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बिहार पर्यटन फोटोग्राफी प्रतियोगिता का विजेता बन अविनाश कुमार ने ज़िला का नाम बढ़ाया

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बिहार पर्यटन फोटोग्राफी प्रतियोगिता के चयनित विजेताओं को उप मुख्य सह पर्यटन मंत्री श्री तेजस्वी प्रसाद यादव एवं पर्यटन सचिव, श्री अभय कुमार सिंह द्वारा पुरस्कृत किया गया। इस मौक़े पर भोजपुर ज़िला निवासी अविनाश कुमार को भोजपुर ज़िला में प्रथम स्थान पाने पर पुरस्कृत किया गया। ज़िला के उद्वंतनगर प्रखंड के बेलाउर निवासी अविनाश कुमार कम संसाधनों के बावजूद पिछले चार साल से लगातार अलग जगह की तस्वीर खींच कर सोशल मीडिया के माध्यम से बिहार के पर्यटन क्षेत्र में अपना योगदान दे रहे हैं।

शुक्रवार 18 अगस्त 2023 को ये समारोह पटना के गांधी मैदान स्थित होटल लेमन ट्री में आयोजित हुआ। इस मौक़े पर श्री अभिजीत कुमार (जीएम, बीएसटीडीसी), श्री विनय कुमार राय (निदेशक पर्यटन) एवं अन्य सम्मानित अतिथिगण भी मौजूद थे।

इस मौक़े पर मीडिया से बात करते हुए अविनाश कुमार कहते हैं कि बिहार सरकार बिहार में पर्यटन क्षेत्र में परिवर्तन लाने की लगातार प्रयास कर रही है, उनका दावा है कि टूरिज़्म इंफ्रास्ट्रक्चर को विकसित कर नए कार्यक्रम, सुविधाओं और योजनाओं की शुरुआत की जा रही है। लेकिन उसे नई चीज़ स्थापित करने के साथ साथ पुराने धरोहर को भी बचाने की ज़रूरत हैं।

Is Sabrina Siddiqui a BJP agent, who asked a question to PM Modi in the USA?

SHUBHRA

Sabrina Siddiqui is being hailed by the left and Muslim media in India as a hero for asking a tough question to Prime Minister Narendra Modi during his press interaction at White House in Washington? Do you believe this narrative that Sabrina has dented the image of Mr. Modi? If your answer is in affirmative then I must say that you don’t understand politics in general and Indian politics in particular.

The Wire reported, “It was a rare moment in Modi’s tenure as prime minister when a journalist could pose a question to him, let alone on alleged human rights violations of minorities in India.” The report also says, “Twitter handles that are overtly pro-BJP and pro-Hindutva went after Siddiqui, labelling her as a ‘Pakistani Islamist’; some saw a conspiracy also in her employer allowing her to pose that question to Modi. “She only attacks India. Hate is in DNA of Pakistanis (sic),” said one such Twitter handle.”

The question Siddiqui asked was,  “India has long prided itself as the world’s largest democracy, but there are many human rights groups who say that your government has discriminated against religious minorities and sought to silence its critics. As you stand here in the East Room of the White House, where so many world leaders have made commitments to protecting democracy, what steps are you and your government willing to take to improve the rights of Muslims and other minorities in your country and to uphold free speech?”

Mr. Modi, in response, expressed “surprise” that people thought minorities during his regime were being discriminated against. “Democracy is our spirit. Democracy runs in our veins. We live democracy…our government has taken the basic principles of democracy…we have always proved that democracy can deliver. And when I say deliver, this is regardless of caste, creed, religion, gender. There is absolutely no space for discrimination.”

The liberal anti-Modi camp started a social media campaign in support of Siddiqui while Right wing pro-Modi people hurled abuses at Siddiqui on twitter. BJP leaders claimed that Modi gave a befitting reply to a Pakistani while leftist claimed that her question has exposed Modi government’s real face in front of the world.

Now sit calmly. Sit down and look at the whole narrative build up. 

Has Siddiqui asked something people did not know?

No. In fact USA itself denied Visa to Modi before he became PM of India. The very claim that her question has exposed him is baseless. 

There is a claim that the question and its response has dented Modi’s image and could affect his election in 2024.

Are you serious? Which image are you talking about? Modi and BJP have never projected themselves as secular. In fact since 2014, secularism has become a taboo word in India. Those who want to talk of secularism use vague terms like Ganga Jamuni Tehzeeb, syncretic culture or Hindustaniyat but the word  secular is a big NO.

So what purpose does this question by Siddiqui serve?

Those who have watched BJP supporters closely should understand that they have been asking why Modi is appeasing Muslims in the name of Pasmanda. Madhu Kishwar and other influential social media handles have been criticising Modi for being soft on Muslims or sometimes as an appeaser. This question has rattled all those internal critics of Modi. 

https://twitter.com/iHardikB/status/1672475115794350080

Now, the whole BJP IT cell and Hindu Right wing social media handle have come out in support of Modi thus reiterating that he is not soft on Muslim. Siddiqui’s question is not aimed at Indians to prove that Modi is secular. The question and its reply have assured the BJP voters that their fears are uncalled for and his actions against Muslims are visible to the whole world. The whole episode has benefited Modi. Without actually perpetuating any violence against Muslims he has successfully reinforced his image as a hardline Hindutva leader. 

Even a layman in India can tell that by proving Mr. Modi, a non secular partisan Hindutva leader Siddiqui has done him more favours than the whole IT cell couldn’t have. 

