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पिछड़े वर्ग को 52% आरक्षण की मांग को लेकर ओबीसी महासभा द्वारा मुख्यमंत्री निवास का घेराव

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दिनाँक 28 जुलाई 2021 प्रेस को जारी विज्ञप्ति में राष्ट्रीय सचिव ओबीसी इंजी. दिनेश कुमार ने बताया कि शासन द्वारा जारी आंकड़ो के अनुसार वर्तमान में मप्र में लगभग 50% आबादी अन्यपिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की निवासरत है, साथ ही वर्तमान में प्रदेश के मुखिया भी ओबीसी वर्ग से ही संबंध रखते है समान परिस्थितियों के बाबजूद भी ओबीसी वर्ग के युवाओ और छात्र- छात्राओं के हितों पर सत्ता प्रशासन में बैठे अधिकारियों व कर्मचारियों और उच्च न्यायालय में बैठे जातिवादी मानसिकता के न्यायाधीशों द्वारा लगातार कुठाराघात हो रहा है। प्रदेश के एक बहुत बड़े तबके, लगभग आधी जनसंख्या वाले वर्ग के साथ अन्याय पूर्ण व्यवहार करते हुए उनके अधिकारों का हनन हो रहा है।

अतः ओबीसी महासभा(रजि.) संगठन सहित प्रदेश के समस्त ओबीसी वर्ग के जनसामान्य के प्रतिनिधि संगठन, सामाजिक संगठन आपके निवेदन करते है कि-

1. केंद्र सरकार द्वारा NEET प्रवेश परीक्षा में केंद्र द्वारा भरी जाने वाली राज्य कोटे की सीट में ओबीसी आरक्षण नही लागू किया जा रहा है जिससे सैकड़ों ओबीसी के छात्र MBBS, BDS सहित स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम MD/MS/MDS में प्रवेश से वंचित हों रहे है। अतः राज्य पूलिंग कोटे की सीटों में ओबीसी आरक्षण तत्काल बहाल करने हेतु आवश्यक कार्यवाही करने का कष्ट करें।

2. बर्ष 2021 में होने वाली जनगणना में जातिगत जनगणना करवाने हेतु आवश्यक कार्यवाही करने का कष्ट करें।

3. माननीय मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में आरक्षण संबंधित लंबित विभिन्न याचिकाओं में जातिवादी मानसिकता से ग्रसित न्यायाधीश द्वारा 10% सवर्ण आरक्षण(EWS) को यथावत रखा गया तथा ओबीसी के 27% आरक्षण को लागू नही कर 13% आरक्षण रिजर्व रखने के अन्यायपूर्ण आदेश दिनाँक 13 जुलाई 21 को पारित कर ओबीसी वर्ग के युवाओं के साथ छलावा किया गया है। उक्त आदेश के विरुद्ध निकट भविष्य में होने वाले विधानसभा सत्र में एक अध्यादेश पारित कर हाईकोर्ट के आदेश को निरस्त कर ओबीसी के 27% आरक्षण को लागू करवाने का कष्ट करें।

4. MPPSC/ शिक्षक पात्रता भर्ती एवं अन्य परीक्षाओं में ओबीसी वर्ग को 27% आरक्षण लागू कराने का कष्ट करें।
5. राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की CHO भर्ती में 27% की जगह 6% आरक्षण दिया गया है। इस प्रकरण को संज्ञान में लेते हुए राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन मप्र की संचालक श्रीमती छवि भारद्वाज पर दण्डात्मक कार्यवाही करते हुए तत्काल निलंबित करने का कष्ट करें।

6. भारत सरकार एवं राज्य सरकार द्वारा पिछड़ा वर्ग (OBC) को प्रत्येक स्तर पर (प्रदेश से लेकर गांव एवं
सड़क से लेकर सदन तक) तक जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व (हिस्सेदारी) सुनिश्चित करे।

7. ओबीसी वर्ग में लागू असंवैधानिक क्रीमीलेयर बाध्यता को समाप्त करने हेतु विधानसभा में विधेयक अथवा आवश्यक कार्यवाही सुनिश्चित करे।

8. ओबीसी वर्ग के छात्रों की छात्रवृति राशि में लगातार कटौती की जा रही है। छात्रों को वाजिब छात्रवृत्ति दिलवाने हेतु कड़े निर्देश जारी करने तथा मप्र शासन के छात्रवृत्ति नियमो की अवहेलना करने वाले अधिकारियों पर दंडात्मक कार्यवाही करने का कष्ट करें।

09. विभिन्न उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशो द्वारा आरक्षित वर्ग के हितों के विरुद्ध दिए जाने वाले निर्णयो के विरुद्ध कार्यवाही करते हुए जातिवादी मानसिकता के जजो के विरुद्ध महाभियोग चलाने हेतु और न्यायपालिका में आरक्षण लागू करने एवं “राज्य न्यायालयीन सेवा परीक्षा” आयोजित कर हाईकोर्ट में जजो की नियुक्ति करने हेतु आवश्यक कार्यवाही करने का कष्ट करें।

10. मध्यप्रदेश में निजी क्षेत्रों मे ओबीसी आरक्षण लागू किये जाने का कष्ट करें।

11. मध्यप्रदेश आरक्षण अधिनियम और तत्सम्बन्धी नियमो को संविधान की 9 वी अनुसूची में डालने के लिए केंद्र को प्रस्ताव भेजने का कष्ट करें।

ओबीसी महासभा ने प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से निवेदन किया है कि ओबीसी वर्ग के शिक्षित छात्रों, युवाओं के भविष्य को ध्यान में रखते हुए सदियों से शोषित, वंचित, किसान वर्ग, बेरोजगार, सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े ओबीसी वर्ग के हक अधिकार की रक्षा के लिए आवश्यक कार्यवाही करना सुनिश्चित करे।

नोट- ओबीसी समाज के हक अधिकारों के रक्षार्थ निम्न सामाजिक संगठनों एवं पार्टियों ने ओबीसी महासभा(रजि.) द्वारा किये गये जनआंदोलन को समर्थन दिया है।

