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बीपीएससी में नालंदा के ओसामा को मिला 96वां रैंक

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सफलता मिलने के बाद उत्साहित हैं स्वजन
बीसीसी मिशन स्कूल के शिक्षक थे ओसामा के पिता
ओसामा बिहार में नगर निकाय के इओ पद पर देंगे योगदान

 

मन में लगन व कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो कोई भी लक्ष्य दूर नहीं होता। नालंदा जिला गांव मौलानाचक के स्थायी निवासी मो मंसूर आलम और सितारा खातून के पुत्र ओसाबा इब्ने मंसूर ने ऐसा ही कुछ कर दिखाया है। ओसामा ने बिहार लोक सेवा आयोग (बीपीएससी) संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा पास कर बेहतरीन उदाहरण कायम किया है। बीते दिनों घोषित बीपीएससी 65वीं के परीक्षा परिणाम में 26 साल के ओसामा ने 96वां स्थान हासिल किया है। ओसामा की ओरसे प्राप्त की गई सफलता के पश्चात उसे नगर निकाय में कार्यपालक पदाधिकारी का पदभार मिलेगा। ओसामा पिछले तीन बार से बीपीएससी और यूपीएससी की परीक्षा दे रहे थे। आखिरकार इस बार उसने सफलता अर्जित की है।

आपको बता दें कि ओसामा ने मेदिनीनगर स्थित सेक्रेड हर्ट स्कूल से वर्ष 2008 में 10वीं की प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की थी। इंटरनेशनल पब्लिक स्कूल रांची से उन्होंने 2010 में आइएससी प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण करने के बाद इंटिग्रल यूनिवर्सिटी लखनऊ से मैनेनिकल इंजीनियरिंग 2014 में पास की। इस बीच कैंपस सलेक्शन से आईबीएम कंपनी में नौकरी लग गई थी। दो साल तो आइबीएम कंपनी में उन्होंने नौकरी की लेकिन इसके बाद उन्होंने प्रशासनिक सेवा में जाने की ठान ली। इसी के साथ उसने तैयारी शुरू कर दी। इधर चार लाख आवेदकों के बीच प्रतिस्पर्द्धा में फतह हासिल करते हुए 96वां रैंक आने के बाद हर ओर से उन्हें बधाइयां मिल रही हैं। ओसामा का खानदानी घर बिहार के नालंदा में है। उनके पिता मो मंसूर आलम मेदिनीनगर स्थित बीसीसी मिशन स्कूल में शिक्षक के पद कार्यरत थे। 2013 के दिसंबर माह में सेवानिवृत हुए थे। सेवानिवृत होने के बावजूद वे लोगों के बीच शिक्षा का अलख जगा रहे हैँ।

बचपन से ही बेहतर करने का था जज्बा : सितारा

ओसामा की मां सितारा खातून ने बताया कि ओसामा लंबे समय के बाद फिलहाल घर लौटा है। खुशखबरी सुनकर गर्व का अहसास हो रहा। बताया कि ओसामा बचपन से ही पढ़ाई के प्रति आकर्षित रहता था।

समाज के प्रति ईमानदार रहने की दी है तरबियत : मंसूर

मेदिनीनगर : बीसीसी मिशन स्कूल के सेवानिवृत शिक्षक और ओसामा के पिता मो मंसूर आलम ने बताया कि समाज के प्रति ईमानदार रहने की तरबियत पुत्र ओसामा को दी है। उम्मीद है कि वह कार्यकाल में भी शत प्रतिशत ईमानदार रहेगा। हरेक लोगो को चाहिए कि ईमानदार और जिम्मेदार नागरिक बने। जरूरतमंद के लिए मददगार करना चाहिए। सफलता मिलने से काफी खुश हैं।

ओसामा अपने माँ और पिता के साथ

जैसा भी माहौल हो हार नहीं मानें : ओसामा

बीपीएससी में सफलता अर्जित कर चुके ओसामा ने तैयारी कर रहे अन्य विद्यार्थियों को सलाह दी है। कहा है कहा है कि दृढ़ इच्छाशक्ति और कुछ कर गुजरने का जज्बा के साथ निर्धारित मंजिल को हासिल करने के लिए संघर्ष करें। जैसा भी माहौल हो हार नहीं मानें। ईमानदारीपूर्वक प्रयास लगातार जारी रखें। टिप्स यह है कि खुद को जज करें। चुनौती के लिए खुद को तैयार करें।

वाइवा का इंतज़ार करते शोधार्थियों की त्रासदी

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Shubhneet Kaushik 

पिछले चार-पाँच सालों में जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में शोधार्थियों के लिए त्रासद स्थिति बन गई है। पीएचडी सबमिशन, वाइवा और डिग्री अवार्ड होने की जो प्रक्रिया जेएनयू जैसे केंद्रीय विश्वविद्यालय में समय से सम्पन्न होनी चाहिए। वही प्रक्रिया इन कुछ वर्षों में जेएनयू प्रशासन की घोर लापरवाही के चलते असह्य रूप से लंबी, बोझिल और हताशपूर्ण बन गई है। जेएनयू के मूल्यांकन विभाग (इवैलुएशन ब्रांच) की मनमानी का आलम यह है कि थीसिस सबमिट किए जाने के एक साल बाद भी उसे परीक्षकों के पास नहीं भेजा जाता।

ख़ुद मैं और मेरे कई दोस्त मूल्यांकन विभाग की इन कारस्तानियों के भुक्तभोगी रहे हैं। मैंने 28 जून 2018 को सेंटर फॉर हिस्टॉरिकल स्टडीज़ (जेएनयू) में अपनी थीसिस सबमिट की। अगले एक साल तक मूल्यांकन विभाग ने मेरी थीसिस परीक्षकों के पास नहीं भेजी। वे कभी सीडी न होने, कभी कोई दूसरा दस्तावेज़ न होने का बहाना करते रहे। जबकि सच्चाई ये है कि सीडी और अन्य दस्तावेज़ों के अभाव में थीसिस सबमिट ही नहीं हो सकती। मैंने इसके बारे में जेएनयू के कुलपति जगदीश कुमार को भी लिखा, लेकिन उन्होंने कोई कार्यवाही करना तो दूर, ईमेल पर कोई प्रतिक्रिया देना भी ज़रूरी नहीं समझा!

आखिरकार थीसिस सबमिट किए जाने के 15 महीने बाद सितंबर 2019 में मेरी थीसिस परीक्षकों के पास मूल्यांकन के लिए भेजी गई। दोनों ही परीक्षकों ने चार महीने के भीतर जनवरी 2020 में रिपोर्ट सौंप दी। 17 मार्च 2020 को मेरा वाइवा हुआ। इस तरह जून 2018 में सबमिट की गई थीसिस का वाइवा 21 महीने बाद हुआ।

मेरे एक मित्र मनीष जो कि सेंटर फ़ॉर पोलिटिकल स्टडीज़ के शोधार्थी रहे, उनके साथ भी यही वाक़या पेश आया। मनीष ने जुलाई 2019 में पीएचडी सबमिट की। लेकिन उनका वाइवा चौबीस महीने बाद जुलाई 2021 में जाकर हुआ। इसी तरह मंदाकिनी हालदार ने सीएचएस में जुलाई 2019 में थीसिस जमा की। मंदाकिनी ने 1971 के भारत-पाक युद्ध, बांग्लादेश मुक्ति संग्राम और शरणार्थी शिविरों के इतिहास पर बेहतरीन काम किया था। थीसिस जमा करने के चौदह महीने बाद सितम्बर 2020 में मंदाकिनी का असमय निधन हो गया। किंतु तब तक मंदाकिनी का वाइवा नहीं हो सका था। मेरी एक अन्य मित्र सुधा ने सिनेमा और भारतीय राज्य पर अपना शोध ग्रंथ दिसम्बर 2019 में जमा किया। पर बीस महीने बीत जाने के बाद भी अब तक सुधा का वाइवा नहीं हो सका है।

