्रोहियों का साथ देना सरकार की नज़र में बग़ावत था, इस लिए सरकारी आदेश पर उनके मकान को घेर लिया गया, उस समय वे गया के “अली करीम” नाम के एक अज़ीम क्रांतिकारी को ख़त लिख रहे थे। इस छापे में उनके घर से बहुत आपत्तिजनक पत्र प्राप्त हुए। पर ट्रायल के दौरान एैसा कोई भी पत्र पेश नहीं किया जा सका।
असलम रहमानी ने कहा कि किताब के अनुसार बरुराज पुलिस चौकी के पास उनके निवास से अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया था। तिरुहुत के मजिस्ट्रेट एएच रिचर्डसन को नीलहों से शिकायत मिली थी कि वारिस अली विद्रोहियों की मदद कर रहे हैं।

गिरफ़्तारी के बाद वारिस अली को मुजफ़्फ़पुर के पुरानी बाज़ार नाका में तीन दिनों तक रखा गया था और उसके बाद उन्हें सुगौली (चम्पारण) मेजर की अदालत में पेश किया गया। मेजर ने इस आधार पर कार्रवाई करने से इनकार किया कि इनके ख़िलाफ़ सबूत अपर्याप्त हैं। इसके बाद उन्हें पटना के तत्कालीन कमिश्नर विलियम टेलर की अदालत में पेश किया गया। 6 जुलाई 1857 को को दानापुर छावनी में फांसी दे दी गई।

इस मौके पर इंसाफ मंच बिहार के राज्य अध्यक्ष सूरज सिंह ने मानवाधिकार कार्यकर्त फादर स्टेन स्वामी के मौत के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए घोषण किया कि सात जुलाई को माले जिला कार्यालय मे दो बजे दिन में न्याय सभा का आयोजन किया जाएगा।

शहादत समारोह में इंसाफ मंच के जिलाध्यक्ष फहद जमां, राज्य उपाध्यक्ष जफर आजम, आफताब आलम, अकबरे आजम, रियाज खान , मोहम्मद एजाज, एहतशाम रहमानी, डाॅक्टर आफताब, मोहम्मद शाहनवाज,सत्यम राठौर, मुफ्त इरफ़न कासमी, मोहम्मद इम्तियाज, जौहर, अरशद आदि मौजूद थे।

 

दिलीप कुमार : हिंदी सिनेमा के पहले महानायक !

Dhruv Gupt

आज अंततः हिंदी सिनेमा के पहले महानायक दिलीप कुमार का 98 साल की उम्र में इंतकाल हो गया। पिछले कुछ सालों से वे लगातार अस्वस्थ चल रहे थे। उनकी याददाश्त भी बहुत हद तक चली गई थी। उनके जाने के साथ हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर की आखिरी कड़ी भी टूट गई। पिछली सदी के चौथे दशक में दिलीप कुमार का उदय भारतीय सिनेमा की एक ऐसी घटना जिसने हिंदी सिनेमा की दशा-दिशा ही बदल दी थी। वे पहले अभिनेता थे जिन्होंने साबित किया कि बगैर शारीरिक हावभाव और संवादों के सिर्फ चेहरे की भंगिमाओं, आंखों और यहां तक कि ख़ामोशी से भी अभिनय किया जा सकता है। अपनी छह दशक लम्बी अभिनय-यात्रा में उन्होंने अभिनय की जिन ऊंचाईयों और गहराईयों को छुआ वह भारतीय सिनेमा के लिए असाधारण बात थी। उन्हें सत्यजीत राय ने ‘द अल्टीमेट मेथड एक्टर’ की संज्ञा दी थी। हिंदी सिनेमा के तीन महानायकों में जहां राज कपूर को प्रेम के भोलेपन के लिए और देव आनंद को प्रेम की शरारतों के लिए जाना जाता है, दिलीप कुमार के हिस्से में प्रेम की व्यथा आई थी। इस व्यथा की अभिव्यक्ति का उनका अंदाज़ कुछ ऐसा था कि दर्शकों को उस व्यथा में भी ग्लैमर नज़र आया। इस अर्थ में दिलीप कुमार पहले अभिनेता थे जिन्होंने प्रेम की असफलता की पीड़ा को स्वीकार्यता दी। ‘देवदास’ उस पीड़ा का शिखर था।

पिछली सदी के चौथे दशक में दिलीप कुमार उर्फ़ युसूफ खान का उदय भारतीय सिनेमा की शायद सबसे बड़ी घटना थी। एक ऐसी घटना जिसने हिंदी सिनेमा की दशा और दिशा ही बदल दी। दिलीप कुमार हिंदी सिनेमा के पहले महानायक हैं। वे पहले अभिनेता हैं जिन्होंने यह साबित किया कि बगैर शारीरिक हावभाव और बड़े-बड़े संवादों के चेहरे की भंगिमाओं, आंखों और ख़ामोशी से भी अभिनय किया जा सकता है। अपनी छह दशक लम्बी अभिनय-यात्रा में उन्होंने अभिनय की जिन ऊंचाईयों और गहराईयों को छुआ वह भारतीय ही नहीं, विश्व सिनेमा के लिए भी असाधारण बात थी। उन्होंने किसी स्कूल में अभिनय नहीं सीखा। प्रयोग और अनुभव से खुद को फिल्म दर फिल्म तराशने वाले दिलीप कुमार को सत्यजीत राय ने ‘द अल्टीमेट मेथड एक्टर’ की संज्ञा दी थी। हिंदी सिनेमा के तीन शुरूआती महानायकों में जहां राज कपूर को प्रेम के भोलेपन और देव आनंद को प्रेम की शरारतों के लिए जाना जाता है, दिलीप कुमार के हिस्से में प्रेम की व्यथा आई थी। प्रेम की व्यथा की उनकी अभिव्यक्ति का अंदाज़ कुछ ऐसा था कि दर्शकों को उस व्यथा में भी ग्लैमर नज़र आने लगा था। इस अर्थ में दिलीप कुमार पहले अभिनेता थे जिन्होंने प्रेम की असफलता की पीड़ा को स्वीकार्यता दी। ‘देवदास’ प्रेम की उस पीड़ा का शिखर था। देवदास की भूमिका उनके पहले कुंदनलाल सहगल और उनके बाद शाहरूख खान ने भी निभाई, लेकिन दिलीप कुमार की वेदना और गहराई को कोई छू भी नहीं सका।