मंडल आर्मी सामाजिक न्याय मिशन
भीम आर्मी
सरदार सेना
समाजवादी पार्टी मध्यप्रदेश
अखिल भारतीय गुर्जर देवसेना मध्यप्रदेश
पिछड़ा समाज क्रांति सेना
आजाद समाज पार्टी कांशीराम
अखिल भारतीय ओबीसी महासभा
जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) संगठन मध्यप्रदेश
ओबीसी एस टी एस सी एकता मंच मध्यप्रदेश
भीम आर्मी भारत एकता मिशन
अखिल भारतीय कुर्मी क्षत्रिय महासभा
वीर अहीर निर्माण सेना
प्रांतीय कुशवाहा समाज मध्यप्रदेश भोपाल
राष्ट्रीय पिछड़ावर्ग अधिकार संगठन
युवा मौर्यवंशी स्वाभिमान समिति
एक्सपोज़ पार्टी ऑफ इंडिया
अंतराष्ट्रीय बौद्धिस्ट भीम सेना
पिछड़ावर्ग संयुक्त संघर्ष मोर्चा
अखिल भारतीय कुशवाहा महासभा मध्यप्रदेश
अखिल भारतीय युवा कुशवाहा महासभा मध्यप्रदेश
भारतीय जन सम्मान पार्टी
लोक सुरक्षा पार्टी मध्यप्रदेश
सेन समाज विकास संगठन
भारतीय सेन सेना मध्यप्रदेश
ओबीसी यूनाइटेड फ्रंट ऑफ इंडिया
सत्यशोधक समाज अंतर्राष्ट्रीय
राष्ट्रीय समानता दल
राजमाता अहिल्याबाई होल्कर सेना भारत
राष्ट्रीय जनहित संघर्ष पार्टी
अखिल भारतीय युवा कुशवाहा समाज भारत मध्य प्रदेश
अखिल भारतीय गुर्जर महासभा
अखिल भारतीय किरार क्षत्रिय महासभा मध्यप्रदेश
अम्बेडकर पेरियार मिश
अखिल भारतीय पाल महासभा
श्री कर्ण राजपूत समाज इन्दोर मध्यप्रदेश
मध्यप्रदेश कुर्मी क्षत्रिय समाज
लवकुश सेना
प्रांतीय नामदेव छिपा महासभा मध्यप्रदेश
जन अधिकार पार्टी
अखिल भारतीय कर्ण समाज
राष्ट्रीय पिछड़ावर्ग संघ मध्यप्रदेश
भारतीय वीर दल
स्वर्णकार युवा क्रांति मंच भारत
मध्यप्रदेश मीणा समाज सेवा संगठन
श्री मीनेष सेवा संगठन
श्री बाबू जी जंडेल विधायक श्योपुर
श्री सचिन जी बिरला विधायक बड़वाह
मध्यप्रदेश जायसवाल (सर्ववर्गीय) महासभा
कूर्मवंशी समाज विकास संगठन
तेली पिछड़ा वैश्य महासभा
एक्टिव युवा कुशवाहा महासभा
पिछड़ा शोषित समाज स्वयं सेवक संघ
मेघवाल समाज विकास परिषद मध्यप्रदेश
श्री संजय जी उइके विधायक बेहर विधानसभा बालाघाट
बहुजन यूथ्स एन्ड स्टूडेंट फ्रंट मध्यप्रदेश
कुर्मी किसान कल्याण समिति
फुले ब्रिगेड टीम श्योपुर
श्री राजपूत लोधी सेना
यादव महासभा मध्यप्रदेश
राष्ट्रीय ओबीसी महासभा
अखिल भारतीय गुर्जर महासभा जिला श्योपुर
लोधी सेना
शेफर्ड टाइगर फ़ोर्स इंडिया श्री विश्वकर्मा सेना
यादव समाज यदुवंशी संगठन
भारतीय बैरवा महासभा जिला श्योपुर
इंकलाब विकास दल
लोधी सेना बुलंदशहर उत्तर प्रदेश
अखिल भारतीय यादव महासभा मध्य प्रदेश
मप्र कुर्मी छत्रिय समाज
श्री विश्वकर्मा सेना
यादव महासभा मध्य प्रदेश
युवा गुर्जर महासभा मध्य प्रदेश
पिछड़ा शोषित समाज स्वयं सेवक संघ (PS-5) मध्यप्रदेश
भारतीय वीर दल
भीम आर्मी सेना मध्य प्रदेश
मीणा समाज संगठन भोपाल
श्री मिनेश सेवा संगठन श्योपुर मध्य प्रदेश जायसवाल महासभा
राष्ट्रीय अनुसूचित जाति जनजाति युवा संघ मध्य प्रदेश (नाजी)
राष्ट्रीय नाई महासभा
अखिल भारतीय चौरसिया महासभा
राठौर एकता मंच मध्य प्रदेश
राष्ट्रीय समानता दल मध्य प्रदेश
राष्ट्रीय धाकड़ सेना
कुम्हार महामंच भारत
मध्यप्रदेश रजक महासभा
संत सिंगाजी गवली समाज युवा संगठन मध्य प्रदेश
श्री रेवा गुर्जर महासभा
भारतीय सोनी समाज मध्य प्रदेश
डॉक्टर अंबेडकर विद्यार्थी संगठन
अखिल भारतीय बैरवा महासभा
राष्ट्रीय रावत समाज
अखिल भारतीय गुर्जर महासभा
यादव समाज (यदुवंशी) संगठन
श्री राजपूत लोधी सेना
अखिल भारतीय आदर्श चौरसिया महासभा मध्य प्रदेश
बाथम समाज संगठन मध्य प्रदेश
किरार महासभा मध्य प्रदेश
त्यागी समाज संगठन भोपाल
गिरी-गोस्वामी महासंघ मप्र
कर्पूरी ठाकुर यूथ ब्रिगेड
भारतीय सेन समाज
1842-1857 क्रांति शोध संस्थान
शिक्षक भर्ती उत्तीर्ण अभ्यर्थी
राष्ट्रीय स्वास्थ मिशन परीक्षा उत्तीर्ण अभ्यर्थी
भगवान श्री सहस्त्रबाहु अर्जुन जन्मोत्सव सेवा समिति
ओम जी पटेल खातेगांव (INC)
राष्ट्रीय फुले ब्रिगेड़ मध्यप्रदेश
अखिल भारतीय जाट महासभा मध्यप्रदेश
अखिल भारतीय गढ़वाल समाज महासभा
जननायक कर्पूरी विचार मंच
महात्मा फुले समता परिषद
ऑल इंडिया एससी एसटी परिसंघ
एससी एसटी छात्र संघ (अजाक्स)

महाराष्ट्र के बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए आगे आएं देश के शुभचिंतक: मौलाना महमूद मदनी

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जमीयत उलेमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना मदनी की हिदायत पर जमीयत का केंद्रीय प्रतिनिधिमंडल प्रभावित क्षेत्र पहुंचा, जमीयत राहत समिति का गठन किया गया, बड़े पैमाने पर राहत अभियान शुरू.

महाराष्ट्र के कई जिलों, खासकर रत्नागिरी, रायगढ़ और अन्य इलाकों में लगातार हो रही बारिश से गंभीर स्थिति का सामना है। लाखों लोग पूरी तरह से पानी में डुबे हुए हैं। अनगिनत लोगों की जान चली गई है और हजारों लोगों की जान गंभीर खतरे में है अगर उन्हें सुरक्षित जगहों तक नहीं पहुंचाया गया।

इसे देखते हुए जमीयत उलेमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी ने देश के सभी शुभचिंतकों और हमदर्दों से इस जरूरत की इस घड़ी में जरूरतमंदों की मदद के लिए आगे आने की अपील की है. मौलाना मदनी ने कहा कि अल्लाह अपने बन्दों का परीक्षण करता है। ऐसे अवसर पर, यदि कोई व्यथित लोगों की मदद के लिए आगे आता है, तो वह अपने रब ( खुदा) को अपने पास पाता है.


मौलाना मदनी ने कहा कि जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने पारंपरिक रूप से बचाव और राहत कार्य शुरू कर दिया है. जमीयत उलेमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना हकीमुद्दीन कासमी के नेतृत्व में जमीयत का एक केंद्रीय प्रतिनिधिमंडल बाढ़ प्रभावित छेत्र पहुँच चूका है । राहत कार्य के समन्वय के लिए एक जमीयत राहत समिति भी बनाई गई है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद हमेशा चरणों में राहत कार्य करता है। इस समय बचाव कार्य, शेल्टर और भोजन का प्रावधान सबसे बुनियादी जरूरत है। साथ ही पुनर्वास की प्रक्रिया अगले चरण में की जाएगी।

गौरतलब है कि जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने महाराष्ट्र बाढ़ पीड़ितों के लिए जमीयत राहत समिति 2021 का गठन किया है, जिसके संयोजक मुफ्ती मुहम्मद रफीक रायगढ़ी, उपाध्यक्ष, दीनी तालीमी बोर्ड, जमीयत उलेमा महाराष्ट्र होंगे. (मोबाइल 855100484848, 9422383711) सहायक संयोजक , जमीयत उलेमा महाराष्ट्र के अध्यक्ष मौलाना हाफिज नदीम सिद्दीकी ( मोबाइल 9665017313, 9422657332) होंगे। शेष सदस्यों में जमीयत उलेमा महाराष्ट्र के कोषाध्यक्ष कारी मुहम्मद अयूब आज़मी, दीनी तालीमी बोर्ड महाराष्ट्र के अध्यक्ष मौलाना मुफ्ती मुहम्मद रोशन, काजी मुहम्मद हुसैन माहमकर, जमीयत उलेमा रायगढ़ के अध्यक्ष, मौलाना मुहम्मद एजाज पन्हालकर सचिव जमीअत उलेमा कोकन, मुफ्ती तौफीक अहमद मजाहेरी जमीयत उलेमा रत्नागिरी के सचिव, मौलाना मुहम्मद इलियास बगदादी, जमीयत उलेमा तालुका चिपलुन के अध्यक्ष और मौलाना मुहम्मद इब्राहिम कासमी जमीयत उलेमा शोलापुर जिले के अध्यक्ष हैं।