कुल मिलाकर यह छात्रों को तंग करने, उनके मानसिक शोषण का एक आजमाया हुआ तरीका है, जो जेएनयू प्रशासन अपना रहा है। इसका सबसे बुरा शिकार वे शोधार्थी हो रहे हैं जो नौकरियों के लिए पीएचडी की डिग्री पर निर्भर हैं। वे अपनी आँखों के सामने तमाम अवसर निकलते जाते देखने को अभिशप्त हैं।

जेएनयू प्रशासन का यह रवैया ऐसे शोधार्थियों के लिए और मुश्किलें खड़ी करता है जो दिल्ली में नहीं रहते हैं। उनके लिए यह संभव नहीं है कि वे नियमित तौर पर जेएनयू जाकर पीएचडी के बारे में अपडेट ले सकें। दुर्भाग्य तो यह भी है कि ऐसे शोधार्थियों का मुद्दा उठाना जेएनयू छात्रसंघ को भी गवारा नहीं क्योंकि ये छात्र उनकी निगाह में वोटर नहीं रह जाते।

बिहार खेल सम्मान से नवाज़े गए मोहम्मद शम्स आलम शेख़

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मोहम्मद शम्स आलम शेख़ ( Shams Aalam ) को बिहार खेल सम्मान से नवाज़ा गया है। यह सम्मान 29 अगस्त को प्रेमचंद रंगशाला में आयोजित एक कार्यक्रम में उप मुख्यमंत्री एवं बिहार के खेल मंत्री द्वारा प्रदान किया गया।


शम्स आलम पैरा तैराक, प्रेरक वक्ता और शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के अधिकारों के पक्षधर हैं।


इन्होंने इंडोनेशिया के ज़कार्ता शहर में आयोजित एशियन पैरा खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया।


दिसंबर 2019 में पटना लॉ कॉलेज घाट में आयोजित मिश्रीलाल मेमोरियल तैराकी प्रतियोगिता में भाग लेकर शम्स आलम ने 2 कि.मी. की दूरी 12 मिनट और 23.04 सेकेंड्स में तय कर एक नया रिकॉर्ड बनाया। यह किसी पैरा प्लेजिक द्वारा दर्ज सबसे तेज समय हैं। उनका नाम इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज हो गया।

निचले स्तर से बड़े सांगठनिक फेरबदल किए कांग्रेस का रिबोर्न मुश्किल।

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शिवम् सौरभ

कांग्रेस का रिबोर्न कब का हो गया होता लेकिन जहां तक मेरा समझ कहता है कि पुरे पार्टी में आत्ममुग्ध बौने भरे पड़े हैं, खासकर हिंदी पट्टी के राज्यों में।

पहचान शुन्य हो चुकी है लेकिन घमंड इतना अधिक की जवाब नहीं। आज आजादी के अमृत महोत्सव के पेंटिंग्स में आधुनिक भारत के निर्माता पंडित जवाहरलाल नेहरू के तस्वीर को हटा दिया गया। यह एक निहायत ही घटियापन भरा कदम है। लेकिन चंद कांग्रेसियों के अलावा कोई और कांग्रेस नेता आपको विरोध करता हुआ नजर नहीं आएगा।

राहुल गांधी जी ने पिछले दिन कहा था कि हमें बहादुर लोगों की जरूरत है बंदा ने बिल्कुल सही कहा। दस प्रतिशत कांग्रेसी छोड़कर नब्बे प्रतिशत कांग्रेसी कायर/सत्ता चिपकु है। नवनीत चतुर्वेदी, मनीष सिंह, सुंदर गुर्ज्जर सहित अनेकों नाम है जो भाजपा का विरोध दमभर करतें हैं और करने की कुव्वत रखते हैं। लेकिन मेरा समझ कहता है कि इनसे कोई भी वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सीधे संपर्क में नहीं है अगर हैं भी तो वह नहीं चाहता है कि आलाकमान के संपर्क में ऐसे लोग आए।

बहरहाल सिर्फ राहुल गांधी की सक्रियता कांग्रेस को कितना पुनर्जीवित करेगी। उन्हें अपनी सुरक्षा की भी चिंता है सीधे किसी से मिल भी नहीं सकते और आत्ममुग्ध बौने अच्छे लोगों को बढ़ने नहीं देंगे। आपको हंसी तो तब आएगी कि संगठन के ऐसे ऐसे छोकड़े जो साल में दो पोस्टर ठीक से नहीं लगवा सकते/दस लोगों को दस मिनट संबोधित नहीं कर सकते/साल में दस दिन फोर व्हीलर से घुम सकते वह वरिष्ठता का दंभ ऐसे भरेंगे जैसे वह राहुल गांधी के राइट हैंड हो।

राहुल गांधी को नयी नीति के साथ सड़े हुए आम को फेंकना होगा और अच्छे लोगों को जोड़ने की नीति को अपनाना होगा। राहुल गांधी जी को समझना चाहिए कि जो पदाधिकारी साल में दस नये कार्यकर्ता जोड़ नहीं पाया/ दुसरे दलों से एक आध कार्यकर्ता तोड़ नहीं पाया वह घंटा आपको दस वोट दिलाएगा।

कांग्रेस में जो भी लोग भरे हैं 90% अधिक इस आस में है कि वापस सरकार बनेगी और हम खजाने की लुट करेंगे। जो कि बड़ा दिव्य स्वप्न है नये लोग और प्रत्याशी आपसे जुड़ नहीं रहें हैं और आप सरकार बनाने की सोच रहे हो.

मोरल ऑफ द पोस्ट:- कांग्रेस को सांगठनिक फेरबदल की बड़ी जरूरत है और सुखी टहनी को छंटनी तथा नये पौधे को लगाने की।

(लेखक युथ एक्टिविस्ट हैं, देश और बिहार से जुड़े सामाजिक राजनीतिक मुद्दों पर प्रमुखता से अपना विचार रखते हैं।)

क्रांतिकारियों के द्रोणाचार्य पं. गेंदालाल दीक्षित, दस्युओं को भी थमाई थी स्वतंत्रता की मशाल

(यथावत पत्रिका का विशेषांक ‘भूले बिसरे नायक’ प्रकाशित हुआ है। 16-31अगस्त, 2021 अंक में मित्र डॉ. अरुण प्रकाश जी ने कमांडर इन चीफ गेंदालाल दीक्षित पर लिखा है।)

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– डॉ.अरुण प्रकाश

चाणक्य सीरियल का वह संवाद तो हम सबके जेहन में है ही, शिक्षक साधारण नहीं होता। प्रलय व निर्माण दोनों उसकी गोद में खेलते हैं। स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में इसका जीवंत उदाहरण हैं क्रांतिवीर पं. गेंदालाल दीक्षित। संयुक्त प्रान्त के क्रांतिकारियों के बीच मास्साब नाम से पहचाने जाने वाले इस क्रांतिवीर ने न सिर्फ सैकड़ों छात्रों और नवयुवकों को स्वतंत्रता की लड़ाई से जोड़ा बल्कि बीहड़ के दस्यु सरदारों में राष्ट्रीय भावना जगाकर उन्हें स्वतंत्रता की लड़ाई के लिए जीवन सौंपने की शपथ दिलवाई। इतिहास में उनकी पहचान मैनपुरी षड्यंत्र केस के सूत्रधार, उस दौर के सबसे बड़े सशस्त्र संगठनों शिवाजी समिति व मातृवेदी के संस्थापक-कमांडर के रूप में होती है। संगठन में युवाओं व डाकुओं को जोड़ने के बाद उन्हें राष्ट्र प्रेम की दीक्षा और हथियार चलाने की शिक्षा देने के नाते उन्हें क्रांतिकारियों का द्रोणाचार्य कहा जाता है। महान क्रांतिकारी पं. रामप्रसाद बिस्मिल को स्वतंत्रता आन्दोलन से जोड़ने व शस्त्र शिक्षा देने का श्रेय भी इन्हीं को है। उन्होंने अलग-अलग प्रान्तों में काम कर रहे क्रांतिक्रारी संगठनों को एकीकृत कर विप्लवी महानायक रास बिहारी बोस की सन 1915 की क्रांति योजना को भी सहयोग दिया था।