11 दिसम्बर,1922 को पाकिस्तान के पेशावर जन्मे युसूफ खान के पिता विभाजन के दौरान अपनी पत्नी और बारह बच्चों के साथ मुंबई आकर बस गए थे। तंगहाली की अवस्था में युसूफ ने पुणे में एक छोटी-सी कैंटीन चलाई। यह कैंटीन भी बंद होने के बाद वे मुंबई लौट आए। पुणे की छोटी-सी कैंटीन से फिल्मों की बादशाहत तक का उनका सफ़र किसी परीकथा जैसा लगता है। संयोग से ही एक बार उस दौर की लोकप्रिय अभिनेत्री और फिल्मकार देविका रानी की नज़र उन पर पड़ गई। उन्होंने झटपट युसूफ खान को दिलीप कुमार का नाम देकर उन्हें अभिनेता बना दिया। वर्ष 1941 में ‘ज्वारभाटा’ से अपनी फिल्मी पारी शुरू करने वाले दिलीप साहब को दर्शकों की स्वीकार्यता और बेहिसाब लोकप्रियता मिली फिल्म ‘जुगनू’ से। उसके बाद जो हुआ, वह इतिहास है। अपने पांच दशक लंबे फिल्म कैरियर में दिलीप साहब ने साठ से ज्यादा फिल्मों में अभिनय के नए-नए प्रतिमान गढ़े। वे पहले ऐसे अभिनेता थे जिनके व्यक्तित्व को ध्यान में रखकर फिल्मों की कहानियां और पटकथाएं ही नहीं, गीत और संगीत भी रचे जाते थे। फिल्मों में प्रेम की व्यथा की जीवंत अभिव्यक्ति के कारण उन्हें ‘ट्रैजेडी किंग’ ज़रूर कहा गया, लेकिन यह भी सच है कि अपने अभिनय की विविधता और रेंज से उन्होंने लोगों को बार-बार चकित किया है। वह ‘मेला,, ‘दीदार’, ‘उड़न खटोला’, ‘आदमी’, ‘दिल दिया दर्द लिया’ का असफल प्रेमी हो, ‘देवदास’ का आत्महंता हो, ‘शहीद’ का क्रांतिकारी हो, ‘मुगले आज़म’ का विद्रोही आशिक़ हो, ‘गंगा जमना’ का बागी डकैत हो, ‘कोहिनूर’, ‘आज़ाद’, ‘राम और श्याम’ का विदूषक हो, ‘शक्ति’ का सिद्धांतवादी पुलिस अफसर हो या ‘गोपी’ का मासूम ग्रामीण युवा – उनका हर किरदार उनके व्यक्तित्व पर फबता है। उनकी कोई भी फिल्म देखकर यही महसूस होता है इस भूमिका को दिलीप कुमार से बेहतर कोई कर ही नहीं सकता था। अभिनय के अपने आखिरी दौर में भी उन्होंने ‘मशाल’,’कर्मा’,’विधाता’, ‘क्रान्ति’, ‘दुनिया’ और ‘सौदागर’ जैसी फिल्मों में बेहतरीन चरित्र भूमिकाएं निभाईं। 1998 में आखिरी बार उन्हें फिल्म ‘क़िला’ में देखा गया जिसके बाद उन्होंने फिल्मों को अलविदा कह दिया।

अभिनय के नए-नए आयाम गढ़ने वाले दिलीप साहब देश के पहले अभिनेता हैं जिनके नाम देश के सर्वाधिक पुरस्कार दर्ज़ हैं। उन्हें उनकी फिल्मों – दाग, आज़ाद, देवदास, नया दौर, कोहिनूर, लीडर, राम और श्याम तथा शक्ति के लिए आठ-आठ फिल्मफेयर पुरस्कार और कई दूसरी फिल्मों के लिए उन्नीस नामांकन मिले। उनकी लिखित और बनाई फिल्म ‘गंगा जमुना’ को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। बोस्टन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल, कार्लोवी वेरी फिल्म फेस्टिवल और चेकोस्लोवाक अकादमी ऑफ आर्ट्स द्वारा भी उन्हें पुरस्कृत और सम्मानित किया गया। भारतीय उपमहाद्वीप में उनकी लोकप्रियता का आलम यह है कि भारत सरकार ने उन्हें सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान ‘दादासाहब फाल्के अवार्ड’ से ही नहीं नवाज़ा,1980 में उन्हें मुंबई का शेरिफ और 2000 में राज्यसभा का सांसद भी बनाया। उधर पाकिस्तान की सरकार ने उन्हें अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘निशान-ए-इम्तियाज़’ से नवाज़ा है। पाकिस्तान के पेशावर में उनके पैतृक घर को पाकिस्तान सरकार ने राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया हुआ है।

अपनी दो सह-अभिनेत्रियों – कामिनी कौशल और मधुबाला के साथ उनके असफल प्रेम उस दौर की चर्चित प्रेम कहानियों में ही नहीं शुमार किए जाते, सायरा बानो के साथ उनका लंबा साहचर्य फिल्मी दुनिया का सबसे सफल दांपत्य भी माना जाता है। इस सफल दांपत्य में एक छोटा-सा व्यतिक्रम तब आया था जब 1980 में उन्होंने आसमां नाम की एक औरत से दूसरी शादी कर ली थी। शायद संतान पैदा करने में सायरा जी की शारीरिक असमर्थता की वज़ह से ही,लेकिन सायरा जी के विरोध के कारण जल्द ही यह अध्याय बंद भी हो गया। कुछ साल पहले दिलीप साहब की आत्मकथा ‘ द सब्सटांस एंड द शैडो’ प्रकाशित और चर्चित हुई थी जिसमें उन्होंने अपने जीवन के कई अनखुले पहलुओं पर रोशनी डाली है।