एक फ़िल्म के हिट होने का मापदंड पैसा कैसे हो सकता है ?

 

Saquib Salim

राजा हिंदुस्तानी’ भाई सुपरहिट हुई है तीन महीने से सिनेमा में लगी हुई है इतने दिन तो DDLJ भी नहीं चली थी”

आज से बीस पच्चीस साल पहले तक भी एक फ़िल्म के हिट होने का मापदंड यही था कि वह कितने दिन सिनेमा हॉल में लगी रही और कितने हाउसफुल हुए। सिनेमा को दर्शकों की कसौटी से परखा जाता था कि कितने लोग उसको देखना चाहते हैं या देख कर दोबारा आते हैं। आप मुग़ले आज़म की बात कीजिये या शोले की फ़िल्म की सफलता ये थी कि वह कितने हफ़्ते हाउसफुल रही।

लेकिन आज वक़्त बदल चुका है। दुनिया समझदार हो चली है तो फ़िल्म निर्माता भी पीछे कैसे रहते। अब फ़िल्म के हाउसफुल होने की ख़बर नहीं आती। न कोई यह बताता है कि कितने दिन फ़िल्म सिनेमा में थी अब सफलता पैसे से नापी जाती है। पहले दिन इतने करोड़ कमाए, दूसरे दिन इतने और इतने दिन में सौ करोड़ कमा लिए बस यही ख़बर है और यही सफलता का मापदंड। फ़िल्म दर्शक को कैसी लगी इससे किसी को क्या फ़र्क़ पड़ता है। पैसा कमा लिया मतलब सफल हो गए। 50 करोड़ में नेटफ़्लिक्स को राइट्स बेचे, किसी का विज्ञापन किया, किसी TV को बेचा और आ गया आंकड़ा के 100 करोड़ हो गए।

बेहूदगी तो यह है कि कुछ समाचार वाले बताते हैं कि देखो फलां फ़िल्म रिलीज़ से पहले ही हिट हो गयी। अब इस पर हंसा जाये कि मातम किया जाये कि हम एक ऐसे दौर में जी रहें हैं जहाँ फ़िल्म को कोई न भी देखे तो उसे हिट घोषित किया जा सकता है।

लेकिन यह कोई केवल फ़िल्मों की विडंबना नहीं है यह हमारे समाज की सच्चाई है। हम इस समाज में साँस ले रहें हैं जहाँ पैसा अगर ख़ुदा नहीं भी है तो ख़ुदा से कम भी नहीं। जिसने पैसा कमा लिया वह सफल है। पहले की तरह अब खिलाड़ी के रिकॉर्ड नहीं छपते यह छपता है कि उसने कितने करोड़ का अनुबंध किया, कितने लाख की गाड़ी ख़रीदी और उसकी शादी का ख़र्च कितना ज़्यादा था। आप कमाते कितना हैं इससे सी ही समाज आपको भी आंकेगा। ये समाज अपने पतन की तरफ़ तेज़ी से भाग रहा है और हम उस पतन की तरफ एक दूसरे से तेज़ भाग रहें हैं।

कहाँ के नाम ओ नसब इल्म क्या फ़ज़ीलत क्या
जहान-ए-रिज़्क़ में तौक़ीर-ए-अहल-ए-हाजत क्या

भारत जोड़ो यात्रा में राहुल गांधी ने उर्दू शायरों, साहित्यकारों से दूरी क्यूँ बना रखी है ? – मंज़र भोपाली

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मोहब्बत ओर नफ़रत दोनों शब्द ऐसे हैं जिनका चोली दामन का साथ है नफ़रत के बाज़ार में मोहोब्बत की दुकान राहुल गांधी ने खोलने की भरपूर कोशिश की है मगर जिस ज़बान के ये शब्द हैं उनके लिखने वालों को, अदीबों को, शायरों को सहाफियों को पूरी तरह से इस दुकान से दूर रखा गया है न इस में जावेद अख्तर नज़र आए न गुलज़ार साहब न वसीम बरेलवी और न मुन्नवर राणा

सैकड़ों किलोमीटर का सफर किया, इतने शहरों में गए उर्दू के बड़े-बड़े सेंटर्स में गए, हैदराबाद, इंदौर न जाने कहां-कहां, सब से मुलाकात की मगर उर्दू शायरों साहित्यकारों से दूरी रखी, न मिले, क्या वजह है?

 

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मौलाना आज़ाद की याद में खुदा बख्श प्रदर्शनी का उद्घटन किया।

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आज 11 नवंबर 2012 को राष्ट्रीय शिक्षा दिवस, मौलाना आजाद की याद में क़ौम ने अपने महान नेता और महान लेखक को बड़ी धूमधाम से याद किया। मौलाना आजाद ने स्वतंत्र भारत के अगले साठ सत्तर वर्षों के लिए राष्ट्र शिक्षा के लिए बड़ी मज़बूत बुनियाद प्रदान की थी। अगर चि उनहें काम करने के लिए दस ग्यारह साल ही मिले, लेकिन इस थोड़े अरसे में बड़े बड़े काम कर गए। विज्ञान संस्थानों के विकास के लिए, तकनीकी शिक्षा के लिए, यहां तक ​​कि युनिवर्सिटी ग्रान्ट कमीशन की स्थापना भी कर गए, जो सभी विश्वविद्यालयों के विकास के लिए एक महान आधार है।

