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शहादत दिवस पर याद किए गए बिहार के पहले शहीद मीर वारिस अली

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स्वतंत्रता संग्राम 1857 में तिरहुत से बिहार के प्रथम शहीद वारिस अली के शहादत दिवस का आयोजन “संकल्प” एवं “नागरिक फोरम” के संयुक्त तत्वावधान में मुज़फ़्फ़रपुर के शहीद खुदीराम बोस स्मारक स्थल कंपनी बाग में किया गया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता संकल्प के अध्यक्ष मोहम्मद जमील अख्तर एवं संचालन नागरिक फोरम के विजय कुमार ने किया।

कार्यक्रम की शुरुआत शहीद वारिस अली की याद में बने शहीद वेदी पर माल्यार्पण से हुई।

कार्यक्रम में विषय प्रवेश कराते हुए शहीद वारिस अली के जीवनी पर प्रकाशित पुस्तक के लेखक व पत्रकार आफाक आजम ने जिले के सभी शहीदों एवं स्वतंत्रता सेनानियों पर किए गए शोध के विषय में, विशेष कर शहीद वारिस अली के विषय में विस्तार से जानकारी दी।

शहादत दिवस की अध्यक्षता करते हुए संकल्प के अध्यक्ष मोहम्मद जमील अख्तर ने जिला प्रशासन से मांग किया कि वारिस अली का शहादत दिवस सरकारी स्तर पर मनाई जाए, नवनिर्मित समाहरणालय द्वार पर जिला के तमाम शहीदों एवं स्वतंत्रता सेनानियों का नाम अंकित की जाए एवं “मालगोदाम चौक से मोतीझील तक का नाम वारिस अली” नगर निगम में दर्ज है, जिसका शिलापट्ट लगाई जाए।

नागरिक फोरम के अरविंद कुमार ने कहा कि देश की आजादी की लड़ाई में हर जाति धर्म एवं संप्रदाय के लोगों ने एकजुट होकर संघर्ष किया एवं अपनी कुर्बानिया दी। उन लोगों का सपना धर्मनिरपेक्ष देश बनाने का था जहां पर सभी के लिए शिक्षा स्वास्थ्य एवं रोजगार की गारंटी हो।

मजदूर यूनियन के नेता मो. इदरीश ने कहा कि वारिस अली सहित आजादी आंदोलन के तमाम क्रांतिकारियों एवं मनीषियों का सपना अधूरा है। क्रांतिकारियों एवं मनीषियों के जीवन संघर्षों से सीख लेकर वर्तमान समय में व्याप्त समस्याओं को लेकर संघर्ष करना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

कार्यक्रम में मजदूर यूनियन के नेता शंभू शरण ठाकुर, गुलशन परवीन, आरफा जिया, रिंकी कुमारी, शिव कुमार, राजन कुमार, मो. अली अहमद, मो. साहील, आरिफ रजा, सनाउल्लाह, राजेश शर्मा का.युनूस, डा सैयद अली मुर्तजा, पंकज किशोर, नबी आलम, इम्तेयाज अहमद एवं काशीनाथ साहनी आदि मौजूद रहे।

संवाद प्रेषक
शिव कुमार
8292129123

जनविद्रोह दिवस समारोह: मशाल मार्च से रौशन हुआ महुआ डाबर क्रांति स्थल

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क्रांति स्थल, महुआ डाबर, बस्ती:

बहादुपुर ब्लॉक अंतर्गत ऐतिहासिक क्रांति की धरती महुआ डाबर में जन विद्रोह दिवस पर मशाल मार्च निकालकर आज़ादी की अलख जगाने वाले क्रांतिवीरों को नमन किया गया। अपने लड़ाका पुरखों की याद में आयोजित जन विद्रोह दिवस समारोह में आये लोगों में अलग ही जज़्बा देखने को मिला। भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के महानायकों का स्मरण किया गया। क्रांतियोद्धा रास बिहारी बोस की आत्मकथा का विमोचन हुआ। वहीं, आजादी आंदोलन को समेटे दुर्लभ दस्तावेजों की प्रदर्शनी लगाकर नौजवानों को आजादी के महत्व बताया गया। कबीर संगीत मंडली की सांस्कृतिक प्रस्तुति दिल को छू गई। वक्ताओं ने महुआ डाबर में गौरवशाली स्मारक बनाने की मांग की। समारोह में संविधान के प्रस्तावना का सामूहिक पाठ किया गया।

‘महुआ डाबर विद्रोह की दास्तान’ खुला सत्र को संबोधित करते हुए कमांडर-इन-चीफ गेंदालाल दीक्षित के पौत्र डॉ. मधुसूदन दीक्षित ने कहा कि महुआ डाबर में क्रांतिवीर पिरई खां की अगुवाई में उनके इंकलाबी साथियों ने अंग्रेजी सेना के लेफ्टिनेंट लिंडसे, लेफ्टिनेंट थॉमस, लेफ्टिनेंट इंग्लिश, लेफ्टिनेंट रिची, सार्जेन्ट एडवर्ड, लेफ्टिनेंट कॉकल जैस कुख्यात अफसरों की घेराबंदी करके मौत के घाट उतार दिया। अंग्रेजी सेना के छह अफसरों के मौत के बाद सार्जेन्ट बुशर घायल अवस्था में किसी तरह से अपनी जान बचाकर भाग निकला और अंग्रेजी हुकूमत के उच्च अधिकारियों को घटना की जानकारी दी। अपने छह सैन्‍य अफसरों की मौत से बौखलाई अंग्रेजी सेना ने 20 जून,1857 को बस्ती के तत्कालीन मजिस्ट्रेट पेपे विलियम्स ने घुड़सवार फौजियों की मदद से पांच हजार की आबादी वाले महुआ डाबर गांव को घेरकर जलाकर राख कर दिया। पूरे कस्बे को तहस नहस करने के बाद ‘गैरचिरागी’ घोषित कर दिया गया। महुआ डाबर गांव के अस्तित्व को मिटाने के लिए पेपे विलियम्स को ब्रिटिश सरकार ने सम्मानित भी किया था।

वरिष्ठ दस्तावेजी छायाकार सुनील दत्ता ने अफसोस जताते हुए कहा कि आजादी के इतने बरस बीत जाने के बाद भी साजिश के तहत महुआ डाबर क्रांति स्मारक नहीं बन सका। जबकि महुआ डाबर से वर्डपुर तक यहां के आजादी मतवालों के संघर्ष की शानदार विरासत है।