भारतीय सिनेमा के इस सबसे बड़े अभिनेता के जाने के बाद सिनेमा ही नहीं, उनकी फिल्मों और उनके अभिनय के विभिन्न आयामों को देखने और महसूस करने वाली पीढ़ी के लोग भी भावनात्मक तौर पर दरिद्र हुए हैं। आपको हम अलविदा नहीं कहेंगे, दिलीप साहब। आपकी फिल्मों में आपकी उपस्थिति हम हमेशा महसूस करते रहेंगे ! खिराज़-ए-अक़ीदत।

लेखक :- ध्रुव गुप्त (पुर्व आई.पी.एस. हैं)

दिलीप कुमार, एक्टिंग की यूनिवर्सटी रहे

  • वीर विनोद छाबड़ा

  • आज अभिनय सम्राट दिलीप कुमार का 98 साल की उम्र में निधन से सिनेमा इंडस्ट्री बहुत उदास है. उनके निधन के साथ ही पचास-साठ के सालों की दिलीप कुमार-देवानंद-राजकपूर प्रसिद्ध तिकड़ी का अंतिम स्टार भी अनंत में विलीन हो गया.
    दिलीप कुमार का नाम जुबां पर आते ही एक विलक्ष्ण प्रतिभाशाली मूरत सामने आती है. वो हिंदी सिनेमा के पहले ट्रेजडी किंग और अभिनय सम्राट कहलाये. तमाम प्रोड्यूसर मुंहमांगी रक़म पर उनको साईन करने के लिये आगे-पीछे घूमते थे. मगर दिलीप उसी को हां बोलते जिनका जिगर बड़ा हो और साथ ही ज्ञानी-ध्यानी हो.
    दिलीप परफेक्शन में यकीन करते थे. कई बार रीटेक पर रीटेक देते रहे. मगर नतीजा, बेशकीमती रा-स्टाक की बरबादी. इसलिए उनके साथ फ़िल्म बहुत महंगी बैठती थी. एक बार उन्होंने छत्तीस रीटेक दिए. लेकिन रीव्यू किया गया तो बोले – मियां, पहले वाला शाट ही बेहतर था. बड़े दिल-गुर्दे वाले प्रोडयूसर के लिए भी दिलीप को रिपीट करना मुश्किल होता था. लेकिन बीआर चोपड़ा बड़े दिल के थे. उन्होंने ‘नया दौर’ के बाद ‘दास्तान’ और फिर ‘मजदूर’में उन्हें कास्ट किया. यद्यपि बीच में अंतराल लंबा रहा. रमेश सिप्पी और सुभाष घई उनकी फ़िल्में देख-देख जवान हुए. रमेश ने अपनी ख्वाईश ‘शक्ति’ में पूरी की. इसमें अमिताभ बच्चन भी थे. दो बडे़ आर्टिस्टों की आमने-सामने की परफारमेंस क्या मायने रखती है, ‘शक्ति’ आज भी इसकी एक मिसाल है.
    शानदार दिल वाले सुभाष घई तो दिलीप के इतने बड़े मुरीद थे कि उन्होंने उनके साथ विधाता, कर्मा और सौदागर तीन फिल्में बनायीं. ‘विधाता’ में संजीव कुमार को दिलीप के सामने खड़ा किया तो ‘कर्मा’ में अनिल कपूर और जैकी श्राफ़ थे. नसीरूद्दीन शाह को दिलीप के कहने पर लाया गया. दरअसल कुछ दिन पहले नसीर ने इंटरव्यू दिया था कि वो दिलीप को बड़ा आर्टिस्ट नहीं मानते. मगर इस फिल्म के बाद उन्होंने बयान बदल दिया. इसी में दारासिंह की भी उनके संग काम करने की चाहत पूरी हुई. ‘सौदागर’ में दिलीप का सामना उन्होंने फुटबाल साईज़ ईगो जानी राजकुमार से कराया गया. राजकुमार ने शुरूआती दौर में उनके संग ‘पैगाम’ की थी. राजकुमार ने अपने से बड़ा आर्टिस्ट सिर्फ दिलीप को ही माना.
    दिलीप कुमार के झोले में हिट फ़िल्में कम हैं. लेकिन इस आधार पर उन्हें ख़ारिज नहीं किया गया. हर एक्टर के लिए उन्हें परफार्म करते हुए देखना और उनके साथ काम करना एक सुखद और लाईफ़टाईम उपलब्धि रही. ज्यादातर क्रिटिक भी इस मत के हैं कि उनसे बड़ा कोई एक्टर भारतीय स्क्रीन पर नहीं आया. बावजूद इसके कि वो किसी स्कूल में एक्टिंग नहीं सीखे-पढ़े, लेकिन खुद में एक्टिंग की यूनिवर्सटी हैं. अमिताभ बच्चन उन्हें सर्वश्रेष्ठ एक्टर बताते हैं. सत्यजीत रे ने कहा था – दिलीप कुमार बेमिसाल सलीकेदार एक्टर हैं. प्रसिद्ध फिल्म क्रिटिक और लेखक अली पीटर जॉन ने एक बार कहा था, मैं अनेक एक्टरों से मिला हूँ. किसी का प्रभाव दिन भर रहा और कोई महीने पर दिमाग को डेंट करता रहा. मगर दिलीप कुमार से मिला तो उनका प्रभाव बरसों तक दिमाग में घुसा रहा. वो आसानी से भुलाये जाने वाले एक्टर नहीं हैं. विधाता के रिव्यु में कई गॉसिप टाइप समीक्षकों ने लिखा कि संजीव कुमार ने दिलीप कुमार को धो दिया. अली पीटर जॉन ने इस पर किस्सा बताया. एक चमचा टाइप समीक्षक ने जब संजीव कुमार के सामने दिलीप कुमार से तुलना करते हुए उनकी तारीफ़ की तो संजीव आपा खो बैठे और उस समीक्षक को जोरदार थप्पड़ मार दिया – संजीव कुमार आते जाते रहेंगे, लेकिन दिलीप कुमार जिस टॉप पोजीशन पर वहां से उन्हें कोई नहीं हटा सकता.
    उन्हें रेकार्ड आठ बार बेहतरीन एक्टर का फिल्मफेयर एवार्ड मिला. वो बेस्ट एक्टर के लिये 19 बार नामांकित हुए. उन्हें 1993 में लाईफटाईम एचीवमेंट एवार्ड देकर फ़िल्मफ़ेयर ने खुद को सम्मानित किया. भारत सरकार ने 1991 में पद्म भूषण दिया. राज्यसभा के लिए भी नामांकित हुए. फिल्म इंडस्ट्री का सबसे बड़ा अवार्ड 1994 में दादासाहेब फाल्के दिया गया. 1980 में बंबई के शैरीफ़ हुए. ये पद मेयर के समकक्ष होता है. गिनीज़ बुक आफ रेकार्ड्स में बताया गया है कि वो एकमात्र भारतीय एक्टर हैं जिन्हें सबसे ज्यादा अवार्ड्स से सम्मानित किया गया है.