शिक्षा संपूर्ण मनुष्य को बनाने की एक प्रक्रिया है और इसके लिए यह आवश्यक है कि धर्मनिरपेक्ष भारत में शिक्षा का मूल मानचित्र इस तरह बने कि हिंदुओं, मुसलमानों, सिखों, ईसाइयों में भेद भाव बढ़ने का कोई मौका न मिले, बल्कि शिक्षा ऐसा होना चाहिए कि हर भारतीय को आगे बढ़ने का मौका मिले, चाहे उसका धर्म कुछ भी हो, उसकी जाति जो भी हो। इसी वजह से मौलाना आज़ाद ने आज़ादी से बीस-तीस साल पहले बुनियादी काम किया था कि जाति, पात, धर्म के भेद मिटा दिए जाएं। अपने वतन के विकास के लिए अपने सारी कोशिशों को समर्पित कर दें। इसी विषय पर मौलाना ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक तारजुमपनुल कुरान लिखी, जिसमें उन्होंने धर्मों की एकता की थीसिस प्रस्तुत की।

इसका हिन्दी अनुवाद खुदा बख़्श पुस्तकालय प्रकाशित भी करेगा। इस महत्वपूर्ण कार्य की ओर खुदा बख्श पुस्तकालय के निदेशक डॉ शाइस्ता बीदर ने मुख्यमंत्री का ध्यान आकर्षित किया कि धर्मों की एकता और इस एकता की सच्चाई के लिए एक केंद्र की स्थापना खुदा बख़्श पुस्तकालय में की जानी चाहिए। बल्कि इस एक सच्चाई और एकता के लिए विश्वविद्यालयों में एक कोर्स शुरू किया जाना चाहिए। डॉ. शाइस्ता ने मुख्यमंत्री के संज्ञान में यह भी लाया कि मौलाना आजाद के संबंध बिहार से इतने पुराने हैं कि वह बचपन में खुदा बख्श पुस्तकालय में कलकत्ता से पटना तक आते थे और यहां की धरोहर का लाभ उठाकर अपने ज्ञान को अद्यतन करते थे। .. खुदा बख्श ने मौलाना आजाद के बिहार के साथ संबंधों पर एक किताब भी प्रकाशित की है।

मौलाना की याद में 11 नवंबर की इस ऐतिहासिक सभा की शुरुआत मौलाना आजाद की ऐतिहासिक तस्वीरों से हुई. इनमें बिस्मल अजीमाबादी के पुत्र शाह महदी हसन का चित्र था, जो वही बिस्मल अजीम अबादी थे, जो अपनी प्रसिद्ध क्रांतिकारी कविता को पढ़ते हुए फांसी पर लटका दिया करते थेः सर फरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में है। पटना शहर के इस क्रांतिकारी कवि को गर्व है कि मौलाना आजाद ने बचपन में अपनी ग़ज़ल पर बीस-तीस कविताओं की ग़ज़ल लिखी थी। इन चित्रों में मौलाना आज़ाद की लॉर्ड पेथिक लॉरेंस, लॉर्ड माउंटबेटन और अन्य ब्रिटिश शासकों के साथ बातचीत के विभिन्न दृश्य दिखाई देते हैं, जब वह स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे थे, यह प्रदर्शनी खुदा बख्श पुस्तकालय की तरफ से सजाई गई थी जिसमें मौलाना आज़ाद की अपनी हाथ की लिखी हुई तहरीरें भी थीं।

मौलाना आजाद के अपने हस्तलिखित पत्र, मौलाना आजाद के बचपन और बचपन की तस्वीरें आदि। इस खुदा बख्श प्रदर्शनी में मौलाना आजाद पर लिखी गई पुस्तकों का एक बड़ा खंड भी था। खास बात यह थी कि खुदा बख्श पुस्तकालय ने मौलाना आजाद पर बत्तीस की संख्या में प्रकाशित पुस्तकों की प्रदर्शनी लगाई, ये अंग्रेजी, उर्दू, हिंदी सभी भाषाओं में हैं। जिसे पढ़ कर मनुष्य में छिपा हुआ जानवर धीरे-धीरे इंसान बनने की कोशिश करता है। ये पुस्तकें धार्मिक भ्रम को दूर करने के लिए सभी धर्मों का परिचय देने और दिलों में सभी धर्मों के सच्चे ज्ञान को स्थापित करने में एक महान भूमिका निभाती हैं जिसमें जैन, बौद्ध, सिख ईसाई, धर्म, इस्लाम के परिचय शामिल हैं। और यह वह साहित्य हैं जो उन्हें एक दूसरे के करीब लाते हैं, इसलिए यह सारा साहित्य एक ही जगह मिल जाता है। पढ़ने और खोजने वाले खोजते रहते हैं कि ‘‘आदमी को भी मयस्सर नहीं इन्सां होना‘‘ (गालिब)। और फिर पढ़ते-पढ़ते उनमें मानवता जाग उठती है।

खुदा बख्श प्रदर्शनी के बाद मौलाना आजाद की याद एक और तरह से जारी रही जब मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों ने मौलाना की उपलब्धियों को याद करते हुए अपने अपने भाषण दिए।
राष्ट्रीय शिक्षा दिवस समारोह को कोविड के कारण कई वर्षों के लिए टलता रहा, लोगों ने आज मौलाना आजाद के उच्च स्तर के स्मरणोत्सव पर प्रसन्नता व्यक्त की।