क्रांतिकारी चिंतक अविनाश गुप्ता ने जोर देते हुए कहा कि अब बिना देर किये यहां गौरवशाली स्मारक बनाकर आजादी महानायकों को उचित सम्मान दिया जाना चाहिए।

मशाल मार्च से रौशन हुआ महुआ डाबर क्रांति स्थल

समारोह की अध्यक्षता कर रहे महामंडलेश्वर महा शक्ति पीठाधीश्वर डॉ. फूलचंद्र ब्रह्मचारी ने कहा कि महुआ डाबर का गौरवशाली विरासत को संजोने की बहुत जरूरत है। आजादी की लड़ाई का साझा संघर्ष हमारी धरोहर है।

समारोह के आयोजक शाह आलम राना ने कहा कि आज़ादी के भूले बिसरे नायकों को याद करना हमारा फ़र्ज़ है। यही एक तरीका है जिससे हम समझ सकते हैं आज़ादी के लिये कितने लोगों ने कुर्बानियां दीं, बल्कि इससे आज़ादी की कीमत भी पता चलती है।

महुआ डाबर जन विद्रोह दिवस समारोह में जुटी शख्सियतें
क्रांतियोद्धा रास बिहारी बोस की आत्मकथा का हुआ विमोचन

समारोह को गौरवशाली सैनिक संतराम मौर्य, प्रोफेसर रामदेव दीक्षित, क्रांतिकारी विचारक धीरेंद्र प्रताप, पूर्व ब्लाक प्रमुख राणा दिनेश प्रताप सिंह, सामाजिक कार्यकर्ता विजेंद्र अग्रहरि, गौहर अली, नूर मोहम्मद प्रधान आदि ने संबोधित ककिया। समारोह का संचालन शिक्षक वागीश मिश्रा ने किया. महुआ डाबर स्मृति समारोह के संयोजक आदिल खान ने आए हुए अतिथियों का आभार प्रकट किया। आयोजन समिति द्वारा स्मृति चिन्ह व शॉल देकर आए हुए सभी अतिथियों का स्वागत किया गया। इस अवसर पर अखंड मित्रा, मोहम्मद रमजान, सुरेन्द्र कुमार, फकीर मोहम्मद खान, अब्दुल वहीद, विशाल पांडेय, डॉ. जहांगीर आलम, शमीम खान, सुशील कुमार, फरहान आदि मौजूद रहे।

आज के लंपट दौर में भूपेंद्र नारायण मंडल के बारे में जानने का मतलब

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रवीश कुमार

“जनतंत्र में अगर कोई पार्टी या व्यक्ति यह समझे कि वही जब तक शासन में रहेगा तब तक संसार में उजाला रहेगा, वह गया तो सारे संसार में अंधेरा हो जाएगा, इस ढंग की मनोवृत्ति रखने वाला, चाहे कोई व्यक्ति हो या पार्टी , वह देश को रसातल में पहुंचाएगा। “

भूपेंद्र नारायण मंडल ने यह बात 60 के दशक में राज्य सभा में कही थी। बीजेपी के अमित शाह कहते हैं कि उनकी पार्टी 50 साल राज करेगी। कर सकती है। जहां 10 साल से ज़्यादा कर चुकी है, वहीं जाकर देख ले कि क्या तीर मार लिया है। मगर भूपेंद्र नारायण मंडल ने यह बात तब की कांग्रेस को सुनाई थी। बिहार में बी पी मंडल हुए जिन्हें लोग मंडल आयोग के कारण जानते ही हैं, मगर इस भूपेंद्र नारायण मंडल को आज की पीढ़ी कम जानती होगी।

यूं ही अनमने ढंग से किताब उठा ली और पन्ने पलटने लगा मगर भूपेंद्र बाबू के भाषणों को पढ़ते पढ़ते उनके प्रति गहरे आदर भाव से भर गया। ऐसा लग रहा था कि मैं एक हीरा खोज रहा हूं। पहली बार और कुछ नया जानने का सुख ही सर्वोत्तम सुख है। मैं बस इस सांसद के बारे में पढ़ने लगा। जो लोग राजनीति में दो तीन चिरकुट राष्ट्रीय नेताओं का नाम जप कर अपना जीवन बर्बाद कर रहे हैं, उन्हें अतीत के बेजोड़ सांसदों के बारे में खोज कर पढ़ना चाहिए।

भूपेंद्र नारायण मंडल समाजवादी नेता थे। कांग्रेस विरोधी थे। ललित नारायण मिश्र को दो दो बार हराया मगर उस वक्त चुनाव आयोग के इशारे से इनकी जीत रद्द कर दी गई थी। फिर भी यह आदमी अपनी हार को लेकर घृणा से नहीं भरा था। ग़ज़ब की दृष्टि वाले सांसद रहे हैं। इनके भाषणों में जनता कभी ग़ायब नहीं होती है। अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर बोलते हुए वे देश का प्रतिनिधित्व करने लगते हैं तो बिहार पर बोलते हुए राज्य का। किसी भी मुद्दे पर बोल रहे हों, जनता को हमेशा ध्यान में रखते हैं जिसे वे ग्रास रूट कहते हैं। कांग्रेस की सही बातों का समर्थन भी करते हैं।

दिल्ली से विधानसभा उठाई जा रही थी तब भूपेंद्र बाबू ने काफी विरोध किया था और कहा था कि दिल्ली के लोग भी इस देश से कम प्यार नहीं करते हैं, उन्हें विधानसभा से वंचित करना, उनके साथ अन्याय होगा। यह सब इसलिए किया जा रहा है ताकि दिल्ली को झुग्गियों से मुक्त करने के नाम पर ग़रीबों को हटाया जा सके। 25 जुलाई 1968 के अपने भाषण में कहा कि “ पब्लिक प्रिमिसेज के दायरे को बढ़ाने का मैं विरोध करता हूं क्योंकि इसके ज़रिए जो यहां के छोटे लोग हैं, जो दूर देहात से यहां आते हैं और यहां पर आकर अपनी कमाई का जो इंतज़ाम वह करते हैं, उसके लिए उन्हें दिल्ली में रहना पड़ता है। वे झुग्गी झोपड़ी बनाकर रहते हैं, उन लोगों को उजाड़ने के लिए इसमें पावर देने का इंतज़ाम है, इसलिए मैं इसका विरोध करता हूं। “