1997 में पाकिस्तान सरकार ने उनके भारत-पाकिस्तान के एवाम को करीब लाने और अमन की पहल करने के लिए निशान-ए-इम्तियाज़ एवार्ड दिया. इस पर शिवसेना और उसकी सोच की समकक्ष पार्टियों ने बड़ा हो-हल्ला मचाया था कि कारगिल युद्ध के मद्देनज़र दिलीप कुमार को यह एवार्ड लौटा देना चाहिए. इस पर दिलीप कुमार ने कहा कि ये एवार्ड उन्हें अमन की सेवा के लिये मिला है, युद्ध से इसका कोई ताल्लुक नहीं है. उन दिनों केंद्र में बीजेपी की सरकार थी. कई मंत्री खुश नहीं थे. मगर तत्कालीन प्रधानमंत्री जनाब अटल बिहारी बाजपेयी ने दिलीप कुमार का समर्थन किया – ये अवार्ड उनके अचीवमेंट के लिए है.

एक पुराना आर्टिकल संशोधित.

०७ जुलाई २०२१

शहादत दिवस पर / एक थे शहीद पीर अली खान !

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ध्रुव गुप्त


1857 के स्वाधीनता संग्राम के नायकों में सिर्फ राजे, नवाब और सामंत नहीं थे जिनके सामने अपने छोटे-बड़े राज्यों और जमींदारियों को अंग्रेजों से बचाने की चुनौती थी। उस दौर में अनगिनत योद्धा ऐसे भी रहे थे जिनके पास न तो कोई रियासत थी, न कोई संपति। उनके आत्म बलिदान के पीछे देश के लिए मर मिटने के जज्बे के सिवा कुछ नहीं था। पीर अली खान स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे ही अनाम योद्धाओं में एक थे जिनके बलिदान को देश ने लगभग विस्मृत कर दिया है।

1820 में आजमगढ़ के गांव मुहम्मदपुर में जन्मे पीर अली किशोरावस्था में घर से भागकर पटना आ गए थे जहां के नवाब मीर अब्दुल्लाह ने उनकी परवरिश की। पढ़ाई के बाद आजीविका के लिए उन्होंने मीर साहब की मदद से किताबों की एक छोटी-सी दुकान खोल ली। कुछ क्रांतिकारियों के संपर्क में आने के बाद उनकी दुकान धीरे-धीरे प्रदेश के क्रांतिकारियों के अड्डे में तब्दील होती चली गई जहां देश भर से क्रांतिकारी साहित्य मंगाकर पढ़ी और बेचीं जाती थी। पीर अली ने देश की आज़ादी को अपने जीवन का मकसद बना लिया। 1857 की क्रांति के वक़्त पीर अली ने बिहार भर में घूमकर क्रांति का जज्बा रखने वाले सैकड़ों युवाओं को संगठित और प्रशिक्षित किया।

वह दिन भी आया जिसके लिए आजादी के सैकड़ों दीवाने एक अरसे से तैयारी कर रहे थे। पूर्व योजना के अनुसार 3 जुलाई, 1857 को पीर अली के घर पर दो सौ से ज्यादा हथियारबंद युवा एकत्र हुए। आजादी के लिए कुर्बानी की कसमें खाने के बाद पीर अली की अगुवाई में उन्होंने पटना के गुलज़ार बाग स्थित अंग्रेजों के प्रशासनिक भवन को घेर लिया। इस भवन से प्रदेश की क्रांतिकारी गतिविधियों पर नजर रखी जाती थी। वहां तैनात अंग्रेज अफसर डॉ. लॉयल ने क्रांतिकारियों की भीड़ पर गोली चलवा दी। अंग्रेजी सिपाहियों की फायरिंग का जवाब क्रांतिकारियों की टोली ने भी दिया। दोतरफा गोलीबारी में डॉ. लॉयल और कुछ सिपाहियों के अलावा कई क्रांतिकारी युवा मौके पर शहीद हुए और दर्जनों दूसरे घायल होकर अस्पताल पहुंच गए। पीर अली चौतरफा फायरिंग के बीच अपने कुछ साथियों के साथ वहां से बच निकलने में सफल रहे।