पं. गेंदालाल दीक्षित का जन्म 30 नवंबर 1890 को संयुक्त प्रांत के आगरा में बटेश्वर के पास मई गांव में हुआ था। उनकी आरंभिक शिक्षा गांव में ही हुई और आगे की पढ़ाई उन्होंने इटावा व आगरा में की। स्वतंत्रता के आन्दोलन से वे मिडिल पास करने के बाद ही जुड़ गये थे, जब 1905 में बंग-भंग के विरोध में देशव्यापी आन्दोलन शुरू हुआ था। इसी के चलते वह कॉलेज की पढ़ाई छोड़कर आगरा से औरैया चले आये और वहां डीएवी स्कूल में पढ़ाने लगे। शुरुआत में उन्होंने शिक्षा सुधार का एक खाका बनाया और उसी पर काम करना शुरू किया। यह खाका आर्य समाज की शिक्षाओं से प्रेरित था।

गेंदालाल स्वयं ज्योतिष, संस्कृत और योग के अच्छे विद्वान थे। वह शिक्षा में सुधार के माध्यम से ही राष्ट्रीय भावना जगाना चाहते थे। इसके लिए डीएवी स्कूल के हेड मास्टर के रूप में काम करते हुए उन्होंने कई स्थानों की यात्रा की और नौजवानों को जोड़ा। गेंदालाल लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के कार्य और विचारों से बहुत प्रभावित थे। जब तिलक ने महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी की जयंती मनाने का आह्वान किया तो इससे प्रभावित होकर गेंदालाल ने शिवाजी समिति नाम की संस्था बनाई। संस्था से युवाओं व छात्रों को जोड़ा जाता था और उन्हें स्वतंत्रता की लड़ाई के लिए तैयार किया जाता था। समिति विस्तार के लिए गेंदालाल संयुक्त प्रान्त के कई इलाकों से लेकर सिंगापुर तक गए।

इसी बीच वह मथुरा के प्रसिद्ध विरजानंद पाठशाला पहुंचे। यह वही पाठशाला है जहां से आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानंद ने शिक्षा पाई थी। यहीं उनकी मुलाकात मजबूत कद काठी के युवा विद्वान लक्ष्मणानंद ब्रह्मचारी से हुई, जोकि उनसे प्रभावित होकर शिवाजी समिति से जुड़ गये। जब दीक्षित राष्ट्रीय नेताओं से संपर्क साधने बम्बई चले गये तो लक्ष्मणानंद ब्रह्मचारी ने ही समिति का संचालन किया। वह सत्सगों व प्रवचनों के माध्यम से लोगों को ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध उठ खड़े होने को प्रोत्साहित करते थे।

पुस्तक कमांडर-इन-चीफ गेंदालाल दीक्षित के लेखक शाह आलम बताते हैं कि, जब पहले विश्व युद्ध की आहट हुई। तो अधिकतर ब्रितानिया सेना सुदूर मोर्चों पर भेज दी गई। यह अन्य क्रांतिकारियों सहित गेंदालाल दीक्षित के लिए सुनहरा मौका था। उन्होंने प्रांत भर में दौरे शुरू किये। इसी दौरान शाहजहांपुर में उनकी मुलाकात राम प्रसाद बिस्मिल से हुई। बिस्मिल उनसे प्रभावित हुए और संगठन से जुड़ गये। आगरा जनपद के अंतर्गत बाह तहसील के पिनाहट कस्बे के नजदीक चंबल घाटी के बीहड़ों में बिस्मिल को सैनिक प्रशिक्षण दिया गया। इसके बाद बिस्मिल गेंदालाल के सहायक कार्यकर्त्ता नियुक्त हुए और प्रांत के 40 जिलों में फैली 4000 से अधिक युवा सदस्यों वाली शिवाजी समिति के संचालन में सहयोग करने लगे। इसके सदस्यों को छोटे समूहों में हथियार चलाने की शिक्षा दी जाती थी।
ऐतिहासिक दस्तावेजों से पता चलता है कि दीक्षित ने अंतर-प्रांतीय क्रांतिकारी संगठनों से तालमेल बिठाया था, इसी दौरान वह विप्लवी महानायक रासबिहारी बोस और महाराष्ट्र के विष्णु गणेश पिंगले के संपर्क में आये।

इन क्रांतिकारियों के संपर्कों के सहारे उन्होंने पंजाब, महाराष्ट्र, दिल्ली, राजपूताना और बंगाल के क्रांतिकारी संगठनों को एक सूत्र में पिरोया। रासबिहारी बोस ने 21 फरवरी 1915 जिस महान क्रांति की तैयारी की थी, उसके लिए दीक्षित ने उन्हें 5000 लड़ाके देने का वादा किया था। हालांकि मुखबिरी के चलते वह क्रांति असफल रही और रासबिहारी को देश छोड़ना पड़ा। इसके बाद गेंदालाल सिंगापुर गए और गदर पार्टी के नेताओं से मिलकर तख्तापलट की रणनीति बनाई।

सिंगापुर से वापस आकर उन्होंने बिस्मिल सहित कई बड़े क्रांतिकारियों के साथ 1916 में मातृवेदी दल की स्थापना की। मातृवेदी के कमांडर स्वयं गेंदालाल दीक्षित थे, इसका अध्यक्ष दस्युराज पंचम सिंह को बनाया गया और संगठन की जिम्मेदारी लक्ष्मणानंद ब्रह्मचारी को दी गई। दल को चलाने के लिए 40 लोगों की केंद्रीय समिति बनी जिसमें 30 चंबल के बागी और 10 क्रांतिकारी शामिल थे। इन 10 क्रांतिकारियों में पंडित राम प्रसाद बिस्मिल और पत्रकार शिव चरण लाल शर्मा भी शामिल थे।

दल का गठन पूरी तरीके से गोपनीय रखा गया था और इसमें शामिल होने के लिए सैनिकों को मर मिटने की शपथ लेनी होती थी। यह शपथ हाथ में गंगाजल लेकर दीक्षित के सहयोगी क्रांतिकारी देवनारायण भारतीय दिलाते थे। उनका नारा था, भाइयों आगे बढ़ो फोर्ट विलियम छीन लो, जितने भी अंग्रेज सारे एक-एक कर बीन लो। मातृवेदी के इन मतवालों के उद्घोष से वीरान पड़े चंबल के बीहड़ गूंज उठे, लेकिन इसकी भनक ब्रितानी सत्ता तक न पहुंचने दी गई।

मातृवेदी दल के पास एक व्यवस्थित वर्दीधारी सेना थी, इसमें बड़ी संख्या में बीहड़ों के डाकू शामिल थे। सैनिकों को वेतन दिया जाता था। उस समय दल की सेना में 2000 पैदल सैनिक और 500 घुड़सवार शामिल थे। दल के पास करीब आठ लाख रूपये का कोष संग्रह था। दल को इतना व्यवस्थित किया गया था कि उसका अपना सूचना तंत्र, खुफिया तंत्र और प्रकाशन तंत्र भी था। इसका सैन्य मुख्यालय जालौन रखा गया।