भूपेंद्र नारायाण मंडल निश्चित रूप से बिहार के श्रेष्ठ सांसदों में से एक रहे होंगे। हर विषय पर इनका भाषण प्रभावित करने वाला है। भाषा स्पष्ट और जानकारी से भरी हुई लेकिन संक्षिप्त। खांटीपना कभी नहीं छोड़ते हैं और इस बात से बिल्कुल प्रभावित नहीं कि उनके सामने नेहरू हैं या हमेशा हमेशा के लिए राज का सपना देखने वाली कांग्रेस हैं। बजट पर इनके सारे भाषण स्तरीय हैं। आप इनके बजट भाषणों के ज़रिए उस समय के हिन्दुस्तान खासकर बिहार की तस्वीर देख सकते हैं। बेहतरीन हैं।

16 अगस्त 1966 के भाषण का एक अंश है- अनुसूचित जाति और जनजाति की दशा को देखने के लिए जो कमिश्नर साहब बहाल हुए हैं और उनकी जो रिपोर्ट अभी हाउस के सामने है, उसमें कुछ चीज़ों को देख कर मुझे बहुत दुख हुआ है। मद्रास राज्य में अनुसूचित जनजाति के छात्रों का नाम लिखन में 52.28 प्रतिशत की कमी हुई है। असम में अनुसूचित जाति के छात्रों के भर्ती में जो कमी हुई है वह 29.20 प्रतिशत है, बिहार में 15.99 प्रतिशत है, मध्य प्रदेश में 44.94 प्रतिशत है, मैंसूर में 72.38 प्रतिशत है, गुजरात में 95.13 प्रतिशत है।

“बिहार में जो राष्ट्रपति शासन चल रहा है, उसमें जो दलित हैं, उनकी क्या दशा है, उसका एक नमूना मैं आपके सामने रखना चाहता हूं। मुंगेर ज़िले में अलोरी एक अंचल है, उस अंचल में एक गांव है जिसका नाम श्यामधरानी गांव हैं, उसमें बहुतयात दलित रहते हैं, उसी के नज़दीक एक ज़मींदारों का गांव हैं। इन ज़मींदारों ने चढ़ाई कर दी उस गांव के ऊपर। चढ़ाई करने के सिलसिले में समूचे गांव में आग भी लगा दी, जिससे कि दलितों को भागना पड़ा। एक आदमी को गोली मार दी गई। 4 आदमी अस्पताल में हैं। सबसे आश्चर्य की बात है कि जो सरकारी तंत्र थाना है, जो दलित जाता है फर्स्ट इंफोरमेशन रिपोर्ट देने के लिए, वह दर्ज नहीं किया जाता है। मुजरिमों को अरेस्ट नहीं किया जाता है और उन्हीं दलितों को गिरफ्तार किया भी किया गया है। “ 21.12.1969 ( राज्यसभा)

आज भी ऊना से लेकर ग्वालियर तक में यही हाल है। राजस्थान में बीजेपी की दलित विधायक का घर जला दिया मगर पार्टी ही चुप रह गई। कायदे से पार्टी के नेता जो घर घर जाकर दलितों के यहां खाना खाने की नौटंकी कर रहे हैं, सबको मिलकर अपनी विधायक का घर बना देना चाहिए था। पर आप भूपेंद्र नारायण मंडल के भाषणों के ज़रिए उस वक्त का हिंदुस्तान, राजनीति और उसके सांसद को देख सकते हैं।

मैं एक जननेता को उसके दिए गए भाषणों के ज़रिए जान रहा हूं। 1957 में विधायक थे, 1962 में लोकसभा के लिए चुने गए और फिर राज्य सभा में भी रहे। इन भाषणों के ज़रिए जिस नेता को जाना है, वो बहुत पसंद आया। उसकी जानकारी का दायरा प्रभावित कर रहा है। यह नेता अपनी जनता को बहुत प्यार करता है। उसके प्रति हमेशा ईमानदार रहता है। दलितों, पिछड़ों और अगड़ों में ग़रीबों के प्रति हमेशा वफादार रहता है। घोर तार्किक है। ज़िम्मेदार सांसद है।

मुझे खुशी है कि मैंने भूपेंद्र नारायण मंडल को जाना। उससे भी ज़्यादा खुशी है कि मैं आपको उनके बारे में बता रहा हूं। इनके नाम पर एक यूनिवर्सिटी है। उसकी ख़स्ता हालत पर प्राइम टाइम में रिपोर्ट कर रहा था, दिमाग़ में बी पी मंडल ही छाए रहते हैं सो बी पी मंडल बोल दिया। तुरंत कई फोन आ गए कि बी एन मंडल हैं। मैं उसके पहले बी एन मंडल के बारे में कुछ नहीं जानता था। आज जानकर अच्छा लग रहा है। गर्व हो रहा है कि मेरे प्रदेश से इस स्तर का कद्दावर और शानदार नेता कभी हुआ था।

शरदेंदु कुमार ने उनके भाषणों का संकलन किया है। दीपक प्रसाद यादव ने ये किताब भेजी है। मैं उन्हें नहीं जानता मगर उनका दिल से शुक्रिया। भारत की राजनीति के एक महत्वपूर्ण अध्याय के करीब ले जाने के लिए। किताब पर एक नंबर है 09431077723, कोई युवा नेता इनके बारे में जानना चाहे तो संपर्क कर सकता है। यह किताब राजनीति में दिलचस्पी रखने वालों के लिए हैं। अगर उन्हें आज के नेताओं की लंपटई से अलग होकर कुछ पढ़ने लिखने का मन करे तो पढ़ सकते हैं।

DID MUSLIMS CONSIDER HINDUS AS KAFIRS?

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Amaresh Misra 

What Ambedkar said about Muslim view about Hindus is wrong.

First, Muslim rulers, especially Mughals, even Aurangzeb, did NOT declare Hindustan, the name given by Mughals to their kingdom in the Indian subcontinent, as an Islamic kingdom officially.

The Mughal State was a multireligious monarchy and you can find this even in Aurangzeb’s firmaans.