दलितों-अतिपिछड़ो-अल्पसंख्यकों पर लगातार हमले चिंताजनक, नीतीश राज में गरीबों की जान की कीमत नहीं – माले

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भाकपा-माले राज्य सचिव कुणाल ने बिहार में दलितों-अतिपिछड़ों-अल्पसंख्यकों पर लगातार हो रहे हमले पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि ऐसा लगता है कि नीतीश जी के राज में गरीबों की जान और इज्जत की कोई कीमत नहीं रह गई है. एक तरफ सामंती अपराधियों का मनोबल बढ़ा है तो प्रशासन व पुलिस के बारे में तो कुछ भी कहना बेमानी है. सबसे ताजा घटनाक्रम जहानाबाद के रतनी प्रखंड के परसबीघा थाना क्षेत्र के सरता गांव का है. शराब के बहाने 28 वर्षीय गोविंद मांझी की गिरफ्तारी के 3 दिन बाद ही जेल में उनकी मौत हो गई. जाहिर है कि यह कस्टोडियल मर्डर है. उसी प्रकार भोजपुर में दुल्हिनगंज की घटना के बाद बैशाडी में भाजपा समर्थित सामंती अपराधियों द्वारा कुल्हाड़ी से काटकर विजय कहार (चंद्रबंशी) की नृशंस हत्या का मामला भी सामने आया है.

माले राज्य सचिव ने कहा है कि ये घटनाएं बताती हैं कि आज बिहार में तथाकथित कानून के राज की धज्जियां उड़ चुकी हैं और पूरा राज्य पुलिस व सत्ता संरक्षित अपराधियों के भय व आतंक के साए में जी रहा है.

भाकपा-माले के अरवल विधायक महानंद सिंह, घोषी विधायक रामबलि सिंह यादव तथा वरिष्ठ माले नेताओं ने आज जहानाबाद के सरता व अन्य गांवों का दौरा किया. माले नेताओं ने कहा कि गोविन्द मांझी की मौत के बाद ग्रामीणों का आक्रोश जायज ही है. ग्रामीणों में इस बात के कारण आक्रोश है कि पुलिस जब चाहे तब, दिन हो या रात बेधड़क उनके घरों में घुस जाती है, दुर्व्यवहार से लेकर मारपीट करती है और उठाकर थाने ले जाती है. पुलिस के इस आचरण के कारण ग्रामीणों का आक्रोश लगातार संगठित हो रहा था.

गोविन्द मांझी की मौत पुलिस पिटाई और साथ ही इलाज के अभाव के कारण जेल में हुई. इसके कारण पहले से संगठित हो रहा आक्रोश भड़क उठा. उनकी मौत से गुस्साए गरीबों ने जहानाबाद-अरवल मेन रोड को नेहालपुर पहुंचकर जाम कर दिया और दोषी पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई व मुआवजा और सरकारी नौकरी की मांग करने लगे. लेकिन दल-बल के साथ पहुंची पुलिस द्वारा कुछ ही देर बाद लाठीचार्ज कर दिया गया और फिर गोली चला दी गई, जिससे भगदड़ मच गई. कई लोग घायल हुए. भगदड़ में महिला सिपाही भी अपनी गाड़ी में चढ़ने के क्रम में गिर गई और गाड़ी से कुचल कर उनकी दुखद मौत हो गई. इसके बाद और भी बड़ी संख्या में पुलिस पहुंच गई और लोगों को खदेड़-खदेड़ कर पिटाई की. लगभग 17 घरों को पूरी तरह से तोड़ दिया गया और सामान बर्बाद कर दिया गया. 5 लोगों को गिरफ्तार भी कर लिया. आज भी लगभग 10 लोगों को पकड़कर पुलिस थाने पे ले गई. इससे पूरे इलाके में भय और आक्रोश का माहौल बना हुआ है. अभी तक गोविंद मांझी का शव परिजनों को नहीं मिला है.

भाकपा-माले जांच दल ने सभी गिरफ्तार गरीबों की अविलंब रिहाई, गोविन्द मांझी के परिजनों को सरकारी नौकरी व मुआवजा तथा दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की है. उन्होंने यह भी कहा कि शराब के नाम पर प्रशासन गरीबों व खासकर मांझी समुदाय के लोगों कोे परेशान करना बंद करे.

उसी प्रकार, विगत 23 जुलाई की रात्रि में भोजपुर के पीरो थानाअंतर्गत बैशाडी में भाजपा समर्थित सामंती अपराधियों जनार्दन उपाध्याय व अन्य लोगों द्वारा कुल्हाड़ी से काटकर विजय कहार की नृशंस हत्या का मामला भी सामने आया है. उनकी पत्नी निर्मला देवी को उनकी ही साड़ी से उनका हाथ-पैर बांधकर बुरी तरह से पिटाई की गई. इस पिटाई के कारण वे बेहोश हो गईं.

24 जुलाई की सुबह एक बार फिर से इन अपराधियों ने सुमित्रा देवी, इंदू देवी और भुअर रजवार की मार पिटाई शुरू कर दी. सुमित्रा देवी के सिर के पिछले हिस्से में गंभीर चोट आई और आज आरा अस्पताल में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई.

जनदबाव में हत्यारे जनार्दन उपाधयाय की गिरफ्तारी हो चुकी है, अन्य हमलावरों की गिरफ्तारी अभी तक नहीं हुई है. माले विधायक सुदामा प्रसाद ने मामले की स्पीडी ट्रायल चलाकर सभी अपराधियों को अविलंब दंडित करने की मांग की है. साथ ही यह भी कहा कि इस मामले को विधानसभा में उठाया जाएगा. उन्होंनेे अन्य हमलावरों मनीष उपाध्याय व कमलेश उपाध्याय की भी तत्काल गिरफ्तारी की मांग की है. इस नृशंस हत्याकांड के खिलाफ माले कार्यकर्ताओं ने आज पीरो-तरारी मार्ग को बैशाडी में 4 घंटों तक सड़क जाम किया. जाम के दबाव में मृतक के परिजन को 20 हजार रुपए का चेक व दाह संस्कार के लिए 3 हजार, इंदिरा आवास और श्रम विभाग से एक लाख रुपए दिलवाने के आश्वाशन के बाद जाम हटा. विधायक सुदामा प्रसाद के अलावा माले नेता संजय, मनीर आलम, नंदकिशोर गुप्ता आदि नेताओं ने इस विरोध कार्यक्रम का नेतृत्व किया.

 

बॉक्सिंग रिंग में अस्मिता की तलाश : ‘सारपट्टा’

Shubhneet Kaushik 

अधिकांश खिलाड़ियों के लिए खेल उनके जीवन को दिशा देने वाला, जीवन का अर्थवत्ता देने वाली अहम चीज़ होती है। और जब इसमें उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि भी जुड़ जाती है तो यही खेल उसकी पहचान/अस्मिता को भी निर्धारित करते हैं। वंचित और शोषित समुदाय से आने वाले खिलाड़ियों के लिए खेल एक ऐसे दायरे में तब्दील हो जाता है, जहाँ वह अवमानना के अतीत और वर्तमान से ऊपर उठकर अपनी इयत्ता को गढ़ता है, ख़ुदी को बुलंद करता है।

पा रंजीत द्वारा निर्देशित तमिल फ़िल्म ‘सारपट्टा परंबरै’ बॉक्सिंग रिंग में अपनी अस्मिता की तलाश करते, जीवन का अर्थ खोजते मुक्केबाज कबिलन की प्रेरक कहानी है। बीसवीं सदी में सत्तर के दशक के तमिलनाडु की यह कहानी सिर्फ़ मुक्केबाजी से जुड़े सारपट्टा, इडियप्पा जैसे कुछ कुलों की ही कहानी नहीं है, बल्कि यह बॉक्सिंग रिंग में अपने खोए हुए आत्मसम्मान को हासिल करने के संघर्ष की कहानी है। अकारण नहीं कि आत्मसम्मान आंदोलन के नायक पेरियर रामास्वामी और डॉक्टर आम्बेडकर फ़िल्म के अनेक फ़्रेमों में सशक्त राजनीतिक संदेश के साथ उपस्थित हैं।