इस हमले के बाद पटना में अंग्रेज पुलिस का दमन-चक्र चला। संदेह के आधार पर सैकड़ों निर्दोष लोगों, खासकर मुसलमानो की गिरफ्तारियां की गईं। उनके घर तोड़े गए। कुछ युवाओं को झूठा मुठभेड़ दिखाकर गोली मार दी गई। अंततः 5 जुलाई, 1857 को पीर अली और उनके चौदह साथियों को बग़ावत के जुर्म मे गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के बाद यातनाओं के बीच पीर अली को पटना के कमिश्नर विलियम टेलर ने प्रलोभन दिया कि अगर वे देश भर के क्रांतिकारी साथियों के नाम बता दें तो उनकी जान बख्शी जा सकती है। पीर अली ने प्रस्ताव ठुकराते हुए कहा–‘जिंदगी में कई ऐसे मौक़े आते हैं जब जान बचाना ज़रूरी होता है। कई ऐसे मौक़े भी आते हैं जब जान देना जरूरी हो जाता है। यह वक़्त जान देने का है।’ अंग्रेजी हुकूमत ने दिखावे के ट्रायल के बाद 7 जुलाई, 1857 को पीर अली को उनके साथियों के साथ बीच सड़क पर फांसी पर लटका दिया। फांसी के फंदे पर झूलने के पहले पीर अली के आखिरी शब्द थे – ‘तुम हमें फांसी पर लटका सकते हो, लेकिन हमारे आदर्श की हत्या नहीं कर सकते। मैं मरूंगा तो मेरे खून से लाखों बहादुर पैदा होंगे जो एक दिन तुम्हारे ज़ुल्म का खात्मा कर देंगे।’

देश की आजादी के लिए प्राण का उत्सर्ग करने वाले पीर अली खां इतिहास के पन्नों से आज अनुपस्थित हैं। इतिहास लिखने वालों के अपने पूर्वग्रह होते हैं। अभी उनके नाम पर पटना में एक मोहल्ला पीरबहोर आबाद है। कुछ साल पूर्व बिहार सरकार ने उनके नाम पर गांधी मैदान के पास एक छोटा-सा पार्क बनवाया, शहर को हवाई अड्डे से जोड़ने वाली एक सड़क को ‘पीर अली खां रोड’ नाम दिया और 7 जुलाई को उनके शहादत दिवस पर समारोहों के आयोजन का सिलसिला शुरू कराया। दुख यह देखकर होता है कि देश और बिहार तो क्या, पटना के लोगों को पीर अली के बारे में कम ही पता है!

तिहाड़ पर सिगरेट और चॉकलेट की बारिश से शुरू हुई भारत में एयरपोर्ट सुरक्षा की कहानी

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डॉक्टर परिवेश मिश्रा

जिन साथियों को किसी हवाई अड्डे में प्रवेश करने का अवसर मिला है वे भी भली भाँति जानते हैं आज के समय में किसी अनधिकृत चिड़िया के लिए भी आसान नहीं कि सुरक्षा व्यवस्था को भेदकर वह एयरपोर्ट में प्रवेश कर पाए।

किन्तु एयरपोर्ट की ऐसी चाक-चौबंद सुरक्षा व्यवस्था हमेशा नहीं थी। साठ के दशक तक लाठी लिए होमगार्ड के एक या दो सैनिक हवाई अड्डे की सुरक्षा ड्यूटी में होते थे। बहुत छोटे एरोड्रोम हों तो गांव के कोटवार पर्याप्त थे। कलकत्ता के डमडम, दिल्ली के पालम और बम्बई के सांताक्रूज आदि बड़ों में शुमार थे सो वहां स्थानीय थाने की पुलिस को यह काम सौंपा जाता था। उस थाना क्षेत्र मे जिस दिन किसी वी.आय.पी का कार्यक्रम हो या कोई कानून व्यवस्था की समस्या हो, पुलिस को एयरपोर्ट ड्यूटी से हटा कर उधर भेज दिया जाता था। ये हाल सिर्फ एरोड्रोम के भवनों के ही नहीं बल्कि हवाई पट्टियों के भी थे। अधिकांश स्थानों में मैदानों में फेन्सिंग भी नहीं थी। वर्षों तक मध्यप्रदेश के स्टेट पायलट रह चुके स्व. कैप्टेन ज़ेड. ए. बेकर ने मुझे बताया था अनेक अवसरों पर हवाई पट्टी पर चरते गाय-बकरियों के बीच विमान लैन्ड कराना उनके अनुभवों में शुमार था।

1984 के अंत में भोपाल में सुरक्षा का जो आलम था उसका अहसास मुझे गैस लीक के एक दिन बाद हुआ जब दिल्ली से पत्रकार मित्र दिलीप चेरियन ने घटना के फोटोग्राफ तत्काल भेजने का आग्रह किया। उन्होने अपनी बिज़नेस इंडिया पत्रिका का प्रेस में जा चुके ताजा अंक की छपायी इस घटना की सूचना के बाद रुकवा दी थी। मैं जब एयरपोर्ट पहुंचा तो सवारियां दिल्ली की एकमात्र फ्लाईट में चढ़ना प्रारम्भ कर चुकी थीं। परदा लगे दरवाजे पर खड़े जवान ने मेरी बात मान ली और विमान तक जाने दिया। सीढ़ियों पर एक विदेशी सज्जन से परिचय के अति-संक्षिप्त आदान प्रदान के बाद निवेदन किया। उन्होने तात्कालिकता समझी, लिफाफा लिया और कार्ड देते हुए कहा दिल्ली में कलेक्ट करवा लूं। कार्ड में पढ़ा : जाॅन ईलियट, फायनेंशियल टाईम्स।

जिस घटना के कारण भारत में हवाई अड्डों की सुरक्षा पर पहली बार सरकार का ध्यान गया, उस घटना में दिल्ली के सफदरज॔ग एरोड्रोम का बड़ा रोल है। पालम से पहले दिल्ली का मुख्य एरोड्रोम यही था। लाॅर्ड माऊंटबैटन जब अंतिम वायसराॅय बनकर भारत आये तो उनका विमान मध्य दिल्ली में यहीं उतरा था। हाल तक यहां फ्लाईंग क्लब काम करता था। प्राणघाती दुर्घटना के दिन 23 जून 1980 को संजय गांधी का विमान यहीं से उड़ा था। पास ही स्थित प्रधान मंत्री आवास की सुरक्षा के चलते यहां की गतिविधियों पर अब लगाम लग चुकी है।