इस अवसर पर खुदा बख्श पुस्तकालय द्वारा तैयार की गई मौलाना आजाद बिबलियोग्राफी भी मुख्यमंत्री को भेंट की गई और इन्टरफैथ अन्डर स्टेन्डिंग के लिए एक केंद्र स्थापित करने के लिए पुस्तकालय द्वारा एक मेमोरन्डम भी प्रस्तुत किया। यह राष्ट्रीय शिक्षा दिवस कार्यक्रम श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में धूमधाम से आयोजित किए गया जो दर्शकों और श्रोताओं को युगों-युगों तक याद रहेंगे।

अब समय आ चुका है की मदरसों में अंग्रेज़ी भाषा में दी जाए इस्लामी तालीम

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आज से सौ डेढ़ सौ साल पहले हिन्दी कौमन ज़ुबान नही थी। अच्छी सरकारी नौकरी के लिए अंग्रेज़ी ज़ुबान का होना ज़रुरी होता था, पर अंग्रेज़ी पढ़ाए कौन ? 1880 के बाद तो आम लोगों के लिए स्कुल खुलना ही शुरु हुआ था। इस लिए लोग छोटी मोटी नौकरी, हिकमत, मुंशीगिरी, और शेर ओ शायरी करने के लिए उर्दु फ़ारसी ज़ुबान ही पढ़ते थे; यही कौमन ज़ुबान थी। हिन्दी की जगह लोकल ज़ुबान युज़ की जाती थी, जैसे बिहार में “कैथी” ज़ुबान (लिपि) बहुत कौमन थी, पर ये लोकल ज़ुबान नौकरी नही दे सकती थी। 1917 में चम्पारण सत्याग्रह के नायक रहे राजकुमार शुक्ल को हिन्दी अच्छे से नही आती थी, वो कैथी ज़ुबान (लिपि) मे लिखते थे। उनकी पुरी डायरी कैथी ज़ुबान मे ही है। वहीं 1857 के नायक बाबु कुंवर सिंह भी जो ख़त अपने क्रांतिकारी साथियों को लिखते थे; वो कैथी ज़ुबान (लिपि) मे ही होती थी।

अब आते हैं असली मुद्दे पर की लोग अब लोग मदरसा पढ़ने क्युं नही जाते हैं ?

पहले लोगों के पास पढ़ने का साधन नही होता था और मदरसे में जुमेराती (कुछ पैसा और आनाज) ले कर मौलवी साहेब उर्दु फ़ारसी ज़ुबान पढ़ा देते थे। उस समय उर्दु फ़ारसी वो ज़ुबान थी, जो छोटी मोटी नौकरी दे दिया करती थी; जैसे आज हिन्दी पढ़ कर लोग नौकरी हासिल कर लेते हैं।

उस समय उर्दु फ़ारसी पढ़ना लोगों की ज़रुरत थी इस लिए वो वहां जाते थे, अगर उस समय हिन्दी या कोई ज़ुबान पढ़ना उनकी ज़रुरत होती तो वोह लोग वो पढ़ते।

और पहले विदेश जाने का चलन बहुत ही कम था, लोग अपने ही इलाक़े में रहलकर नौकरी करना चाहते थे इस लिए उर्दु फ़ारसी के मुक़ाबले अंग्रेज़ी उनके लिए बहुत बड़ी ज़रुरत नही थी।

ग्लोब्लाईज़ेशन के इस दौर में आज अंग्रेज़ी एक बहुत बड़ी ज़रुरत है, इस लिए लिए लोग अपने बच्चे को स्कुल भेजते हैं। कौन से स्कुल भेजते हैं ? वही सैंट माईकल, सैंट जौसेफ़, सैंट ज़ेवियर, सैंट सेवरेंस वग़ैरा में भेजते हैं। ये भी तो ईसाईयों का मदरसा ही है। यहां भी इसाई नन पढ़ाती हैं, जिस तरह से मदरसे में मौलवी साहेब दर्स देते हैं।

समय समय की बात है, कब किस समय किसे किस चीज़ की ज़रुरत पड़ जाए। आज अगर उर्दु, फ़ारसी, अरबी वग़ैरा वो ज़ुबान हो जाएं जो जो सबसे बेहतर नौकरी दे सकें, लोग फिर से अपने बच्चों को वहां भेजना शुरु कर देंगे। जो अब हो नही सकता है इस लिए अब मदरसे की तालीम को उर्दू और अरबी की जगह हिंदी और अंग्रेज़ी में दी जाए, फिर देखिए किस तरह की क्रांति भारत में आती है। रोज़गार को लोगों ने असली मसला बना लिया है।

और यही वजह है के 19वीं सदी के आख़िर और 20वीं सदी के शुरुआती दौर में बिहार के देहाती इलाक़ो के हर महतो जी के दालान पर आपको कोई मौलवी बच्चों को उर्दु, फ़ारसी आदी पढ़ाता मिल जाता था। क्यूँकि उस वक्त वो ज़ुबान रोज़गार देता था। आज अंग्रेज़ी रोज़गार देता है इसलिए लोग ईसाईयों के मदरसे यानी मिशनरियों के स्कूल में बच्चों को भेजते हैं।

बाक़ी मेरा ज़ाती तौर पर मानना है की मदरसा में इस्लाम की तालीम दी जाती है, और जिन्हें असरी और दुनियावी तालीम चाहिए वो स्कूल जाए। मदरसे को सरकारी स्कूल बनाना बंद होना चाहिए।

 

नीतीश जी ,लालू जी की जगह रज़ी साहब से मिल कर अभियान पर निकलते तो अच्छा होता

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प्रेमकुमार मणि

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विपक्षी एकता के प्रयास में दिल्ली प्रवास पर हैं और इस दिशा में आगे बढ़ते हुए वह विभिन्न विपक्षी दलों के वरिष्ठ नेताओं से मिल -जुल रहे हैं. यह स्वागत योग्य कदम कहा जाएगा. विपक्षी दलों की एकता और सक्षम प्रतिपक्ष के गठन का मैं व्यक्ति स्तर पर भी हार्दिक स्वागत करना चाहूंगा. अतएव इस दिशा में किए गए प्रयासों का भी सशर्त समर्थन करता हूँ .