खेल के मैदान विषमता और भेदभाव के विरुद्ध ऐसे संघर्षों के साक्षी रहे हैं। वह चाहे अमेरिका में मुहम्मद अली जैसे काले खिलाड़ियों द्वारा अपने जीवन में नस्लीय भेदभाव के विरुद्ध किए गए संघर्ष हों और उस संघर्ष के लिए चुकाई गई क़ीमत हो। या बीसवीं सदी के मध्य में कैरेबियन क्रिकेट टीम के खिलाड़ियों द्वारा क्रिकेट के मैदान पर अपने आत्मसम्मान के लिए दिखाया गया जुझारूपन हो। जिसे इतिहासकार सीएलआर जेम्स ने अपनी बेहतरीन किताब ‘बियोंड ए बाउंड्री’ के पन्नों में ख़ूबसूरती से सहेजा है। कैरेबियाई खिलाड़ियों का वह जीवट, उनके सरोकार और नस्लीय भेदभाव के विरुद्ध क्रिकेट के मैदान पर उनका संघर्ष ‘फ़ायर इन बेबिलोन’ डॉक्युमेंटरी में भी प्रदर्शित हुआ है।

भारत की ही बात करें तो औपनिवेशिक काल में दिग्गज क्रिकेटर पलवनकर बालू को क्रिकेट टीम का कप्तान केवल इसलिए नहीं बनाया गया क्योंकि वे दलित थे। केवल बालू ही नहीं उनके भाइयों पलवनकर शिवराम, गणपत और विट्ठल को भी उनकी प्रतिभा के बावजूद क्रिकेट के मैदान में अवमानना का दंश झेलना पड़ा। सिर्फ़ इसलिए कि वे दलित समुदाय से आते थे। ‘सारपट्टा’ ख़ुद के आत्मसम्मान के साथ-साथ अपने परिवार, समुदाय के आत्मसम्मान के लिए लड़ने के जज़्बे की गाथा है।

मद्रास में स्थानीय स्तर पर मुक्केबाजी के विशिष्ट खेल के उभार और आत्मसम्मान की इस लड़ाई के साथ-साथ ‘सारपट्टा’ राजनीति और सामाजिक यथार्थ को भी बख़ूबी दर्शाती है। द्रविड़ राजनीति, एम करुणानिधि और एमजी रामचन्द्रन के बीच सत्ता के लिए संघर्ष और आपातकाल के दौरान तमिल राजनीति में चल रही उठापटक भी ‘सारपट्टा’ की दिलचस्प कहानी की पृष्ठभूमि में शामिल हैं। अपराध, राजनीति और मुक्केबाजी के जुड़ाव और इन सबके बीच जूझते हुए कबिलन और सारपट्टा कुल के लोगों के जीवट की कहानी पा रंजीत ने इस फ़िल्म में शानदार ढंग से पिरोई है। मुख्य कलाकार आर्या के साथ-साथ पशुपति, कलैयारासन, जॉन विजय जैसे दूसरे कलाकारों ने भी बेहतरीन अभिनय किया है। ज़रूर देखें यह फ़िल्म।

अमेरिकी साम्राज्‍यवाद की अफ़ग़ानिस्‍तान से शर्मनाक वापसी के निहितार्थ

 

Anand Singh 

इक्‍कीसवीं सदी की शुरुआत में अमेरिकी साम्राज्‍यवाद अपने उरूज़ पर था। दुनिया पर अपना एकछत्र साम्राज्‍य स्‍थापित करने की सनक में उसने पहले 9/11 के आतंकी हमले का बहाना बनाकर अफ़ग़ानिस्‍तान पर और फिर जनसंहारक हथियारों का झूठ फैलाकर इराक़ पर हमला किया। उसकी योजना इन दोनों देशों में अपनी पिट्ठू सरकारें बिठाकर ईरान पर हमला करने की थी जो 1979 के इस्‍लामी क्रान्ति के बाद उसके चंगुल से बाहर निकल गया था। लेकिन इस सदी के दो दशक बीतने के बाद आज अमेरिकी साम्राज्‍यवाद की हालत बिना दाँत और नाख़ून वाले बब्‍बर शेर जैसी हो गयी है जिसकी जगह इतिहास के चिड़ियाघर में सुरक्षित हो चुकी है। अमेरिकी साम्राज्‍यवाद को पहले इराक़ी प्रतिरोध के हाथों मुँह की खाने के बाद वहाँ से बेआबरू होकर लौटना पड़ा और अब अफ़ग़ानिस्‍तान में तालिबान की पकड़ मजबूत होता देख वह पतली गली से निकल लेने की पूरी तैयारी कर चुका है। लेकिन इस साम्राज्‍यवादी दुस्‍साहस का ख़ामियाजा अफ़ग़ानिस्‍तान सहित समूचे दक्षिण एशिया के लोगों को लम्‍बे समय तक बेपनाह हिंसा और बढ़ती अस्थिरता और के रूप में भुगतना पड़ेगा।

अमेरिकी साम्राज्‍यवाद द्वारा अफ़ग़ानिस्‍तान के लोगों पर थोपे गए इस आतंकी युद्ध के दौरान पिछले दो दशक में 2 लाख से भी ज्‍़यादा अफ़ग़ानियों की जान जा चुकी है। अफ़ग़ानिस्‍तान से अमेरिका की वापसी के बाद वहाँ लम्‍बे समय तक गृहयुद्ध की परिस्थिति जारी रहने की सम्‍भावना है जिससे आम अफ़ग़ानियों की ज़ि‍न्‍दगी बद से बदतर होनी तय है। अगर तालिबान एक बार फिर से काबुल की सत्‍ता में पहुँचने में और इस्‍लामी अमीरात क़ायम करने में क़ामयाब हो जाता है, जिसकी प्रबल सम्‍भावना है, तो इसका सीधा असर वहाँ की आम जनता और ख़ासकर महिलाओं के ऊपर बढ़ती बन्दिशों के रूप में सामने आएगा। तालिबान की पकड़ न सिर्फ़ उसके पारम्‍परिक गढ़ कान्‍धार के इर्द-गिर्द दक्षिणी अफ़ग़ानिस्‍तान में बल्कि उत्‍तरी अफ़ग़ानिस्‍तान में भी बढ़ी है। नाटो की सेना की वापसी के बाद काबुल की सरकार अपने दम पर तालिबान के लड़ाकों का मुक़ाबला कर ही नहीं सकती। जहाँ एक ओर तालिबान और काबुल की सरकार के नुमाइन्‍दों के बीच दोहा में बातचीत का प्रहसन चल रहा है वहीं दूसरी ओर तालिबान दिन-ब-दिन अफ़ग़ानिस्‍तान के नये-नये इलाक़ों पर अपनी पकड़ मजबूत करता जा रहा है। एक अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी ने यह अनुमान लगाया है कि अमेरिकी सेना की वापसी के बाद काबुल की सरकार छह महीने के भीतर धराशायी हो जाएगी।

अफ़ग़ानिस्‍तान में तालिबान के इस बढ़ते प्रभुत्‍व का ही यह नतीजा है कि जहाँ कुछ वर्षों पहले तक उसे एक आतंकी संगठन समझा जाता था वहीं अब तमाम देश उसके साथ बातचीत की प्रक्रिया शुरू कर रही हैं जिनमें भारत भी शामिल है। भारत ने पिछले दो दशक के दौरान अफ़ग़ानिस्‍तान में अपने रणनीतिक और सामरिक हितों के मद्देनज़र सड़क, बाँध, बिजली घर तथा अन्‍य विकास कार्यों में 2 अरब से 3 अरब डॉलर का निवेश किया है जो तालिबान के बढ़ते प्रभुत्‍व की वजह से अब पानी में डूबता नज़र आ रहा है। इसलिए भागते भूत की लंगोटी भली वाले मुहावरे को चरितार्थ करते हुए भारत के फ़ासिस्‍ट हुक्‍मरान तालिबान से गुप्‍त बातचीत कर रहे हैं ताकि इस भारी निवेश को पूरी तरह से डूबने से बचाया जा सके और तालिबान को आर्थिक मदद का लालच देकर उसे लश्‍कर-ए-तोइबा और जैश-ए-मोहम्‍मद जैसे पाकिस्‍तानी आतंकी समूहों से दूरी बनाये रखने के लिए तैयार किया जा सके।