उधर सन 1915 की क्रांति असफल होने के बाद हो रही तख्तापलट की तैयारियों की भनक ब्रितानी सरकार को लग गई। इस तैयारी के तार संयुक्त प्रान्त से जुड़े तो ब्रिटिश सरकार ने फैड्रिक यंग (जिसने बाद में सुल्ताना डाकू को पकड़ा था) नामक पुलिस कमिश्नर को विशेष रूप से मलाया से बुलाकर आगरा में विशेष अधीक्षक नियुक्त किया और क्रांतिकारियों के दल को कुचलने का आदेश दिया। उसकी धरपकड़ में कुछ क्रांतिकारी पकड़े गए।

गेंदालाल दीक्षित व उनके करीबी साथियों की गिरफ्तारी के लिए दबिश शुरू होने से पहले गेंदालाल का प्रयास जापान पहुंचने का था। लेकिन असफल रहने पर वह बड़े भाई भगीरथ प्रसाद दीक्षित के पास कोटा चले गए। इस तरह से भूमिगत रहकर गेंदालाल ने क्रांतिकारी गतिविधियों को जारी रखा लेकिन जब वह वापस संयुक्त प्रांत लौटे तो मुखबिरी हो गई।

गेंदालाल और पंचम सिंह के 90 सदस्यों का दल दल भिंड जिले के मिहोना में घने जंगल में था तो 31 जनवरी 1918 को फैड्रिक यंग की अगुवाई में पुलिस की बड़ी टुकड़ी ने चारों तरफ से घेर कर अंधाधुंध गोलियां बरसाईं। यंग के जासूस ने खाने में जहर मिला दिया था, जिससे दल बेहोशी की हालत में था इसलिये जवाबी कार्रवाई न हो सकी। इस गोलीबारी में 36 क्रांतिकारी शहीद हुए। गेंदालाल दीक्षित को तीन और लक्ष्मणानंद ब्रह्मचारी को नौ गोली लगी, दोनों गिरफ्तार हुए। सभी घायल गिरफ्तार क्रांतिकारियों को ग्वालियर किले में मिलिट्री की निगरानी में बंद कर दिया गया। इस मामले का मुकदमा मैनपुरी षड्यंत्र केस के रूप में चलाया गया, क्योंकि दल के सदस्य दलपत सिंह ने मुखबिरी मैनपुरी जिलाधिकारी को ही की थी।

शाह आलम बताते हैं कि जब गेंदालाल को किले के बंदीगृह से निकालकर मैनपुरी में आईजी सामने लाया गया तो उन्होंने कहा, आपने इन बच्चों को व्यर्थ ही पकड़ रखा है। इस केस का तो मैं स्वयं जिम्मेदार हूं। पंजाब, बंगाल, बम्बई, गुजरात सहित विदेशों से मेरा कनेक्शन है, इन सबको आप छोड़ दीजिये। आईजी ने उनकी बात पर भरोसा कर लिया, और कई नौजवानों को छोड़ दिया। इसके बाद उन्हें कप्तान की कोठी पर ले जाकर मुखबिरों के साथ ही हवालात में बंद कर दिया गया।

मैनपुरी में हवालात में बंद होने के दौरान उनके सहयोगी देवनारायण भारतीय ने उनतक फलों की टोकरी में रिवाल्वर व लोहा काटने की आरी पहुंचा दी, जिसकी मदद से गेंदालाल सलाखें काटकर फरार हो गये। इस दौरान कुछ समय उन्होंने ग्वालियर स्टेट के छोटे से गांव में मात्र राशन पर अध्यापन किया। लेकिन किले में कैद के समय हुआ क्षय रोग बढ़ता जा रहा था, वह हरिद्वार गये फिर दिल्ली होते हुए बीमारी की हालत में अपने वीरान पड़े गांव आए। उनकी हवेली काफी समय से खाली पड़ी थी, उनके सहयोगी वहीं रात में खाना-पानी और दवा पहुंचाते थे। उनके साथ परिवार भी न उलझ जाए यह सोचकर गेंदालाल फिर हरिद्वार चले गये। जब वह वापस दिल्ली लौटे तो पहाड़गंज के महावीर मंदिर में प्याऊ पर नौकरी कर ली। सरफरोशी की तमन्ना पुस्तक में मदनलाल वर्मा क्रांत लिखते हैं, प्याऊ पर नौकरी करने के दौरान उनका स्वास्थ्य बिगड़ता रहा और दिल्ली के एक अस्पताल में 21 दिसंबर 1920 को मात्र 30 वर्ष की अवस्था में उनका देहांत हो गया।

देश को आजाद कराने का सपना लेकर यमुना तट के एक छोटे से गांव में जन्मे गेंदालाल को फिर उसी यमुना तट ने प्रश्रय दी। पार्थिव को लावारिश समझकर मिट्टी के तेल से झुलसाकर यमुना तट पर फेंक दिया गया। इसके बाद इलाज करने वाले डाक्टर को उनके पास मिले पत्र से उनकी पहचान मालूम हुई। गेंदालाल की क्रांतिकारी गतिविधियों के साक्षी व उनकी सांगठनिक कुशलता के कायल रामप्रसाद बिस्मिल ने उनकी कहानी प्रताप पत्र में छपने को कानपुर भेजी। बिस्मिल की लिखी वह स्टोरी दीक्षित जी की संक्षिप्त जीवनी के रूप में प्रभा नामक पत्रिका के सितंबर 1920 के अंक में मुख्य पृष्ठ पर गेंदालाल के चित्र के साथ 9 पन्नों में छापी गई। बिस्मिल ने अपने गुरु गेंदालाल की जीवनी भी लिखी थी, लेकिन काकोरी मामले में उनकी गिरफ़्तारी के बाद वह पाण्डुलिपि खो गई। सरकारी तंत्र में गेंदालाल को लेकर जो रिपोर्ट दी गई थी, उसके आधार पर पुलिस के लिए यह स्वीकार करना कठिन था कि इतने बड़े क्रान्तिकारी की ऐसी गुमनाम व सामान्य मृत्यु हो सकती है। इसलिए अगले 20 वर्षों तक पुलिस उनकी खोज करती रही और उनके परिवार पर नजर रखती रही। कई बार उनके घर के पास में सेना की टुकड़ियों ने पड़ाव भी डाला, परिजनों से पूछताछ भी हुई। युवाओं, छात्रों और दस्युओं के हृदय में राष्ट्रीयता के अरमान भरने और हाथ में स्वतंत्रता के लिए हथियार थमाने वाले इस द्रोणाचार्य के साथ न इतिहास लिखने वालों ने न्याय किया, न आजाद भारत की सरकार ने। स्वतंत्र भारत में उनकी विधवा पति व पुत्री के बिछोह में रो-रोकर अपने ही आंसुओं में घुल गईं, किसी ने उनकी सुधि न ली। जिन परमार्थ पथिकों ने उनके इतिहास से नई पीढ़ी का परिचय कराया, वह आज तक अदद सरकारी डाक जारी कराने की मांग लिए घूम रहे हैं, लेकिन मांग अब तक अनसुनी है। आज हम उनके शहादत की शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर चुके हैं, लेकिन उनकी पुण्यकीर्ति का सत्कार होना अब तक प्रतीक्षित है।

(नोट- पत्रिका में प्रकाशित लेख संपादित है।)

तालिबान की जन्‍म कुण्‍डली और अमेरिकी साम्रा्ज्‍यवाद से उसके रिश्‍तों का काला इतिहास

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Anand Singh

अफ़ग़ानिस्‍तान के राष्‍ट्रपति अशरफ़ ग़नी के काबुल से कायरतापूूर्ण पलायन के बाद वहाँ तालिबान की हुकूमत क़ायम होना अब लगभग तय हो चुका है। सत्‍ता में आने के बाद तालिबान अफ़ग़ानिस्‍तान को एक बार फिर से कट्टर इस्‍लामी अमीरात में तब्‍दील करने की पूरी कोशिश करेगा। अफ़ग़ानिस्‍तान में अमेरिकी साम्राज्‍यवादी दख़ल से पैदा हुए ये ख़ौफ़नाक हालात अफ़ग़ानी लोगों के लिए पहले से कहीं ज्‍़यादा तबाही और बर्बादी का सबब बनेंगे और साथ ही मध्‍य एशिया, पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया के समूचे क्षेत्र में भी अशान्ति और अस्थिरता पैदा करेंगे। इसकी वजह से इस इलाक़े के सामरिक समीकरणों और अन्‍तरसाम्राज्‍यवादी प्रतिस्‍पर्द्धा के स्‍वरूप में भी बुनियादी बदलावों की आशंका है।