Secondly, the Indian Muslim clergy saw Hindus as Dhimmis and NOT Kaffirs.

THIS POINT IS EXTREMELY IMPORTANT.

Well read individuals also miss this.

In fact, Dar-ul-harb fatwa by Shah Abdul Aziz, the son of Shah Waliullah, the great cleric/political scientist of the 18th century, was issued in 1803, AFTER the British entered Delhi and took control of the Mughal emperor.

And whom did the British defeat?

Not a Mughal army but a Maratha army led by Daulat Rao Scindia, the son of Mahadji Scindia.

Lord Lake defeated Daulat Rao Scindia in the battle of Laswari and captured Delhi in 1803.

At that time, Mughals were under Maratha protection.

So, the point is that Shah Abdul Aziz declared Hindustan as Dar-ul-Harb AFTER the British took over–and NOT when Marathas were ruling Delhi as plenipotentiaries of the Mughals.

Then, the Dar-ul-Harb fatwa, mentions British as Kafirs and Hindus as Dhimmis.

If you read the fatwa, it clearly says: “neither Muslims or their Dhimmis are in power. That is why it is legitimate to wage Jihad against Kafirs, the British”.

This fatwa is unique as it reveals that under Islam, it is acceptable for Muslims to be ruled by their Dhimmis.

And clerics like Shah Abdul Aziz were comfortable while Marathas were ruling Delhi.

Marathas were not Kafirs.

In fact, Syed Ahmed Shahid who launched a Jihad to expel the British immediately after this fatwa, corresponded with Malhar Rao Holkar. Till Holkar was alive, both fought together.

In all anti-British fatwas of Jihad issued by Maulavis in 1857, even the word Dhimmi is not used.

Hindus become brothers (भाईबंध or हम-वतन).

So, Ambedkar was totally wrong when he said Muslims considered Hindus as Kafirs!

बाबू कुँवर सिंह, हिंदू मुस्लिम एकता का एक अज़ीम नायक

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Md Umar Ashraf

भाजपा के पास कोई नायक है नही। अब वो हमारे नायक को उठा रही है, यूँ तो उसके कई उदाहरण मिलते रहते हैं, पर मौजूदा दौर में बाबू कुँवर सिंह विजयोत्सव कार्यक्रम का है। वैसे तो बिहार सरकार उन्हें राजकीय सम्मान के साथ हमेशा याद करती है। वैसे राजकीय सम्मान के साथ बिहार में कई लोगों को याद किया जाता है, चाहे वो कुंवर सिंह हो या पीर अली ख़ान, बाबू जगजीवन राम हों या ग़ुलाम सरवर, सरकार किसी भी रहे इन्हें बिहार सरकार याद करती है। पर अब ये पार्टी का मामला भी होते जा रहा है। अब भाजपा बड़े पैमाने पर बाबू कुँवर सिंह को सेलिब्रेट करेगी। उनका मेन टार्गेट होगा, राजपूतों को अपने तरफ़ मायल रखना। और इसी तरह भाजपा उनको यानी कुँवर सिंह को अपनी विचारधारा का आइकॉन बना कर पेश करेगी। फिर इसका एक असर ये होगा की मुसलमान कुँवर सिंह से दूर होते चले जाएँगे। जबकि बाबू कुँवर सिंह के साथ उज्जैन वंशी राजपूतों को हटा दिया जाए तो उनके साथ सिर्फ़ मुसलमान दिखेंगे।

बाबू कुँवर सिंह के साथ मुसलमान सिर्फ़ 1857-58 की जंग में नही थे। बल्कि काफ़ी पहले से काम कर रहे थे। जिसमें 1844 का ज़िक्र तो अंग्रेज़ अपने दस्तावेज़ में करते हैं। जहां 1856 में काज़ी ज़ुल्फ़िक़ार अली ख़ां को बाबू कुंवर सिंह का लिखा ख़त उनके बीच के रिश्ते को बख़ूबी ज़ाहिर करता है, वहीं 1844-45 में पीर बख़्श, दुर्गा प्रासाद, मुन्शी राहत अली, ख़्वाजा हसन अली, मौलवी अली करीम, मौलवी नियाज़ अली, बरकतउल्लाह और मीर बाक़र के साथ बाबु कुंवर सिंह का नाम भी बग़ावत में आता है। लगातार ये लोग साथ काम कर रहे होते हैं, और इसको तरह समझ सकते हैं की जब 1857 में बाबू कुंवर सिंह ने आरा जीतने के बाद वहाँ दो थाना क़ायम किया “पुर्वी थाना और पश्चिमी थाना” जिसकी देख रेख की पुरी ज़िम्मेदारी ‘शेख़ ग़ुलाम यह्या’ के हाथ मे मेजिस्ट्रेट बना कर दे दिया। मिल्की मोहल्ला के ‘शेख़ मुहम्मद अज़ीमुद्दीन’ को पुर्वी थाना का जमादार बना दिया गया, तुराब अली और ख़ादिम अली जो के दीवान शेख़ अफ़ज़ल के बेटे थे को इन थाने कोतवाल बना दिया गया।

कुंवर सिंह जिस जगह गए, उनके साथ मुसलमान चट्टान के साथ खड़े रहे। उनकी शहादत के बाद मोहसिनपुर के ज़मींदार ‘मीर क़ासिम शेर’ और उस्ताद गु़लाम हुसैन ख़ान जैसे लोग बाबू अमर सिंह के साथ खड़े रहे। कुल मिला कर बाबू कुंवर सिंह मुसलमानो के उतने ही बड़े नायक हैं, जितने वो राजपूतों के हैं, इसलिए किसी सियासी पार्टी का उनपर क़ब्ज़ा ना हो, ये बहुत ज़रूरी हैं। बुज़ुर्गों ने उनके साथ मिल कर ख़ून दिया है, जायदाद लुटाईं हैं। इतनी आसानी से उनकी क़ुर्बानी को फ़रामोश नही होने दिया जा सकता है।

आज़ान और हनुमान चालीसा के बहाने नफ़रत कौन लोग फैला रहे हैं?