जहाँ तक पाकिस्‍तान का सवाल है तो वहाँ के फ़ौजी हुक्‍मरान तालिबान की बढ़त की वजह से दुविधा में हैं। जहाँ एक ओर तालिबान के बढ़ते प्रभुत्‍व से वे ख़ुश हैं क्‍योंकि इससे अफ़ग़ानिस्‍तान में भारत का प्रभाव कम होगा और भारत में आतंक का निर्यात करने और कश्‍मीर में अस्थिरता बढ़ाने में मदद मिलेगी, वहीं दूसरी ओर यह उनकी चिन्‍ता का सबब है कि अफ़ग़ानी तालिबान के मजबूत होने से पाकिस्‍तानी तालिबान (तहरीक़-ए-तालिबान पाकिस्‍तान) भी मजबूत होगा जिसका नतीजा पाकिस्‍तान के भीतर बढ़ती मज़हबी दहशतगर्दी के रूप में सामने आएगा। ग़ौरतलब है कि पाकिस्‍तानी तालिबान पाकिस्‍तान की हुक़ूमत को अपना मुख्‍य शत्रु मानती है और वह अल-क़ायदा जैसे आतंकी संगठनों के सहयोग से दुनिया भर में इस्‍लामी जेहाद को फैलाना चाहती है। ग़ौर करने वाली बात यह भी है कि पाकिस्‍तानी तालिबान की पाकिस्‍तान में दहशतगर्दी से आजिज़ आकर पाकिस्‍तानी फ़ौज को 2014 में अफ़ग़ानिस्‍तान की सीमा से लगे पाकिस्‍तानी प्रान्‍त ख़ैबर पख़तून्‍ख्‍़वाह के उत्‍तरी वज़ीरिस्‍तान हिस्‍से में ऑपरेशन ज़र्ब-ए-अज्‍़ब के तहत फ़ौजी कार्रवाई करनी पड़ी थी। पाकिस्‍तान अफ़ग़ानी तालिबान को मनाने की फ़िराक़ में है कि वह पाकिस्‍तानी तालिबान को फैलने से रोके। पाकिस्‍तान के फ़ौजी हुक्‍मरान वहाँँ की आवाम को यह बताते आए हैं कि अफ़गानी तालिबान और पाकिस्‍तानी तालिबान के बीच फ़र्क़ है और पाकिस्‍तानी तालिबान भारत द्वारा समर्थित है। लेकिन पाकिस्‍तान के फ़ौजी हुक्‍मरानों को यह भी अच्‍छी तरह से पता है कि अफ़ग़ानी तालिबान और पाकिस्‍तानी तालिबान के बीच कोई चीन की दीवार नहीं है। अफ़गानी तालिबान और पाकिस्‍तानी तालिबान दोनों में पश्‍तूनी लड़ाकों की बहुतायत है जो पाकिस्‍तान-अफ़ग़ान सीमा के दोनों ओर रहते हैं और जिनके बीच आपसी सम्‍बन्‍ध बेहद घनिष्‍ठ हैं। दोनों तरह के लड़ाकों को आतंकवाद की ज़हरीली वैचारिक ख़ुराक़ पाकिस्‍तान के मदरसों से ही मिलती है। इसलिए दोनों के बीच वैचारिक बिरादराना रिश्‍ता भी बेहद मजबूत है। इसलिए तालिबान का उभार पाकिस्‍तान की आवाम के लिए भी बेहद ख़तरनाक है।

उधर चीन अफ़ग़ानिस्‍तान से अमेरिका की वापसी का लाभ उठाने की फ़िराक़ में है। तालिबान ने भी अपनी ओर से चीन के साथ बेहतर रिश्‍ते क़ायम करने की मंशा जतायी है। ग़ौरतलब है कि अफ़ग़ानिस्‍तान में कॉपर, कोयला, आयरन, गैस, मरकरी, सोना, लीथियम और थोरियम का अकूत भण्‍डार है। इस अकूत सम्‍पदा पर नियंत्रण पाने के अतिरिक्‍त चीन अपने महत्‍वाकांक्षी बेल्‍ट रोड पहल में अफ़ग़ानिस्‍तान को भी शामिल करना चाहता है। लेकिन चीन भी पाकिस्‍तानी तालिबान की बढ़ती ताक़त को लेकर आशंकित है। 62 बिलियन डॉलर के निवेश वाला चीन पाकिस्‍तान इकोनॉमिक कॉरिडॉर (जो बेल्‍ट रोड पहल का हिस्‍सा है) ख़ैबर पख़तून्‍ख्‍़वाह से होकर जाता है। लेकिन पाकिस्‍तानी तालिबान इस कॉरिडोर के निर्माण व अन्‍य विकास कार्यों में लगातार व्‍यवधान पहुँचा रहा है। अभी कुछ दिनों पहले ही पाकिस्‍तानी तालिबान ने एक बस पर आतंकी हमला किया जिसमें 9 चीनी मज़दूर मारे गये जो एक बाँध के निर्माण में लगे थे। इसके अलावा पाकिस्‍तानी तालिबान का सम्‍बन्‍ध ईस्‍ट तुर्कस्‍तान इस्‍लामिक मूवमेण्‍ट नामक आतंकी संगठन से भी है जो चीन का शिनजियांग प्रान्‍त में उइगर मुसलमानों के बीच सक्रिय है। ग़ौरतलब है कि चीन के शिनजियांग प्रान्‍त की सीमा अफ़गानिस्‍तान के बडकशान प्रान्‍त में स्थित वख़ान कॉरिडोर से लगती है। चीन तालिबान को आर्थिक मदद एक एवज में यह आश्‍वासन चाहेगा कि वख़ान कॉरिडोर का इस्‍तेमाल चीन में अस्थिरता बढ़ाने के लिए न किया जाए।

इस प्रकार तालिबान के उभार से एशिया के इस क्षेत्र में निश्चित रूप से भूराजनीतिक समीकरणों में अहम बदलाव आएंगे। यही नहीं अमेरिकी साम्राज्‍यवाद अपनी इस शर्मनाक पराजय और चीन के बढ़ते प्रभुत्‍व के मद्देनज़र अपनी गिरती साख़ को बचाने के लिए निश्‍चय ही कोई कार्रवाई करेगा जिससे अमेरिका और चीन के बीच जारी अन्‍तरसाम्राज्‍यवादी प्रतिस्‍पर्द्धा तीखी होगी। अमेरिकी राष्‍ट्रपति जो बाइडेन ने अमेरिकी सेना की अफ़ग़ानिस्‍तान से झटपट वापसी का कारण पूछा जाने पर यह जवाब दिया कि वे अपना ध्‍यान चीन पर केन्द्रित करना चाहते हैं। स्‍पष्‍ट है कि आने वाले दिनों में साम्राज्‍यवाद के अन्‍तरविरोधों का नतीजा बढ़ती आतंकी घटनाएँ, बेपनाह हिंसा और भीषण युद्दों के रूप में सामने आएगा।

तालाब को स्वीमिंग पुल न बनायें

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Pushya Mitra 

मुझे हमेशा लगता है कि पटना और बिहार के दूसरे शहरों के पास नारायण जी चौधरी जैसा सजग पर्यावरण कार्यकर्ता क्यों नहीं है। अब इस पोस्ट के साथ जो तालाब के जीर्णोद्धार की तसवीर लगी है, उसे देखकर आमलोगों को कुछ भी गलत नहीं लगेगा। पटना शहर में अदालतगंज तालाब को तो पूरी तरह सुखाकर उसकी पेंदी तक को सीमेंटेड कर दिया गया, मगर कोई विरोध नहीं हुआ। मगर तालाब के पारिस्थितिकीतंत्र और उसे जुड़े कानूनों की जानकारी रखने के कारण नारायण जी ने जीर्णोद्धार की इस प्रक्रिया पर जो आपत्तियां की हैं, उसका लाभ निश्चित तौर पर दरभंगा को मिलेगा। उन्होंने आपत्ति करते हुए जो पत्र दरभंगा विवि को लिखा है, उसका अंश पढ़ें-