तालिबान के इस उभार को समझने के लिए हमें अफ़ग़ानिस्‍तान के आधुनिक इतिहास पर एक नज़र दौड़ानी होगी।

मध्‍य एशिया और दक्षिण एशिया के सन्धिबिन्‍दु पर स्थित होने की वजह से अफ़ग़ानिस्‍तान 19वीं सदी से ही साम्राज्‍यवादी हस्‍तक्षेप का अखाड़ा रहा है। 19वीं सदी के अन्‍त और 20वीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश साम्राज्‍य और रूसी ज़ार साम्राज्‍य के बीच अफ़ग़ानिस्‍तान पर क़ब्‍ज़ा करने की होड़ थी, हालाँकि वे उसपर कभी भी पूरा क़ब्‍ज़ा करने में कामयाब नहीं हो पाये। 1919 में तीसरे आंग्‍ल-अफ़ग़ान युद्ध में अंग्रेज़ों को धूल चटाने के बाद अफ़ग़ानिस्‍तान पूरी तरह से आज़ाद हो गया। साम्राज्‍यवादी हस्‍तक्षेप से आज़ादी मिलने बाद अफ़ग़ानी बादशाह ग़ाज़ी अमानुल्‍ला ख़ान ने तुर्की के मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क की तर्ज़ पर अफ़ग़ानिस्‍तान का आधुनिकीकरण करने की कोशिश की परन्‍तु वह कामयाब नहीं हो सका। उसके बाद 1973 तक अफ़ग़ानिस्‍तान में बाहदशाहत क़ायम रही। 1973 में बादशाह ज़ाहि‍र शाह के तख्‍़ता पलट के बाद बादशाहत का ख़ात्‍मा हुआ और दाऊद ख़ान पहला राष्‍ट्रपति बना। 1978 में एक और तख्‍़तापलट हुआ जिसके बाद वामपन्‍थी पार्टी ‘पीपल्‍स डिमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ अफ़ग़ानिस्‍तान’ (पीडीपीए) सत्‍ता में आयी।

‍वीर 1985 की है जब तत्‍कालीन अमेरिकी राष्‍ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने सोवियत संघ के ख़िलाफ़ जारी जिहाद में मुजाहिद्दीनों को नेताओं को प्रेरित करने के लिए उन्‍हें व्हाइट हाउस में ससम्मान आमंत्रित किया और उन्‍हें सम्बोधित करते हुए कहा कि वे आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे हैं और नैतिक रूप से वे अमेरिका के संस्‍थापक वाशिंगटन और जैफ़रसन जैसे नेताओं के समतुल्य हैं।

1978 के तख्‍़तापलट को सावर क्रान्ति के नाम से जाना जाता है क्‍योंकि यह फ़ारसी कैलेण्‍डर के दूसरे महीने सावर में हुआ था। संभवत: यह नामकरण अक्‍टूबर क्रान्ति की तर्ज़ पर किया गया था, परन्‍तु इसमें अक्‍टूबर क्रान्ति जैसा कुछ भी नहीं था। यह मज़दूरों और किसानों के जनउभार की बजाय सैन्‍य शैली में किया गया तख्‍़तापलट था। पीडीपीए का सामाजिक आधार बेहद सीमित था। उसमें मुख्‍य तौर पर परचम और ख़ल्‍क़ नामक दो धड़े थे। परचम धड़े का सामाजिक आधार शहरी मध्‍यवर्ग के बीच था और उसमें राष्‍ट्रवादी झुकाव था जबकि ख़ल्‍क़ मज़दूरों के बीच लोकप्रिय था और वह वर्गीय आधार पर राजनीति करने का पक्षधर था। इन दोनों ही धड़ों का आधार अफ़ग़ानिस्‍तान के ग्रामीण इलाक़ों में न के बराबर था जबकि उस समय वहाँ की 86 फ़ीसदी आबादी गाँवों में रहती थी।

पीडीपीए जब सत्‍ता में आयी तो उस समय अफ़ग़ानि‍स्‍तान एक बेहद पिछड़ा हुआ समाज था। वहाँ एक भी गाँव में बिजली नहीं थी और रेलवे का नामोनिशान तक नहीं था। क़रीब डेढ़ करोड़ की आबादी वाले इस मुल्‍क में केवल 5 फ़ीसदी लोगों को ही तालीम हासिल थी। अफ़ग़ानि‍स्‍तान के अलग-अलग हिस्‍सों में पश्‍तून, ताजिक, उज़बेक, हज़ारा, तुर्कमान, और बलूच जातियों के इस्‍लामिक कबीले रहते थे जो बेहद पिछड़े सामन्‍ती सम्‍बन्‍धों व रीति-रिवाज़ों से बँधे थे। खेती-योग्‍य 45 फ़ीसदी ज़मीन पर ऊपर के 5 फ़ीसदी भूस्‍वीमियों का क़ब्‍ज़ा था। औद्योगिक विकास बेहद सीमित था और मज़दूर वर्ग की तादाद बहुत कम थी। इन हालात में सत्‍ता में आने के बाद पीडीपीए ने ग़रीब किसानों और मेहनतकशों के बीच पार्टी का आधार विस्‍तारित किये बिना ही आधुनिकीकरण और रैडिकल भूमि सुधारों की मुहिम छेड़ दी। ग्रामीण कबीलों के सरदार और भूस्‍वामियों की अपने-अपने कबीलों पर पकड़ थी, लिहाज़ा वे लोगों को यह समझाने में कामयाब होने लगे कि पीडीपीए की सत्‍ता उनकी तहजीब और मज़हब की विरोधी है। उस समय अफ़ग़ानि‍स्‍तान के पड़ोसी मुल्‍क पाकिस्‍तान में जनरल ज़ि‍या-उल-हक़ की फ़ौजी हुकूमत क़ायम थी और वह भारत के साथ होड़ में पाकिस्‍तान को रणनीतिक बढ़त दिलाने के लिए अफ़ग़ानिस्‍तान की सत्‍ता पर अपना नियंत्रण चाहता था। इस मक़सद से उसने पाकिस्‍तान की ख़ुफ़ि‍या एजेंसी आईएसआई को अफ़ग़ानिस्‍तान के पश्‍तून लोगों के बीच पीडीपीए की सरकार के ख़ि‍लाफ़ ज़हर उगलने के लिए लगा दिया। इसमें उसे सऊदी अरब से आर्थिक व कट्टरपन्‍थी वहाबी विचारधारा के रूप में मदद मिली।

इस प्रकार काबुल की सत्‍ता के ख़ि‍लाफ़ जेहाद छेड़ने वाले इस्‍लामी लड़ाके अस्तित्‍व में आते हैं जिन्‍हें मुजाहिद्दीन कहा जाता है। इन मुजाहिद्दीनों को इस्‍लामिक कट्टरपन्‍थ की ज़हरीली वैचारिक ख़ुराक़ अफ़ग़ानिस्‍तान की सीमा से लगे पाकिस्‍तानी प्रान्‍त नॉर्थ वेस्‍ट फ्रण्टियर प्रोविंस (जिसे आज ख़ैबर पख़्तूनख़्वा के नाम से जाना जाता है) के मदरसों में मिली। यही वह समय था जब अमेरिका ने मुजाहिद्दीनों को बढ़ावा देने के लिए आर्थिक व सैन्य मदद की नीति पर अमल करना शुरू किया। तत्‍कालीन अमेरिकी राष्‍ट्रपति जिमी कार्टर के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेंस्की ने ख़ैबर दर्रे का दौरा किया और एक हाथ में कुरान और दूसरे हाथ में बन्दूक लेकर वहाँ मुजाहिद्दीनों को सम्बोधित करते हुए कहा कि अब यही उन्हें काफ़िरों से मुक्ति दिला सकते हैं।