एक प्रश्न मेरे मन में है . वह यह कि किसी एकता के पूर्व हमें बिखराव के कारणों की खोज करनी चाहिए या नहीं ? व्याधि के इलाज के पूर्व डाक्टर एक जांच प्रक्रिया से गुजरने की सलाह देता है. बीमारी के कारण तत्व क्या हैं इसका पता चल जाने पर चिकित्सा आसान हो जाती है. राजनीतिक मामलों में भी कारण और समाधान के बीच सम्बन्ध स्थापित करना जरूरी होता है. इसके बिना हुए प्रयास का बहुत अर्थ नहीं होता. इस तरह की मुलाकातों से ही प्रतिपक्ष गठित हो जाता तब कब के ऐसे प्रयास हो चुके होते. इसलिए श्री नीतीश कुमार के इस प्रयास में गंभीरता की कमी दिखती है. उद्देश्य तो निःसंदेह सही है ,लेकिन किए जा रहे प्रयास उसके अनुकूल नहीं हैं.

प्रतिपक्ष अथवा विपक्ष के बिखराव के कारण क्या हैं ? मैं समझता हूँ कि सर्वप्रथम इसी मुद्दे पर विचार होना चाहिए था. मुझे जो कारण दीखते हैं उसके मुख्य बिंदु निम्नोक्त हैं-

1 – व्यक्तित्वों का टकराव जिनके मूल में अहम अथवा ईगो केंद्रीय तत्व है.

2 – कालातीत हुई वैचारिकता. प्रायः सभी दल ऐसी वैचारिक- सरणी के तहत काम कर रहे हैं जो पुरानी पड़ गई है. नई सदी के चुनौतियों का उसके पास वाजिब जवाब नहीं है.

3 – नैतिकता का अभाव.

क्या उपरोक्त बिंदुओं के समाधान ढूंढने के पूर्व किसी विपक्षी एकता की संभावना हो सकती है? मुझे इसमें संदेह है. यात्रा के आरम्भ में नीतीश कुमार का उत्साह जोश से भरा था. लेकिन क्या इसमें होश भी था? यात्रा पूर्व उन्होंने लालू प्रसाद से मुलाकात की अथवा उनका ‘ आशीर्वाद ‘ लिया. लालू प्रसाद उनके पुराने मित्र हैं और उनके ही शब्दों में ‘ भाई समान मित्र ‘. लेकिन उनसे मिलने का राजनीतिक निहितार्थ क्या है ? स्वयं नीतीश कुमार 1994 में जब जनता दल से अलग हुए थे, तब उनका आरोप था कि लालू प्रसाद की कार्यशैली ठीक नहीं है और पार्टी के भीतर उनका व्यवहार तानाशाहीपूर्ण है. इसी बिंदु पर संघर्ष करते हुए वह पार्टी से अलग हुए और कुछ महीने बाद भारतीय जनता पार्टी के साथ राजनीतिक समझौता किया. इस समय ही लालू प्रसाद पर चारा घोटाले का मामला समता -भाजपा के लोगों की तरफ से कोर्ट में दर्ज हुआ जिसके आधार पर कालांतर में उन्हें सजा हुई . लालू प्रसाद की पार्टी को सत्ता से अपदस्थ करने में वह अंततः कामयाब हुए और 2015 के पूर्व एकबार फिर उसी लालू प्रसाद से चुनावी समझौता करने केलिए मजबूर भी हुए. इसबार भाजपा को हराया. दो साल बाद फिर भाजपा से हाथ मिला लिया और पांच साल साथ चले. पिछले महीने भाजपा से अलग होकर फिर लालू प्रसाद के साथ हुए. अब वह भाजपा को परास्त करने केलिए राष्ट्रीय अभियान पर निकले हैं.

इस आवाजाही में निश्चित तौर पर उनकी जन – विश्वसनीयता को गहरा धक्का लगा. आयाराम- गयाराम का चरित्र किसी भी समाज में आदर के साथ नहीं देखा जाता. ऐसे में उन्हें यदि यह लगता है कि जनता बेवकूफ है और कुछ भी नहीं समझती तब वह गलती पर हैं. पब्लिक सब कुछ जानती -समझती है. वह मौके पर जवाब देती है. हाँ, यह भी सही है कि वह गलतियां मुआफ करना भी जानती है. लेकिन उसे सचमुच यह महसूस होना चाहिए कि नेता मुआफ करने लायक है. इसीलिए मैं नीतीश कुमार से आग्रह करना चाहूंगा कि वह मुआफ करने लायक बनें.