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आपका ध्यान आकर्षित करते हुए तालाब की संरचना के एक महत्वपूर्ण अंग, जिसे मिथिला में ‘कछैर या कछार’ कहते हैं, की ओर दिलाना चाहता हूँ, जो जलीय पारिस्थितिकी तंत्र (Aquatic Ecosystems) को सुरक्षित एवं संरक्षित रखने में अहम् भूमिका निभाता है।

तालाब के किनारे से इसके बेड/पेट तक उतरने वाला जो ढलान चारो तरफ होता है, उसे तालाब का कछार कहते हैं। तालाब का कछार वह जगह होता है, जिसमें इसके पानी का स्तर वर्षा ऋतु में उच्चतम और जून में निम्नतम रहता है। अर्थात कछार तालाब का वह स्थान होता है, जिसमें इसके पानी के स्तर का उतार-चढाव विभिन्न ऋतुओं में अलग-अलग होता रहता है। यह कछार सैकड़ों तरह के जलीय जीवों का निवास स्थान और प्रजनन स्थल होता है। मिथिला के कोई भी आम आदमी आपको बता सकता है कि कछार में घोंघा, सितुआ, डोका, केकड़ा, कछुआ, चाली/अर्थवर्म, घुरघुरा सहित अनेक कीड़े-मकोड़े का निवास और प्रजनन स्थल होता है। इसके साथ-साथ, पोठी, मारा, देढ्बा, चेंगा, गरई, सिंगी, मांगुर, गैंची, ढलई, भुल्ला, कबई, कोतरी, झींगा, चेल्हा, चना, लट्टा, सौरा, भोंरा आदि दर्जनों मछलियों का भी निवास व प्रजनन स्थल कछार ही होता है। सैकड़ों तरह के सूक्ष्म जीव भी अभी निवास और प्रजनन यहीं करते हैं। इसीलिए यह कछार तालाब/जलाशय के जलीय पारिस्थितिकी तंत्र (Aquatic Ecosystem) को बनाए रखने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कई तरह के पक्षी भी अपने भोजन के लिए तालाब और इसके कछार के जीव-जंतुओं पर निर्भर होते हैं। मिथिला में तालाब के कछार पर घास लगाने (बायोलॉजिकल फेन्सिंग) और इसके भिंडा/किनारे में पेड़-पौधा लगाने की परम्परा रही है। इसके अलावा, तालाब के किनारे पक्का घाट और छोटा सा मंदिर भी बनाने की परम्परा रही है।

महोदय, विश्वविद्यालय प्रशासन की इस तालाब के सौन्दर्यीकरण के नाम पर इसके कछार के समस्त क्षेत्र पर लगभग 15 फीट चौड़ा और लगभग 5 फीट तालाब के बेड/पेट में ईट और सीमेंट-कंक्रीट की ढलाई करने की योजना है, जैसा स्थानीय लोगों ने बताया। अगर यही सौन्दर्यीकरण करने की योजना है, तो इससे इस तालाब के जलीय पारिस्थितिकी तंत्र की ह्त्या होगी। ऐसा प्रतीत होता है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने “जल, जलाशय और नदी” के एक्सपर्ट, जो जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के जानकार होते हैं, से बिना सुझाव लिए ही सौन्दर्यीकरण की योजना/डिजाइन बनायी है।

महोदय, विश्वविद्यालय का परिसर ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर वाला इलाका है। इस परिसर के अंतर्गत लगभग 800 वर्ष पुराना एक विशालकाय झीलनुमा तालाब है, जिसे मिथिला के कर्णाटवंशीय राजाओं द्वारा बनाया गया है। दोनों विश्वविद्यालयों के परिसर और इसके भवन का निर्माण खंडवला कुल के राजाओं द्वारा किया गया है। खंडवला कुल के राजाओं द्वारा आठ या नौ तालाबों का निर्माण भी इस परिसर में कराया गया है, जो सभी आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए थे और इसीलिए इस परिसर में कभी भी जल-जमाव की समस्या नहीं होती थी।

हम उम्मीद करते हैं कि विश्वविद्यालय (LNMU) के पदाधिकारीगण पर्यावरण, जैव-विविधता और पारिस्थितिकी से संबंधित सरकार के गाइडलाइन्स, दिशा निर्देश और माननीय न्यायलय के आदेश की अद्यतन जानकारी (latest information) जरूर रखते होंगे। अतः विनम्र अनुरोध है कि:

1) माननीय न्यायालय, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के आदेश से CPCB द्वारा बनाए गए गाइडलाइन्स एवं जलीय पारिस्थितिकी तंत्र (Aquatic Ecosystems) के रक्षार्थ भारत सरकार द्वारा बनाये गये गाइडलाइन्स एवं दिशा निर्देशों की सम्मान करते हुए तालाब पर अभी किये जा रहे विनाशकारी सौन्दर्यीकरण पर अविलम्ब रोक लगायेंगे। साथ ही अपने इस तालाब के जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के रक्षार्थ एवं सुधारात्मक कार्य के लिए आवश्यक कदम उठायेंगें।

2) सांस्कृतिक तालाब के सौन्दर्यीकरण का डिजाइन कभी भी ‘स्वीमिंग पूल’ के कांसेप्ट/डिजाइन और तकनीक से न किया जाय। जिस तरह से अभी सौन्दर्यीकरण किया जा रहा है, उससे यह तालाब, तालाब न रहकर एक बड़ा स्वीमिंग पूल बन जाएगा। तालाब और स्वीमिंग पूल – दोनों दो चीजें हैं, दोनों की संरचाएं, आवश्यकताएं, भूमिका और उद्देश्य भी अलग-अलग होते हैं।

3) तालाब हमारी सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर है। मिथिला में तालाब का निर्माण समस्त जीवों, जिसमें मनुष्य के अलावा, पशु, पक्षी, कीड़े-मकोड़े एवं जलीय जीव भी शामिल हैं, के कल्याण, बल प्राप्ति एवं स्नानादि के उदेश्य से किया जाता है। किसी भी तड़ागोत्सर्ग पद्धति में इस विषय पर विस्तार से जानकारी मिल सकती है। अतः हमारे इस (तालाब) सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर की सुरक्षा, संरक्षण और पुनरुद्धार (RRR) की योजना बनाने में पर्यावरण, जैव-विविधता एवं पारिस्थितिकी के प्रति संवेदनशील हो।
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मेरी तरफ से यह पत्र उन तमाम परियोजना प्रबंधकों के नाम है, जो तालाब को स्वीमिंग पुल बनाने में जुटे हैं।

कौन हैं कादंबिनी गांगुली? जिन्हें डूडल द्वारा आज गूगल कर रहा है याद

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आज कादंबनी गांगुली की 160वीं जयंती है, इस मौक़े पर गूगल ने भी आज 18 जुलाई को कादंबिनी गांगुली का 160वां जन्मदिन अपने अन्दाज़ में मनाया है. गूगोल ने एक डूडल बनाया है। बेंगलुरू के अतिथि कलाकार ओद्रिजा द्वारा तैयार आज के Google Doodle में मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल की पृष्ठभूमि में कादंबिनी गांगुली का एक स्केच दिखाई दे रहा है. कादंबिनी गांगुली भारत में एक चिकित्सक के रूप में प्रशिक्षित होने वाली पहली महिला थीं.