हमारी कहानी के हीरो (आप चाहें तो विलेन कह सकते हैं) हैं डेनियल हैली वाॅलकाॅट। तीस-एक साल की उम्र में इस अमरीकी ने एक छोटा विमान खरीदकर अपने देश में समुद्र पार से माल ढुलाई का कारोबार शुरू किया। आज के संदर्भ में कुरियर कम्पनी। हालांकि तब तक यह जानकारी बाहर नहीं आयी थी कि इनका असली काम सामान के साथ साथ बिना कागज़ात वाले लोगों की स्मगलिंग का था।

वाॅलकाॅट को भारत मे बड़ा काम 1962 में मिला जब एयर इंडिया ने उन्हे बड़े रेल्वे स्टेशनों से माल उठाकर अफगानिस्तान पहुंचाने का ठेका दिया। वाॅलकाॅट ने अपनी पत्नी के साथ दिल्ली के अशोका होटल में अस्थायी निवास बनाया और अपने “पाईपर अपाशे” विमान के साथ काम शुरू कर दिया। स्मगलिंग का अनुभव तो था ही। सो साथ ही साथ भारत में शिकार के शौकीन लोगों से सम्पर्क कर बन्दूकों की गोलियां भी सप्लाई करने लगे।

सितम्बर 1962 में दिल्ली पुलिस ने छापा मारकर होटल के कमरे के अलावा इनके पाईपर अपाशे विमान से बड़ी मात्रा में बन्दूक की गोलियां जब्त की। एस.डी.एम ने वाॅलकाॅट को न्यायिक अभिरक्षा में तिहाड़ जेल भेज दिया। सफदरज॔ग एरोड्रोम पर खड़े विमान को भी जब्त कर लिया गया। एक महिने के बाद जब जमानत मिली तो वाॅलकाॅट ने भारत से भागने का प्रयास किया। किन्तु वाघा सीमा पर इन्हे पकड़ कर फिर से तिहाड़ में डाल दिया गया।

उसी समय भारत पर चीन का आक्रमण हुआ और देशप्रेम बाकी हर बात पर हावी हो गया। देश के लिए कुछ कर गुज़रने के लिए भारतीय लालयित हो गये थे। ऐसे समय में वाॅलकाॅट ने कोर्ट में आवेदन दे कर कहा उसके पास विमान है, विमान उड़ाने का अनुभव है, और यदि आवश्यकता पड़े तो वह भारत की सेवा में अपने विमान को समर्पित करना चाहेगा। मांग बस इतनी थी कि उसे विमान को चालू हालत में रख सकने की अनुमति दी जाए। अनुमति मिल गयी और जेल का वाहन वाॅलकाॅट को नियमित रूप से सफदरज॔ग एरोड्रोम ले जाने लगा। उन्हे थोड़ा पेट्रोल दिया जाता ताकि वे एंजिन को कुछ समय चालू रख सकें। यह अनदेखा रह गया है कि वाॅलकाॅट हर बार कुछ पेट्रोल बचा कर इकट्ठा करते जा रहे हैं।

साल भर में दोबारा जमानत मिली तो वाॅलकाॅट की अमेरिका वापसी स्वाभाविक मानी जाती। किन्तु दो समस्याएं बाधा बन गयी थीं। वाॅलकाॅट पर टाटा की ओर साठ हज़ार रुपयों की देनदारी बाकी थी और दूसरे उनका विमान अभी तक वापस नहीं मिला था। जब पैसा वसूली की उम्मीद कम हुई तो टाटा के वकीलों ने इनके विरुद्ध गैर-जमानती वाॅरंट की प्रक्रिया शुरू कर दी। वाॅलकाॅट के लिए निर्णायक कदम उठाने का समय आ गया था।

23 सितम्बर 1963 की सुबह जब वाॅलकाॅट सफदरज॔ग एरोड्रोम पहुंचे तब तक पुलिस का जवान इन्हे वहां देखने का आदी हो चुका था। वाॅलकाॅट ने वहां पहुंच कर हर बार की तरह विमान को स्टार्ट किया। यह अप्रत्याशित नहीं था। कुछ देर के बाद जवान का ध्यान उस ओर लौटा तब तक विमान रन-वे पर पहुंच चुका था। उसने दौड़कर विमान को रोकने का प्रयास किया पर देर हो चुकी थी। जवान ने लौटकर कार्यकाल का दरवाजा खुलवाया, फोन के डब्बे से रिसीवर उठाकर ऑपरेटर के “नम्बर प्लीज़” कहने की प्रतीक्षा की और हवाई जहाज के भाग जाने की सूचना आगे दी। भारतीय वायु सेना के दो हंटर विमानों को पीछा करने भेजा गया किन्तु तब तक वाॅलकाॅट का विमान पाकिस्तान की सीमा में प्रवेश कर चुका था।

लेकिन इस से पहले वाॅलकाॅट ने एक काम किया। सफदरज॔ग एरोड्रोम से उड़ने के बाद उसने तिहाड़ जेल के चक्कर लगाये और ऊपर से सिगरेट और चॉकलेट के पैकेट गिराये। जेल के मित्रों के लिए यह वाॅलकाॅट का उपहार था।


और जो हुआ सो हुआ, लेकिन इस घटना के फ़ौरन बाद सरकार ने हवाई अड्डों की सुरक्षा के तरीके ढूंढ़ने के लिये एक समिति बनायी थी। तमिलनाडु काडर के पुलिस अधिकारी आर.एन. माणिक्कम इंटेलिजेंस ब्यूरो में थे और “राॅ” के भीतर ऐवियेशन रिसर्च सेन्टर के संस्थापक के रूप में याद किये जाते हैं। वे इस समिति के मेम्बर सेक्रेट्री थे। अपनी पुस्तक “सिक्योरिटी, एस्पियोनेज एन्ड काऊंटर इन्टेलिजेन्स” में लिखते हैं कि पहली बार भारत के हवाई अड्डों की सुरक्षा के लिए केन्द्र शासन के अधीन किसी समर्पित व्यवस्था का सुझाव दिया गया।