क्या उन्हें यह महसूस होता है कि लालू प्रसाद के दर्शन करके आरम्भ होने वाली इस यात्रा के कुछ नैतिक सन्दर्भ हो सकते हैं? पिछले तीन दशक से वह लालू के खिलाफ राजनैतिक लड़ाई लड़ रहे हैं. उनकी पार्टी से जुड़े लोगों ने ही उन पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए और उसी आधार पर वह सजायाफ्ता हैं. बीमारी के आधार पर वह जेल से बाहर हैं. अब जिस यात्रा का आरम्भ एक अपराधी की भक्ति से होता हो उसकी परिणति क्या हो सकती है ? यदि नीतीश जी को यह भान हो गया है कि लालू प्रसाद निर्दोष हैं और उनके लोगों द्वारा उनपर किया गया मुकदमा गलत था तो सब कुछ के पहले उन्हें इसकी सार्वजनिक घोषणा करनी चाहिए. या फिर यह भी वह कह सकते हैं कि बदली हुई परिस्थितियों में भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं रह गया है. लेकिन इस तरह एक सजायाफ्ता से मिल कर निकले उनके अभियान से कोई बड़ा सन्देश जाएगा इस पर संदेह है. लालू प्रसाद की जगह यदि पटना में ही बीमार -हाल बुजुर्ग गांधीवादी रज़ी अहमद साहब से मिल कर वह अभियान पर निकलते तो देश भर में एक अच्छा सन्देश जाता.

नैतिकता का प्रश्न उनके सांसदों -विधायकों पर भी है. पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनाव उन्होंने भाजपा के साथ लड़ा है. शुचिता का तकाजा था कि उनके सभी सांसद -विधायक इस्तीफा देकर एक आदर्श उपस्थित करते कि पूर्व में हमने चाहे जो गलतियां की हैं अब जब एक बड़े अभियान पर निकले हैं तब हम नई नैतिकता के साथ हैं. इसका व्यापक असर होता. 1974 में बिहार आंदोलन के समय उसमें साथ होने वाले विधायकों ने अपनी सदस्यता से त्यागपत्र दिया था. छात्रों ने साल भर की पढाई छोड़ी थी. असहयोग आंदोलन के समय गांधी ने नौकरी पेशा लोगों से नौकरी और छात्रों से सरकारी शिक्षण संस्थान छोड़ने का आग्रह किया था. बहुत लोगों ने ऐसा नहीं किया था . लेकिन जितने लोगों ने किया उतने की ही नैतिक आभा से आंदोलन को बल मिला और वह परवान चढ़ गया. त्याग हमेशा हमें शक्ति देता है. किसी भी इबादत के पूर्व उपवास का यही निहितार्थ है. भोजन त्याग कर ब्रती एक ताकत हासिल करता है और उस ताकत से की गई उसकी अराधना का एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव होता है.

मैं आग्रह करूँगा कि नीतीश कुमार अपनी इस यात्रा को यूँ ही मिलने -जुलने की यात्रा भर रहने दें . अपनी वास्तविक राजनीतिक यात्रा की शुरुआत वह किसी सजायाफ्ता अपराधी से नहीं किसी संत सामाजिक कार्यकर्त्ता से मिल कर करें और यात्रा के पूर्व अपने सांसदों -विधायकों का इस्तीफा करवा कर अपने भाजपा- संग होने का प्रायश्चित भी सुनिश्चित करें. बिहार सरकार का होम तो करना ही पड़ेगा. बेहतर होगा बिहार में मध्यावधि चुनाव हो और इस चुनाव से ही राष्ट्रीय राजनीति का आरम्भ भी. लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश को दिशा देने वाला राजनेता स्वयं ही उलझनों का शिकार है. विचारों की केन्द्रीयता का अभाव उनके पूरे व्यक्तित्व पर फैला हुआ है. आज भी उनके वक्तव्यों में भाजपा के दिवंगत नेता अटलबिहारी वाजपेयी केलिए जो श्रद्धा और अनुराग दीखता है वह चिंतनीय है. वह बिखरे विपक्ष को सुगठित करने के पूर्व अपने बिखरे व्यक्तित्व को सुगठित करें. मेरी बातें कड़वी हो सकती हैं ,लेकिन इसके निहितार्थ भले हैं.

आज़ाद हिंद फ़ौज के समर्थन की क़ीमत चुकाता भारतीय उपमहाद्वीप

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रोहिंग्या अराकान के मूलनिवासी हैं, अराकान वही इलाक़ा है जहां से नेताजी सुभाष चंद्रा बोस अपनी आज़ाद हिंद फ़ौज ऑपरेट किया करते थे। वहाँ उनकी मदद इन रोहिंग्या लोगों ने भरपूर की। 1945 के बाद अंग्रेज़ों ने चुन चुन कर बदला लिया। उन्होंने भारत और पाकिस्तान का बँटवारा किया। सारे राज्य का या तो भारत या फिर पाकिस्तान में विलय हुआ। सिर्फ़ दो स्टेट दोनो में आधे आधे बटे। एक बंगाल और दूसरा पंजाब। अगर मज़हब को छोड़ दें तो इनकी हर चीज़ एक है, रहन सहन, बोली, भाषा, खाना पीना, सब का सब। फिर इन्हें अंग्रेज़ों ने क्यूँ बाँटा ?? उसकी वजह है आज़ाद हिंद फ़ौज और उसके कारनामे। आज़ाद हिंद फ़ौज की लीडरशिप जहां बंगालीयों के पास थी, वहीं पूरी फ़ौज पंजाब की थी। और इनकी कर्म भूमि अराकान थी। बंगाल और पंजाब वालों ने जो झेला वो तो है ही… पर जो अराकान वालों के साथ हुआ वो एक अलग ही सानहा है।