शिव शंकर सिंह का ये लेख आपको कादंबिनी गांगुली के बारे में जानने में काफ़ी सहयोग करेगा।

डाक्टर यह शब्द और खासकर महिला फिजीशीयन डाक्टर से आपके मन में क्या सबसे पहले आता होगा मैं नहीं जानता किंतु मेरे ज़हन में भारत की पहली दो महिला डाक्टर आनंदीबेन जोशी एवं कादंबनी गांगुली का नाम आता है। कादंबनी गांगुली भारत में पश्चिमी चिकित्सा पद्धति का प्रयोग करने वाली पहली महिला फिजीशियन डाक्टर थी,और यह अपनी पहली नौकरी में ही आज के हिसाब से लगभग 2 से 2.5 लाख महिना कमा लेती थी। और उन्हें हम भारत की पहली वर्किंग मां भी कह सकते हैं, जिसने अपने पढ़ाई और काम के दौरान अपने बच्चों का ध्यान रखा,इनके कुल आठ बच्चे थे जिनमें पांच बच्चे इनके पति के पहली पत्नी से थे किंतु इन्होंने बच्चों में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया।।अब आगे बात करते हैं,
* वह आज का ही दिन था जब एक छोटी बच्ची का जन्म होता है, जिसने बड़े होकर रूढ़िवादिता को तोड़ते हुए भारत की चिकित्सा, समाजिक, स्वतंत्रता आन्दोलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

जी हां वह आज ही का दिन था जब भागलपुर के ब्रहमसमाजी ब्रजकिशोर बसु की पुत्री कादंम्बनी गांगुली का जन्म यहीं 18 जुलाई 1861 को हुआ था. वे उन्नीसवीं शताब्दी की पहली महिला थी जिन्हे ब्रिटिश शासन काल मे पहली महिला स्नातक और पहली महिला चिकित्सक होने का गौरव प्राप्त था. उनकी प्रारम्भिक शिक्षा भागलपुर मे वर्ष 1868 ई मे स्थापित बर्नाकुलर मिडिल गर्ल स्कूल से हुई थी, वह समय ऐसा था जब लड़कियों को शिक्षा का अधिकार नहीं था और थोड़ा बड़े होते ही उनका विवाह कर दिया जाता था और उस समय मौजूद शिक्षण संस्थान भी समाज के डर से लड़कियों को स्कूल में भर्ती नहीं करते थे, ठीक इसी तरह का व्यवहार कादंबनी गांगुली के साथ हुआ किन्तु सारी चीजों एवं विरोध को दरकिनार करते हुए सन् 1878 में कलकत्ता विश्वविद्यालय की इंट्रेंस परीक्षा पास करने वाली पहली महिला बनीं और 1883 ई मे ग्रेजुएशन की परीक्षा पास की थी, उस जमाने मे वे न केवल तत्काल बंगाल अपितु सम्पूर्ण ब्रिटिश भारत की पहली महिला स्नातक (ग्रेजुएट )थी , उन्होने जब कलकत्ता मेडिकल कालेज मे दाखिला लेना चाहा तब उन्हे दाखिला नहीं मिला क्योंकि उस समय लड़कियो के लिए मेडिकल की पढ़ाई करना वर्जित था. तब कादंबनी के गुरु द्वारकानाथ गांगुली जो बाद मे इनके पति भी बने। इन्हीं द्वारकानाथ गांगुली ने वायसराय से लेकर गवर्नर तक कादम्बनी के मेडिकल कालेज मे दाखिला को लेकर आन्दोलन चलाया जिसके फलस्वरूप 1883 ई मे उन्हे कलकत्ता मेडिकल कालेज मे दाखिला मिला,इसी वर्ष इन्होंने द्वारकानाथ के साथ विवाह कर लिया। द्वारकानाथ गांगुली उस समय पांच बच्चों के पिता एवं विधुर थे इसके साथ ही यह कादम्बनी गांगुली के गुरु एवं मार्गदर्शक भी थे, इस विवाह का विरोध समाज एवं कुछ ब्रह्मो समाज के सदस्यों ने भी किया किन्तु वह आगे बढ़ी और अपनी पढ़ाई जारी रखी एवं सन् 1886 में अपनी चिकित्सा शास्त्र की डिग्री ली और चिकित्सा शास्त्र की डिग्री लेने वाली वे पहली भारतीय महिला बनीं। इनके जुझारूपन एवं लगन देखकर उस वक्त की दो महान महिलाएं फ्लोरेंस नाइटेंगल एवं एनी बेसेंट भी प्रभावित हुई। फ्लोरेंस नाइटेंगल ने अपने एक मित्र को इनको नौकरी दिलाने में मदद करने के लिए कहा फिर कादम्बनी गांगुली को लेडी डेफरिन वूमेन हास्पिटल मे नौकरी मिली,उस समय इन्हें महीने के 300रू प्रति माह मिलते थे मतलब आज के अनुसार लगभग 2 -2.5लाख प्रति माह होंगे। पाँच वर्ष तक नौकरी करने के दौरान उन्हें अंग्रेज सीनियर डाक्टर से भारतीय एवं महिला होने के कारण परेशानी झेलनी पड़ती थी इसके साथ ही उस समय हमारे देश के लोग ही काम करने वाली महिला को हीन भावना से देखते थे,इसी कारण पांच वर्ष तक नौकरी करने के बाद वे पुनःमेडिकल की उच्च शिक्षा लेने के लिए 1892 ई मे वो विदेश गई और ग्लासगो और ऐडिनबर्ग विश्वविद्यालयों से चिकित्सा की उच्च डिग्रियां प्राप्त की,और ऐसा करने वाली आनंदीबेन जोशी के साथ पहली महिला बनीं।


लेकिन भारत में पश्चिमी चिकित्सा शास्त्र का अभ्यास करने वाली कादम्बनी गांगुली पहली डाक्टर फिजीशियन बनी कई बार आनंदीबेन जोशी का नाम भी आता है, किंतु उनकी भारत में पश्चिमी चिकित्सा पद्धति का प्रयोग करने से पहले ही उनकी मृत्यु टूव्यरकुलैसिस से हो गई थी।

डॉ कादंम्बनी गांगुली मे देश के प्रति प्रेम कूट कूट कर भरा हुआ था, क्योंकि कादंबिनी बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय की रचनाओं से बहुत प्रभावित थीं। उनमें देशभक्ति की भावना बंकिमचन्द्र की रचनाओं से ही जागृत हुई थी। और उन्होने बंबई मे 1889 मे आयोजित इंडियन नेशन कॉंग्रेस के अधिवेशन मे भाग लिया और महिलाओ की स्थिति मे सुधार की वकालत की थी. उन्हे बंगाल महिला संघ का सचिव बनाया गया और उहोने 1906ई मे कलकत्ता मे महिला सम्मेलन का आयोजन भी किया था।

कादम्बिनी ने समाज सेवा में भी अपना समय दिया. उन्होंने अपने पति द्वारकनाथ के साथ से समाज सुधार और खासकर महिलाओं के लिए काम करना शुरू कर दिया. उन्होंने वैसे तो कई सामाजिक कार्य किये थे।

लेकिन,कोयले की खानों में काम करने वाली बिहार और ओडिशा की महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए किया गया काम सबसे ज्यादा अहम रहा था. उन्होंने गाँधी जी के लिए साउथ अफ्रीका में किये जा रहे आंदोलन के लिए चंदा भी इकट्ठा किया था।
इसके अलावा,कादम्बिनी को कांग्रेस अधिवेशन में सबसे पहले भाषण देने वाली महिला का सम्मान भी प्राप्त है. साथ ही, वह कांग्रेस की 6 महिला सदस्यों में से भी एक थीं. इस तरह उन्होंने हर जगह अपनी उपस्तिथि दर्ज की थी।

बात चाहे सामाजिक कार्य हो या राजनीतिक. उन्होंने हर जगह महिलाओं का प्रतिनिधित्व किया था।

यकीनन, कादम्बिनी की पहल ने उस समय महिलाओं में आगे बढ़ने की हिम्मत दी थी. साथ ही, उस हर रुढ़िवादी सोच के इंसान की मानसिकता पर गहरा प्रहार किया था. उन्हें अपने हकों के लिए लड़ना पड़ा, रास्ते में कई रूकावटे भी आईं, लेकिन उन्होंने हर मुश्किलों का सामना करते हुए खुद के लिए एक जगह स्थापित की।

उस समय लोग उनका विरोध कर रहे थे,लोगों की घटिया मानसिकता का मंजर कुछ ऐसा था कि वो अपने लेखों में उन्हें वेश्या कहकर अपनी भड़ास निकालते थे।

इस काम को एक रूढ़िवादी मैगजीन ‘बंगाबासी’ के एडिटर किया करते थे. उनका नाम मोहेश चंद्र पाल था. ये उन्हें बदनाम करने की कोई कसर नहींं छोड़ते थे. किन्तु, मोहेश भूल गए थे कि वह इस बार किसी बेचारी महिला से नहीं, बल्कि एक सशक्त महिला से टक्कर ले रहे थे. क्योंकि, कादम्बिनी ने अपने इस अपमान को नहीं सहा।