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Md Umar Ashraf

जैसा ये आम है कि मस्जिद में पाँच वक़्त आज़ान होती है, पर कुछ संगठन के लोग इसके मुक़ाबिल हनुमान चालीसा की पाठ करने की बात कर रहे हैं, इसको लेकर सोशल मीडिया पर बहस भी छिड़ा हुआ है। लोग इस तरह से पेश कर रहे मानो मंदिर में आरती और हनुमान चालीसा का पाठ होता ही नही था। होता भी था और लाउडस्पीकर पर ही होता था। वैसे आज भी होता है।

हमारे घर से एक किलोमीटर की दूरी पर एक घाट है, गंगा किनारे, अलखनाथ घाट (बाढ़, पटना), बचपन में सुबह सुबह दूर से बड़ी सुरीली आवाज़ आया करती थी।

जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बंदि महा सुख होई।

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा।

काफ़ी लम्बा भजन है, बजता ही रहता था, फ़जर की अज़ान होती थी, उस वक़्त हिंदुओं की एक बड़ी संख्या गंगा की जानिब डुबकी लगाने जाती थी, अधिकतर अधेड़ उम्र और बुज़ुर्ग लोग हुआ करते थे, कुछ अपने मवेशी की ख़िदमत में लग जाते थे, मुसलमानो की एक छोटी अबादी ही मस्जिद जाया करती थी। अब शहर बड़ा हो गया है, आबादी बहुत घनी हो गई है, इसलिए आवाज़ अब सुनाई नही देती है। बहरहाल, कहने का मतलब ये है की आज़ान और हनुमान चालीसा हमेशा से आम लोगों तक पहुँचाया गया है लाउडस्पीकर के ज़रिया। पहले लाउडस्पीकर कि ताक़त कम होती थी, और क़स्बे में आबादी भी कम हुआ करती थी, पुराने लोग थे, साथ में रहने का पुराना तजुर्बा था, इसलिए साथ में ले देकर चलते थे। कोई दिक़्क़त नही होता था, आज़ान को लेकर कई सकारात्मक स्टोरी का तो मै ख़ुद गवाह हूँ।

तो फिर अब सवाल उठता है की आख़िर अब ये माइक पर आज़ान और हनुमान चालीसा को लेकर दिक़्क़त किसे हो रही है?? तब जवाब मिलेगा बाहरी लोगों को। असल में लोग बड़ी तेज़ी से गाँव से पलायन कर शहर और क़स्बे में पहुँच रहे हैं, वहाँ इनको कोई पूछता है नही, फिर ये अपने आप को वहाँ स्थापित और मज़बूत करने के लिए अजीब अजीब हरकत करते हैं। अलग अलग संगठन बनाएँगे, अलग अलग हरकत करेंगे, अधिकतर मज़हब के नाम पर ही होगा और इस संगठन में अधिकतर बाहर से आकर बसे हुए लोग जुड़ेंगे और साल दस साल में पूरे क़स्बे और शहर का अजेंडा बदल देंगे, बाक़ी कुछ संगठन तो हैं ही, जिनके प्रचारक पैसे के दम पर अपने मिशन के प्रचार में लगे हुवे हैं। ये हर शहर और क़स्बे की कहानी है। जो पुरानी हिंदू मुस्लिम आबादी है उनके बीच तो कई दशक का रिश्ता है, आपस में ये हर मामले ये एक दूसरे के साथ देते हैं। लेकिन ये बाहर से आए हुए लोग धीरे धीरे इतने हावी हो जाते हैं की पुराने स्थानीय लोग बस मूकदर्शक की हैसियत निभाते हैं, या फिर कुछ समय बाद उन्ही के अजेंडे का शिकार हो जाते हैं। फिर इनको हर चीज़ से तकलीफ़ होने लगती है। आज़ान के मामले में भी यही हुआ है।

लोग ख़ुद अपने नायक की क़दर नही करते हैं, और दूसरे से उम्मीद करते हैं।

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Md Umar Ashraf

प्रोफ़ेसर अब्दुल बारी स्वतंत्रता आंदोलन के बिहार के आख़री शहीद थे। 28 मार्च 1947 को प्रोफ़ेसर साहब फ़तुहा के पास शहीद कर दिये गए। उन्हें ख़िराज ए अक़ीदत पेश करते हुवे Tarique भाई ने एक लाइन लिखा “अपना नायक ख़ुद गढ़ना पड़ता है।”

थोड़ा अटपटा लगेगा, लेकिन मामला यही है। जब तक आप अपने नायक को ख़ुद नही उठाइएगा, कोई पूछेगा नही। इसके सैंकड़ों उदाहरण मिल जाएँगे। पर यहाँ हम अब्दुल बारी साहब पर ही रहते हैं। आज उनकी 75वीं शहादत दिवस है।

पटना में सबसे मसरूफ़ एक सड़क है, जिसका नाम है बारी पथ। अब आप उसी सड़क पर ज़माने से रह रहे किसी भी इंसान से पूछ लीजिए के इसका नाम बारी पथ क्यूँ है? तो अधिकतर कोई जवाब नही देंगे। एकाध आदमी कह देंगे की यहाँ पर ठाकुरबाड़ी है, इसलिए इसका नाम बारी पथ है। असल में ये सड़क प्रोफ़ेसर अब्दुल बारी साहब के नाम पर है, क्यूँकि इसी सड़क पर अंदर एक गली में उनका मकान है।

अब पूछिएगा की प्रोफ़ेसर अब्दुल बारी साहब की क्या ख़ूबी थी के उनके नाम पर सड़क का नाम है। तो मामला कुछ यूँ है की प्रोफ़ेसर अब्दुल बारी टाटा वर्कर्स यूनीयन के संस्थापक थे। और उसके अध्यक्ष भी रहे, और इसी पद पर रहते हुवे उन्हें शहीद कर दिया गया था। इसके इलावा वो एक और पद पर थे, और वो था बिहार कांग्रेस का अध्यक्ष पद। मतलब ये कि जिस वक़्त प्रोफ़ेसर अब्दुल बारी शहीद किए गए बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष थे। टाटा वर्कर्स यूनीयन वाले तो अपने लीडर को हमेशा याद रखते हैं, टाटा से लेकर पटना तक उनकी याद में कुछ न कुछ करते हैं, वहीं बिहार कांग्रेस ने ट्वीट कर के भी उन्हें याद करना गवारा नही किया। और ये कोई पहला मामला नही है। ये हर साल का है। लेकिन दिक़्क़त इससे भी नही है, दिक़्क़त है हमारे फ़ेसबुक पर मुस्लिम नौजवानो से। उनके सामने कुछ भी जानकारी पेश कीजिए तो कमेंट आ जाएगा की ये तो हमें पढ़ाया ही नही गया। इनके नाम मिटा दिए गए, इनके बारे में बात नही होती है। इनको कोई पूछता नही है। ये सब बात लिखने के लिए लम्बी लम्बी पोस्ट लिख देंगे, कमेंट छाप देंगे, लेकिन दो लाइन उन नायकों पर लिखना गवारा नही करेंगे। बाक़ी बात करवा लो बड़ी बड़ी।