भारत में जो इलाक़ा आज पिछड़ा हुआ है, उसकी सिर्फ़ एक वजह है क्यूँकि यहाँ के लोगों अंग्रेज़ों की मुख़ालिफ़त की और फिर अंग्रेज़ों ने उनसे हर कुछ छीन लिया। बंगाल, बिहार, पूर्वांचल, अवध से लेकर बुंदेलखंड तक एक लम्बी फ़हरिस्त है। तमिल क़ुली ने आज़ाद हिंद फ़ौज का बहुत साथ दिया था, अंग्रेज़ों ने भारत के सीलोन को श्रीलंका के रूप में अलग कर दिया और तमिल मरवा डाले। हम आज तक सेकंड वर्ल्ड वॉर में अंग्रेज़ के विरोध की क़ीमत चुका रहे हैं। फ़िलहाल इसकी सबसे बड़ी क़ीमत अराकान के रोहिंग्या चुका रहे हैं। अरकान एक मुस्लिम बहूल इलाक़ा था, 1947 में वो पाकिस्तान के साथ जा सकता था, पर मुस्लिम लीग और अंग्रेज़ ने नही होने दिया, क्यूँकि ये आज़ाद हिंद फ़ौज के लोग थे।

कभी सोचा है कि 15 अगस्त को भी भारत क्यूँ आज़ाद हुआ ??

असल में 15 अगस्त पूरे तौर पर भारत के आख़िरी वाइसराय लॉर्ड मॉउन्टबेटन के स्वार्थ के लिए चुना गया था। ये तारीख़ उसके जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण थी क्योंकि वही उस सेना का अध्यक्ष था जिसके सामने जापान ने दो परमाणु बम गिराए जाने के बाद आत्मसमर्पण किया था। मॉउन्टबेटन की मंशा थी कि वो ये ज़ाहिर कर सके कि असली मालिक कौन है।

मॉउन्टबेटन ख़ुद एक साक्षात्कार में कहते हैं कि – “ये तारीख़ अचानक से मेरे दिमाग़ में आयी। ये एक सवाल का जवाब देते हुए मैंने सोचा था। मैं ये दिखाने पर आमादा था कि सबको ये समझ आये कि इस पूरे प्रकरण (आज़ादी मिलना) का असली सरदार/मुखिया कौन है। फिर मैंने अगस्त सोचा, 15 अगस्त। क्यों ? क्योंकि ये जापान के आत्मसमर्पण की दूसरी सालगिरह थी।”

अलग अलग जगह मॉउन्टबेटन ने कई बार ये दोहराया है कि जापान का आत्मसमर्पण और भारत की आज़ादी उसके जीवन के सबसे महत्वपूर्ण क्षण थे। वैसे भारत की आज़ादी को भारत के बँटवारे में तौर पर देखिए, लाखों लोगों की मौत आपस में लड़ कर हुई।

वैसे क़ायदे से या तो 26 जनवरी चुना जाता जिस दिन पिछले 17 साल से कांग्रेसी तिरंगा फहराते थे या 30 दिसंबर जब सुभाष चंद्र बोस ने अंडमान पर झंडा फहराया था या 14 अप्रैल जब शौकत मालिक ने भारतीय तिरंगा अंग्रेज़ फ़ौज को हरा कर मोइरांग पर फहराया था। लेकिन 15 अगस्त क्यों ? ये आज़ाद हिंद फ़ौज की हार को सेलिब्रेट कर रहे थे।

एक चीज़ और समझने की है जब भारत आज़ाद हुआ तो इंग्लैंड के झंडे को न नीचे किया गया था, न सार्वजनिक रूप से उतार कर उसकी जगह दूसरा झंडा चढ़ाया गया था। लॉर्ड मॉउन्टबेटन के अनुसार ये बात वो पहले ही कर चुके थे कि यूनियन जैक को नीचे नहीं झुकने दिया जाएगा। जिससे भारतीयों को भी कोई एतराज़ नहीं था।

अंतिम समय में जिस स्तम्भ पर यूनियन जैक था वो ख़ाली कर दिया गया था और 15 अगस्त की मध्यरात्रि उस ख़ाली स्तम्भ पर ही भारतीय तिरंगा फहरा। साथ ही वाइसराय के झंडे की जगह नीले रंग का गवर्नर जनरल का झंडा फहराया गया।

शायद बहुत से लोग ये न जानते हों कि भारतीय झंडा केवल यूनियन जैक नहीं था वो तो पूरे ब्रिटिश साम्राज्य का झंडा था। वाइस-राय का झंडा मुख्य समारोह में फहराया जाता था जिसको 15 अगस्त 1947 से 26 जनवरी 1950 तक गवर्नर जनरल के झंडे से बदल दिया गया। 1950 के बाद भारत पूर्ण गणतंत्र बना और गवर्नर जनरल का झंडा भी समाप्त हो गया।

याद रखिये जब भारत आज़ाद हो रहा था तो अंग्रेज़ों के लिए भारतीयों में नफ़रत नहीं थी। मॉउन्टबेटन याद करते हैं कि आज़ादी मिलने के बाद कैसे जनता ने उनकी जय जयकार के नारे लगाए थे। उनके अनुसार लोग “ज़िंदाबाद की जय, मॉउन्टबेटन की जय , लेडी मॉउन्टबेटन की जय और पामेला मॉउन्टबेटन की जय” जैसे नारे लगा रहे थे। और उस समय कई आज़ाद हिंद फ़ौज के सिपाही क़ैद में ही थे।

मोकामा सीट का उपचुनाव बिहार की सियासत का रुख़ तय करेगा…!