लिहाज़ा, 1891 में एक बार जब मोहेश ने उनके वेश्या होने की बात कही. तब उन्होंने अपनी आपत्ति दर्ज करते हुए उन पर मुकदमा दायर कर दिया. वह इस मुकदमे में जीती भी. इसके तहत मोहेश पर 6 महीने की सजा हो गई। यही वजह है कि जब भी महिलाओं के संघर्ष की बात होगी, तब उनका नाम शीर्ष लोगों में लिया जाएगा।

3 अक्टूबर, 1923 को उन्होंने आखिरी सांस ली और इस सशक्त और बहादुर महिला ने दुनिया को अलविदा कह दिया किंतु लोगो के जहन में हमेशा जिन्दा रह गई।

Electoral rules in India : an inequalable system

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By Asif khan


➢ Flaws on electoral rule in India :

▪ First past the post (FPTP) System : India follows an election policy of who secures the most number of votes in an election. Example :- If 99% votes are voted for (NOTA) and remaining 1% goes to one party amongst others. The party wins the election to form a government.The main disadvantage because of this system is :- If a party wins they are free to form any kind of policies that reflect their state of mind, this can be harmful – Example :- (BJP) emerged as single largest party in 2014 election and announced demonetisation in 2016 while 69% voters who voted against (BJP) went waste so, (FTTP) system vitiates the spirit of democracy.
▪ Vote banks : Politics has turned religious, Caste communities into vote banks that has made people support candidates of their own religious- Casteist due to the
community feeling India has in its heritage since centuries. Obviously with this mindset of religiously hatred towards minorities will gain more majority votes compare to minority so in this case majority always wins over minority.
▪ Electoral bonds : The election expenditure incurred by the political parties does not indicate a particular source infact in many elections the expenditure of the
candidates far exceeds the set of limit so, secret electoral financially becomes the most corrosive and corrupting electoral factor that’s why policies are made for and influenced by the big corporates.this has to be looked into.

▪ Religion based politics : Religious politics have been marked by desire for power on the religious lines rather than a substantial agenda for social reform of the downtrodden that’s why polarisation of votes took place that’s why majority caste

his vote for majority’s Candidate and vice-versa so, minority deeps down into this also deprived from the rights thats leads atrocities on minorities, communal violence erupt amidst election, dalits are also exploited that’s why social reforms of society lacking behind.

➢ Important measures should be taken to reforms :-
▪ Proportional representation : The rationable underpining are proportional
representation is to consciously reduce the disparity between a party’s share of national voters and it’s share of parliamentary seats, If a major party wins 40% of votes, it should win approximately 40 percent of the seats and a minor party wins 10 Percent of the votes should also gain percent of seats. This congruity between a party’s share of the vote and it’s share of the seats provides an incentive for all parties to support and participate in the system. Proportional representation requires the use of electoral district with more than one member, it is not possible to divide a single seat elected on a single ocassion proportionally. There are many important issues which can have a major impact on how a proportional representation system works in practice. The greater number of representatives to be ected from a district, the more proportional the electoral system will be. Proportional representation system also differ in the range of choice given to the voter – whether the voter can choose between political parties, individual, candidate or both.
▪ Reservation for Minorities : Many ways to enhance the representation of minorities, electoral system which use reasonably large district magnitudes encourage
parties to nominate on grounds that balanced tickets will increase the electoral chances. In proportional representation system can also facilitate the representation of earlier underrepresented or unrepresented groups by encouraging the formation of parties specially representating them. In majority system in particular seats are sometimes set reserved in the legislature for minorities.
▪ Transparency on electoral bind : Political parties and electoral bond need to be brought under the ambit of Right to information (RTI) 2005.
▪ Equal media coverage : All parties should be given to equal media coverage so as to provide a level playing field.

▪ Expenditure : Three steps of expenditure in electioons – Legitimate electioneering cost,
party running cost and T.V air time cost however the accouted legitimate expenditure is a mere percentage of actual spending by Candidate and their corresponding political parties according to national commission to review the working (NCRWC), high cost of election Creates a high degree compulsion for corruption in the public arena.

JMI VC visits photojournalist Danish Siddiqui’s home to offer condolences

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Jamia Millia Islamia(JMI) Vice Chancellor Prof. Najma Akhtar today met family members of the Reuters photojournalist and Jamia alumnus Danish Siddiqui who was killed in Afghanistan while covering conflict between Afghan Armed Forces and Taliban.

She met with Danish’s father Prof. Akhtar Siddiqui and other members of the family at his residence in Jamia Nagar. She was accompanied by the Registrar and other senior officials of the university.


The Vice Chancellor consoled Prof. Siddiqui and discussed many things about Danish with him for about 40 minutes. She termed Danish a true fighter like his father whom she has known for quite a long time.


Prof. Akhtar said Danish worked passionately to bring out the truth to show it to the world and always raised his voice against the wrong. “Danish’s death is a loss not only to his family and Jamia fraternity but to the whole country” she said.

 

The Vice Chancellor told Prof. Siddqui that JMI will organise a condolence meeting on the university campus on coming Tuesday. An exhibition of Danish’s exemplary work will also be organised on the university campus in due course of time so that students can take inspiration from it.

JMI condoles tragic death of its alumnus award-winning photojournalist Danish Siddiqui

Jamia Millia Islamia (JMI) deeply mourns the tragic and untimely passing of Reuters photojournalist Danish Siddiqui who was killed in the violence in Kandahar’s Spin Boldak District. There has been an outpouring of grief at the AJK Mass Communication Research Centre (MCRC) where Danish studied from 2005 -2007 and graduated with a Masters in Mass Communication.

JMI Vice Chancellor termed it’s a big loss to journalism and Jamia fraternity. She spoke to Danish’s father Prof. Akhtar Siddiqui as soon she got the news about the tragic incident. He informed her that Danish spoke to him two days back and talked about the assignment he was working upon in Afghanistan.

Prof. Akhtar Siddiqui who retired from JMI was Dean, Faculty of Education. He was Director of National Council for Teachers Education (NCTE) also.

In 2018 the MCRC had awarded Danish the Distinguished Alumni Award. Professor and Officiating Director Shohini Ghosh says: “This is one of the saddest days in the life of the MCRC. Danish was one of the brightest stars in our hall of fame and a proactive alumnus who kept returning to his alma mater to share with students his work and experiences. We will miss him deeply but are determined to keep his memory alive.”

Danish won a number of awards for his work inclosing a Pulitzer Prize in 2018 for his work as part of a seven-member Reuters team that documented the violence faced by Myanmar’s minority Rohingya community and their mass exodus to Bangladesh beginning August 2017. The photograph for which he was given the Pulitzer shows an refugee woman sinking to her knees on the shore of the Bay of Bengal, fatigued and forlorn. In the distance, a group of men unload the meagre belongings that they have carried with them in a small boat as they journeyed from their homes in Myanmar to Bangladesh for safety.

His last interaction with the students of MCRC was on April 26, 2021 when Sohail Akbar invited him to speak to the students of Convergent Journalism. “It was at the deadly peak of the COVID-19 second surge and Danish was very busy” remembers Sohail Akbar “but as always, he made time for the students of the MCRC”.

As a photojournalist, Danish has covered several important stories in Asia, Middle East and Europe. Some of his works include covering the wars in Afghanistan and Iraq, Rohingya refugees crisis, Hong Kong protests, Nepal earthquakes, Mass Games in North Korea and living conditions of asylum seekers in Switzerland. He has also produced a photo series on Muslim converts in England. His work has been widely published in scores of magazines, newspapers, slideshows and galleries – including National Geographic Magazine, New York Times, The Guardian, The Washington Post, Wall Street Journal, Time Magazine, Forbes, Newsweek, NPR, BBC, CNN, Al Jazeera, South China Morning Post, The Straits Times, Bangkok Post, Sydney Morning Herald, The LA Times, Boston Globe, The Globe and Mail, Le Figaro, Le Monde, Der Spiegel, Stern, Berliner Zeitung, The Independent, The Telegraph, Gulf News, Libèration and various other publications.