1969 से फिलिस्तीन वालों ने हवाई जहाज हाइजैक करने का सिलसिला शुरू किया। इनमें महिला हाइजैकर लैला खालिद का बड़ा नाम हुआ था। इसके बाद हवाई अड्डों की सुरक्षा और चौकस की गयी। 30 जनवरी 1971 में पहली बार भारत में विमान का अपहरण हुआ। व्यवस्था और बढ़ाई गयी। और तब से यह चक्र चल रहा है। धीरे धीरे बात बढ़ती रही और राज्य शासन के एस.पी. स्तर के अधिकारियों से बढ़ कर सी.आर.पी.एफ. और सी.आय. एस.एफ. से भी आगे निकल गयी। अप्रैल 1993 में तत्कालीन विमानन मंत्री गुलाम नबी आज़ाद ने संसद में घोषणा की कि प्रमुख हवाई अड्डों की सुरक्षा के लिए केन्द्र विशेष रूप से प्रशिक्षित बल तैनात करेगा।

1960 का काल और तिहाड़ जेल पर सिगरेट और चॉकलेट की बारिश का किस्सा अब इतिहास बन चुका है।

डाॅ. परिवेश मिश्रा
गिरिविलास पैलेस

सारंगढ़ (छत्तीसगढ)

“क्षेत्रीय स्वतंत्रता आंदोलन माइक्रोस्कोप है।”- डॉ. रविशंकर

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‘’भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में लिखा गया है लेकिन आम जन के संघर्ष और उनके त्याग को विस्मृत कर दिया गया है। क्षेत्रीय स्वतंत्रता आंदोलन माइक्रोस्कोप की तरह है, इसलिए आवश्यक है कि स्वाधीनता संग्राम को आम आदमी के नजरिये से क्षेत्रीय स्तर पर इतिहास पुन: लिखा जाए।’’ यह बात टीएनबी कॉलेज के इतिहास के सहायक प्राध्यापक डॉ. रविशंकर कुमार चौधरी द्वारा बताई गई। डॉ.चौधरी हेरीटेज सोसाईटी, पटना एवं डॉ. बीआर अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय, महू (मध्य प्रदेश) के संयुक्त तत्वावधान में आजादी का “अमृत महोत्सव” के अवसर पर ‘अंग प्रदेश में स्वतंत्रता आंदोलन’विषय पर बोल रहे थे।

डॉ.चौधरी ने कहा कि स्वाधीनता संग्राम के कालखंड में अंग प्रदेश का उदय नहीं हुआ था। उन्होंने इतिहास के संदर्भ में कहा कि अंग प्रदेश का उल्लेख छठीं शताब्दी में मिलता है। उपलब्ध तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि यह दानवीर कर्ण की राजधानी हुआ करती थी। उन्होंने इतिहास में उपलब्ध जानकारी के आधार पर बताया कि अंग प्रदेश सम्राट अशोक का ननिहाल था।

स्वाधीनता संग्राम की चर्चा करते हुए डॉ. चौधरी ने कहा कि तिलका मांझी ने बगावत का पहला बिगुल फूंका था, उन्होने गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाई थी। डा.चौधरी ने बताया कि गांधीजी के प्रवेश के बाद अंग प्रदेश में स्वाधीनता संग्राम में एक नई उबाल आयी। 1920 में गांधीजी पहली बार भागलपुर पहुंचे थे। उन्होंने लोगों को संबोधित करते हुए कहा था कि शैतान को सत्य और अहिंसा से पराजित किया जा सकता था। पूर्ण स्वराज और असहयोग आंदोलन की चर्चा करते हुए शराबबंदी, जाति वैमनस्य के बारे में भी लोगों को सचेत किया। उन्होंने स्वाधीनता संग्राम के अनेक परिचित और अज्ञात वीर सेनानियों का उल्लेख करते हुए कई प्रसंग सुनाये।

वेबीनार की अध्यक्ष आई.सी.सी.आर.दिल्ली की पूर्व डायरेक्टर डॉ. नीरू मिश्रा ने ब्राउस के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए वेबीनार के विषय पर प्रकाश डाला। डॉ. मिश्रा ने कहा कि कुलपति प्रो. आशा शुक्ला अमृत महोत्सव के इस संकल्प को साकार करने के लिए लगन के साथ मेहनत कर रही हैं और हम सबको प्रेरित भी कर रही हैं। कार्यक्रम में स्वागत वक्तव्य हेरीटेज सोसाईटी के महानिदेशक डॉ.अनंताशुतोष द्विवेदी ने किया एवं आभार वाकतव्य योगिक साइंस विभाग के डॉ.अजय दुबे द्वारा किया गया। वेबीनार का संचालन प्रशासनिक सलाहकार डॉ शैलेन्द्र मिश्र ने किया। वेबीनार के सफल संचालन के लिए डीन डॉ.डी.के वर्मा, डॉ० मनीषा सक्सेना, डीन, ब्राउस एवं रजिस्ट्रार श्री अजय वर्मा के साथ विश्वविद्यालय परिवार का सहयोग रहा।

विकल्प व सम्भावनाओं की तलाश करने वाला राजनेता : किशन पटनायक

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Shubhneet Kaushik

आज भारत में समाजवादी आंदोलन की एक प्रखर आवाज़ रहे विचारक व राजनेता किशन पटनायक (1930-2004) का जन्मदिन है। आज के दौर में जब राजनीतिक बहसों के बीच गाहे-बगाहे ‘आख़िर विकल्प ही क्या है’ का जुमला उछाला जा रहा हो। ‘विकल्पहीन नहीं है दुनिया’ की वकालत करने वाले किशन पटनायक और उनके विचार और भी प्रासंगिक हो चले हैं। किशन जी की किताब ‘विकल्पहीन नहीं है दुनिया’ में संकलित लेख उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं और सामाजिक सरोकारों की बानगी देते हैं। ये लेख पढ़ते हुए किशन पटनायक के चिंतन पर गांधी और लोहिया की गहरी छाप भी स्पष्ट दिखती है।