वो प्रोफ़ेसर अब्दुल बारी जिनके नाम पर बिहार का मशहूर कोईलवर पुल है, जिनके नाम पर जमशेदपुर से लेकर जहानाबाद तक कुछ न कुछ है। उनके ऊपर दो किताब हिंदी में लिखी जा चुकी है। उनको सिलेबल में पढ़ाया भी गया, पर उन्हें याद करने की फ़ुरसत किसी को नही है।

आज आज़ादी के अमृत महत्सव की वजह कर दो मिनट का प्रोग्राम प्रोफ़ेसर अब्दुल बारी पर आकाशवाणी और दूरदर्शन ने ज़रूर दिखाया गया है। बाक़ी जो है सो है ही है। लोग ख़ुद याद करते नही, और दूसरे से उम्मीद करते हैं।

शिक्षा, संघर्ष और संगठन : बीएचयू में छह साल तक चले संघर्ष कहानी

Shubhneet Kaushik

शिक्षा, संघर्ष और संगठन

डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर के इस नारे को बीएचयू लाइब्रेरी आंदोलन से जुड़े साथियों ने अपने संघर्षों से साकार करके दिखाया है। उनके छह साल तक चले संघर्ष के बाद कल बीएचयू प्रशासन ने सयाजी राव गायकवाड़ केंद्रीय ग्रंथालय के साइबर लाइब्रेरी स्टडी सेंटर को इक्कीस घंटे तक खोलने का निर्णय लिया है। लाइब्रेरी आंदोलन का हिस्सा रहे सभी साथियों के संघर्षों को सलाम!

मुझे वर्ष 1916 में बीआर अम्बेडकर का लिखा वह ख़त भी आज याद आता है, जो उन्होंने ‘द क्रॉनिकल’ के सम्पादक को लिखा था। याद रहे कि 1916 बी॰एच॰यू॰ का स्थापना वर्ष भी है। हुआ यह था कि बंबई नगरपालिका ने सर फ़िरोज़शाह मेहता के निधन के बाद उनकी याद में एक मूर्ति बनाने का प्रस्ताव रखा था। इस प्रस्ताव से अपनी असहमति जाहिर करते हुए तब कोलम्बिया यूनिवर्सिटी के छात्र रहे अम्बेडकर ने लिखा था कि सर फ़िरोज़शाह मेहता की स्मृति में लाइब्रेरी स्थापित करना ही उस महान भारतीय नेता के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी, न कि उनकी मूर्ति बनाना।

अभी दो दिन पहले राज्यसभा में भाषण देते हुए भाजपा सांसद राकेश सिन्हा सदन को नालंदा विश्वविद्यालय की याद दिला रहे थे, उसकी पुस्तकों और पांडुलिपियों को संख्या गिना रहे थे। और नालंदा के पुस्तकालय की याद में आँसू बहा रहे थे। जो अतीत हो चुका है, जिसे बदलना अपने वश में नहीं, उसके लिए घड़ियाली आँसू बहाना और वर्तमान से नज़रें चुराना अतीतजीवी समाज का लक्षण है। जाहिर है आज की नालंदाओं का जो हश्र हो रहा है, उसके बारे में सोचना, उसकी बात करना सत्ता में क़ाबिज़ लोगों को क़तई स्वीकार नहीं।

यह कितना दुखद है कि विश्वविद्यालय में लाइब्रेरी चौबीस घंटे खुले, ऐसी बुनियादी सुविधा के लिए छात्रों को वर्षों तक संघर्ष करना पड़े, आंदोलन चलाना पड़े। और सिर्फ़ आंदोलन नहीं, जेल जाना पड़े, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के चक्कर काटने पड़े। लेकिन यह सब हुआ है और हो रहा है। बीएचयू में, जेएनयू में, दिल्ली विश्वविद्यालय में और देश के दूसरे तमाम विश्वविद्यालयों में। कोरोना काल में लॉकडाउन होने और पुनः परिस्थितियाँ सामान्य होने के बाद भी लाइब्रेरी खोलना और पहले की तरह सुचारु रूप से चलाना विश्वविद्यालय प्रशासन की प्राथमिकता में कभी नहीं रहा। लाइब्रेरी खुलवाने के लिए छात्रों को लामबंद होना पड़ा और संघर्ष चलाना पड़ा।

बीएचयू लाइब्रेरी आंदोलन के लिए कल का दिन सफलता का दिन रहा और सीख का भी। सीख इसलिए कि यह लड़ाई ख़त्म नहीं हुई है। सम्भव है कि आने वाले दिनों में प्रशासन द्वारा फिर साइबर लाइब्रेरी को बंद करने या उसकी समयावधि घटाने की कोशिश हो। लेकिन कल की यह सीख, यह प्रेरणा हमें हिम्मत देगी। मशाल की तरह हमारी राह प्रशस्त करेगी। यह लड़ाई जारी रहेगी ताकि शिक्षा, संघर्ष और संगठन की राह मज़बूत हो सके। ज़िंदाबाद दोस्तों।

और आख़िर में आंदोलन से जुड़े तमाम साथियों के लिए वह शेर जो बी॰एच॰यू॰ सेंट्रल लाइब्रेरी में प्रवेश करते ही हम संगमरमर की किताब पर पढ़ते हैं :

साक़ी की मुहब्बत में दिल साफ़ हुआ इतना
जब सर को झुकाता हूं शीशा नज़र आता है।

ग्रामीण विद्यार्थियों को स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड की जगह छात्रवृत्ति मिले : पुष्पम प्रिया चौधरी

 

पूर्वी चंपारण (26 मार्च 2022) बिहार के सारे उद्योगों को बंद करके बिहारियों को मजदूर बनाकर आखिर किस बात का बिहार उत्सव मनाया जा रहा है? बिहार को देश में सबसे पीछे रखकर बिहार दिवस पर उत्सव मनाने का क्या औचित्य है? बिहार को बदहाल और बेरोजगार बनाकर किस बात का उत्सव मना रहे हैं? यह बात प्लुरल्स पार्टी के प्रेसिडेंट पुष्पम प्रिया चौधरी ने पूर्वी चंपारण के मधुबन प्रखंड के एक सम्मान समारोह में कही.