ये वो हालात थे जिनमें 1979 में सोवियत संघ की सामाजिक साम्राज्‍यवादी हुकूमत ने अफ़ग़ानिस्‍तान में सैन्‍य हस्‍तक्षेप की शुरुआत की जिसके बाद अफ़ग़ानिस्‍तान दो महाशक्तियों के बीच जारी शीतयुद्ध का नया अखाड़ा बन गया। कार्टर के बाद अमेरिका के अगले राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने सोवियत संघ को हराने के लिए अफ़गानी जेहादियों को आर्थिक मदद और अत्‍याधुनिक हथियारों की आपूर्ति को अभू‍तपूर्व रूप से बढ़ा दिया। यहाँ तक कि रीगन ने मुजाहिद्दीनों के नेताओं को व्हाइट हाउस में ससम्मान आमंत्रित किया और उन्‍हें सम्बोधित करते हुए कहा कि वे नैतिक रूप से अमेरिका के स्‍थापक वाशिंगटन और जैफ़रसन जैसे नेताओं के समतुल्य हैं। रीगन ने मुजाहिद्दीनों के जेहाद को इतना महत्‍वपूर्ण माना कि उस समय लॉन्‍च होने वाले अमेरिकी अन्तरिक्ष यान कोलम्बिया को अफ़गानियों के संघर्ष के नाम समर्पित कर दिया गया। यही वह दौर था जब सऊदी अरब के धनपशु ओसामा बिन लादेन ने अमेरिका की मदद से सोवियत संघ के ख़ि‍लाफ़ जेहाद करने के लिए अफ़ग़ानिस्‍तान-पाकिस्‍तान सीमा को अपना अड्डा बनाया।

तस्‍वीर 1979 की है जब तत्‍कालीन अमेरिकी राष्‍ट्रपति जिमी कार्टर के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेंस्की ने अफ़ग़ानिस्‍तान में वामपन्‍थी सरकार को‍ गिराने के लिए पश्‍तूनी कबीलियाई लोगों को हथियारों की सप्‍लाई और ट्रेनिंग देने के सीआईए के ऑपरेशन को शुरू करने के लिए अफ़ग़ानिस्‍तान-पाकिस्‍तान सीमा पर स्थित ख़ैबर दर्रे का दौरा किया था। इन लड़ाकों को बाद में मुजाहिद्दीन कहा गया।

अमेरिकी हस्‍तक्षेप के बाद सोवियत संघ समर्थित पीडीपीए की सत्‍ता कमज़ोर पड़ने लगी और उसे एक-एक करके तमाम सुधारों की नीतियाँ वापस लेनी पड़ीं। अमेरिका, पाकिस्‍तान और सऊदी अरब से समर्थन पाने वाले मुजाहिद्दीनों के सामने सोवियत सेना भी अपने मक़सद में कामयाब नहीं हो सकी और अन्‍तत: 1989 में उसे अफ़ग़ानिस्‍तान से वापसी करनी पड़ी। उसके बाद से ही पीडीपीए की सरकार की उल्‍टी गिनती शुरू हो चुकी थी। 1992 तक काबुल मुजाहिद्दीनों के क़ब्‍ज़े में आ चुका था। लेकिन मुजाहिद्दीनों के कई धड़ों के बीच आपस में सत्‍ता के लिए जंग छिड़ गयी जिससे अफ़ग़ानिस्‍तान बर्बरता के युग में प्रवेश करता गया। यही वह दौर था जब पाकिस्‍तान और सऊदी अरब की मदद से पश्‍तून मुजाहिद्दीनों के बीच से ही तालिबान नामक एक धुर इस्‍लामिक कट्टरपन्‍थी संगठन वजूद में आता है जो अन्‍य मुजाहिद्दीनों से इस मायने में अलग था कि वह इस्‍लामिक क़ानून शरिया को तमाम कबायली क़ानूनों व रीति-रिवाजों के ऊपर रखने और एक सख्‍़त इस्‍लामी अमीरात क़ायम करने की बात करता था। सोवियत संघ की अफ़ग़ानिस्‍तान की वापसी और बाद में उसके पतन और अमेरिका द्वारा छेड़े गये खाड़ी युद्ध के बाद मुजाहिद्दीन अपने पूर्व आक़ा अमेरिका के भी विरोधी हो गए थे। इसी दौर में ओसामा बिन लादेन ने अल क़ायदा की स्‍थापना की और अमेरिका के ख़ि‍लाफ़ जेहाद का ऐलान किया।

तालिबान का क्रूर शासन और अमेरिकी साम्राज्‍यवाद से उसके बढ़ते अन्तरविरोध

1996 में तालिबान काबुल की सत्‍ता पर क़ब्‍ज़ा करने और अफ़ग़ानिस्‍तान में कट्टर इस्‍लामी अमीरात क़ायम करने में कामयाब हो जाता है जो वहाँ के आम लोगों, ख़ासकर महिलाओं, के लिए नरक के समान था। छोटे-छोटे अपराधों के लिए भी सरेआम कोड़े लगाए जाते थे, चोरी करने वाले के हाथ काट दिये जाते थे। सरेआम फ़ॉंसी देने का भी चलन था। हर तरह के संगीत, नृत्‍य, मनोरंजन, फ़ैशन आदि को प्रतिबन्धित कर दिया गया और महिलाओं की नौकरी व लड़कियों की पढ़ाई पर सख्‍़ती से पाबन्‍दी लगा दी गयी। तालिबान के दौर में अफ़ग़ानिस्‍तान की अर्थव्‍यवस्‍था का आधार अफ़ीम की खेती और उसके व्‍यापार तथा मध्‍य एशिया और पाकिस्‍तान तथा ईरान के बीच होने वाले व्‍यापार पर कर था।

तालिबान के शासन में अल क़ायदा सहित तमाम इस्‍लामिक कट्टरपन्‍थी संगठनों को फलने-फूलने के लिए अनुकूल माहौल मिला जिसकी वजह से उनके अमेरिका से अन्‍तरविरोध बढ़ते गए। 2001 में अल क़ायदा द्वारा अमेरिका पर 11 सितम्‍बर के आतंकी हमले के बाद अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्‍तान पर हमला कर दिया। ग़ौरतलब है कि 11 सितम्‍बर के आतंकी हमले से पहले ही तत्‍कालीन अमेरिकी राष्‍ट्रपति जॉर्ज डब्‍ल्‍यू बुश, उपराष्‍ट्रपति डिक चेनी और रक्षामंत्री डोनॉल्‍ड रम्सफ़ेल्‍ड की नवरूढ़ि‍वादी सत्‍ता अफ़ग़ानिस्‍तान, इराक़, सीरिया और ईरान पर हमला करके पश्चिम एशिया के तेल व गैस भण्‍डार पर अपना क़ब्‍ज़ा करने की योजना बना चुकी थी। 11 सितम्‍बर की घटना ने उन्‍हें अपनी इस योजना को अमली जामा पहनाने का बहाना दे दिया।