उल्लेखनीय है कि डॉक्टर लोहिया ने भी कभी समाजवादी युवाओं को सम्बोधित करते हुए उन्हें ‘निराशा के कर्तव्य’ बताए थे। निराशा के क्षण की तंद्रा को तोड़ने के उन्हीं कर्तव्यों को किशन पटनायक विकल्पों और सम्भावनाओं की तलाश के राजनीतिक-वैचारिक मुहिम में बदल देते हैं। ‘सामयिक वार्ता’ जैसी पत्रिकाओं के जरिए किशन जी ने समता और नैतिकता की कसौटियों के पुनरुद्धार की पैरवी की।

किशन जी के ये लेख पढ़ते हुए आपको आश्चर्य होगा कि अभी डेढ़ दो दशक पहले तक भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में ऐसे राजनेता सक्रिय रहे हैं, जिन्होंने समकालीन राजनीति के साथ-साथ उपनिवेशिवादी मानसिकता, अर्थनीति, किसान आंदोलन, कूटनीति, प्रतिरक्षा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, जाति प्रथा और सामाजिक-आर्थिक विषमता जैसे तमाम सवालों पर इतनी सुलझी हुई और स्पष्ट राय रखी है।

इस पुस्तक में शामिल एक विचारोत्तेजक लेख का शीर्षक ही है ‘ग़ुलाम दिमाग़ का छेद’। नगुगी वा थियोंगो जैसे विचारक मस्तिष्क के विऔपनिवेशीकरण की जिस प्रक्रिया की बात करते रहे, भारतीय संदर्भ में उसी प्रक्रिया के लिए ज़रूरी उपायों की बात किशन जी ने उठाई है। इसी लेख में किशन पटनायक ने लिखा है कि ‘अल्पकालीन ग़ुलामी में सिर्फ़ राजनीतिक ग़ुलामी होती है, जबकि दीर्घकालीन ग़ुलामी में मानसिक ग़ुलामी आ जाती है।’ कहना न होगा कि अनुकरण और बौद्धिक निर्भरता वाली यह मानसिक ग़ुलामी व्यक्ति को एक छद्म सुरक्षा और आश्वस्ति का भाव भी देती है। यही कारण था कि गांधी, लोहिया और किशन पटनायक सरीखे विचारकों ने मानसिक ग़ुलामी के इस छद्म को तोड़ने के अनवरत प्रयास किए।

भारतीय बुद्धिजीवियों की सीमाओं को भी किशन पटनायक ने अपने लेखों में बखूबी चिह्नित किया है। वे ठीक ही लिखते हैं कि ‘भारत का लगभग हरेक बुद्धिजीवी अपने जीवन में कई बार विभिन्न प्रसंगों में यह कहता हुआ पाया जाता है – ‘बात तो सही है, लेकिन इस पर अमल कठिन है।’ ‘लेकिन’ और ‘कठिन’ शब्दों का उच्चारण वह इस तरह करता है मानो कठिन और असम्भव का पर्यायवाची हो।’

किशन जी के लेखों का यह महत्त्वपूर्ण संकलन राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया। जिसे ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए।

आज आप इंतज़ार करें

Vir Vinod Chhabra

मुझे राजकपूर की वहीदा रहमान संग दो फ़िल्में याद आती हैं, एक दिल सौ अफ़साने (1963) और तीसरी क़सम (1966). बॉक्स ऑफिस पर भले दोनों ही बहुत अच्छी नहीं चलीं लेकिन तीसरी क़सम ने क्रिटिक्स की दुनिया में धमाल मचा दिया था. बहुत सराहना हुई. बड़े शहरों में तो फिल्म थोड़ी बहुत चली भी. फ्रंट बेंचर्स को फिल्म समझ ही में नहीं आयी. अफ़सोस यह भी रहा कि ये देखने के लिए प्रोड्यूसर गीतकार-शैलेंद्र जीवित नहीं रहे. फ़िलहाल तो एक किस्सा सुनाता हूँ. वहीदा रहमान ने इसे सोनी टीवी के कपिल शर्मा शो में शेयर भी किया था. वहीदा से पूछा गया कि सेट पर सबसे लेट कौन हीरो आता था? उन्होंने थोड़ा हिचकते हुए बताया कि राजकपूर साब. सुबह नौ बजे की शिफ़्ट होती थी और राज साहब दोपहर दो बजे आते थे. बेचारी वहीदा और बाकी आर्टिस्ट सुबह नौ बजे से तैयार होकर इंतज़ार करते रहते. इंतज़ार करते करते काम करने का उत्साह भी ख़त्म हो जाता. एक दिन डायरेक्टर ने सोचा क्यों न दोपहर दो बजे की शिफ्ट कर दी जाए. सबने मंजूरी दे दी, राज साहब ने भी. लेकिन राज साहब की लेट-लतीफ़ी फिर भी जारी रही. वो शाम छह बजे शूटिंग पर आने लगे. अब राज साहब बड़े आर्टिस्ट. कौन उनसे प्रोटेस्ट करे. दिन वहीदा ने साहस बटोर राज साहब से कह ही दिया – देखिये राज साब, हम सब आपका इंतज़ार करते करते सूख जाते हैं. टाइम पर आया करें.
राज साहब ने प्रामिज़ किया – ठीक है, कल से वक़्त पर आऊंगा. ठीक सुबह नौ बजे.
अगले दिन वहीदा को सुबह सुबह फ़ोन आया. उधर से राज साहब बोल रहे थे – अरे मैं सुबह सात बजे से स्टूडियो में तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ.
वहीदा को तो काटो खून नहीं वाली हालत हो गयी. घड़ी देखी, अभी आठ बजा था. उन्होंने पलटवार किया – सॉरी सर. लेकिन आपने हम सबको इत्ता इंतज़ार करवाया, आज आप थोड़ा इंतज़ार करें प्लीज़.
बहरहाल, राज साहब ने वहीदा के कहने का बुरा नहीं माना.

अब ये नहीं मालूम कि ये किस्सा एक दिल सौ अफ़साने की शूटिंग के दौरान का है या तीसरी क़सम की शूटिंग का। लेकिन ये ज़रूर है कि वो दोस्ताना माहौल हुआ करता था।

२९-०६-२०२१