प्लुरल्स अध्यक्ष पुष्पम प्रिया चौधरी ने कहा कि पहले गरीब और जरूरतमंद ग्रामीण विद्यार्थियों हेतु छात्रवृत्ति प्रदान की जाती थी परंतु अब उसके जगह स्टूडेंट क्रेटिट कार्ड की योजना की लाई गई इससे विद्यार्थी हतोत्साहित हो रहे हैं, क्योंकि उसे लौटाने का दवाब बना रहता है. इंटर में सफल विद्यार्थियों को सम्मान समारोह में बोलते हुए प्लुरल्स पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि शिक्षित व्यक्ति ही बेहतरीन समाज का निर्माण कर सकता है. राजनीति में शिक्षित लोगों को आना चाहिए.

प्लुरल्स पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अनुपम सुमन ने क्रेडिट कार्ड की जगह जगह स्कूलों में छात्रवृत्ति वाली पुरानी व्यवस्था बहाल की मांग कि ताकि विद्यार्थियों को प्रोत्साहन मिल सके. अनुपम सुमन ने कहा कि बाबा भीमराव अम्बेडकर ने भी बड़ौदा महाराज के छात्रवृत्ति पाकर ही विदेश जाकर शिक्षा पाई, अगर उस समय
बाबा साहेब के लिए छात्रवृत्ति की व्यवस्था नहीं होती तो शायद देश संविधान निर्माता के प्रतिभा से वंचित रह जाता.

प्लुरल्स पार्टी के प्रेस सचिव मुकेश कुमार ने कहा कि सबसे पहले आप बेहतर इंसान बनिए, इससे आप बेहतर नागरिक भी बन सकेंगे. उन्होंने विद्यार्थियों को कहा कि सबसे पहले अपने लक्ष्य का निर्धारण कीजिए और उसे पूरी शिद्दत- लगन से हासिल करने का प्रयास करें.
प्लुरल्स प्रदेश प्रवक्ता मुन्ना कुशवाहा ने विद्यार्थियों को साक्षर बनने की जगह शिक्षित बनने की सलाह देते हुए शिक्षा के महत्व को रेखांकित किया.

पूर्वी चंपारण जिले के मधुबन विधानसभा के पूर्व उम्मीदवार विकास केसरी ने शिक्षा और शिक्षित समाज की प्रासंगिकता पर बल देते हुए महिला शिक्षा को प्रोत्साहित करने की बात कही.

इस सम्मान समारोह में प्लुरल्स को पूर्व पैक्स अध्यक्ष यादव लाल गुप्ता, जिला परिषद सदस्य राकेश पासवान, किरण कुशवाहा, मधुबन प्रखंड के स्थानीय निकाय के प्रतिनिधि सिकंदर यादव, शिव शम्भु प्रसाद सहित कई लोगों ने संबोधित किया. कार्यक्रम में पूर्वी चंपारण के जिलाध्यक्ष अभिनव भारती, ढाका से प्लुरल्स पार्टी के पूर्व उम्मीदवार डॉक्टर राजन जायसवाल, सुधांश, दीपक,आनंद, आर्यन, मनीष, धर्मेंद्र, आयुष, शिवम, आकाश, लक्की सहित सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने शिरकत की.

हिजाब के नाम पर मुसलमानो को सियासी जमात ने एक बार फिर इंधन बना लिया

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Md Umar Ashraf

सोच रहा था के नही लिखूँ, पर लिख ही देता हूँ।

8 फ़रवरी 2022 को कर्नाटक के मांड्या में एक हिजाब पहनने वाली छात्रा के ख़िलाफ़ भगवा गमछा-पाटा ओढ़े और उग्र नारेबाज़ी करता समूह एक लड़की का पीछा करता है, बदले में वो अकेली लड़की अपने पूरे दम से इस भीड़ का सामना करती है।

इस पूरे वाक़िये का वीडियो बनता है, जिसे वाइरल किया जाता है, आपने क्या; पूरी दुनिया ने देखा होगा..! उस लड़की का कहना था कि इस पूरे मामले में उसे अपने सहपाठियों और कॉलेज के प्रिंसिपल का समर्थन मिला, यानी वहाँ हिजाब बैन नही था। कई मीडिया हाऊस के लोगों से बात करते हुए उस लड़की ने बताया कि उनके कॉलेज में उन्हें बुर्का पहनने और हिजाब पहनकर क्लास करने की इजाज़त है।

वहीं कर्नाटक के दूसरे शहर उडुपी में, हिजाब पहनने वाली लड़कियों के ख़िलाफ़ भगवा गमछा पहनने वाले लोगों ने कई दफ़ा उग्र प्रदर्शन किया। इसकी शुरुआत तब हुई जब 31 दिसंबर 2021 को उडुपी के सरकारी पीयू कॉलेज में हिजाब पहन कर आई छह छात्राओं को कक्षा में प्रवेश करने से रोक दिया गया था। इसके बाद कॉलेज के बाहर प्रदर्शन भी हुआ था।

कॉलेज प्रशासन ने 19 जनवरी 2022 को छात्राओं, उनके माता-पिता और अधिकारियों के साथ बैठक की थी। लेकिन इस बैठक का कोई परिणाम नहीं निकला था। इसके बाद उडुपी के विधायक रघुपति भट ने कहा कि जो छात्राएं बिना हिजाब के स्कूल नहीं आ सकती हैं वो ऑनलाइन पढ़ाई करें। और यहीं से मामला तूल पकड़ता चला गया। मुस्लिम लड़कियों ने ऑनलाइन क्लास का विरोध किया। और फिर मुस्लिम छात्राओं हिजाब पहनने के विरोध में हिंदू छात्र-छात्राएं भगवा शॉल और स्कार्फ़ पहन कर कॉलेज में पहुंचने लगे, और ये ख़ुद पहन कर नही आते थे, इन्हें स्कूल के बाहर शॉल और स्कार्फ़ कुछ लोगों द्वारा बाँटा जाता था।