*तालिबान का फिर से संगठित होना*

अफ़ग़ानिस्‍तान पर हमला करके अमेरिका ने तालिबान को सत्‍ता से तो हटा दिया था, परन्‍तु कुछ ही वर्षों के भीतर अफ़ग़ानिस्‍तान और पाकिस्‍तान के पश्‍तून बाहुल्‍य इलाक़ों में उसने अपने आप को फिर से संगठित कर लिया। अमेरिकी हमले के दौरान बड़ी संख्‍या में अफ़ग़ान शरणार्थियों ने पाकिस्‍तान के ख़ैबर पख्‍़तूनख्‍़वाह प्रान्‍त में पनाह ली। पाकिस्‍तान की मदद से तालिबान ने इन शर‍णार्थियों के बीच से नये सिरे से लड़ाके तैयार किये जिनको वैचारिक ख़ुराक़ पाकिस्‍तान के मदरसों से मिलती रही, हालाँकि इसी बीच पाकिस्‍तान के भीतर तहरीक़-ए-तालिबान पाकिस्‍तान नामक संगठन खड़ा हो गया जो पाकिस्‍तान की सत्‍ता को ही अपना मुख्‍य दुश्‍मन मानने लगा और वहाँ आतंकवादी घटनाएँ अंजाम देने लगा।

तालि‍बान के फिर से संगठित हो जाने के बाद अमेरिका का अफ़ग़ानिस्‍तान युद्ध लम्‍बा खिंचता चला गया जिससे अमेरिकी सरकार का ख़र्च बढ़ने लगा और आर्थिक संकट के दौर में वह बोझ बनता चला गया। यही वजह है कि पिछले कई सालों से अमेरिकी रणनीतिकार अफ़ग़ानिस्‍तान से सेना वापस बुलाने पर ज़ोर दे रहे थे क्‍योंकि अमेरिकी सेना की मौजूदगी से अमेरिका को कोई रणनीतिक लाभ नहीं हासिल हो रहा था। बराक ओबामा के कार्यकाल से ही तालिबान से बातचीत की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी। ट्रम्‍प के कार्यकाल में अफ़ग़ानिस्‍तान से अमेरिकी सेना की वापसी की तैयारियाँ होने लगी थीं। फ़रवरी 2020 में ही अमेरिका और तालिबान के बीच वापसी को लेकर समझौता भी हो चुका था जिसे वर्तमान बाइडेन प्रशासन ने लागू किया। इसी का नतीजा आज हमारे सामने है।

रवीश कुमार को रवीश कुमार ने पत्र लिखा…रवीश कुमार का अपना रवीश कुमार

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व्हाट्स एप में आने पत्रों में अनगिनत कहानियाँ होती हैं। जो मेरे भीतर अफ़सोस का दरिया छोड़ जाती हैं। इन्हीं कहानियों में कई बार काग़ज़ की नाव भी दिख जाती है लगता है कोई इनके सहारे पार करना चाहता है, लगता है मैं इनके सहारे पार होना चाहता हूँ। इस पत्र को पढ़ें।
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सर
मेरा नाम रवीश कुमार है और मैं BPSSC द्वारा आयोजित परीक्षा में मेरिट लिस्ट में मेरा Roll Number नही है, जबकि मेरा marks, cutoff से कही ज्यादा है। मेरे जैसे बहुत से कैंडिडेट के साथ ऐसा हुआ है। जिनकी संख्या मैं बता नहीं सकता। लेकिन उम्मीद है की और भी लड़के आप के पास अपना मार्क्स भेजें होंगे।

सर, हमारी आप से अनुरोध है कृपया इसे आप अपने अस्तर से उठने की कोशिश करे। इसके लिए हम लोग आपके आभारी रहेंगे। हमारी संवेदना को समझा जाए की हम लोग किस दौर से गुजर रहे है।

आपका अपना
रवीश कुमार

आईआईएमसी बना देश का सर्वश्रेष्ठ सरकारी मीडिया शिक्षण संस्थान

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‘आउटलुक-आइकेयर रैकिंग 2021’ में मिला पहला स्थान

नई दिल्ली, 5 अगस्त। देश की प्रतिष्ठित पत्रिका आउटलुक की ‘आउटलुक-आइकेयर रैकिंग 2021’ में भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी), नई दिल्ली को पत्रकारिता एवं जनसंचार के क्षेत्र में देश का सर्वश्रेष्ठ सरकारी मीडिया शिक्षण संस्थान घोषित किया गया है।

संस्थान के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने बताया कि आईआईएमसी परिवार के लिए यह बड़े ही गर्व का विषय है। केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्री अनुराग ठाकुर और संस्थान के चेयरमैन श्री अमित खरे के मार्गदर्शन और सहयोग से संस्थान अकादमिक गुणवत्ता के मानकों को स्थापित करने में सफल रहा है। उन्होंने कहा कि आईआईएमसी के सभी श्रेष्ठ प्राध्यापकों, अधिकारियों और कर्मचारियों के अथक प्रयास से ही हम मीडिया शिक्षा के क्षेत्र में पहले स्थान पर हैं। इससे पहले इंडिया टुडे के ‘बेस्ट कॉलेज सर्वे’ में भी आईआईएमसी को देश का सर्वश्रेष्ठ मीडिया शिक्षण संस्थान घोषित किया गया था।

शैक्षणिक सत्र 2021-22 के लिए प्रवेश प्रक्रिया की जानकारी देते हुए प्रो. द्विवेदी ने कहा कि आईआईएमसी हिंदी पत्रकारिता, अंग्रेजी पत्रकारिता, विज्ञापन एवं जनसंपर्क, रेडियो एवं टेलीविजन पत्रकारिता, ओड़िया, मराठी, मलयालम और उर्दू पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा पाठ्यक्रम संचालित करता है। इन आठ पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया 20 जुलाई, 2021 से शुरू हो गई है। आवेदन पत्र जमा करने की अंतिम तिथि 9 अगस्त, 2021 है। प्रवेश परीक्षा 29 अगस्त को आयोजित की जाएगी। परीक्षा परिणाम 10 सितंबर को घोषित किया जाएगा। ऑनलाइन आवेदन पत्र वेबसाइट www.iimc.nta.ac.in पर उपलब्ध है।

प्रो. द्विवेदी ने कहा कि किसी भी प्रकार की समस्या होने पर विद्यार्थी अकादमिक विभाग, भारतीय जन संचार संस्थान, अरुणा आसफ अली मार्ग, नई दिल्ली-110067 पर संपर्क कर सकते हैं। इसके अलावा दूरभाष नंबर 011-26742920, 26742940, 26742960 (एक्सटेंशन 233) पर भी संपर्क किया जा सकता है। मोबाइल नंबर 9818005590 के माध्यम से भी आवेदनकर्ता जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। अगर विद्यार्थी व्हाट्सऐप के द्वारा जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं, तो मोबाइल नंबर 9871182276 पर संदेश भेज सकते हैं। इसके अलावा [email protected] पर ईमेल के द्वारा भी संपर्क किया जा सकता है।

बदले बदले से नज़र आ रहे है राहुल और कांग्रेस।

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शिवम् सौरभ

कांग्रेस के तरफ से मोदी सरकार को मिल रहा वॉक ऑवर लगता है अब खत्म हो गया है। मृतप्राय हो चुकी कांग्रेस में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी और युवा कांग्रेस के अध्यक्ष श्रीनिवास बीवी लगातार जान फुंक रहे हैं। 2014 के बाद 2020 तक मानिए कांग्रेस की एक्टिविटी तो शुन्य हो चुकी थी।

गांव देहात में एक कहावत है “ढ़ोरबा के फुफकार भारी” इस कहावत को पूरा कांग्रेस फॉलो कर रहा था सिवाय 10 से 20% लोगों को छोड़कर। ऐसे ऐसे लोग कांग्रेस संगठन के नेता है जिन्हें अपने जिले में 10 लोग ठीक से नहीं जानते। जिन्हें कुछ पहचान नहीं वह टिकट की बात करते। लेकिन राहुल गांधी की सक्रियता अब बता रही है की कांग्रेस को बहादुर लोगों की जरूरत है। राहुल गांधी पिछले दिन कह भी चुके हैं कि जिन्हें भाजपा से डर लगता है वह छोड़कर चले जाए।