Md Umar Ashraf 

एक जैसे मामले में मोकामा विधायक अनंत सिंह को हफ़्ते भर में लोवर कोर्ट से दो बार सज़ा होना और फिर उनसे विधायक का पद छीन जाना, शुरू में सिर्फ़ एक आम घटना लग रही थी। पर पिछले चार पाँच दिन में जो घटना हुई है, उसने बहुत कुछ साफ़ कर दिया है।

मोकामा सीट पर अनंत सिंह की दावेदारी से अगर किसी को सबसे अधिक ख़तरा है तो वो हैं, बिहार के मुख्यमंत्री के दोनो हाथ यानी ललन सिंह को। पिछले कुछ साल से नितीश कुमारी से बाग़ी हुए अनंत सिंह लगातार ललन सिंह के लिए चुनौती बनते जा रहे हैं। इसका असर 2019 का लोकसभा चुनाव में मुंगेर सीट को सबने देखा।

ये सीट वैसी ही थी जैसे बेगुसराय से RJD किसी भी हाल में कन्हैया कुमार को जीतता नही देखना चाहती थी, वैसे ही मुंगेर को किसी भी हाल में अनंत सिंह के पाले में ललन सिंह और नितीश कुमार नही जाने देना चाहते थे। इसके लिए जो बन सका उन्होंने किया। अपने दम पर अनंत सिंह ने पहले तो अपनी पत्नी के लिए कांग्रेस का टिकट हासिल किया। और जिस मज़बूती से लड़े, वो अपने में यूनीक था।

फिर 2020 में उन्होंने उस RJD से ख़ुद के लिए मोकामा से टिकट हासिल किया, जिसने 2015 में उन्ही के विरोध पर पूरे बिहार में चुनाव लड़ा था, पूतूस यादव हत्याकांड ही 2015 का सबसे महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दा था। और जेल से ही अनंत सिंह ने 2020 में चुनाव लड़ा और बड़ी मार्जिन से चुनाव जीता भी। ख़ुद तेजस्वी यादव ने बिहार चुनाव में प्रचार की शुरुआत मोकमा के मेकरा से अनंत सिंह के पक्ष में वोट माँग कर की थी। ये बिहार में भूमिहार और यादव को जोड़ने की पहली बड़ी शुरुआत थी। इसका असर दिखा भी…

अब चूँकि सरकार बदल चुकी है, नितीश कुमार और ललन सिंह की दोस्ती अब तेजस्वी यादव से वापस हो चुकी है, वैसे अब अनंत सिंह का क्या होगा ?? अनंत सिंह अब विधायक नही रहे, मोकामा सीट पर जल्द ही वोट पड़ेगा, यानी उपचुनाव होगा। वैसे में RJD क्या मोकामा सीट पर अपनी दावेदारी बरक़रार रखेगी ? और अनंत सिंह के किसी पसंदीदा उम्मीदवार को टिकट देगी।

या फिर नितीश कुमार और ललन सिंह के दबाव में आ कर अनंत सिंह से छुटकारा चाहेगी.? वैसे अगर तेजस्वी यादव अनंत सिंह के समर्थन में जाते हैं तो ललन सिंह की सियासत कमज़ोर पड़ेगी। लेकिन क्या नितीश कुमार ये कभी होने देंगे, ललन सिंह उनकी कमज़ोरी और मजबूरी दोनो हैं ?? अगर तेजस्वी यादव अनंत सिंह से दूरी बना लेते हैं तो फिर अनंत सिंह के पास क्या ऑप्शन रह जाएगा ??

मेरे अनुसार कुछ चीज़ इस तरह की हो सकती हैं, चूँकि अनंत सिंह RJD के सदस्य हैं, उनकी पत्नी कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ चुकी हैं। वैसे में थोड़ी बहुत दबाव की सियासत कांग्रेस भी करेगी, क्यूँकि उनके पास अखिलेश सिंह हैं, वो किसी भी हाल में अनंत सिंह को ख़ुद से दूर नही करना चाहेंगे। उसके बाद बेगुसराय में कन्हैया कुमार की दावेदारी। कुल मिला कर इन दो सीटों को लेकर इनमें कुछ समझौता ज़रूर होगा। किसी एक को ज़रूर झुकना होगा। झुकता कौन है ये तो वक़्त बताएगा।

बाक़ी अनंत सिंह का जो मिज़ाज है, तो वो मज़बूती से लड़ने वाले इंसान हैं। वो पहले तो किसी मज़बूत सियासी पार्टी से गठजोड़ करना चाहेंगे। और वो पार्टी कौन हो सकती है ?? भाजपा, लोजपा, लोजपा(चिराग़)

भाजपा का तो मामला खुला है; अगर वो वहाँ जाना चाहें तो उन्हें अपना भी लिया जाएगा। जहां तक लोजपा की बात है, वहाँ सूरजभान सिंह हैं, अगर वो अनंत सिंह के साथ गए तो फिर अनंत सिंह उनके साथ भी जा सकते हैं। वर्ना फिर चिराग़ पासवान को तो अपनी सियासत के लिए अनंत सिंह जैसों की तो बहुत सख़्त ज़रूरत है।

कुल मिला कर मोकामा जहां मेरी पैदाइश हुई है, वहाँ का उपचुनाव बिहार की सियासत का रुख़ तय करेगा।

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