4 फ़रवरी को पीयू कॉलेज में हिजाब पहनकर आने वाली छात्राओं को फिर से रोका गया। इसके बाद 5 फ़रवरी को कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी हिजाब पहनकर स्कूल आने वाली मुस्लिम छात्राओं के समर्थन में आए। उन्होंन एक ट्वीट में कहा कि हिजाब को शिक्षा के रास्ते में लाकर भारत की बेटियों का भविष्य छीना जा रहा है। उसी दिन 5 फ़रवरी को राज्य सरकार ने कर्नाटक शिक्षा अधिनियम 1983 की धारा 133(2) लागू कर दी। इसके अनुसार सभी छात्र-छात्राओं के लिए कॉलेज में तय यूनिफॉर्म पहनना अनिवार्य कर दिया गया। यह आदेश सरकारी और निजी, दोनों कॉलेजों पर लागू किया गया। जिसका विरोध हुआ।

दूसरी तरफ कुंडापुरा के सरकारी पीयू कॉलेज ने कैम्पस में पहले तो हिजाब पहनी लड़कियों को रोका गया, लेकिन लड़कियों ने गेट के बाहर रोज कॉलेज शुरू होने से लेकर ख़त्म होने तक प्रदर्शन किया, जिसके बाद सोमवार यानी 7 फ़रवरी 2022 को मुस्लिम छात्राओं को हिजाब पहनकर आने की अनुमति दे दी गई। साथ ही यह नियम भी लागू किया कि वे अलग क्लास में बैठेंगी। वहीं इसी दिन कर्नाटक के आईडीएसजी कॉलेज चिक्कमंगलूर में हिजाब पहनने वाली छात्राओं के समर्थन में दलित छात्रनीला गमछा पहन कर आ गए हैं।

और इसके बाद सियासत अपने उरूज पर पहुँचा और जो मामला लोकल लेवल पर सॉल्व हो जाता, उसे कांग्रेस के स्टूडेंट विंग एनएसयूआई कोर्ट में ले गई, जिसकी वजह कर जो फ़ैसला आज आया सो आया ही। वैसे इसमें और भी कई तंज़ीमें शामिल हैं।

देखिए हुआ क्या है 8 फ़रवरी 2022 को कर्नाटक के मांड्या में एक बुर्क़ा पहनने वाली छात्रा के ख़िलाफ़ भगवा गमछा-पाटा ओढ़े और उग्र नारेबाज़ी करता समूह हूटिंग करता है, लड़की पलट कर जवाब देती है, इस पूरे वाक़िये का वीडियो वाइरल होता है, लड़की को आइकॉन बनाया जाता है, पर वो विक्टिम नही थी, क्यूँकि उस पर पाबंदी नही थी, उसे क्लास करने और इग्ज़ैम देने से कभी रोका ही नही गया। जहां तक बात हूटिंग की है, ये भारत में गिरी हुई मानसिकता है, जिसका शिकार हर लड़की होती है। बाक़ी लड़की ने पलट कर मज़बूती से जवाब दिया।

लेकिन सब मामले में उडुपी की उन आधा दर्जन को बिल्कुल ही ग़ायब कर दिया गया जो सच में अपने हक़ के लिए लड़ रही थीं, प्रदर्शन कर रही थी, और प्रशासन के ज़ुल्म का शिकार हो कर अपना करियर दाव पर लगा रही थीं। उन्हें हिजाब पहन कर क्लास में अलाउ नही किया गया। साल उनका बर्बाद हुआ।

अब पूछिएगा मै ये लिख क्यूँ रहा हूँ?? ख़ास कर लास्ट का दो पैराग्राफ़। तो मामला कुछ यूँ है की वंचित बहुजन आघाडी के प्रकाश अम्बेडकर और उनकी टीम उस लड़की को जिसे आइकॉन बनाया गया, को औरंगाबाद लाना चाहते थे, क्यूँ लाना चाहते थे?? भाजपा ने विरोध शुरू किया।

अब मामला ये हुआ की उनके औरंगाबाद आने पर सेक्शन 144, IPC सेक्शन 188, 269, 270 और 271 के तहत कारवाई की नोटिस पुलिस कमिश्नर द्वारा थमा दी गई है। कर्नाटका पुलिस के इंटेलिजेंस की उस लड़की के घर के बाहर कड़ी नज़र, जिसके बाद वंचित बहुजन आघाडी ने पुलिस कमिश्नर के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद खंडपीठ में पेटिशन दाखिल की गई। शायद वो लड़की अब औरंगाबाद नही जाए, तो अब वंचित बहुजन आघाडी द्वारा उस लड़की की एक कट & एडिट की हुई विडीओ शेयर किया जा रहा है।

मतलब आप समझ रहे के किस लेवल पर सियासत चल रहा है? वामपंथीयों ने जिनकी पूरी लड़ाई ही औरतों की आज़ादी के नाम पर है, ने केरेला से लेकर बंगाल तक हेजाब के फ़ेवर में जुलूस निकाल दिया। अब पूछिएगा यहाँ पर मिल्ली तंज़ीम कहाँ हैं? सब आइकॉन बनी लड़की के यहाँ फ़ोटो खैंचवाने पहुँच गए, कोई पाँच लाख रुपया दे आया। ओवैसी जैसे लोग ने यूपी चुनाव में उस लड़की नाम भुनाया। और जिन लड़कियों ने हिजाब के लिए असली जद्दोजहद की उन्हें कोई जानता नही।

अगर आप मेरी नज़र से देखें तो यहाँ मुसलमानो को हमेशा की तरह इंधन बनाया गया है। और इसके लिए मुसलमान ख़ुद भी ज़िम्मेदार हैं, क्यूँकि Advocacy के लिए ज़मीन पर उतर कर काम करने की जगह मेरी तरह सोशल मीडिया को हक़ीक़त मान के अपना काम चला लेते हैं।

बाक़ी इस्लाम में सतर ढकना मर्द और औरत दोनो पर फ़र्ज़ है, जो इसमें घोल मोल करेगा, क़यामत के दिन उसे अल्लाह के सामने हिसाब देना पड़ेगा। ये हमारा ईमान है। अल्लाह फ़ित्ना और शर से हमारी हिफ़ाज़त फ़रमाए।