पंजाब कांग्रेस प्रकरण को आप गौर से देखे तो पता चलेगा जिस कैप्टन ने पंजाब में कांग्रेस के अपना बपौती समझ रखा था, वहां का कप्तान ही बदल कर तमाम जमे हुए लोगों को औकात दिखा दिया गया। राजस्थान में जिस प्रकार अशोक गहलोत मनमर्जी कर रहे थे उन्हें भी अब शांत किया जा रहा है। उन्हें भली-भांति अब औकात दिखाया जा रहा है कि सड़क से उठाकर आपको अगर राजस्थान के सदन का सबसे बड़ा नेता बना सकते हैं तो वापस आपको वही पहुंचा भी सकते हैं। किसान आंदोलन को धारदार बनाने के लिए राहुल गांधी का संसद ट्रैक्टर से जाना हो या फिर कांस्टीट्यूशन क्लब में विपक्षी दलों के साथ बैठक करके महंगाई के विरोध में साइकल मार्च हो। राहुल गांधी को यह सब घटना अब पप्पू से विपक्ष का मजबूत, बुलंद और जननेता बनने की ओर अग्रसर कर रहा है। दिल्ली में 9 वर्षीय दलित बच्ची के साथ जघन्यता के बाद प्रशासन द्वारा जबरन अंतिम संस्कार में पीड़ित परिवार के पक्ष में मजबूती से खड़ा रहना हो या हाथरस में राहुल की सक्रियता। यकीन मानिए कांग्रेस नेतृत्व के क्रियाकलाप का यह पुनर्जन्म है। अब सांगठनिक रूप से बड़े फेरबदल कांग्रेस को भाजपा के सामने एक मजबूत विपक्ष बनाएंगी। राहुल अब पार्टी के नेताओं या आसपास के चमचे के बजाय खुद पर भी ज्यादा निर्भर लग रहे हैं पिछले कुछ घटनाओं से यह स्पष्ट समझा जा सकता है।

आज यूथ कांग्रेस के द्वारा संसद घेराव का आयोजन किया गया है। यह आयोजन किसान बिल, पेगासस और महंगाई के खिलाफ है। बहुत ही तरीके से घेराव का नेतृत्व किया जा रहा है। यूथ कांग्रेस के दलित लड़कों की टोली संविधान बचाने की बात लेकर अग्रेसिव रूप से शामिल हो रही है। अन्य उत्साही कार्यकर्ता महंगाई और अन्य मुद्दे पर उत्साह से भरपूर हैं।

खैर पिछले 7 वर्षों के वनवास ने कांग्रेस को संघर्ष तो लगता है अब सिखा दिया। अब जरूरत है सांगठनिक फेरबदल की। वैसे लोग जो सत्ता में आते ही सक्रिय हो जाते हैं और सत्ता की जाती हैं, तो संगठन की राजनीति से संगठन को बढ़ने नहीं देते हैं, अब उन्हें भगा कर वैसे नये लोगों को लाने की जरूरत है जिनमें में मोदी-शाह, भाजपा-आरएसएस के षड्यंत्रों से लड़ने का कुवत है।

ऐसे लोगों को अब आगे बढ़ाकर कॉन्ग्रेस खुद को रिबोर्न कर सकती है। देखना शेष है कि राहुल गांधी अपने में बदलाव के साथ क्या अब सांगठनिक बदलाव भी करते हैं।

(लेखक बिहार के युथ एक्टिविस्ट हैं और समसामयिक मुद्दों पर प्रखरता के साथ अपना विचार रखते हैं।)

Mughal – Rajput War

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ManiMugdha Sharma 

 

I have been reading many articles put out by various media houses recently on the outcome of the Battle of Haldighati. Many authors have started describing Rana Pratap fleeing the battlefield as a “tactical retreat”. This is only a shade better than declaring that Pratap won the battle, but still shows historical ignorance and perhaps even wilful distortion.

Some articles have also claimed that “new research” has found that the battle was fought on June 18, 1576, and not June 21 as the stone tablets at Rakta-Talai stated. It is not new research. Colonial translators in the early part of the 20th century had first figured out the date of this battle after translating Persian primary sources, like Abu’l Fazl’s Akbarnama.

Beveridge’s translation of Akbarnama clearly states June 18, 1576, as the date of the battle. Contrast this with the original published version of James Tod’s Annals and Antiquities of Rajasthan that says the battle was fought in July, 1576. The 1829 first print and the later reprints continued with this July date. But when you pick up the 1920 print, you find the date, June 18, 1576. The impact of the Akbarnama was clear on this.

A Sanghi uncleji was, apart from mounting ad hominem attacks on me, insisting that I read Veer Vinod, which he claimed was the real deal. Veer Vinod, which was commissioned by the Mewar court in the 19th century, was the first “authentic” history of Mewar. Authored by Kaviraj Shyamaldas, it states without any ambiguity that the Mughals were victorious at Haldighati. However, the date here is May 31, 1576.

Kaviraj Shyamaldas played a very important role in questioning James Tod’s version of events. Tod wrote that it was Prince Salim (the future Emperor Jahangir) who was leading the Mughal army and had a close shave when Rana Pratap threw a javelin at him. Tod also gave the fantastic story of Pratap’s horse Chetak leaping across a 30-foot ridge and taking his master to safety. The Veer Vinod version, that way, is less super-heroic. No lofty claims are made and Chetak “drops down dead” without making any giant leaps. The Rana’s brother Shakti Singh gives him his own horse and the Mewar king escapes to safety.

Not many know this, but Shyamaldas played a very important role in modern history writing. He had forcefully argued that the Prithviraja Raso was not 12th-century account but a much later work, composed between the late 16th century and early 17th century. Today, most historians accept this historicity of the Raso.

But for his work, and his reliance on Indo-Persian historiography, Shyamaldas was viciously attacked by conservative (and communal) Hindu voices for not being patriotic enough by rejecting “swadeshi” history and accepting the version of “our adversary” (read: Muslims).

But despite his leaps of imagination, even James Tod doesn’t say that Pratap won the battle or that it was some “tactical retreat”. It was defeat all the way for the Mewar king and he even lost his capital to the Mughals.

Now, what constitutes defeat? Let’s see what the great military theorist Clausewitz had to say about this. “What do we mean by the defeat of the enemy? Simply the destruction of his forces, whether by death, injury, or any other means—either completely or enough to make him stop fighting.”

Clausewitz also says that a defeat will include the destruction of army and the seizure of the capital. The most powerful and experienced land force in the world, the United States Army, has a doctrinal definition of defeat: “…to render a force incapable of achieving its objectives. Defeat has a temporal component and is seldom permanent.”

Defeat is seldom permanent, as the US Army notes. So, this also explains why the Mewar king was able to fight back in later years and make some gains in the process as the Mughals started focusing elsewhere. However, these gains were never significant, and he never had it again what he originally had until that fateful day of June 18, 1576.

At the expense of Mewar rose Amber and Marwar, making significant gains due to their association with the Mughals. These are facts of history that don’t change due to the changing nature of politics and society. An Amber princess today is trying hard to project Haldighati as a Mewar victory because the politics of our time is such that it embarrasses her that her great ancestor actually led the victorious Mughal forces.

One can understand her compulsions as she is a member of the BJP. But it is unfortunate that even the Archaeological Survey of India has withdrawn some stone tablets at Rakt-Talai that declared that the Mewar forces were defeated.

Even though the ASI hasn’t revealed its cards yet, as in they haven’t told us what they are going to write in the new tablets, they have said that this will be based on “factual information”. If only “factual information” were to be relied on, then there is no reason for doubt: the new tablets will also say that Rana Pratap was defeated and will give the correct date of June 18. But the kind of declarations that have been coming from the right-wing groups, there is some reason to suspect that a fictitious argument will be put forward to assuage hurt Rajput pride.